जलनखोर – गीता वाधवानी

” आज चलो ना अविनाश मम्मी पापा से मिलने” श्रुति ने प्यार से मनुहार करते हुए अविनाश से कहा। 

 अविनाश-” आज नहीं, कल आऊंगा और वो भी अपने मम्मी पापा को साथ लेकर कल ठीक रहेगा क्योंकि कल रविवार है। ” 

 श्रुति-” सच्ची, सच कह रहे हो ना तुम? ” 

 अविनाश-” हां बाबा बिल्कुल सच्ची, हम लोग तुम्हारे घर 12:00 तक पहुंच जाएंगे। ” 

 श्रुति-” अच्छा ठीक है, हम लोग इंतजार करेंगे। ” 

 अविनाश और श्रुति कॉलेज में साथ पढ़ते थे और एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। कॉलेज की पढ़ाई खत्म होने के बाद भी दोनों का प्यार कायम था और अब दोनों अलग-अलग ऑफिस में काम करते थे। 

      अगले दिन अविनाश अपने माता-पिता के साथ श्रुति के घर समय से पहुंच गया। दोनों के माता-पिता भी बहुत खुश थे। अविनाश के मम्मी पापा को श्रुति बहुत पसंद आई और श्रुति के मम्मी पापा को अविनाश। 

 चट मंगनी और पट ब्याह तय हो गया। श्रुति ब्याह कर अविनाश के घर आ गई। कुछ दिन सास ससुर के साथ रही और फिर अविनाश का ट्रांसफर हैदराबाद में हो गया।श्रुति ने अपनी जॉब छोड़ दी और घर संभाल लिया। 

 दोनों बहुत खुश थे। अविनाश श्रुति की हर ख्वाहिश पूरी करता था। श्रुति के कुछ कहने से पहले ही वह सब कुछ समझ जाता था। उसे दिल खोलकर शॉपिंग करवाता था। वीकेंड पर घूमने ले जाता था,रेस्टोरेंट में खाना खिलाता था।     गीता वाधवानी दिल्ली

 कभी मॉल ले जाता था तो कभी मूवी। अगर कभी तबीयत खराब हो जाए तो अच्छे से अच्छे डॉक्टर को दिखाता था। जब भी कहीं घूमने ले जाता था तो कैब बुक करता था। कभी किसी तरह की कोई कंजूसी नहीं और ना ही कोई रोक-टोक।।

 समय-समय पर सरप्राइज देता था और श्रुति को गिफ्ट भी देता था। 

 एक दिन श्रुति ने अविनाश से कहा -” मैं पूरा दिन घर पर बैठकर बोर हो जाती हूं क्यों ना मैं कहीं जॉब ढूंढ लूं। दो लोगों का ही तो काम है घर में, उसे करने के बाद मैं पूरा दिन बोर होती रहती हूं। समझ ही नहीं आता कि अब क्या करूं। ” 

 अविनाश-” वैसे तो जरूरत नहीं है, पर तुम करना चाहती हो तो तुम्हारी मर्जी, लेकिन तुम पर डबल काम हो जाएगा क्योंकि तुम्हें पता है कि मुझे किचन का काम बिल्कुल नहीं आता। ” 

 श्रुति-” मैं सब संभाल लूंगी, ठीक है मैं कल से जॉब ढूंढना शुरू करती हूं। ” 

 श्रुति बहुत खुश थी। लगभग 2 महीने बाद उसको एक अच्छी जॉब मिल गई। दोनों ने मिलकर तय किया कि श्रुति की सैलरी से बचत की जाएगी और अविनाश पूरे घर के खर्च उठाएगा। 

 घर बहुत बढ़िया तरीके से चल रहा था। इधर अचानक अविनाश की नौकरी चली गई। दरअसल अविनाश का बॉस लड़कियों के मामले में सही इंसान नहीं था। लड़कियों को इधर-उधर स्पर्श करना और उनके साथ भददे मजाक  करना उसकी आदत थी। 

 अविनाश ने कई बार उनको ऐसा करने से रोका भी था और उनका विरोध किया था लेकिन अधिकतर लोग नौकरी की खातिर चुप हो जाते थे यहां तक की खुद लड़कियां भी। 

 लेकिन इस बार बस का पाला शक्ति नाम की लड़की से पड़ा था जो कि किसी भी सूरत में उसकी बदतमीजियां सहन नहीं कर रही थी बल्कि उसने तो उसकी कंप्लेंट भी लिखवा दी थी और अविनाश ने गवाही भी दे दी थी। 

 बॉस को पुलिस पकड़ कर ले गई थी। उसे कुछ समय की जेल हुई और जुर्माना भी लगा। लेकिन कुछ समय बाद वह छूट कर आ गया और उसने आते ही सबसे पहले झूठे इल्जाम लगाकर अविनाश को नौकरी से निकलवा दिया और शक्ति तो पहले ही नौकरी छोड़कर जा चुकी थी। 

 अविनाश बहुत परेशान था कि अब क्या होगा। घर का खर्च कैसे चलेगा। तब श्रुति ने उसे तसल्ली दी और कहा कि दूसरी जॉब ढूंढ लेना और फिर मेरे पास तो नौकरी है ही। 

 एक महीना ऐसे ही बीत गया। अविनाश कोशिश कर रहा था। अब अविनाश घर के कामों में श्रुति की मदद कर रहा था और काफी कुछ काम करना उसे आ गया था।       गीता वाधवानी दिल्ली

 दूसरा महीना भी बीत गया। अब श्रुति ने सारे काम उसके हवाले ही छोड़ दिए थे और उसके ऊपर रोब चलने लगी थी। वह खुद को कमाऊ और अविनाश को निकम्मा समझने लगी थी। 

 तीसरे महीने भी अविनाश को कोई नौकरी नहीं मिली। अब अविनाश को कहीं जाना हो या कभी कुछ बाहर खाने का मन हो  ‌, तो श्रुति से पैसे मांगने पढ़ते थे। इसीलिए वह कई बार अपने मन को मार लेता था। श्रुति पैसे तो दे देती थी लेकिन ऐसे मुंह बनाती थी जैसे अविनाश पर एहसान कर रही हो। 

   4 महीने बीत गए। अविनाश तंग आ चुका था। एक दिन श्रुति ने उससे कहा-” मैं तुम्हारे खर्चों से तंग आ चुकी हूं, मुझे तो तुमसे जलन होने लगी है, तुम तो सारा दिन घर में ए सी चला कर आराम से बैठे रहते हो और मैं कमाने के लिए धक्के खा रही हूं। और मेरी सारी कमाई घर के खर्चों में खत्म हो जाती है। ऐसा कब तक चलेगा। ” 

 अविनाश-” तो क्या मैं जानबूझकर घर पर बैठा हूं या फिर मैं घर बैठकर सारा दिन आराम करता हूं, झाड़ू पोछा से लेकर खाना बनाने तक सारे काम करता हूं, तुम ऑफिस से आकर महारानी की तरह बैठ जाती हूं यहां तक की पानी भी खुद नहीं पीती हो। ” 

     दोनों की इस बात पर लड़ाई हो गई। 5 महीने बीत चुके थे। आज अविनाश का इंटरव्यू था। उसके पास ₹1 भी नहीं था। उसने बहुत झिझकते हुए श्रुति से पैसे मांगे।       गीता वाधवानी दिल्ली

 श्रुति-” मैं तो तुमसे तंग आ चुकी हूं, जब देखो पैसे मांगते रहते हो, यह को ₹200। ” 

 अविनाश-” इतनी दूर ऑफिस है ₹200 से क्या होगा? ” 

 श्रुति ने चिढ़कर कहा -” जरूरी तो नहीं है कैब में जाना, बस में जाओ। ” 

 अविनाश इंटरव्यू के समय से बहुत पहले ही घर से निकल गया और बस में चढकर समय पर इंटरव्यू देने पहुंच गया और अच्छी बात यह रही की इंटरव्यू सफल रहा। 

 इंटरव्यू सफल होने के बाद वह चुपचाप बैठा था। तब बॉस के पूछने पर उसने सकुचाते हुए कहा -” सर अगर कुछ एडवांस मिल जाता तो अच्छा रहता क्योंकि मेरे पास बहुत समय से नौकरी नहीं थी तो  जेब बिल्कुल खाली है। ” 

 उसे कुछ एडवांस मिल गया था। घर जाकर अविनाश ने सबसे पहले ₹200 निकालकर श्रुति के मुंह पर मारे। ” येलो अपने ₹200, जब तुम नौकरी नहीं कर रही थी तब मैं तुम्हारे सारे खर्चे खुशी-खुशी उठाए, तुम्हारी सारी इच्छाएं, तुम्हारे सारे शौक पूरे किए। हर जगह तुम्हें कैब में घूमाने ले गया, अपनी मेहनत की कमाई से तुम्हें रेस्टोरेंट में खाना खिलाया तुम्हें गिफ्ट दिए, तुम्हें सरप्राइज दिए, और आज मैं तुम्हें यह सब इसीलिए याद दिला रहा हूं क्योंकि तुमने 5 महीनो में ही मुझे ताने देना शुरू कर दिया था। तुमने इन 5 महीनो में मुझे बहुत बार नीचा दिखाया है। मेरी कमाई घर खर्च के लिए और तुम्हारी कमाई सिर्फ तुम्हारे लिए। श्रुति, तुम कितनी स्वार्थी और जलनखोर हो, यह मैं अच्छी तरह समझ चुका हूं। 

 अब से हम दोनों घर का खर्च आधा-आधा निकालेंगे और मैं अपने लिए बचत हर हाल में करूंगा क्योंकि वक्त का कुछ पता नहीं कभी भी जरूरत पड़ सकती है और मैं तुम्हारे आगे हाथ नहीं फैलाना चाहता। ” 

 श्रुति को अपनी गलती का एहसास हो रहा था लेकिन रिश्ते में कड़वाहट आ चुकी थी। 

 कहानी पढ़ने के लिए आप सभी का धन्यवाद 

 स्वरचित अप्रकाशित गीता वाधवानी दिल्ली

#जलन

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