इस बार सुमित्रा जी ठीक नीरजा के पीछे खड़ी थीं और उन्होंने अपने ‘वारिस’ का हर एक शब्द सुन लिया था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा पराया समझा, जिस बेटे की खातिर उन्होंने अपने पति की सारी ज़िंदगी की कमाई लुटा दी, आज वो बेटा उनके पति की लाश को ‘ड्रामा’ और ‘प्रैक्टिकल’ होने का पाठ पढ़ा रहा था। सुमित्रा जी के सीने में एक अजीब सा दर्द उठा, उनकी वो सारी झूठी शान, वो सारा आधुनिकता का आवरण, और वो सारा खोखला भ्रम उस एक पल में कांच की तरह चकनाचूर हो गया।
नीरजा उठी, उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे और बिना किसी से कुछ कहे, घर के आंगन में रखे सामान की तरफ बढ़ी। उसने खुद अर्थी का बांस उठाया और रिश्तेदारों से कहा, “पापा की अंतिम यात्रा की तैयारी कीजिए। बहुत इंतज़ार हो गया, अब और नहीं।”
सुमित्रा जी शहर के एक नामी सरकारी स्कूल में शिक्षिका रही थीं। उनके पति, दीनानाथ जी, एक साधारण से बैंक कर्मचारी थे जिनका जीवन बस अपने दफ्तर और घर की चारदीवारी तक ही सीमित था। सुमित्रा जी हमेशा से खुद को एक बेहद सुलझी हुई, पढ़ी-लिखी और आधुनिक विचारों वाली महिला मानती थीं। उनका उठना-बैठना, बात करने का सलीका और समाज के हर मुद्दे पर उनकी बेबाक राय अक्सर लोगों को प्रभावित करती थी। लेकिन, इस आधुनिकता के चमकदार आवरण के ठीक नीचे एक ऐसा पारम्परिक और सड़ा-गला विचार छिपा था, जिसे वो कभी खुद से भी स्वीकार नहीं कर पाईं—बेटे की चाहत और बेटे के प्रति उनका अंधा मोह। सुमित्रा जी के दो बच्चे थे, बड़ा बेटा अंशुल और छोटी बेटी नीरजा। कहने को तो वो दोनों को एक समान प्यार करने का दावा करती थीं, लेकिन घर के हर छोटे-बड़े फैसले में, हर सुख-सुविधा में, अंशुल का पलड़ा हमेशा भारी रहता था।
बचपन से ही अंशुल की हर जायज़-नाजायज़ मांग पूरी की जाती थी। अगर अंशुल को नया वीडियो गेम चाहिए होता, तो सुमित्रा जी दीनानाथ जी से बहस करके या अपने बचाए हुए पैसों से उसे दिला देतीं। वहीं, जब नीरजा अपने कॉलेज के लिए एक नई साइकिल की मांग करती, तो उसे यह कहकर चुप करा दिया जाता कि “बेटियाँ तो पराए घर की होती हैं, तुम्हें इतने शौक पालने की क्या ज़रूरत है? जो पुरानी साइकिल है, उसी से काम चला लो।” नीरजा एक बेहद समझदार और शांत स्वभाव की लड़की थी। वो अपनी माँ के इस दोहरे मापदंड को बचपन से देखती आ रही थी, लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की। उसे लगता था कि शायद इसी का नाम परिवार है, जहाँ किसी एक को हमेशा समझौता करना पड़ता है और उसने वो समझौते वाला हिस्सा अपने हिस्से में खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया था।
अंशुल जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था, माँ के इस अंधे लाड़-प्यार ने उसे एक बेहद जिद्दी, स्वार्थी और महत्वाकांक्षी इंसान बना दिया था। उसे लगने लगा था कि दुनिया की हर चीज़ पर उसका पहला अधिकार है। पढ़ाई में सामान्य होने के बावजूद सुमित्रा जी ने अपनी सारी जमा-पूंजी लगाकर उसे इंजीनियरिंग करवाई और फिर जब उसने अमेरिका जाकर मास्टर्स करने की ज़िद पकड़ी, तो सुमित्रा जी ने दीनानाथ जी के रिटायरमेंट फंड तक को दांव पर लगा दिया। दीनानाथ जी ने कई बार समझाने की कोशिश की कि बुढ़ापे का सहारा ये पैसे ही हैं, लेकिन सुमित्रा जी का तर्क था कि “बेटा अमेरिका जाएगा, कमाएगा तो क्या हमें भूल जाएगा? बुढ़ापे का असली सहारा तो हमारा अंशुल ही है। नीरजा तो शादी करके अपने घर चली जाएगी, तब हमारा क्या होगा?” दीनानाथ जी हमेशा की तरह खामोश हो गए। नीरजा उस वक्त अपनी ग्रेजुएशन कर रही थी। उसने अपनी माँ की बातों को चुपचाप सुना और उसी दिन तय कर लिया कि वो कभी भी अपने माता-पिता पर बोझ नहीं बनेगी।
अंशुल अमेरिका चला गया और वहां जाकर उसकी दुनिया ही बदल गई। शुरुआत में वो हफ्ते में एक बार फोन करता था, फिर ये सिलसिला महीने में एक बार का हो गया और धीरे-धीरे फोन सिर्फ तब आने लगा जब उसे पैसों की ज़रूरत होती या कोई काम होता। इस बीच नीरजा ने अपनी मेहनत से बैंक में नौकरी हासिल कर ली और अपने पैरों पर खड़ी हो गई। उसकी शादी भी एक बहुत ही सुलझे हुए इंसान, विनय से हो गई, जो उसी शहर में काम करता था। शादी के बाद भी नीरजा हर दूसरे दिन अपने माता-पिता को देखने आती, उनकी दवाइयों से लेकर घर के राशन तक का ध्यान रखती। लेकिन सुमित्रा जी की आँखों पर तो जैसे अंशुल के नाम की पट्टी बंधी थी। नीरजा चाहे जितना भी कर ले, सुमित्रा जी की बातों में हमेशा यही रहता कि “अंशुल ने कल फोन किया था, वहां अमेरिका में कितनी ठंड है, मेरा बच्चा कैसे रह रहा होगा।” नीरजा बस मुस्कुरा देती और अपना काम करती रहती।
वक्त अपनी रफ्तार से बीतता गया। अंशुल ने अमेरिका में ही एक लड़की से कोर्ट मैरिज कर ली और वहीं बसने का फैसला कर लिया। सुमित्रा जी को इस बात का गहरा धक्का लगा था, लेकिन उन्होंने खुद को यह कहकर तसल्ली दे दी कि आज के बच्चे अपने फैसले खुद लेते हैं। “कम से कम मेरा बेटा वहां एक बड़ी कंपनी में काम तो कर रहा है, समाज में मेरा नाम रोशन हो रहा है,” सुमित्रा जी अक्सर अपनी सहेलियों के बीच अपनी इसी खोखली शान का बखान करतीं।
एक दिन अचानक दीनानाथ जी को दिल का दौरा पड़ा। स्थिति बेहद गंभीर थी। नीरजा और विनय ने बिना एक पल गंवाए उन्हें शहर के सबसे बड़े अस्पताल में भर्ती करवाया। आईसीयू के बाहर नीरजा लगातार भाग-दौड़ कर रही थी, डॉक्टरों से बात करना, दवाइयां लाना, ब्लड का इंतज़ाम करना। विनय अस्पताल के बिल चुकाने के लिए अपनी सेविंग्स लगा रहा था। सुमित्रा जी बस एक कोने में बैठी रो रही थीं और बार-बार अपने फोन की स्क्रीन देख रही थीं। उन्होंने अंशुल को मैसेज किया था, लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं आया था। दो दिन बाद जब अंशुल का फोन आया, तो सुमित्रा जी फफक कर रो पड़ीं। “बेटा, तुम्हारे पापा की हालत बहुत खराब है, डॉक्टर कह रहे हैं कि कुछ भी हो सकता है। तुम एक बार आ जाओ।”
अंशुल की आवाज़ में घबराहट की जगह एक अजीब सी झुंझलाहट थी। “मम्मी, आप भी ना अजीब बात करती हैं। यहां मेरे नए प्रोजेक्ट का लॉन्च है, मैं अचानक छुट्टी कैसे ले सकता हूँ? और फिर वीज़ा का भी कुछ इशू चल रहा है, पत्नी भी प्रेग्नेंट है। आप नीरजा को बोलिए ना कि वो सब संभाल ले। पैसों की ज़रूरत हो तो मैं कुछ डॉलर ट्रांसफर कर देता हूँ, पर मेरा आना अभी बिल्कुल इम्पॉसिबल है।” इतना कहकर अंशुल ने फोन काट दिया। सुमित्रा जी के हाथ से फोन छूट गया। उनके कानों में अंशुल के शब्द गूंज रहे थे, “पैसे ट्रांसफर कर देता हूँ…” क्या उनके पति की ज़िंदगी, उनके बुढ़ापे का दर्द सिर्फ कुछ डॉलर्स तक सिमट कर रह गया था?
दीनानाथ जी ज़िंदगी की जंग हार गए। अस्पताल के उस ठंडे कमरे में जब डॉक्टर ने आकर कहा कि “आई एम सॉरी, हम उन्हें बचा नहीं सके,” तो नीरजा टूट कर गिर पड़ी। उसने अपने पिता को बाहों में भर लिया और फूट-फूट कर रोई। सुमित्रा जी एकदम सुन्न हो गई थीं। उनके आंसू जैसे सूख गए थे। जब दीनानाथ जी के पार्थिव शरीर को घर लाया गया, तो पूरे मोहल्ले और रिश्तेदारों की भीड़ जमा हो गई। अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू होने लगीं। तभी सुमित्रा जी ने एक ऐसा फैसला सुनाया जिसने सबको चौंका दिया। “दीनानाथ जी का अंतिम संस्कार तब तक नहीं होगा जब तक अंशुल नहीं आ जाता। बेटे के बिना बाप की चिता को आग कैसे लग सकती है? उसे मुक्ति कैसे मिलेगी? बर्फ की सिल्ली मंगवाओ, शरीर यहीं रहेगा।”
नीरजा ने अपनी माँ को बहुत समझाया, “माँ, भैया ने साफ कह दिया है कि वो नहीं आ पाएंगे। पापा के शरीर को इस तरह रोकना ठीक नहीं है। आत्मा को कष्ट होगा।” लेकिन सुमित्रा जी अपनी ज़िद पर अड़ी थीं। उनका वो पुराना मोह, वो पारम्परिक भ्रम अब भी ज़िंदा था। उन्हें लगता था कि बाप की मौत की खबर सुनकर कोई भी बेटा सात समंदर पार से भी दौड़ा चला आएगा। “तुम चुप रहो नीरजा, तुम नहीं समझोगी। वो मेरा अंश है, इस घर का वारिस है। वो ज़रूर आएगा। मैंने उसे फिर से मैसेज किया है, वो फ्लाइट टिकट बुक कर रहा होगा।”
एक दिन बीत गया, फिर दूसरा दिन भी बीत गया। घर में अजीब सी सड़ांध और खामोशी छाने लगी थी। रिश्तेदार कानाफूसी करने लगे थे। “कैसा बेटा है, बाप मर गया और उसे आने की फुर्सत नहीं,” कोई कहता। “अरे सुमित्रा जी भी पागल हो गई हैं, मरे हुए शरीर की दुर्गति करवा रही हैं,” कोई और बुदबुदाता। नीरजा से अपने पिता की यह दुर्दशा देखी नहीं जा रही थी। उसने एक बार फिर विनय के फोन से अंशुल को वीडियो कॉल किया। इस बार अंशुल ने फोन उठाया।
“भैया, पापा आपको आखिरी बार देखना चाहते थे, पर आप नहीं आए। अब कम से कम उनके अंतिम संस्कार के लिए तो आ जाओ। माँ आपके इंतज़ार में बैठी हैं, उन्होंने पापा के शरीर को रोके रखा है।” नीरजा की आवाज़ में दर्द और गुस्सा दोनों था।
स्क्रीन के उस पार अंशुल बिल्कुल सामान्य लग रहा था। उसने एक गहरी सांस ली और बोला, “देख नीरजा, मैंने मम्मी को पहले ही समझा दिया था कि मेरा आना मुमकिन नहीं है। तुम लोग भी क्यों इतना ड्रामा कर रहे हो? किसी भी पंडित को बुलाकर, या ताऊ जी के बेटे से मुखाग्नि दिलवा दो। आजकल कौन इन पुराने रीति-रिवाज़ों को मानता है? और वैसे भी, मैं आऊंगा तो कम से कम चार दिन का वक्त लगेगा, तब तक क्या बॉडी को ऐसे ही सड़ाओगे? प्लीज़ बी प्रैक्टिकल, और मुझे बार-बार फोन करके डिस्टर्ब मत करो।” कॉल कट गई।
इस बार सुमित्रा जी ठीक नीरजा के पीछे खड़ी थीं और उन्होंने अपने ‘वारिस’ का हर एक शब्द सुन लिया था। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटे के लिए उन्होंने अपनी बेटी को हमेशा पराया समझा, जिस बेटे की खातिर उन्होंने अपने पति की सारी ज़िंदगी की कमाई लुटा दी, आज वो बेटा उनके पति की लाश को ‘ड्रामा’ और ‘प्रैक्टिकल’ होने का पाठ पढ़ा रहा था। सुमित्रा जी के सीने में एक अजीब सा दर्द उठा, उनकी वो सारी झूठी शान, वो सारा आधुनिकता का आवरण, और वो सारा खोखला भ्रम उस एक पल में कांच की तरह चकनाचूर हो गया।
नीरजा उठी, उसने अपनी आँखों के आंसू पोंछे और बिना किसी से कुछ कहे, घर के आंगन में रखे सामान की तरफ बढ़ी। उसने खुद अर्थी का बांस उठाया और रिश्तेदारों से कहा, “पापा की अंतिम यात्रा की तैयारी कीजिए। बहुत इंतज़ार हो गया, अब और नहीं।”
“लेकिन मुखाग्नि कौन देगा?” भीड़ में से किसी रिश्तेदार ने सवाल उछाला। “समाज क्या कहेगा? बेटी कैसे आग दे सकती है?”
तभी सुमित्रा जी की कांपती हुई आवाज़ गूंजी, “समाज आग देने नहीं आता भाई साहब। मुखाग्नि वही देगा जो इस घर का असली वारिस है, और मेरे दीनानाथ की वारिस मेरी बेटी नीरजा है।” सुमित्रा जी आगे बढ़ीं और उन्होंने नीरजा का हाथ कसकर पकड़ लिया। आज उनकी आँखों में एक अलग सी चमक थी, एक ऐसा पछतावा था जिसने उनके सारे भ्रम धो डाले थे।
शमशान घाट में जब नीरजा ने हाथ में मटकी और कांपते हाथों से आग ली, तो वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम थीं। सुमित्रा जी दूर खड़ी अपनी बेटी को देख रही थीं। उन्हें याद आ रहा था वो हर लम्हा जब उन्होंने नीरजा को कमतर आंका था। मुखाग्नि देते हुए नीरजा के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था, अपने पिता के प्रति अपने अंतिम कर्तव्य को निभाने का सुकून। अंतिम संस्कार के बाद जब सब लौट रहे थे, सुमित्रा जी ने नीरजा को गले से लगा लिया और फफक कर रो पड़ीं।
“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची… मैं जीवन भर जिस मृगतृष्णा के पीछे भागती रही, वो सिर्फ एक धोखा था। मेरा असली मान, मेरा गुरूर तो तू है।”
नीरजा ने अपनी माँ को कसकर थाम लिया। उस दिन सिर्फ एक पिता का अंतिम संस्कार नहीं हुआ था, बल्कि एक माँ के मन में बैठे उस खोखले समाज और बेटे के झूठे मोह का भी दाह संस्कार हो गया था। रिश्तों की असली पहचान खून से नहीं, बल्कि उस वक्त साथ खड़े होने से होती है, जब दुनिया का हर दरवाज़ा बंद हो जाता है।
दोस्तों, क्या सुमित्रा जी को यह सच्चाई समझने में बहुत देर हो गई? क्या आज भी हमारे समाज में बेटियों को वो दर्ज़ा मिल पाया है जिसकी वो हक़दार हैं या आज भी लोग बेटों की चाहत में ऐसे ही भ्रम में जी रहे हैं? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएँ।
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#मृगतृष्णा: एक अधूरे सच की कहानी