अनकहे रिश्ते

देवकी जी की आँखें शून्य में ठहर गईं। जो दर्द उन्होंने सालों से अपने सीने में दबा रखा था, वह अब बाहर आने के लिए तड़प रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, “हाँ बेटा, तूने मुझे फिर से जीना सिखाया है। मेरा सिद्धार्थ… वह मेरा सब कुछ था। मैं तुझे सब बताऊँगी।”

कबीर ने अचानक उनका हाथ और ज़ोर से पकड़ा और बोला, “यहाँ नहीं नानी। आज मेरा जन्मदिन है। मैं चाहता हूँ कि आज आप मेरे घर चलें। मेरी माँ आपसे मिलने के लिए बहुत बेताब हैं। मैंने उन्हें आपके बारे में बहुत कुछ बताया है। आप मुझे अपनी कहानी मेरे घर पर सुनाएंगी।”

देवकी जी पहले तो झिझकीं, लेकिन कबीर की ज़िद के आगे उन्हें झुकना पड़ा। आश्रम के वॉर्डन से शाम तक वापस आने की अनुमति लेकर, देवकी जी कबीर के साथ उसके घर की तरफ निकल पड़ीं।

कबीर का घर बहुत सुंदर और गर्मजोशी से भरा था। उसकी माँ, अंजलि, ने दरवाज़े पर ही देवकी जी का स्वागत किया। 

शहर के कोलाहल से दूर, पहाड़ियों की तलहटी में बना ‘आश्रय’ वृद्धाश्रम बाहर से जितना शांत दिखता था, उसके भीतर रहने वालों के दिलों में उतना ही बड़ा शोर था। इसी वृद्धाश्रम के एक कोने वाले कमरे में पिछले चार सालों से देवकी जी रह रही थीं। पैंसठ वर्ष की उम्र, झुर्रियों से भरा लेकिन एक अजीब से तेज़ वाला चेहरा, और हमेशा खामोश रहने वाली आँखें। आश्रम में लगभग पचास बुज़ुर्ग थे, सबकी अपनी-अपनी कहानियाँ, अपने-अपने दुख, लेकिन देवकी जी सबसे अलग थीं। वह किसी से बात नहीं करती थीं। सुबह उठकर प्रार्थना करना, नाश्ता करना और फिर अपने कमरे की खिड़की के पास बैठकर सलाई और ऊन लेकर स्वेटर बुनते रहना—यही उनकी दिनचर्या थी। वह स्वेटर किसके लिए बुन रही हैं, यह कोई नहीं जानता था, क्योंकि चार सालों में उनसे मिलने कभी कोई नहीं आया था।

आश्रम के बाकी लोगों को लगता था कि देवकी जी बहुत रूखी और घमंडी स्वभाव की हैं। कोई उनसे कुछ पूछता भी, तो वह बस गर्दन हिलाकर हाँ या ना में जवाब दे देतीं। उनकी इस खामोशी को अगर किसी ने सम्मान दिया था, तो वह थीं उनकी रूममेट विमला। विमला स्वभाव से बहुत चुलबुली थीं, लेकिन उन्होंने कभी देवकी जी के अतीत को कुरेदने की कोशिश नहीं की। विमला अक्सर उनके पास बैठकर अपने पोते-पोतियों की बातें करतीं, और देवकी जी बिना कुछ कहे बस चुपचाप सुनती रहतीं। कभी-कभी विमला को लगता कि देवकी जी की उंगलियां स्वेटर बुनते-बुनते अचानक कांपने लगती हैं, और उनकी आँखों में एक अजीब सी नमी तैर जाती है, लेकिन वह कभी कुछ नहीं पूछती थीं। शायद इसीलिए देवकी जी को विमला का साथ बुरा नहीं लगता था।

दिन ऐसे ही बीत रहे थे। देवकी जी की दुनिया उनकी खामोशी और उन ऊनी धागों में सिमटी हुई थी, जिन्हें वह रोज़ बुनती और फिर उधेड़ देती थीं।

एक सर्द सुबह, जब धुंध ने पूरे आश्रम को घेर रखा था, विमला तेज़ कदमों से चलती हुई देवकी जी के पास आईं। “अरे देवकी! ज़रा बाहर तो आ। देख, आज कोई तुझसे मिलने आया है,” विमला की आवाज़ में एक अजीब सा उत्साह था। देवकी जी की सलाई वहीं रुक गई। मिलने? उनसे? चार सालों में तो कोई भूल कर भी इस दरवाज़े तक नहीं आया था। उनका दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। कांपते हाथों से उन्होंने अपनी शॉल को ठीक किया और धीरे-धीरे चलकर आगंतुक कक्ष (विज़िटर्स रूम) की तरफ बढ़ीं। इतने सालों में पहली बार उनके चेहरे पर एक हल्की सी उत्सुकता और घबराहट देखी जा सकती थी।

विज़िटर्स रूम के दरवाज़े पर पहुँचकर जब उन्होंने अंदर झांका, तो उनके कदम ठिठक गए। सामने कोई अपना नहीं था। वहाँ एक सत्रह-अठारह साल का लड़का खड़ा था। उसके गले में एक बड़ा सा कैमरा लटका था और चेहरे पर एक मासूम सी मुस्कान थी। देवकी जी को कुछ निराशा हुई, लेकिन जब उन्होंने उस लड़के को गौर से देखा, तो उन्हें याद आया कि यह लड़का पिछले कुछ दिनों से आश्रम में आ रहा था। उसने कई बुज़ुर्गों के साथ बैठकर तस्वीरें खींची थीं। लेकिन आज वह सीधा उनसे मिलने क्यों आया था?

देवकी जी जाकर चुपचाप एक कुर्सी पर बैठ गईं। लड़के ने अपना कैमरा साइड में रखा और बड़ी शालीनता से उनके सामने बैठ गया। वह कुछ पल तक देवकी जी को देखता रहा, और देवकी जी की नज़रें भी उस पर टिक गईं। उस लड़के का माथा, उसकी आँखें, और उसके बात करने का अंदाज़… देवकी जी को अचानक अपने बेटे सिद्धार्थ की याद आ गई। जब सिद्धार्थ कॉलेज में था, तो बिल्कुल ऐसा ही दिखता था। वही बिखरे हुए बाल, वही चमकती आँखें।

“मैं आपको नानी कह सकता हूँ?” लड़के ने अचानक खामोशी तोड़ते हुए पूछा।

देवकी जी ने बिना कुछ कहे, बस हल्के से अपनी गर्दन हाँ में हिला दी।

“नानी, मेरा नाम कबीर है,” लड़के ने मुस्कुराते हुए कहा। “मैं बारहवीं कक्षा में पढ़ता हूँ। हमारे स्कूल की तरफ से मुझे ‘जनरेशन गैप और बुज़ुर्गों का जीवन’ विषय पर एक डॉक्यूमेंट्री बनानी है। मैं पिछले तीन दिनों से यहाँ आ रहा हूँ, लोगों से बातें कर रहा हूँ। लेकिन मेरी नज़र बार-बार आप पर जाकर टिक जाती थी। मैंने देखा है कि आप पूरा दिन उस खिड़की के पास बैठकर कुछ बुनती रहती हैं, लेकिन किसी से कुछ कहती नहीं। पता नहीं क्यों, मुझे आपको देखकर अपनी असली नानी की याद आ गई, जिन्हें मैंने बहुत बचपन में ही खो दिया था। क्या हम दोस्त बन सकते हैं?”

देवकी जी अवाक् रह गईं। एक अनजान लड़का, जो उम्र में उनसे इतना छोटा था, वह उनसे दोस्ती का हाथ बढ़ा रहा था। उन्होंने कबीर की मासूमियत से भरी आँखों में देखा। उन आँखों में कोई दिखावा नहीं था, कोई तरस नहीं था, बस एक सच्ची आत्मीयता थी। बरसों से जमे बर्फ के पहाड़ में जैसे एक छोटी सी दरार आ गई हो। देवकी जी ने फिर से हाँ में सिर हिला दिया।

उस दिन के बाद से कबीर का आश्रम आना रोज़ का नियम बन गया। वह रोज़ स्कूल के बाद अपनी साइकिल उठाता और सीधा ‘आश्रय’ पहुँच जाता। वह देवकी जी के पास बैठता, उन्हें अपनी स्कूल की बातें बताता, दोस्तों के किस्से सुनाता और अपने कैमरे से खींची गई तस्वीरें दिखाता। शुरू में देवकी जी सिर्फ सुनती थीं, लेकिन धीरे-धीरे कबीर की बेपरवाह और भोली बातों ने देवकी जी के होंठों पर मुस्कान ला दी। एक दिन जब कबीर ने देवकी जी की सलाई लेकर खुद स्वेटर बुनने की उल्टी-सीधी कोशिश की और पूरा ऊन उलझा दिया, तो देवकी जी ज़ोर से हंस पड़ीं। यह हँसी पूरे आश्रम के लिए किसी अजूबे से कम नहीं थी। विमला और बाकी लोग भी हैरान थे कि जिस महिला ने चार साल से किसी से ठीक से बात तक नहीं की थी, वो आज एक अजनबी बच्चे के साथ ठहाके लगा रही थी।

कबीर ने देवकी जी के अंदर के उस इंसान को फिर से ज़िंदा कर दिया था, जिसे उन्होंने खुद अपने ही हाथों से एक गहरी कब्र में दफना दिया था। देवकी जी अब कबीर का इंतज़ार करने लगी थीं। वह उसके लिए अपने हिस्से की मिठाइयां बचाकर रखने लगी थीं।

लेकिन फिर अचानक एक दिन कबीर नहीं आया। देवकी जी ने सोचा शायद स्कूल में कोई काम होगा। दूसरा दिन बीता, तीसरा दिन बीता… पूरा एक हफ्ता गुज़र गया, लेकिन कबीर का कोई पता नहीं था। देवकी जी की बेचैनी बढ़ने लगी। वह बार-बार मुख्य दरवाज़े की तरफ देखतीं। उनका मन अनजाने डरों से घिरने लगा। क्या उसे कुछ हो तो नहीं गया? क्या वह भी बाकी लोगों की तरह उन्हें हमेशा के लिए भूल गया? उनकी रातों की नींद उड़ गई। वह स्वेटर जो उन्होंने कबीर के लिए बुनना शुरू किया था, वह भी अधूरा पड़ा रहा।

आठवें दिन की शाम, जब देवकी जी उदास मन से अपने कमरे में बैठी थीं, तभी दरवाज़े पर किसी के कदमों की आहट हुई। उन्होंने पलट कर देखा। कबीर खड़ा था। वह थोड़ा थका हुआ लग रहा था। उसे देखते ही देवकी जी की आँखों से आंसुओं की धार बह निकली। वह अपनी जगह से उठीं और तेज़ी से जाकर कबीर को अपने गले से लगा लिया।

“कहाँ चला गया था तू बेटा? तुझे पता है मेरी क्या हालत हो गई थी?” देवकी जी रोते हुए बोलीं।

कबीर ने उन्हें कसकर पकड़ा और बोला, “मुझे माफ़ कर दीजिए नानी। मुझे अचानक शहर से बाहर जाना पड़ा था, मेरी नेशनल लेवल की फोटोग्राफी प्रतियोगिता थी। मैं आपको बता भी नहीं पाया। मैंने आपको बहुत याद किया।”

देवकी जी ने उसके आंसू पोछे और उसके माथे को चूमा। कबीर ने उनका हाथ पकड़ा और धीरे से बोला, “नानी, आपने मुझे अपना दोस्त माना है, अपना पोता माना है। लेकिन मैंने आज तक आपके बारे में कुछ नहीं जाना। आप यहाँ क्यों हैं? आपका परिवार कहाँ है? सिद्धार्थ मामा कौन हैं, जिनका नाम आप कभी-कभी नींद में बड़बड़ाती हैं? मुझे सब जानना है नानी। आप अपना दर्द मुझमें बाँट सकती हैं।”

देवकी जी की आँखें शून्य में ठहर गईं। जो दर्द उन्होंने सालों से अपने सीने में दबा रखा था, वह अब बाहर आने के लिए तड़प रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, “हाँ बेटा, तूने मुझे फिर से जीना सिखाया है। मेरा सिद्धार्थ… वह मेरा सब कुछ था। मैं तुझे सब बताऊँगी।”

कबीर ने अचानक उनका हाथ और ज़ोर से पकड़ा और बोला, “यहाँ नहीं नानी। आज मेरा जन्मदिन है। मैं चाहता हूँ कि आज आप मेरे घर चलें। मेरी माँ आपसे मिलने के लिए बहुत बेताब हैं। मैंने उन्हें आपके बारे में बहुत कुछ बताया है। आप मुझे अपनी कहानी मेरे घर पर सुनाएंगी।”

देवकी जी पहले तो झिझकीं, लेकिन कबीर की ज़िद के आगे उन्हें झुकना पड़ा। आश्रम के वॉर्डन से शाम तक वापस आने की अनुमति लेकर, देवकी जी कबीर के साथ उसके घर की तरफ निकल पड़ीं।

कबीर का घर बहुत सुंदर और गर्मजोशी से भरा था। उसकी माँ, अंजलि, ने दरवाज़े पर ही देवकी जी का स्वागत किया। “आइए माँ जी, कबीर ने आपके बारे में इतना कुछ बताया है कि लग ही नहीं रहा कि हम पहली बार मिल रहे हैं,” अंजलि ने देवकी जी के पैर छूते हुए कहा।

घर के अंदर का माहौल देखकर देवकी जी को अपना घर याद आ गया, जिसे वह बरसों पहले छोड़ आई थीं। चाय और नाश्ते के बाद, जब शाम ढलने लगी और कमरे में एक हल्की सी पीली रोशनी फैल गई, तब कबीर उनके पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गया।

“अब बताइए नानी… सिद्धार्थ मामा की कहानी। आपकी कहानी,” कबीर ने बहुत ही कोमलता से कहा।

देवकी जी ने अपनी चाय का कप मेज़ पर रखा। उनकी आँखें फिर से भर आई थीं, लेकिन इस बार उन आंसुओं में एक सुकून था—अपने दर्द को किसी अपने के साथ बाँटने का सुकून।

“सिद्धार्थ मेरा इकलौता बेटा था कबीर,” देवकी जी की आवाज़ थोड़ी कांप रही थी, “उसके पिता के गुज़रने के बाद मैंने उसे बड़ी मुश्किलों से पाला था। वह पढ़ने में बहुत तेज़ था। बड़ा होकर एक बहुत बड़ा इंजीनियर बना। उसकी शादी हुई, घर में खुशियां आईं। लेकिन फिर…”

कमरे में सन्नाटा छा गया। सिर्फ दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक और देवकी जी की भारी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। कबीर ने उनका हाथ अपने हाथों में ले लिया, मानों उन्हें हौसला दे रहा हो। और फिर, देवकी जी ने अपने अतीत के वे पन्ने खोलने शुरू किए, जिन पर बरसों से खामोशी की धूल जमी हुई थी…

क्या आपको लगता है कि देवकी जी के साथ उनके बेटे ने क्या किया होगा? क्या आधुनिक समाज में बुज़ुर्गों का अकेलापन हमारी तरक्की की सबसे बड़ी कीमत है? अपने विचार हमें कमेंट में ज़रूर बताएं।

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# अनकहे रिश्ते

मूल लेखिका : के कामेश्वरी

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