स्वाभिमान की चौखट

“तूने बिल्कुल सही किया बेटा,” रामदीन जी ने शिखा का माथा चूमते हुए कहा। “मैं एक बाप होकर जो नहीं कह पाया, वो तूने कह दिया। मेरी बेटियां मेरे गुरूर हैं, कोई बाज़ार में बिकने वाला सामान नहीं। अनुराधा की शादी जब होगी, तब होगी, लेकिन आज के बाद मेरी किसी बेटी को ऐसे अपमान के तराजू में नहीं तौला जाएगा। मुझे तुम दोनों पर गर्व है।”

अनुराधा भी फूट-फूट कर रो रही थी, लेकिन आज उसके मन से वो सालों का बोझ और हीन भावना हमेशा के लिए धुल चुकी थी। उसे एहसास हो गया था कि उसका मूल्य किसी अजनबी की ‘हाँ’ या ‘ना’ में नहीं, बल्कि उसके खुद के वजूद में है। घर में भले ही आज रिश्ता टूट गया था, लेकिन उस घर की नींव आज हमेशा के लिए और मज़बूत हो गई थी।

लखनऊ के गोमती नगर वाले उस पुराने लेकिन बेहद सलीके से सजे हुए घर में आज सुबह से ही एक अलग तरह की हलचल थी। सुबह के साढ़े पाँच ही बजे थे, लेकिन पंडित रामदीन शर्मा के घर का हर कोना जाग चुका था। रसोई से आती शुद्ध देसी घी, बेसन और इलायची की महक पूरे घर में एक मीठी सी गंध घोल रही थी। रामदीन जी अपनी पुरानी एटलस साइकिल का पहिया पोंछने के बाद अब बैठक के सोफे के कवर को तीसरी बार ठीक कर रहे थे। आज उनके घर दिल्ली से मेहमान आ रहे थे। मेहमान भी कोई ऐसे-वैसे नहीं, बल्कि उनकी बड़ी बेटी अनुराधा को देखने के लिए लड़के वाले आ रहे थे। रामदीन जी एक साधारण स्कूल में हेडमास्टर थे और उनकी पत्नी सुमित्रा एक बेहद ही सुलझी हुई, संस्कारी और पारंपरिक गृहिणी।

अनुराधा, उनकी बड़ी बेटी, बिल्कुल अपनी माँ जैसी थी। शांत, सौम्य, और एक गहरी नदी की तरह ठहरी हुई। उसने हिंदी साहित्य में एम.ए. किया था और एक एनजीओ में काम करती थी। वहीं उनकी छोटी बेटी, शिखा, बिल्कुल अपने पिता के कड़क मिजाज़ और आधुनिक विचारों का मिश्रण थी। शिखा एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर थी और अपनी बेबाकी के लिए पूरे मोहल्ले में जानी जाती थी।

“शिखा, ओ शिखा! ज़रा देख तो, बैठक में वो गुलाब वाले फूल ठीक से तो लगे हैं ना? और सुन, अपनी दीदी को कह दे कि वो कांजीवरम वाली साड़ी ही पहने, लड़के वालों ने खासतौर पर कहा था कि उन्हें संस्कारी लड़की चाहिए,” सुमित्रा जी ने रसोई से ही आवाज़ लगाते हुए कहा, उनके माथे पर चिंता और थकान की लकीरें साफ देखी जा सकती थीं।

शिखा ने एक गहरी सांस ली और अपनी दीदी के कमरे की तरफ बढ़ गई। कमरे का दरवाज़ा आधा खुला था। अनुराधा आईने के सामने खड़ी थी, उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी और घबराहट थी। यह कोई पहली बार नहीं था जब उसे इस तरह ‘देखा’ जाने वाला था। पिछले दो सालों में यह चौथी बार था जब उसे एक सजी-धजी गुड़िया की तरह अजनबियों के सामने पेश किया जाना था। हर बार कोई न कोई बेतुका बहाना बनाकर बात टाल दी जाती थी। कभी रंग थोड़ा सांवला बता दिया जाता, तो कभी कद, और कभी कुंडली का दोष। हर अस्वीकृति अनुराधा के आत्मविश्वास को अंदर ही अंदर दीमक की तरह खा रही थी।

“दीदी, तुम इस पीली साड़ी में बिल्कुल सूरजमुखी की तरह खिल रही हो,” शिखा ने कमरे में आते ही माहौल को हल्का करने की कोशिश की। उसने अनुराधा के कंधों पर हाथ रखा और आईने में उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “और सुनो, आज कोई घबराने की ज़रूरत नहीं है। तुम कोई परीक्षा देने नहीं जा रही हो। अगर उन्हें तुम पसंद नहीं आईं, तो यकीन मानो, वो तुम्हारी अहमियत के लायक ही नहीं हैं।”

अनुराधा ने एक फीकी सी मुस्कान दी। “तुझे सब आसान लगता है शिखा। पिताजी की उम्र ढल रही है, रिटायरमेंट करीब है। मैं नहीं चाहती कि मेरी वजह से उन्हें और ताने सुनने पड़ें। मुझे बस डर लगता है कि आज फिर से कोई नया सवाल, कोई नई कमी न निकाल दी जाए।”

शिखा ने अनुराधा को गले लगा लिया और उसे आश्वस्त करते हुए उसके बाल संवारने लगी।

ठीक ग्यारह बजे घर के बाहर एक बड़ी सी चमचमाती कार आकर रुकी। रामदीन जी लगभग दौड़ते हुए दरवाज़े तक पहुँचे। कार से श्रीमान कपूर, उनकी पत्नी श्रीमती कपूर, और उनका इकलौता बेटा विवान बाहर निकले। विवान दिल्ली की एक बड़ी आईटी कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था। उसकी चाल में वो गुरूर साफ झलक रहा था जो अक्सर सफलता और पैसे के साथ बिना मांगे ही मिल जाता है। उसने अपनी ब्रांडेड घड़ी को देखते हुए ऐसे घर के अंदर कदम रखा जैसे वह किसी फाइव स्टार होटल के इंस्पेक्शन के लिए आया हो।

बैठक में औपचारिकताओं का दौर शुरू हुआ। सुमित्रा जी और रामदीन जी हाथ जोड़े, हल्की मुस्कान के साथ हर बात में ‘जी’ और ‘बिल्कुल’ मिला रहे थे। कपूर साहब ने आते ही अपने खानदान की रईसी, विवान के पैकेज और अपनी दिल्ली वाली कोठी की कहानियाँ सुनानी शुरू कर दीं। रामदीन जी बस हाँ में हाँ मिला रहे थे।

तभी सुमित्रा जी का इशारा पाकर शिखा, अनुराधा को लेकर बैठक में आई। अनुराधा की नज़रें झुकी हुई थीं। उसके हाथ में चाय की ट्रे थी, जो हल्की सी कांप रही थी। उसने सलीके से चाय सबके सामने रखी और एक किनारे सोफे पर सिकुड़ कर बैठ गई।

“तो अनुराधा, हमें बताया गया है कि आप कविताएं वगैरह लिखती हैं,” श्रीमती कपूर ने अपनी चाय का घूंट लेते हुए उसे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा। “पर शादी के बाद तो दिल्ली की हाई सोसाइटी में उठना-बैठना होगा। हमारे विवान के साथ आपको बड़ी-बड़ी पार्टीज़ होस्ट करनी होंगी। क्या आप खुद को उस माहौल में ढाल पाएंगी? क्योंकि हमें तो एक ऐसी बहू चाहिए जो विवान के स्टेटस को मैच कर सके।”

अनुराधा ने कुछ कहने के लिए होंठ खोले ही थे कि विवान ने उसे बीच में टोकते हुए कहा, “मॉम, प्लीज। लेट इट बी।” विवान की नज़रें अनुराधा से ज़्यादा चाय सर्व करके एक तरफ खड़ी शिखा पर टिकी थीं। शिखा ने जींस और एक सिंपल सा कुर्ता पहना हुआ था, और उसकी आँखों में एक गजब का आत्मविश्वास था, जो अनुराधा की झुकी हुई नज़रों से बिल्कुल विपरीत था।

करीब आधे घंटे तक ऐसे ही अजीबोगरीब सवालों का सिलसिला चलता रहा। इसके बाद श्रीमती कपूर ने रामदीन जी से कहा, “रामदीन जी, अगर आप बुरा न मानें तो हम लोग आपस में कुछ बात करना चाहते हैं। क्या हम थोड़ी देर के लिए अकेले में बात कर सकते हैं?”

रामदीन जी ने तुरंत अनुराधा और शिखा को अंदर जाने का इशारा किया। दोनों बहनें उठकर अंदर वाले कमरे में चली गईं। रामदीन जी और सुमित्रा जी भी थोड़ी दूर डाइनिंग टेबल के पास जाकर खड़े हो गए ताकि कपूर परिवार आपस में चर्चा कर सके।

अंदर कमरे में शिखा गुस्से से उबल रही थी। “दीदी, तुमने देखा उस लड़के का एटीट्यूड? जैसे वह कोई राजकुमार हो और हम उसकी प्रजा! और उसकी माँ? वो तो तुम्हारा ऐसे इंटरव्यू ले रही थी जैसे किसी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट की नौकरी देनी हो।”

“चुप रह शिखा, धीरे बोल, कोई सुन लेगा,” अनुराधा ने घबराते हुए कहा।

दस मिनट बाद रामदीन जी को कपूर साहब ने वापस बैठक में बुलाया। रामदीन जी के चेहरे पर एक अजीब सी उम्मीद और डर का मिला-जुला भाव था।

“देखिए रामदीन जी,” कपूर साहब ने गला साफ करते हुए कहा, “हम लोग सीधी बात करने वाले लोग हैं। हमें आपका परिवार पसंद आया, आपके संस्कार भी अच्छे हैं।”

रामदीन जी की जान में जान आई। उन्होंने राहत की सांस ली।

“लेकिन…” श्रीमती कपूर ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “हमारे विवान को लगता है कि अनुराधा उसके लाइफस्टाइल के हिसाब से थोड़ी ज़्यादा… मतलब, पुरानी सोच की है। विवान को एक ऐसी लड़की चाहिए जो मॉडर्न हो, स्मार्ट हो, जो कंधे से कंधा मिलाकर चल सके।”

रामदीन जी का चेहरा सफेद पड़ गया। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। “जी? मैं कुछ समझा नहीं…”

तभी विवान अपनी जगह से उठा और बिना किसी हिचकिचाहट के बोला, “अंकल, टू बी ऑनेस्ट, मुझे आपकी छोटी बेटी शिखा पसंद है। मैंने उसे अभी देखा, उसका बात करने का तरीका, उसका कॉन्फिडेंस… वो मेरे लिए परफेक्ट मैच है। अगर आप चाहें तो हम शिखा और मेरी शादी की बात आगे बढ़ा सकते हैं।”

बैठक में जैसे सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा। रामदीन जी की आवाज़ जैसे उनके गले में ही फंस गई। “पर… पर आप लोग तो अनुराधा को देखने आए थे। शिखा तो अभी उससे छोटी है, और अनुराधा के होते हुए…”

“अरे तो क्या फर्क पड़ता है रामदीन जी!” श्रीमती कपूर ने एक अजीब सी बेशर्मी के साथ हंसते हुए कहा। “लड़कियां तो दोनों ही आपकी हैं। विदा तो आपको बेटी ही करनी है ना, तो बड़ी क्या और छोटी क्या? बल्कि आपको तो खुश होना चाहिए कि शिखा को दिल्ली का इतना अच्छा लड़का और इतना अमीर घर मिल रहा है। आजकल ऐसी किस्मत कहाँ होती है लोगों की? अनुराधा के लिए हम कोई और लड़का देख देंगे, हमारी नज़र में बहुत हैं।”

यह सुनकर रामदीन जी का स्वाभिमान जैसे किसी ने कुचल दिया हो। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस अपमान का क्या जवाब दें। एक मध्यमवर्गीय पिता की मजबूरी उनके होंठों को सिल रही थी।

तभी अंदर के कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से खुला। शिखा, जिसने सब कुछ सुन लिया था, एक शेरनी की तरह बैठक में दाखिल हुई। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था और आँखें अंगारे बरसा रही थीं। अनुराधा उसे रोकने की कोशिश कर रही थी, लेकिन शिखा को आज रोकना नामुमकिन था।

“शिखा, बेटा तुम अंदर जाओ…” रामदीन जी ने कांपती आवाज़ में कहा।

“नहीं पिताजी, आज नहीं,” शिखा ने हाथ का इशारा करते हुए कहा और फिर सीधे कपूर परिवार की तरफ मुड़ी।

“आप लोगों को क्या लगता है? यह कोई बाज़ार है? या हम दोनों बहनें यहाँ किसी सेल में टंगी हुई कमीजें हैं कि ये रंग पसंद नहीं आया तो दूसरी वाली पैक कर दो?” शिखा की आवाज़ में इतनी दृढ़ता थी कि विवान और उसके माता-पिता दोनों हक्के-बक्के रह गए।

“तमीज़ से बात करो लड़की!” श्रीमती कपूर ने अपनी जगह से खड़े होते हुए कहा। “तुम्हारे पिता को हम इतना बड़ा ऑफर दे रहे हैं और तुम…”

“कैसा ऑफर?” शिखा ने उन्हें बीच में ही काट दिया। “आपकी नज़रों में यह एक सौदा है, कोई पवित्र रिश्ता नहीं। आप लोग मेरी दीदी को देखने आए थे। उन्होंने आपका सम्मान किया, आपके हर बेतुके सवाल का जवाब दिया। और आपके इस सो-कॉल्ड ‘स्मार्ट’ बेटे को लगा कि वो उंगली उठाकर जिसे चाहेगा, उसे खरीद लेगा? आप लोगों ने मेरी दीदी के शांत स्वभाव को उसकी कमज़ोरी समझ लिया। वो संस्कारी है, इसलिए चुप रह गई। लेकिन मैं चुप नहीं रहूंगी।”

विवान ने अपना रुतबा दिखाते हुए कहा, “देखो शिखा, तुम हाइपर हो रही हो। मैंने बस अपनी प्रेफरेंस बताई है। शादी कोई खेल नहीं है, मुझे जो सही लगा मैंने वो कहा।”

“प्रेफरेंस?” शिखा एक कड़वी हंसी हंसी। “मिस्टर विवान, आपको पत्नी नहीं, अपने स्टेटस के लिए एक ट्रॉफी चाहिए। एक ऐसी ट्रॉफी जो आपके दोस्तों के सामने अँग्रेजी बोल सके और आपकी झूठी शान को बढ़ा सके। आपको मेरी दीदी जैसी समझदार, पढ़ी-लिखी और सुलझी हुई लड़की की अहमियत कभी समझ आ ही नहीं सकती। और रही बात आपकी पसंद की, तो आपको किसने कह दिया कि आप मुझे पसंद हैं?”

कपूर साहब गुस्से से कांपने लगे। “रामदीन! अपनी बेटी की ज़बान पर लगाम लगाओ। हम इज़्ज़तदार लोग हैं, यहाँ बेइज़्ज़त होने नहीं आए थे!”

इससे पहले कि रामदीन जी कुछ कहते, शिखा फिर बोल पड़ी, “इज़्ज़त? जो लोग दूसरों की बेटियों को बाज़ार का सामान समझते हों, उनकी खुद की क्या इज़्ज़त होती है? मेरी दीदी कोई रिजेक्टेड पीस नहीं है जिसे आप किनारे कर दें और मुझे चुन लें। मैं उसी दिन शादी करूंगी जिस दिन मेरी दीदी का घर बसेगा, और वो भी किसी ऐसे इंसान से जो उसकी रूह की कद्र करे, उसके सांवले रंग या उसके कम बोलने की नहीं। और आप जैसे घमंडी और खोखले परिवार में तो मैं अपनी दुश्मन को भी न ब्याहूँ। दरवाज़ा उस तरफ है, आप लोग जा सकते हैं।”

बैठक में फिर से सन्नाटा छा गया। शिखा के शब्द किसी चाबुक की तरह कपूर परिवार पर पड़े थे। विवान का घमंड चकनाचूर हो चुका था। बिना एक शब्द और कहे, कपूर परिवार अपना सा मुँह लेकर तेज़ी से घर से बाहर निकल गया और कार में बैठकर चला गया।

सुमित्रा जी रोने लगीं। “ये क्या कर दिया शिखा तूने? इतने बड़े घर का रिश्ता ठुकरा दिया, अब अनुराधा का क्या होगा?”

तभी रामदीन जी, जो अब तक चुप थे, आगे बढ़े। उनके चेहरे पर अब कोई डर या झिझक नहीं थी। उन्होंने अपनी दोनों बेटियों को गले से लगा लिया। उनकी आँखों से भी आंसू बह रहे थे, लेकिन ये आंसू बेबसी के नहीं, गर्व के थे।

“तूने बिल्कुल सही किया बेटा,” रामदीन जी ने शिखा का माथा चूमते हुए कहा। “मैं एक बाप होकर जो नहीं कह पाया, वो तूने कह दिया। मेरी बेटियां मेरे गुरूर हैं, कोई बाज़ार में बिकने वाला सामान नहीं। अनुराधा की शादी जब होगी, तब होगी, लेकिन आज के बाद मेरी किसी बेटी को ऐसे अपमान के तराजू में नहीं तौला जाएगा। मुझे तुम दोनों पर गर्व है।”

अनुराधा भी फूट-फूट कर रो रही थी, लेकिन आज उसके मन से वो सालों का बोझ और हीन भावना हमेशा के लिए धुल चुकी थी। उसे एहसास हो गया था कि उसका मूल्य किसी अजनबी की ‘हाँ’ या ‘ना’ में नहीं, बल्कि उसके खुद के वजूद में है। घर में भले ही आज रिश्ता टूट गया था, लेकिन उस घर की नींव आज हमेशा के लिए और मज़बूत हो गई थी।

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पाठकों के लिए सवाल: क्या शिखा का कदम सही था? अगर आप शिखा या रामदीन जी की जगह होते तो क्या करते? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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