सुमित्रा जी मुस्कुराते हुए बोलीं, “नहीं मालती, बच्चों ने कभी हमसे एक पैसा नहीं मांगा। बल्कि वे तो हर महीने हमें पैसे भेजना चाहते हैं। सच तो यह है कि उस बड़े घर में हम थक चुके थे। रोज सुबह उठकर कामवाली का इंतजार करना, कभी प्लंबर को बुलाना, कभी बिजली वाले के पीछे भागना। और सबसे बड़ी बात… वह अकेलापन। जब हम बीमार पड़ते, तो रात-रात भर एक-दूसरे का मुंह देखते रहते कि अगर कुछ हो गया तो कौन अस्पताल ले जाएगा।”
रमाकांत जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “दिनकर, यहाँ देख! यहाँ हमारी उम्र के सौ से ज्यादा लोग रहते हैं। हम सब एक बड़े परिवार की तरह हैं। यहाँ एक कॉमन डाइनिंग हॉल है, जहाँ हम सब साथ बैठकर खाना खाते हैं। सुमित्रा को अब किचन में पसीना नहीं बहाना पड़ता। चौबीस घंटे डॉक्टर और एंबुलेंस की सुविधा है। शाम को हम लोग लाइब्रेरी में बैठते हैं,
बनारस के एक पॉश इलाके में स्थित ‘आशीर्वाद’ भवन कभी अपनी चहल-पहल के लिए पूरे मोहल्ले में जाना जाता था। रमाकांत जी और उनकी पत्नी सुमित्रा ने इस दो मंजिला घर को अपने खून-पसीने की कमाई से बनाया था। घर के हर कोने में उनके बच्चों, बेटे विनीत और बेटी शिखा की यादें बसी थीं। लेकिन वक्त के साथ पंछी बड़े हुए और अपने-अपने आसमान की ओर उड़ गए। विनीत लंदन की एक बड़ी आईटी कंपनी में डायरेक्टर बन गया और शिखा शादी के बाद सिडनी में बस गई। दोनों अपनी जिंदगी में बेहद खुश और व्यस्त थे। साल-दो साल में एक बार वे छुट्टियों में आते, दस-पंद्रह दिन घर में रौनक रहती और फिर वही चुभने वाला सन्नाटा पसर जाता।
रमाकांत जी अब पचहत्तर के हो चुके थे और सुमित्रा जी सत्तर पार कर चुकी थीं। दोनों के शरीर अब उस बड़े से घर की जिम्मेदारी उठाने से जवाब देने लगे थे। कभी छत टपकती, कभी मोटर खराब हो जाती, तो कभी कामवाली बाई के न आने से सुमित्रा जी को घुटनों के दर्द के बावजूद झाड़ू-पोछा करना पड़ता। विनीत और शिखा अक्सर फोन पर कहते, “मम्मी-पापा, आप दोनों हमारे पास आ जाइए। वहाँ अकेले क्यों परेशान होते हैं?” रमाकांत जी और सुमित्रा जी ने दोनों बच्चों के पास जाकर छह-छह महीने बिताए भी, लेकिन परदेस की वह बंद और मशीनी जिंदगी उन्हें रास नहीं आई। उन्हें अपनी मिट्टी, अपनी भाषा और अपने लोगों की आदत थी। वहां बच्चों के काम पर चले जाने के बाद वे खिड़की से बाहर देखते हुए दिन गुजारते।
एक दिन रमाकांत जी ने सुमित्रा जी के साथ चाय पीते हुए एक ऐसा फैसला लिया जिसने उनके पूरे जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने तय किया कि वे इस विशाल और एकाकी घर को बेच देंगे और शहर से दूर बन रहे एक प्रीमियम ‘सीनियर लिविंग कम्युनिटी’ (वरिष्ठ नागरिक आवासीय परिसर) में शिफ्ट हो जाएंगे। यह कोई आम वृद्धाश्रम नहीं था, बल्कि हमउम्र लोगों के लिए बनाई गई एक सुरक्षित और सुविधा संपन्न सोसायटी थी।
जब घर बिकने की खबर रिश्तेदारों से होते हुए लंदन में बैठे विनीत तक पहुँची, तो वह सन्न रह गया। उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों तले से जमीन खींच ली हो। उसने तुरंत अपने पिता को फोन लगाया। “पापा! यह मैं क्या सुन रहा हूँ? आपने ‘आशीर्वाद’ बेच दिया? और आप लोग किसी ओल्ड एज होम में जा रहे हैं? क्या कमी रह गई थी मेरी परवरिश में जो आप दुनिया के सामने मेरी नाक कटवा रहे हैं? लोग क्या कहेंगे कि करोड़ों कमाने वाले बेटे ने अपने माँ-बाप को घर से निकाल दिया?” विनीत की आवाज में गुस्सा और घबराहट दोनों थे।
रमाकांत जी ने शांत स्वर में कहा, “बेटा, दुनिया क्या कहेगी, यह सोचकर हमने अपनी पूरी जिंदगी निकाल दी। अब जो बचा हुआ जीवन है, वह हम अपनी सुविधा और खुशी के लिए जीना चाहते हैं। यह ओल्ड एज होम नहीं, हमारा नया घर है।” लेकिन विनीत कुछ समझने को तैयार नहीं था। उसने फोन काट दिया और सीधे बनारस में रहने वाले अपने पिता के सबसे करीबी दोस्त, दिनकर अंकल को फोन मिलाया।
दिनकर जी रमाकांत के बचपन के मित्र थे। विनीत ने उन्हें सारी बात बताई और कहा, “अंकल, आप ही उन्हें समझाइए। मुझे तो लगता है कि किसी प्रॉपर्टी डीलर ने उन्हें बेवकूफ बना दिया है या फिर वे मुझसे किसी बात पर नाराज हैं। आप उन्हें रोकिए।”
दिनकर जी ने जब यह बात अपनी पत्नी मालती को बताई, तो मालती जी ने शक जताते हुए कहा, “मुझे तो दाल में कुछ काला लग रहा है। रमाकांत भाई साहब को जरूर विनीत ने पैसों के लिए परेशान किया होगा। आजकल के बच्चों का क्या भरोसा? लंदन में कोई नया घर लेना होगा, इसीलिए दबाव डालकर यहाँ का घर बिकवा दिया होगा। आप कल ही जाकर उनसे मिलिए, मैं कहती हूँ सारी सच्चाई सामने आ जाएगी।”
दिनकर जी ने हामी भरी। उन्होंने रमाकांत जी को फोन किया। रमाकांत जी ने बहुत उत्साह से फोन उठाया, “अरे दिनकर! कैसी है तुम्हारी तबीयत? बहुत दिन बाद याद किया।”
दिनकर जी ने गंभीर लहजे में कहा, “तुमने तो जैसे हमें भूल ही जाने का फैसला कर लिया है। घर बेच दिया, ठिकाना बदल लिया और एक बार बताना भी जरूरी नहीं समझा? हो कहाँ तुम?”
रमाकांत जी हँस पड़े, “अरे मेरे यार, मैं तुझे ही फोन करने वाला था। मैं तुझे एक लोकेशन भेज रहा हूँ, कल सुबह नाश्ता यहीं आकर करना। मालती भाभी को भी साथ ले आना।”
अगले दिन सुबह दिनकर और मालती लोकेशन के सहारे शहर की भीड़भाड़ से दूर एक शांत और हरे-भरे इलाके में पहुँचे। मुख्य द्वार पर ‘आनंद उपवन’ का बड़ा सा बोर्ड लगा था। सुरक्षा गार्ड ने बहुत ही अदब से उनका नाम पूछा, रजिस्टर में एंट्री की और एक गोल्फ कार्ट (छोटी गाड़ी) में बैठाकर उन्हें अंदर ले गया।
अंदर का नजारा देखकर दिनकर और मालती की आँखें फटी की फटी रह गईं। यह उनके द्वारा सोचे गए किसी उदास, सीलन भरे वृद्धाश्रम से बिल्कुल उलट था। यह किसी शानदार रिसॉर्ट जैसा था। चारों तरफ हरियाली थी, चौड़ी साफ सड़कें थीं, और ढलान वाले रास्ते थे ताकि व्हीलचेयर आसानी से जा सके। एक तरफ कुछ बुजुर्गों का समूह लॉन में योग कर रहा था, तो दूसरी तरफ कुछ महिलाएं ठहाके लगाकर हँस रही थीं।
गोल्फ कार्ट एक सुंदर से विला के सामने रुकी। रमाकांत और सुमित्रा बाहर ही खड़े उनका इंतजार कर रहे थे। दोनों के चेहरों पर एक अजीब सी चमक और शांति थी, जो पिछले कई सालों से बनारस वाले बड़े घर में गायब हो चुकी थी। गले मिलने के बाद रमाकांत उन्हें अपने नए घर के अंदर ले गए। घर छोटा था लेकिन बहुत ही सलीके से सजा हुआ था। फर्श ऐसा था जिस पर फिसलने का डर न हो, और बाथरूम में पकड़कर खड़े होने के लिए रेलिंग लगी हुई थीं।
नाश्ते की मेज पर मालती जी से रहा नहीं गया। उन्होंने पूछ ही लिया, “भाई साहब, सच-सच बताइएगा। क्या विनीत ने आपसे पैसे मांगे थे? आपने इतना सुंदर घर क्यों छोड़ दिया?”
सुमित्रा जी मुस्कुराते हुए बोलीं, “नहीं मालती, बच्चों ने कभी हमसे एक पैसा नहीं मांगा। बल्कि वे तो हर महीने हमें पैसे भेजना चाहते हैं। सच तो यह है कि उस बड़े घर में हम थक चुके थे। रोज सुबह उठकर कामवाली का इंतजार करना, कभी प्लंबर को बुलाना, कभी बिजली वाले के पीछे भागना। और सबसे बड़ी बात… वह अकेलापन। जब हम बीमार पड़ते, तो रात-रात भर एक-दूसरे का मुंह देखते रहते कि अगर कुछ हो गया तो कौन अस्पताल ले जाएगा।”
रमाकांत जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “दिनकर, यहाँ देख! यहाँ हमारी उम्र के सौ से ज्यादा लोग रहते हैं। हम सब एक बड़े परिवार की तरह हैं। यहाँ एक कॉमन डाइनिंग हॉल है, जहाँ हम सब साथ बैठकर खाना खाते हैं। सुमित्रा को अब किचन में पसीना नहीं बहाना पड़ता। चौबीस घंटे डॉक्टर और एंबुलेंस की सुविधा है। शाम को हम लोग लाइब्रेरी में बैठते हैं, ताश खेलते हैं, गजलें सुनते हैं। हम अपनी जिंदगी के आखिरी पड़ाव को एक बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक उत्सव की तरह जी रहे हैं।”
दिनकर जी बहुत ध्यान से सब सुन रहे थे। रमाकांत जी उन्हें पूरा परिसर घुमाने ले गए। उन्होंने देखा कि वहाँ एक छोटा सा मंदिर था जहाँ भजन-कीर्तन चल रहा था। एक ध्यान कक्ष था, और एक बड़ा सा पार्क था जहाँ शाम को महफिल जमती थी। रमाकांत जी ने वहाँ के कई लोगों से दिनकर का परिचय करवाया। किसी ने बैंक मैनेजर के पद से रिटायरमेंट ली थी, तो कोई सेना से रिटायर्ड कर्नल था। कोई अपने बच्चों के विदेश जाने के कारण यहाँ था, तो कोई सिर्फ अपनी आजादी के लिए यहाँ आया था। सबका दुख-सुख एक था, और शायद इसीलिए सब एक-दूसरे को बिना कहे समझ लेते थे।
यह सब देखकर दिनकर जी के मन में चल रही सारी शंकाएं और धारणाएं टूट कर बिखर गईं। उन्हें अहसास हुआ कि बुढ़ापे का मतलब सिर्फ लाचारी नहीं होता। बच्चों पर निर्भर रहने की बजाय, अपने लिए एक सुरक्षित और खुशहाल जीवन चुनना कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि समझदारी है।
तभी दिनकर जी के फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर विनीत का नाम फ्लैश हो रहा था। दिनकर जी ने फोन उठाया। विनीत ने बेचैनी से पूछा, “अंकल, क्या आप पापा से मिले? क्या कहा उन्होंने? आप उन्हें वापस ला रहे हैं ना?”
दिनकर जी के चेहरे पर एक चौड़ी मुस्कान फैल गई। उन्होंने कहा, “विनीत बेटा, तुम्हारे माता-पिता बिल्कुल सुरक्षित हाथों में हैं, और सबसे बड़ी बात कि वे बहुत खुश हैं। मैंने आज तक उन्हें इतना सुकून में नहीं देखा। उन्होंने जो फैसला लिया है, वह उनके लिए एकदम सही है। तुम चिंता मुक्त होकर अपना काम करो। और हाँ… एक और खबर है तुम्हारे लिए।”
“क्या खबर अंकल?” विनीत ने हैरानी से पूछा।
“खबर यह है कि मैं भी अपने और तुम्हारी आंटी के लिए यहाँ एक विला बुक करने जा रहा हूँ। जब तुम लोग इंडिया आओगे, तो हम सब यहीं इसी ‘आनंद उपवन’ में एक साथ छुट्टियां मनाएंगे!” दिनकर जी की बात सुनकर पास खड़े रमाकांत और सुमित्रा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उन्होंने दिनकर को गले लगा लिया।
सच ही है, एक उम्र के बाद बच्चों को अपनी जिंदगी जीने का हक है, तो माता-पिता को भी अपने हिस्से की खुशी और सुकून चुनने का पूरा अधिकार है। प्यार का मतलब एक-दूसरे को बांधना नहीं, बल्कि एक-दूसरे की खुशी में खुश होना है।
आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या समाज को ‘वृद्धाश्रम’ और ‘सीनियर लिविंग’ को लेकर अपनी सोच नहीं बदलनी चाहिए?
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मूल लेखिका : के कामेश्वरी