नौ साल एक लंबा अरसा होता है, इतना लंबा कि किसी गहरे घाव पर वक्त की चमड़ी चढ़ जाए, पर अंदर की कसक पूरी तरह कभी खत्म नहीं होती। जब अवंतिका की गाड़ी “शांति कुंज” के बड़े से लोहे के फाटक के सामने रुकी, तो उसके हाथ खुद-ब-खुद स्टीयरिंग व्हील पर कस गए। पतझड़ के सूखे पत्ते हवेली के अहाते में बिखरे पड़े थे और हवा में अगरबत्तियों की तीखी, भारी महक के साथ सन्नाटा घुला हुआ था।
यह वही घर था, जहां नौ साल पहले वह लाल जोड़े में मंगलकामनाओं के बीच ब्याह कर आई थी। उसके ससुर, शहर के प्रतिष्ठित सिविल सर्जन डॉ. कैलाशनाथ त्रिवेदी का यह पुश्तैनी आशियाना कभी खुशियों से चहकता था। अवंतिका के पति, बड़े कॉरपोरेट बैंकर कुणाल त्रिवेदी की हनक और रुतबा इसी चारदीवारी से झलकता था। लेकिन आज उसी घर के बाहर सफेद कपड़ों में खड़े लोगों की खामोश भीड़ किसी अनहोनी की गवाही दे रही थी। घर की दहलीज पर शोक की चादर तनी थी, क्योंकि कुणाल की दूसरी पत्नी, राधिका, अब इस दुनिया में नहीं रही थी। अचानक हुए ब्रेन हैमरेज ने राधिका की जिंदगी असमय ही छीन ली थी।
गाड़ी से उतरते ही अवंतिका की सांसें पल भर के लिए थमीं। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी साड़ी के पल्लू को ठीक किया और सीधे कदमों से उस घर के अंदर कदम रखा, जिसे वह कभी मुड़कर न देखने की कसम खाकर छोड़ गई थी। बरामदे में फूलों से सजी अर्थी रखी थी। सफेद कफन के नीचे राधिका का शांत चेहरा नजर आ रहा था। कुणाल सिर झुकाए, निष्प्राण से एक कोने में बैठे थे। जैसे ही अवंतिका अंदर दाखिल हुई, वहां मौजूद कुछ रिश्तेदारों की कानाफूसी सहसा बंद हो गई। कुणाल ने चौंककर सिर उठाया। अवंतिका को अपने सामने देखकर उनकी पथराई आंखों में अविश्वास, शर्म और हैरानी का तूफान तैर गया। कुणाल को सपने में भी यह उम्मीद नहीं थी कि जिस औरत को उन्होंने बेरहमी से ठुकरा दिया था, वह आज इस रूप में उनके घर कदम रखेगी।
अवंतिका ने कुणाल की ओर एक नजर भी नहीं डाली। उसकी आंखें केवल एक शख्स को तलाश रही थीं। हॉल के दूसरे कोने में, सोफे पर सफेद सूती साड़ी पहने, आंसुओं में डूबी उसकी पूर्व सास, उमा जी बैठी थीं। उनकी कांपती गोद में सात साल का एक मासूम बच्चा चेहरा छिपाए सिसक रहा था। वह कबीर था, राधिका और कुणाल का बेटा। कबीर के नन्हे कंधे डर और रुलाई से कांप रहे थे। चारों तरफ का रोना-धोना और मां का निष्प्राण शरीर देखकर वह सहम चुका था।
अवंतिका तेज कदमों से आगे बढ़ी और बिना किसी झिझक के उमा जी के घुटनों के पास फर्श पर बैठ गई। उसने बेहद नरमी से उमा जी के थरथराते हाथों को अपनी हथेलियों में थाम लिया। उमा जी ने धुंधली नजरों से ऊपर देखा। अवंतिका का चेहरा देखते ही उनके सब्र का बांध टूट गया।
“अवंतिका… तू आ गई बेटी?” उमा जी की आवाज गले में ही घुट गई। उन्होंने अवंतिका का माथा चूम लिया और फूट-फूटकर रो पड़ीं। “मैंने सोचा भी नहीं था कि तू कभी इस मनहूस चौखट पर दोबारा कदम भी रखेगी। मेरी काव्या कैसी है? तू उसे साथ नहीं लाई?”
“काव्या बिल्कुल ठीक है, मां जी। उसे नानी के घर छोड़कर आई हूं। इस माहौल में उसे लाना ठीक नहीं लगा,” अवंतिका ने बेहद शांत और सधे हुए स्वर में कहा।
“अवंतिका, मेरा कलेजा फटा जा रहा है,” उमा जी ने अपनी गोद में दुबके कबीर के सिर पर हाथ फेरते हुए बिलखकर कहा। “राधिका तो चली गई… पर इस मासूम का क्या होगा? कुणाल अपने काम और दुनियादारी से कभी बाहर नहीं निकला। यह बच्चा तो जीते जी अनाथ हो गया। मुझे दिन-रात यही चिंता खाए जा रही है कि मेरे बाद इस फूल जैसे बच्चे को कौन संभालेगा?”
“मां जी, आप खुद को संभालिए। रोने से आपकी तबीयत और बिगड़ जाएगी। बीपी बढ़ गया तो मुश्किल होगी,” अवंतिका ने प्यार से उनके आंसू पोंछे और गिलास से पानी पिलाया।
उमा जी का सिर सहलाते हुए अवंतिका की नजरें उस नन्हे कबीर पर टिक गईं। कबीर ने धीरे से अपना चेहरा उमा जी की गोद से निकाला और बड़ी-बड़ी, भीगी आंखों से अवंतिका को देखा। उस मासूम के चेहरे पर जो लाचारी, खालीपन और डर था, उसने अवंतिका के दिल को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। वह बच्चा किसी भी दुश्मनी या अतीत के गुनाह से बिल्कुल परे था।
अवंतिका के जेहन में नौ साल पुरानी यादें किसी धारदार खंजर की तरह तैरने लगीं। वह वक्त कैसा था, जब वह खुद गर्भवती थी और उसके पेट में काव्या पल रही थी। उसी नाजुक दौर में कुणाल के जीवन में राधिका का प्रवेश हुआ था। कुणाल ने राधिका के आकर्षण और नए सपनों के लिए अवंतिका के बरसों के प्रेम, वफादारी और पवित्र रिश्ते को तिनके की तरह उड़ा दिया था। जब अवंतिका को सबसे ज्यादा सहारे की जरूरत थी, कुणाल ने साफ कह दिया था कि वह अब उसके साथ नहीं रह सकते और राधिका से शादी करना चाहते हैं।
उस दिन इसी “शांति कुंज” में महाभारत मची थी। उमा जी अपने बेटे के फैसले के खिलाफ दीवार बनकर खड़ी हो गई थीं। उन्होंने कुणाल को जायदाद से बेदखल करने तक की धमकी दी थी, पर कुणाल के सिर पर नया सुरूर सवार था। उमा जी ने रोते हुए अवंतिका के पैर पकड़ लिए थे, “बेटी, तू मत जा। तू इस घर की बहू है, मैं तुझे कुणाल के साथ नहीं, अपने साथ रखूंगी।”
पर अवंतिका का स्वाभिमान तब भी जिंदा था। उसने आंसू पोंछकर सास से कहा था, “नहीं मां जी। जिस रिश्ते में सम्मान और वफादारी ही न बची हो, उस रिश्ते की लाश को घसीटने का कोई मतलब नहीं। जब कुणाल ने अपने दिल में किसी और को मेरी जगह दे दी है, तो मैं इस छत के नीचे एक बोझ या दया की पात्र बनकर नहीं रह सकती। अगर मैं आज समझौता कर लूंगी, तो आने वाले कल में अपने बच्चे को आत्मसम्मान का पाठ कैसे पढ़ाऊंगी?”
अवंतिका उस दिन सूटकेस उठाकर निकल गई थी। उसके जाने के कुछ महीनों बाद काव्या का जन्म हुआ। कुणाल ने कभी पलटकर अपनी सगी बेटी का हाल तक नहीं पूछा था। न तो अस्पताल आए, न कभी एक फोन किया कि दोनों मां-बेटी जिंदा भी हैं या किस हाल में गुजर-बसर कर रही हैं। सिर्फ उमा जी थीं, जो चोरी-छिपे अवंतिका से मिलती थीं, काव्या को दुलारती थीं और रोती थीं।
अवंतिका ने उन नौ सालों में खुद को बिखरने नहीं दिया। उसने अपने पुराने हुनर को तराशा, अपनी इंटीरियर डिजाइनिंग की डिग्री को काम में लाया, दिन-रात मेहनत की और आज शहर की एक जानी-मानी डिजाइन फर्म की मालकिन थी। उसने काव्या को बेहतरीन परवरिश दी थी, बिना किसी के सहारे, बिना किसी की खैरात के।
तभी बाहर शंख और मंत्रोच्चार की आवाज गूंजी। अर्थी उठाने का समय हो गया था। कुणाल और कुछ लोग आगे बढ़े। अर्थी उठते ही घर में चीख-पुकार मच गई। कबीर अपनी जगह से उठकर बदहवास सा चिल्लाया, “मम्मा! मम्मा को कहां ले जा रहे हो? मम्मा, उठो!”
बच्चे की चीख ने वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर दिया। वह दरवाजे की तरफ दौड़ने लगा, तभी अवंतिका ने तेजी से आगे बढ़कर उसे अपनी बाहों में समेट लिया। कबीर छटपटाया, उसने अवंतिका के सीने पर अपने नन्हे हाथों से मारा, “मुझे मम्मा के पास जाना है! छोड़ो मुझे!”
अवंतिका ने उसे कसकर गले से लगा लिया। उसने बच्चे की पीठ पर हाथ फेरते हुए बेहद ममतामयी आवाज में कहा, “कबीर… शांत हो जाओ बेटा। मैं हूं ना… यहां देखो, सब ठीक हो जाएगा।”
अवंतिका के स्पर्श में कोई बनावट नहीं थी, कोई दिखावा नहीं था। वह एक मां का सच्चा, सुरक्षित आंचल था। कबीर की छटपटाहट धीरे-धीरे कम होने लगी। उसने अवंतिका के कुर्ते को अपनी मुट्ठियों में जकड़ लिया और उसके कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोने लगा। अवंतिका के खुद के आंसू कबीर के बालों में गिरकर समा गए।
अंतिम यात्रा निकल चुकी थी। कुणाल श्मशान के लिए जा चुके थे। घर में केवल औरतें और सन्नाटा बचा था। अवंतिका ने कबीर को सोफे पर बैठाया, उसके आंसू पोंछे और उसे थोड़ा सा दूध पिलाया। रोते-रोते कबीर की आंखें भारी हो गईं और वह अवंतिका की गोद में ही सो गया।
उमा जी यह सब एकटक देख रही थीं। उनके चेहरे पर अवंतिका के लिए श्रद्धा के भाव थे। वे धीरे से बोलीं, “अवंतिका, कुणाल ने तेरे साथ जो किया, वह माफी के लायक नहीं है। उसने तेरी ममता, तेरे भरोसे का कत्ल किया था। पर आज तूने जिस तरह कबीर को संभाला है… मुझे लगता है कि ईश्वर ने ही तुझे भेजा है।”
अवंतिका ने कबीर के माथे से बिखरी लटों को पीछे किया और शांत भाव से बोली, “मां जी, मेरा जो हिसाब-किताब था, वह कुणाल से था। इस मासूम बच्चे ने तो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। बच्चे तो मिट्टी के घड़े होते हैं, उन्हें नहीं पता होता कि बड़ों ने क्या गलतियां की हैं। राधिका चली गई, उसकी गलतियां भी उसी के साथ चली गईं। पर यह बच्चा… यह तो नितांत अकेला हो गया है।”
“तू बहुत महान है बेटी,” उमा जी रुंधे गले से बोलीं।
“महान नहीं हूं मां जी, बस एक मां हूं। जो दर्द मैंने और मेरी काव्या ने सहा है, मैं नहीं चाहती कि किसी भी हाल में यह बच्चा उस खालीपन और अकेलेपन की आग में झुलसे,” अवंतिका ने दृढ़ता से कहा।
दोपहर ढल चुकी थी। अवंतिका ने कबीर को बिस्तर पर लिटाया और उमा जी से विदा लेने लगी। “मां जी, अब मुझे चलना चाहिए। काव्या मेरा इंतजार कर रही होगी।”
उमा जी ने उसका हाथ पकड़ लिया, उनकी आंखों में एक अनकही विनती थी, “अवंतिका… क्या तू फिर कभी नहीं आएगी? क्या इस बच्चे को हमेशा के लिए इस वीराने में छोड़ जाएगी?”
अवंतिका ने कुछ देर सोचा, फिर बोली, “मां जी, मैं इस घर में कभी बहू बनकर नहीं आऊंगी, क्योंकि वह रिश्ता नौ साल पहले ही राख हो चुका था। पर मैं एक इंसान और एक मां के नाते इस बच्चे से मुंह नहीं मोड़ूंगी। जब भी कबीर को मेरी जरूरत होगी, मैं आऊंगी। और अगर आप चाहें, तो कबीर को काव्या से मिलाने मेरे घर भी भेज सकती हैं। आखिर दोनों भाई-बहन हैं, उनका आपस में क्या बैर?”
उमा जी ने हाथ जोड़ लिए, उनके पास शब्द नहीं थे।
अवंतिका बाहर बरामदे में निकली ही थी कि श्मशान से कुणाल लौटते दिखाई दिए। उनके बाल बिखरे थे, कपड़े अस्त-व्यस्त थे और चेहरे पर एक गहरा अवसाद था। सामने अवंतिका को देखकर उनके कदम ठिठक गए। वर्षों बाद दोनों एक-दूसरे के इतने करीब आमने-सामने खड़े थे।
कुणाल की नजरें शर्म से झुक गईं। वे कुछ बोलना चाहते थे, उनके होंठ हिले, पर जबान से लफ्ज नहीं फूटे। जो इंसान कभी अहंकार के नशे में चूर था, आज वह अपनी ही नजरों में बौना साबित हो चुका था।
अवंतिका ने रुककर कुणाल को देखा। उसकी आंखों में न तो नफरत थी, न बदले की भावना, न ही कोई शिकायत। वहां सिर्फ एक शांत, असीम गरिमा थी।
“कुणाल जी,” अवंतिका की आवाज बिल्कुल स्थिर थी। “जो हुआ, उसका मुझे अफसोस है। राधिका की आत्मा को शांति मिले। लेकिन याद रखिएगा, आपने एक बार एक बेटी को उसके हक से महरूम किया था। आज ईश्वर ने आपको कबीर के रूप में एक और मौका दिया है। अपनी गलतियों और अपने गम में इस बच्चे को मत खो देना। उसे इस वक्त एक पिता के सबसे मजबूत कंधे की जरूरत है। पिता बनने की जिम्मेदारी अब मत भूलिएगा।”
कुणाल ने धीरे से अपनी भीगी आंखें उठाईं और लड़खड़ाती आवाज में कहा, “अवंतिका… मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ जो किया, शायद आज उसी का फल भुगत रहा हूं। मैंने तुम्हारा घर उजाड़ा, तुम्हारी खुशियां छीनीं… और आज तुम मेरे बच्चे के आंसुओं को सहारा देने आई हो? मैं तुम्हारे सामने खड़ा होने के काबिल भी नहीं हूं।”
“माफी मांगने से बीता हुआ वक्त नहीं लौटेगा, कुणाल जी,” अवंतिका ने सहजता से कहा। “मैंने आपको बहुत पहले ही माफ कर दिया था, इसलिए नहीं कि आपकी गलती छोटी थी, बल्कि इसलिए कि मैं अपनी जिंदगी में आपकी नफरत का बोझ लेकर नहीं चलना चाहती थी। माफ करके मैं खुद आजाद हो गई थी। आज मैं यहां आपके लिए नहीं, सिर्फ मां जी और इस अनाथ हुए बच्चे की खातिर आई थी।”
इतना कहकर अवंतिका मुड़ी और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गई। कुणाल अपलक उसे जाते हुए देखते रहे। उन्हें एहसास हुआ कि जिसे वे नौ साल पहले कमजोर समझकर छोड़ चुके थे, वह आज आत्मबल, गरिमा और संस्कारों के उस शिखर पर खड़ी थी, जहां तक उनका पहुंचना नामुमकिन था।
गाड़ी में बैठकर अवंतिका ने खिड़की का शीशा नीचे किया। ठंडी हवा उसके चेहरे को छूकर गुजरी। उसने महसूस किया कि नौ साल से उसके दिल के किसी अनजाने कोने में जो एक हल्की सी टीस बची थी, वह आज पूरी तरह धुल चुकी थी। उसने नफरत का जवाब नफरत से नहीं, बल्कि अपनी गरिमा और करुणा से दिया था। उसने कबीर के रूप में अपनी बेटी काव्या को उसका भाई लौटाने का फैसला कर लिया था।
जिंदगी ने उसे जख्म दिए थे, लेकिन उसने उन जख्मों को अपनी कमजोरी नहीं, बल्कि अपनी ताकत बना लिया था। गाड़ी आगे बढ़ चली—एक नए सवेरे, एक नई सुबह और एक संपूर्ण जीवन की ओर।
अक्सर हम नफरत के बदले नफरत देकर खुद को ही नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन असली बड़प्पन और ताकत तब नजर आती है जब हम अपनों के दिए गहरे जख्मों के बावजूद किसी बेकसूर के लिए ढाल बनकर खड़े हो जाएं। अवंतिका का यह फैसला केवल कबीर के लिए सहारा नहीं था, बल्कि उसके अपने आत्मसम्मान और ममता की सबसे बड़ी जीत थी। क्या आपको लगता है कि अवंतिका ने कुणाल की गलतियों को भुलाकर कबीर को अपनाकर सही फैसला किया? अगर आप अवंतिका की जगह होते, तो क्या उस मासूम बच्चे के लिए यही कदम उठाते? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : रचना कंडवाल