जलन – खुशी

निशा और सिया दो चचेरी-तहेरी बहनें थीं। दोनों बचपन से ही साथ पली-बढ़ी थीं, लेकिन दोनों के स्वभाव और गुणों में बहुत अंतर था।

निशा साँवली-सलोनी, समझदार, मेहनती और गुणी लड़की थी। पढ़ाई में वह बहुत तेज थी और हमेशा अच्छे अंक प्राप्त करती थी। घर के कामों में उसकी बहुत अधिक रुचि नहीं थी, लेकिन ऐसा भी नहीं था कि उसे कोई काम नहीं आता था। आवश्यकता पड़ने पर वह घर का हर काम पूरी जिम्मेदारी से कर लेती थी।

इसके विपरीत सिया देखने में बहुत सुंदर थी। उसे अपनी सुंदरता पर बहुत गर्व था, लेकिन पढ़ाई और घर के कामों में उसकी विशेष रुचि नहीं थी। जब भी घर में कोई निशा की प्रशंसा करता और कहता, “निशा कितनी होशियार है, पढ़ाई में भी इतनी अच्छी है और जरूरत पड़ने पर घर के सारे काम भी कर लेती है,” तो सिया के मन में जलन पैदा हो जाती।

वह हमेशा सोचती, “आखिर सब लोग निशा की ही तारीफ क्यों करते हैं? कोई मेरी तारीफ क्यों नहीं करता?”

धीरे-धीरे यह जलन उसके मन में गहरी होती गई। वह हर अवसर पर खुद को निशा से बेहतर दिखाने की कोशिश करने लगी। जहाँ निशा शांत रहकर अपना काम करती, वहीं सिया आगे बढ़कर अपनी बातें बताती और सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करती।

समय बीतता गया और दोनों लड़कियाँ बड़ी हो गईं।

निशा ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद आईएएस की तैयारी शुरू कर दी थी। दूसरी ओर सिया बी.ए. के अंतिम वर्ष में थी। इसी बीच निशा के लिए एक बहुत अच्छे परिवार से रिश्ता आया।

लड़के का नाम अमर था। वह एक प्रतिष्ठित बैंक में मैनेजर था। देखने में सुंदर, सुशील और सुदर्शन युवक था। उसके परिवार के संस्कार भी अच्छे थे। अमर के परिवार वाले निशा को देखने के लिए घर आने वाले थे।

घर में सभी बहुत खुश थे। सबको विश्वास था कि अमर और उसका परिवार निशा को पसंद करेगा।

जिस दिन अमर का परिवार आया, निशा उस समय अपने दफ्तर से लौटकर नहीं आई थी। सिया ने जैसे ही मेहमानों को देखा, वह बहुत सज-धजकर उनके सामने आने लगी। वह कभी इधर जाती, कभी उधर आती और बार-बार अपनी ओर सबका ध्यान खींचने की कोशिश करती।

कुछ देर बाद निशा की माँ उसे तैयार करके कमरे में लेकर आईं।

बातचीत के दौरान अमर की माँ ने मुस्कुराकर पूछा,

“बेटा निशा, तुम्हें घर के कामों में क्या-क्या बनाना आता है?”

निशा कुछ कहती, उससे पहले ही सिया तपाक से बोल पड़ी,

“आंटी जी, निशा दीदी तो पढ़ाई और ऑफिस में बहुत व्यस्त रहती हैं। घर के कामों में मैंने ही ताई जी की बहुत मदद की है। खाना बनाना, मेहमानों की देखभाल करना… ये सब मैं कर लेती हूँ।”

सिया की बातों में आत्मविश्वास और बनावटी विनम्रता दोनों थे। वह बार-बार अमर और उसके परिवार के सामने अपनी खूबियाँ गिनाती रही।

निशा चुपचाप सब देखती रही। उसने सिया को रोकना उचित नहीं समझा।

अमर के परिवार को सिया की बातें बहुत अच्छी लगीं। उन्हें लगा कि सिया घर-गृहस्थी संभालने वाली, मिलनसार और व्यवहार-कुशल लड़की है। देखते ही देखते परिस्थिति ऐसी बन गई कि जो रिश्ता निशा के लिए आया था, वह सिया की ओर मुड़ गया।

सिया के मन में खुशी की लहर दौड़ गई।

उसे लगा कि उसने आखिरकार निशा को पीछे छोड़ दिया है।

कुछ ही समय बाद सिया और अमर का विवाह हो गया। निशा के माता-पिता ने भी मन को समझाया, “चलो, बेटी सिया का घर अच्छे परिवार में बस गया। निशा के लिए भी अच्छा रिश्ता मिल जाएगा।”

सिया को पूरा विश्वास था कि अमर से शादी करके उसकी जिंदगी बहुत आराम और शान से बीतेगी। उसे लगता था कि अब वह निशा से हर मामले में आगे निकल गई है।

कुछ समय बाद निशा के लिए भी एक रिश्ता आया। लड़के का नाम विवेक था। वह नौसेना में वन-रैंक ऑफिसर था और सीआईएस से भी जुड़ा एक प्रतिष्ठित अधिकारी था। विवेक पढ़ा-लिखा, संस्कारी और जिम्मेदार युवक था।

जब विवेक और उसके परिवार ने निशा को देखा, तो उन्हें उसका सरल स्वभाव, बुद्धिमत्ता और आत्मविश्वास बहुत पसंद आया। निशा और विवेक की जोड़ी सभी को बहुत अच्छी लगी।

निशा और विवेक का विवाह भी धूमधाम से हो गया।

शादी के बाद दोनों अपने-अपने जीवन में आगे बढ़ने लगे।

निशा ने अपनी पढ़ाई और मेहनत जारी रखी। दूसरी ओर सिया को धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि केवल सुंदरता और दिखावे के सहारे जीवन नहीं चलता। अमर की नौकरी अच्छी थी, लेकिन घर और जीवन की जिम्मेदारियाँ भी बहुत थीं। जिन कामों को लेकर सिया ने शादी से पहले अपने बारे में बढ़-चढ़कर बातें की थीं, अब वही काम उसके सामने थे।

सिया को घर संभालने में कठिनाई होने लगी। उसे धीरे-धीरे अपनी उन कमियों का एहसास होने लगा, जिन्हें वह कभी स्वीकार नहीं करना चाहती थी।

उधर निशा ने अपनी मेहनत जारी रखी और एक दिन उसकी मेहनत रंग लाई। उसे एक बड़ी सफलता प्राप्त हुई।

जब यह खबर परिवार में पहुँची तो सभी लोग निशा की प्रशंसा करने लगे।

सिया यह सुनकर फिर से जल उठी।

लेकिन इस बार कहानी पहले जैसी नहीं थी।

निशा ने सिया के प्रति मन में कोई कटुता नहीं रखी थी। उसने कभी यह नहीं कहा कि सिया ने उसका रिश्ता छीन लिया था। वह अपने जीवन में आगे बढ़ चुकी थी और अपनी मेहनत से खुश थी।

सिया को पहली बार महसूस हुआ कि उसने जिंदगी भर निशा से मुकाबला करने में अपना समय गंवा दिया। जिस खुशी को वह दूसरों को पीछे छोड़कर पाना चाहती थी, वह उसे कभी नहीं मिली।

उसने सोचा—

“अगर मैंने निशा से जलने के बजाय उससे कुछ सीखा होता, तो आज मैं भी अपने जीवन में बहुत आगे होती।”

उस दिन सिया को समझ आया कि किसी दूसरे की रोशनी बुझाने से अपना दीपक उजाला नहीं करता।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

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