अतीत की दहलीज पर

“मैं तुम्हें वापस पाने की जिद नहीं कर रहा हूँ, अनन्या। मैं जानता हूँ मैंने तुम्हारा बहुत दिल दुखाया है। मैं बस इतना चाहता था कि तुम यह जान लो कि तुम्हारी लड़ाई गलत नहीं थी। गलत मैं था। मुझे बस इस एहसास के साथ नहीं जीना था कि तुम मुझे एक डरपोक और धोखेबाज इंसान समझकर नफरत करती हो।” सिद्धार्थ की आँखों से एक आँसू छलक कर टेबल पर गिर पड़ा।

अनन्या का गला रुंध गया था। उसने कभी नहीं सोचा था कि सिद्धार्थ में इतना बदलाव आ सकता है। उसके मन में जमी हुई बर्फ अचानक पिघलने लगी थी, लेकिन दर्द के निशान अभी भी गहरे थे।

दिल्ली के उस मशहूर आर्ट गैलरी में आज खासी भीड़ थी। शहर के नामी चित्रकारों की प्रदर्शनी लगी हुई थी और अनन्या, जो खुद एक उभरती हुई आर्ट क्यूरेटर थी, कैनवस पर उकेरे गए रंगों की गहराई में खोई हुई थी। एक पेंटिंग, जिसमें एक अकेली नाव तूफानी समंदर के बीच रास्ता तलाश रही थी, ने उसे कुछ पल के लिए बाँध लिया था। वह उसी नाव की तरह तो थी, जिसने अपनी जिंदगी के सबसे बड़े तूफान को अकेले ही झेला था। वह पेंटिंग की बारीकियों को समझने के लिए थोड़ा पीछे हटी और तभी उसकी नजर सामने से गुजरते एक शख्स पर पड़ी।

अनन्या के कदम वहीं ठिठक गए। उसके हाथ में पकड़ी हुई प्रदर्शनी की ब्रोशर हल्की सी कांप गई। वह सिद्धार्थ था। वही सिद्धार्थ, जिसकी एक मुस्कान पर कभी वह अपनी पूरी दुनिया लुटाने को तैयार रहती थी, और वही सिद्धार्थ, जिसकी खामोशी ने उसकी दुनिया उजाड़ दी थी।

अनन्या ने तुरंत अपनी नजरें चुरा लीं। वह अचकचाई सी इधर-उधर देखने लगी, मानो किसी और पेंटिंग में उसकी गहरी दिलचस्पी जाग उठी हो। उसके दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं। “यहाँ कैसे? इतने बड़े शहर में, आज ही के दिन उसे यहाँ क्यों आना था?” अनन्या का मन सवालों से घिर गया। उसने एक चोर निगाह फिर से उस तरफ डाली और पाया कि सिद्धार्थ की नजरें भी उसी पर टिकी थीं। उसकी आँखों में एक अजीब सी कशमकश थी, एक ठहराव था जो पहले कभी नहीं दिखा था।

अनन्या ने खुद को संभाला। उसने अपने चेहरे पर एक कठोर भाव ओढ़ लिया और तेजी से गैलरी के निकास द्वार की तरफ कदम बढ़ाने लगी। वह बस इस जगह से, इस हवा से, और सबसे बढ़कर सिद्धार्थ की नजरों से दूर जाना चाहती थी। वह कुछ ही कदम आगे बढ़ी थी कि पीछे से एक परिचित, भारी आवाज ने उसके कदमों को बेड़ियों की तरह जकड़ लिया।

“कैसी हो, अनन्या?”

आवाज बिल्कुल पास से आई थी। सिद्धार्थ उसके ठीक बगल में आकर खड़ा हो गया था। उसकी आवाज में एक झिझक थी, एक अजीब सी नरमी जो अनन्या के लिए नई थी।

“मैं बिल्कुल ठीक हूँ,” अनन्या ने बिना उसकी आँखों में देखे, बेहद रूखेपन से जवाब दिया और अपने कदम आगे बढ़ा दिए।

लेकिन सिद्धार्थ ने इस बार हार नहीं मानी। वह उसके साथ-साथ चलने लगा और थोड़ा रास्ता रोकते हुए बोला, “अनन्या, थोड़ा रुको तो… इतने वक्त बाद, इतने सालों बाद अचानक हम ऐसे मिल ही गए हैं, तो क्या कुछ देर बैठकर बात नहीं कर सकते? पास ही एक कॉफी शॉप है।”

अनन्या ने इस बार पलटकर सीधे उसकी आँखों में देखा। उसकी आँखों में वही पुरानी शिकायतें, वही दर्द और वही गुस्सा था जो डेढ़ साल पहले था। “अब बात करने को बचा ही क्या है सिद्धार्थ? हमारे बीच जो कुछ भी था, वह बहुत पहले खत्म हो चुका है। अब हम एक-दूसरे के लिए महज अजनबी हैं, जिनका कोई साझा कल नहीं है। मुझे देर हो रही है, मुझे जाना होगा।” उसकी आवाज में बर्फ जैसी ठंडक थी।

सिद्धार्थ ने एक गहरी साँस ली, उसके चेहरे पर एक उदासी छा गई। “ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्जी। मैंने तो उसी दिन सोच लिया था, जिस दिन तुम घर छोड़कर गई थीं, कि अब कभी तुम्हारी खुशी के रास्ते में नहीं आऊंगा। मैंने तुम्हारे लिए ही खुद को तुमसे दूर कर लिया था। यहाँ तक कि मैंने मुंबई से अपना ट्रांसफर भी इसी वजह से करवाया था कि तुम्हें मेरी परछाईं भी परेशान न करे। लेकिन आज… आज किस्मत ने न जाने क्यों, फिर से मुझे तुम्हारे सामने लाकर खड़ा कर दिया है।” सिद्धार्थ की आवाज धीमी और भारी हो गई थी।

यह सुनकर अनन्या के अंदर का दबा हुआ ज्वालामुखी जैसे फट पड़ा। वह अचानक गर्म हो गई और गुस्से से बोली, “वाह! बहुत महान काम किया था तुमने सिद्धार्थ। अपनी जिम्मेदारियों से भागने को तुम मेरी खुशी का नाम दे रहे हो? चलो, मुझे तुमसे कोई बहस नहीं करनी है। तुम्हें देखकर मुझे वो पिछला सारा दर्द, वो सारा घुटन भरा किस्सा याद आ गया जिसे मैं भूलने की कोशिश कर रही थी।”

अनन्या वहाँ से निकलने की जल्दी में थी, लेकिन उसकी झुंझलाहट छुप नहीं पा रही थी। वह कभी भी बनावटी जीवन जीने वालों में से नहीं थी। जो उसके मन में था, वही उसकी जुबान पर था। वह तेजी से गैलरी से बाहर आ गई। बाहर मौसम का मिजाज बदल चुका था। आसमान में काले घने बादल छाए हुए थे और हल्की बूंदाबांदी शुरू हो गई थी। उसने कैब बुक की थी, लेकिन बारिश की वजह से कैब को आने में अभी दस मिनट का वक्त था। उसे मजबूरी में गैलरी के बाहर बने उस छोटे से पोर्च में रुकना पड़ा।

तभी उसने महसूस किया कि सिद्धार्थ उसका पीछा करता हुआ वहाँ भी आ पहुँचा है। वह उससे कुछ दूरी पर खड़ा होकर बारिश को देखने लगा, लेकिन उसका पूरा ध्यान अनन्या पर ही था। उसे पास आता देख अनन्या का सब्र टूट गया। उसने कड़ाई से पूछा, “आखिर चाहते क्या हो तुम? क्यों मेरे पीछे पड़े हो? क्या अब भी कुछ कसर बाकी रह गई है मुझे परेशान करने में?”

सिद्धार्थ ने उसकी तरफ देखा, उसकी आँखों में अब कोई बचाव नहीं था, सिर्फ एक गहरी याचना थी। “अनन्या, तुम्हारे जाने के बाद मैंने कई बार तुमसे मिलने की, बात करने की कोशिश की। मैंने तुम्हारे दोस्तों से, तुम्हारी बहन से संपर्क करना चाहा, पर तुमने अपने इर्द-गिर्द ऐसी दीवार खड़ी कर ली थी कि मेरा कोई भी संदेश तुम तक नहीं पहुँच सका।”

“डेढ़ साल पहले मैं वो घर, वो रिश्ते और तुम्हें हमेशा के लिए छोड़ चुकी हूँ। अब तुम मुझसे क्या चाहते हो? क्यों कुरेद रहे हो उन पुराने जख़्मों को?” अनन्या की आवाज में अब गुस्से से ज्यादा एक थकावट थी।

“मैं सच में नहीं जानता था कि आज तुमसे यहाँ, ऐसे मुलाकात हो जाएगी। मैं तो बस इस शहर की भीड़ में खुद को गुम करने आया था। पर अब जब तुम सामने आ ही गई हो… तो प्लीज़, मुझे सिर्फ एक मौका दो। सिर्फ एक बार शांति से बात करने का मौका। मैं कोई सफाई नहीं देना चाहता, बस कुछ कहना चाहता हूँ,” सिद्धार्थ की आवाज में एक ऐसी मिन्नत थी जिसने अनन्या के कठोर आवरण में एक छोटी सी दरार डाल दी।

बारिश तेज हो गई थी और कैब के आने का समय अभी भी पांच मिनट दिखा रहा था। अनन्या ने सामने गिरती बारिश की बूंदों को देखा और फिर एक लंबी साँस खींचकर बोली, “अच्छा ठीक है। कल शाम मिलते हैं। यहाँ नहीं, पास ही ‘द ओक ट्री’ कैफे है। शाम छह बजे। लेकिन यह हमारी आखिरी मुलाकात होगी, सिद्धार्थ।” यह कहकर अनन्या अपनी आ चुकी कैब में बैठ गई और दरवाजा बंद कर लिया।

कैब के शीशे से उसने देखा, सिद्धार्थ बारिश में खड़ा उसे जाते हुए देख रहा था। रास्ते भर अनन्या का दिमाग सुन्न रहा। वह बस यही सोचती रही कि आखिर कैसे भी करके सिद्धार्थ से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाना है। यह कल की मुलाकात बस एक औपचारिकता होगी, एक आखिरी पूर्णविराम। लेकिन क्या सच में ऐसा था?

रात भर अनन्या अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रही। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसके और सिद्धार्थ के रिश्ते के वे पन्ने, जिन्हें उसने बहुत गहराई में दफना दिया था, आज हवा के एक ही झोंके से फिर फड़फड़ाने लगे थे।

उसे याद आया आज से पांच साल पहले का वो वक्त। कॉलेज के दिनों में तीन साल के एक बेहद खूबसूरत रिलेशनशिप के बाद दोनों ने शादी का फैसला किया था। कितनी खुश थी वह। सिद्धार्थ ने उसके हर सपने को अपना बना लिया था। उनके प्यार की मिसालें दी जाती थीं। शादी बहुत धूमधाम से हुई थी। सिद्धार्थ का परिवार लखनऊ का एक पारंपरिक और रसूखदार परिवार था। वे एक संयुक्त परिवार में रहते थे। शादी के बाद कुछ महीनों के लिए दोनों लखनऊ गए थे।

अनन्या एक आजाद ख्यालों वाली, कामकाजी लड़की थी। उसे लगा था कि प्यार हर फासले को मिटा देगा। लेकिन लखनऊ के उस बड़े से पुश्तैनी घर में कदम रखते ही चीजें बदलने लगीं। सिद्धार्थ के माता-पिता, उसके बड़े भाई और भाभी, सभी की उम्मीदें एक ‘आदर्श बहू’ की थीं। उनके नियम, उनके कायदे अनन्या के लिए एक पिंजरे की तरह होने लगे।

शुरुआत में अनन्या ने हर संभव कोशिश की। वह सुबह जल्दी उठती, उनके हिसाब से कपड़े पहनती, त्योहारों पर सारे रीति-रिवाज निभाती। सिद्धार्थ भी खुश था। वह अक्सर अनन्या से कहता कि “बस कुछ दिनों की बात है, फिर हम वापस मुंबई चले जाएंगे।” मुंबई में सिद्धार्थ का एक छोटा सा प्रोजेक्ट चल रहा था।

लेकिन वह ‘कुछ दिन’ कभी खत्म नहीं हुए। सिद्धार्थ के पिता ने उस पर पारिवारिक बिजनेस संभालने का दबाव डालना शुरू कर दिया। सिद्धार्थ, जो हमेशा से अपने पिता के सामने सिर झुकाकर रहने का आदी था, इंकार नहीं कर सका। मुंबई का टिकट कैंसिल हो गया। और इसके साथ ही अनन्या के करियर, उसकी आजादी के सपने भी उसी पुराने घर के आंगन में दफन होने लगे।

धीरे-धीरे घर के छोटे-छोटे तानें बड़े विवादों में बदलने लगे। “हमारी बहू होकर तुम बाहर नौकरी करोगी?” “तुम्हारे पहनने का यह क्या ढंग है?” इन सबके बीच सिद्धार्थ हमेशा चुप रहता। वह न तो अपनी माँ को कुछ कह पाता और न ही पिता को। वह बस रात में बंद कमरे में अनन्या से कहता, “प्लीज़ एडजस्ट कर लो ना, परिवार ही तो है।”

अनन्या को सिद्धार्थ की यह चुप्पी सबसे ज्यादा चुभती थी। जिस इंसान ने उसे दुनिया की हर खुशी देने का वादा किया था, वो उसके आत्मसम्मान के लिए एक शब्द नहीं बोल पा रहा था। दूरियाँ बढ़ने लगीं। एक ही बिस्तर पर सोते हुए भी वे दोनों मीलों दूर हो गए। वह हँसता-खेलता सिद्धार्थ अब एक चिड़चिड़ा इंसान बन गया था, जो ऑफिस और घर के तनाव के बीच पिस रहा था।

और फिर वो दिन आया, जिसे अनन्या कभी नहीं भूल सकती। सिद्धार्थ की बहन की शादी थी। घर में सैकड़ों मेहमान थे। एक छोटी सी रस्म को लेकर सिद्धार्थ की माँ ने सबके सामने अनन्या को खरी-खोटी सुना दी। उसे उसके मायके और उसके संस्कारों को लेकर बहुत कुछ कहा गया। अनन्या की आँखों में आँसू थे, वह सिद्धार्थ की तरफ उम्मीद से देख रही थी, लेकिन सिद्धार्थ ने नजरें झुका लीं और वहाँ से चला गया। उस एक पल ने अनन्या के अंदर के सारे प्यार को, सारी उम्मीदों को मार दिया था।

उसी रात उसने अपना सामान बांधा और हमेशा के लिए उस घर की चौखट पार कर ली। सिद्धार्थ ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अनन्या को समझ आ गया था कि सिर्फ प्यार से रिश्ते नहीं चलते, उसके लिए एक-दूसरे के सम्मान के लिए खड़े होने की हिम्मत भी चाहिए होती है, जो सिद्धार्थ में नहीं थी।

यादों के भंवर से निकलते-निकलते सुबह हो गई। अनन्या की आँखों में एक अजीब सी सूजन थी। उसने खुद को आईने में देखा। वह अब वो सहमी हुई लड़की नहीं थी। आज वह दिल्ली में एक स्वतंत्र जीवन जी रही थी। उसने फैसला कर लिया था कि वह शाम को जाएगी और इस अतीत के दरवाजे को हमेशा के लिए बंद कर देगी।

शाम के छह बज रहे थे। ‘द ओक ट्री’ कैफे के एक शांत कोने में सिद्धार्थ पहले से बैठा था। उसने एक साधारण सी नीली शर्ट पहन रखी थी, वही रंग जो कभी अनन्या का पसंदीदा हुआ करता था। अनन्या जाकर उसके सामने बैठ गई। उसने कॉफी का ऑर्डर दिया और सीधे मुद्दे पर आते हुए बोली, “कहो, क्या कहना चाहते हो? मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है।”

सिद्धार्थ ने अपना कॉफी का कप दोनों हाथों में पकड़ लिया, जैसे उससे कोई गर्माहट ले रहा हो। उसने नजरें उठाईं और सीधे अनन्या की तरफ देखा। “मुझे माफ कर दो अनन्या।”

अनन्या ने एक व्यंग्यात्मक मुस्कान दी। “माफी? डेढ़ साल बाद? और किस बात की माफी? इस बात की कि तुमने मुझे उस घर में घुटने के लिए छोड़ दिया था, या इस बात की कि तुमने कभी मेरा साथ नहीं दिया?”

“हर उस बात की, जहाँ मैं तुम्हारे लिए खड़ा नहीं हो सका,” सिद्धार्थ की आवाज में एक ऐसा दर्द था जो बनावटी नहीं लग रहा था। “तुम्हारे जाने के बाद, मुझे लगा कि शायद वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा। लेकिन तुम्हारे बिना वो घर, वो परिवार मुझे काटने को दौड़ता था। जिन माता-पिता की खुशी के लिए मैंने तुम्हारी खुशियों का गला घोंट दिया, तुम्हारे जाने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं उनके लिए सिर्फ एक मोहरा था, एक आज्ञाकारी बेटा जो उनके हर हुक्म की तामील करे। जब मैंने पहली बार तुम्हारे लिए, हमारे रिश्ते के लिए उनसे सवाल किए, तो मुझे भी उसी तरह बेगाना कर दिया गया जैसे तुम्हें किया गया था।”

अनन्या चुप रही, लेकिन उसकी पकड़ अपने कॉफी के कप पर सख्त हो गई।

सिद्धार्थ आगे बोला, “मुझे समझ आ गया कि तुमने वो घर क्यों छोड़ा था। मैं कायर था अनन्या। मैं रिश्तों के उस जाल में इस कदर उलझा था कि मुझे सही और गलत का फर्क ही नहीं दिखा। मैंने छह महीने पहले वो घर छोड़ दिया। मैंने पारिवारिक बिजनेस से अपना हिस्सा छोड़ दिया और दिल्ली आ गया। मैं फिर से शुरुआत कर रहा हूँ। तुम्हारे बिना, लेकिन तुम्हारी दी हुई हिम्मत के साथ।”

यह सुनकर अनन्या अंदर तक हिल गई। सिद्धार्थ, जो कभी अपने पिता की मर्जी के बिना एक कदम नहीं उठाता था, उसने घर छोड़ दिया था?

“मैं तुम्हें वापस पाने की जिद नहीं कर रहा हूँ, अनन्या। मैं जानता हूँ मैंने तुम्हारा बहुत दिल दुखाया है। मैं बस इतना चाहता था कि तुम यह जान लो कि तुम्हारी लड़ाई गलत नहीं थी। गलत मैं था। मुझे बस इस एहसास के साथ नहीं जीना था कि तुम मुझे एक डरपोक और धोखेबाज इंसान समझकर नफरत करती हो।” सिद्धार्थ की आँखों से एक आँसू छलक कर टेबल पर गिर पड़ा।

अनन्या का गला रुंध गया था। उसने कभी नहीं सोचा था कि सिद्धार्थ में इतना बदलाव आ सकता है। उसके मन में जमी हुई बर्फ अचानक पिघलने लगी थी, लेकिन दर्द के निशान अभी भी गहरे थे।

“तुम्हारी माफी ने मेरे वो डेढ़ साल के आँसू तो नहीं पोंछे हैं सिद्धार्थ, और न ही वो मुझे रातों की नींद वापस दे सकते हैं,” अनन्या ने शांत लेकिन भरे हुए स्वर में कहा। “लेकिन… शायद मुझे यह सुनने की जरूरत थी। मुझे यह जानने की जरूरत थी कि मैं गलत नहीं थी।”

सिद्धार्थ ने राहत की एक हल्की सी सांस ली। “क्या हम… क्या हम कभी-कभार सिर्फ एक दोस्त की तरह बात कर सकते हैं? बिना किसी उम्मीद के? बस यह जानने के लिए कि हम दोनों ठीक हैं?”

अनन्या ने बाहर सड़क पर चलती ट्रैफिक को देखा। बारिश आज भी हो रही थी, लेकिन मौसम में कल जैसी घुटन नहीं थी। उसने वापस सिद्धार्थ की तरफ देखा। “मुझे नहीं पता सिद्धार्थ। कुछ घाव भरने में बहुत वक्त लगता है। मैं कोई वादा नहीं कर सकती।”

“मैं इंतजार करूँगा,” सिद्धार्थ ने एक हल्की सी, पुरानी वाली मुस्कान के साथ कहा।

दोनों कैफे से बाहर निकले। इस बार कोई जल्दबाजी नहीं थी, कोई झुंझलाहट नहीं थी। रास्ते अलग थे, लेकिन शायद पहली बार उनके बीच कोई अनकही शिकायत नहीं बची थी। अनन्या ने पलटकर सिद्धार्थ को देखा जो बारिश में धीरे-धीरे दूर जा रहा था। जिंदगी शायद उन्हें एक दूसरा मौका दे रही थी, या शायद यह बस एक खूबसूरत अंत था। फैसला अभी बाकी था।

क्या आपको लगता है कि अनन्या को सिद्धार्थ की बातों पर यकीन करके उसे एक दूसरा मौका देना चाहिए, या फिर जो बीत गया उसे अतीत ही रहने देना चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट्स में जरूर बताएं।

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