प्रतीक्षा के वो सात समंदर

 खैर, आज का दिन बहुत खास है। आज मेरी वही पोती, जो कल तक मेरे कंधों पर बैठकर बनारस के घाट घूमा करती थी, खुद चलकर इस आंगन में आ रही है। लड़कियाँ जब मायके आती हैं, तो घर की दीवारें भी जैसे मुस्कुराने लगती हैं। उनकी हंसी की खनक से पूरे घर का सन्नाटा टूट जाता है। देवकीनंदन तो सुबह से ही नहा-धोकर एयरपोर्ट जाने के लिए तैयार बैठा है। बार-बार घड़ी देख रहा है। सुशीला रसोई में मानसी की पसंद की पूरियां तल रही है। उसकी नजरें भी बार-बार दरवाजे की तरफ उठ जाती हैं।

बनारस के उस पुराने, चौड़े आंगन वाले घर में पिछले एक हफ्ते से जो चहल-पहल मची थी, उसे देखकर कोई भी कह सकता था कि घर में किसी बड़े त्योहार या शादी की तैयारियां चल रही हैं। लेकिन सच तो ये था कि न कोई त्योहार था और न ही कोई ब्याह-शादी। बात बस इतनी सी थी कि घर की इकलौती बेटी, मानसी, पूरे आठ साल बाद टोरंटो, कनाडा से अपने मायके वापस आ रही थी। मानसी के माता-पिता, देवकीनंदन जी और सुशीला जी, की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। घर का कोना-कोना ऐसे सजाया जा रहा था जैसे कोई नई नवेली दुल्हन पहली बार कदम रखने वाली हो।

बैठक के पुराने और भारी सोफों पर नए, चमकदार कवर चढ़ाए जा रहे थे। दीवारों पर जो रंग पिछले दीवाली पर ही हुआ था, उसे सुशीला जी ने ये कहकर दोबारा पुतवा दिया था कि, “मेरी बेटी आठ साल बाद आ रही है, उसे घर एकदम नया और सुंदर लगना चाहिए।” रसोई में तो जैसे मिठाइयों और नमकीनों का कारखाना खुल गया था। मानसी को बेसन के लड्डू पसंद हैं, तो एक डिब्बा उसका तैयार हो रहा था; उसे घर की बनी मठरी और अचार की तलब रहती है, तो उसकी भी पूरी व्यवस्था की जा रही थी। घर के मुख्य द्वार पर नए पर्दे झूल रहे थे और आंगन के गमलों में नए फूल वाले पौधे लगा दिए गए थे।

मैं, इस घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य यानी मानसी का दादा, अपनी पुरानी लकड़ी की आराम कुर्सी पर बैठा यह सब तमाशा बड़े मजे से देख रहा था। मेरे हाथ में चाय का प्याला था और होठों पर एक हल्की सी मुस्कान। मुझे सुशीला और देवकीनंदन की इस आपाधापी पर कभी-कभी हंसी भी आ जाती थी। ऐसा नहीं था कि उन्होंने पिछले आठ सालों में अपनी बेटी को देखा नहीं था। आज के इस डिजिटल युग में दूरियां भला कहां मायने रखती हैं! हर सुबह और शाम वीडियो कॉल पर हमारी बात होती है। हम यहां बनारस की सुबह दिखाते हैं, तो वो वहां टोरंटो की बर्फबारी।

हमें मानसी के घर के हर कोने की जानकारी है। उसने नया सोफा किस रंग का लिया है, उसकी रसोई में कौन सी नई मशीन आई है, यहां तक कि उसके पाले हुए कुत्ते ‘ब्रूनो’ की दिनचर्या भी हमें कंठस्थ है। हर वीकेंड पर वो हमें अपने कैमरे के जरिए कभी किसी मॉल में ले जाती है, तो कभी नाइग्रा फॉल्स की सैर कराती है। और तो और, देवकीनंदन और सुशीला खुद भी इन आठ सालों में तीन-चार बार कनाडा हो आए हैं।

जब ये दोनों कनाडा जाते हैं, तो वहां की दुनिया में ऐसे रम जाते हैं जैसे वहीं के बाशिंदे हों। मुझे याद है, पिछली बार जब ये लोग वहां से लौटे थे, तो देवकीनंदन पूरे मोहल्ले में टोरंटो की सड़कों और वहां के ट्रैफिक नियमों की तारीफें करते नहीं थकता था। इंडिया में भले ही वो बनारस की संकरी गलियों में स्कूटर चलाने में हिचकिचाता हो, लेकिन कनाडा के चौड़े हाइवे और वहां के मॉल्स का चप्पा-चप्पा उसे मुंहजबानी याद हो गया है। वहां जाकर ये दोनों अकेले ही बस और मेट्रो पकड़कर पूरे शहर की खाक छान आते हैं। उन्हें किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती।

लेकिन जब ये लोग कनाडा जाने वाले होते हैं, तब इस घर का जो दृश्य होता है, वो किसी कॉमेडी फिल्म से कम नहीं होता। उड़ान से दो रात पहले ही घर के बीचों-बीच चार बड़े-बड़े सूटकेस खोल कर बिछा दिए जाते हैं। सुशीला की कोशिश रहती है कि भारत का हर वो स्वाद जो मानसी को पसंद है, वो उन सूटकेसों में समा जाए। घर के बने मसाले, पापड़, वड़ियां, तरह-तरह के अचार, और न जाने क्या-क्या। फिर शुरू होता है असली संघर्ष—वजन तौलने का नाटक।

देवकीनंदन एक हाथ में डिजिटल वेइंग मशीन पकड़ता है और दूसरे हाथ से सूटकेस का हैंडल उठाकर उसे तौलता है। एयरलाइंस का नियम है कि एक सूटकेस का वजन 23 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए।

“अरे सुशीला! ये तो 25 किलो हो गया, दो किलो कम करो!” देवकीनंदन माथे का पसीना पोंछते हुए चिल्लाता है।

“तो क्या निकालूं? ये बेसन के लड्डू निकाल दूं? मेरी बच्ची कितने चाव से खाती है!” सुशीला मुंह बनाते हुए कहती है।

“लड्डू मत निकालो, वो जो मेरे दो स्वेटर रखे हैं, वो निकाल दो। वहां वैसे भी घर में हीटर चलता है।”

फिर एक-एक करके कभी जींस निकाली जाती है, कभी किताबों का बंडल, तो कभी मिठाइयों का डिब्बा केबिन बैगेज में ठूंसा जाता है। यह सूटकेस पर चढ़ने-उतरने का सिलसिला तब तक चलता है जब तक मशीन का कांटा ठीक 22.9 किलो पर आकर न रुक जाए। और फिर आधी रात को, जब दुनिया सो रही होती है, ये दोनों अपनी पूरी गृहस्थी उन सूटकेसों में समेट कर फुर्र से उड़ जाते हैं। उन्हें पीछे छूट गए इस पुश्तैनी घर की कोई खास चिंता नहीं होती, क्योंकि उन्हें पता है कि मैं अपनी आराम कुर्सी पर बैठकर इस घर की रखवाली करने के लिए मौजूद हूं।

वहां कनाडा में मानसी और उसका पति इन्हें खूब घुमाते हैं। हर वीकेंड नई जगह, नए रेस्तरां। लेकिन जब वहां से इनके लौटने का समय आता है, तो सूटकेसों का आकार और वजन फिर से वही कहानी दोहराता है। बस इस बार अंदर का सामान बदल जाता है। बनारस के पापड़ और अचार की जगह अब टोरंटो की चॉकलेट्स, परफ्यूम, विदेशी जैकेट, और तरह-तरह के गैजेट्स ले लेते हैं। जो चीजें हमारे यहां आसानी से नहीं मिलतीं या महंगी होती हैं, वो सब बड़े जतन से पैक की जाती हैं।

मुझे अपनी इस कुर्सी पर बैठे-बैठे बहुत सुकून मिलता है जब ये दोनों वापस आते हैं। सूटकेस खुलते ही घर में विदेशी परफ्यूम की एक अजीब सी मीठी महक फैल जाती है। फिर शुरू होता है तोहफे बांटने का सिलसिला। मोहल्ले के हर रिश्तेदार, हर पड़ोसी के लिए कुछ न कुछ जरूर आता है। मेरे लिए भी पिछली बार एक बहुत ही खूबसूरत और गर्म शॉल आई थी। जब मानसी ने वीडियो कॉल पर पूछा, “दादा जी, शॉल कैसी लगी?” तो मेरी आंखें भर आई थीं। वो सिर्फ एक ऊनी कपड़ा नहीं था, बल्कि सात समंदर पार से आई मेरी पोती के हाथों की गर्माहट थी, जिसने मेरे बूढ़े शरीर और मन दोनों को ढंक लिया था।

खैर, आज का दिन बहुत खास है। आज मेरी वही पोती, जो कल तक मेरे कंधों पर बैठकर बनारस के घाट घूमा करती थी, खुद चलकर इस आंगन में आ रही है। लड़कियाँ जब मायके आती हैं, तो घर की दीवारें भी जैसे मुस्कुराने लगती हैं। उनकी हंसी की खनक से पूरे घर का सन्नाटा टूट जाता है। देवकीनंदन तो सुबह से ही नहा-धोकर एयरपोर्ट जाने के लिए तैयार बैठा है। बार-बार घड़ी देख रहा है। सुशीला रसोई में मानसी की पसंद की पूरियां तल रही है। उसकी नजरें भी बार-बार दरवाजे की तरफ उठ जाती हैं।

मैं सोच रहा था कि समय कैसे बदल गया है। एक वो जमाना था जब लड़कियां शादी करके दूसरे गांव या शहर जाती थीं, तो माता-पिता महीनों उनके खत का इंतजार करते थे। मायका सिर्फ एक शहर दूर होता था, लेकिन पहुंचना मीलों का सफर लगता था। और आज? आज के इस दौर में, अमेरिका, कनाडा या लंदन भी जैसे हमारे लिए मायका या ससुराल बन गए हैं। दुनिया इतनी छोटी हो गई है कि सात समंदर पार का फासला भी अब दिलों की दूरियों को नहीं बढ़ा पाता।

हवाई जहाज ने दुनिया को समेट कर हमारी मुट्ठी में कर दिया है। रिश्ते अब भौगोलिक सीमाओं के मोहताज नहीं रहे। जब मन किया, सूटकेस पैक किया और उड़ गए अपने बच्चों के पास। और जब उनका मन किया, वो आ गए अपने घर, अपनी जड़ों की तरफ। परसों रात जब मानसी का फोन आया था कि उसने पैकिंग पूरी कर ली है, तो उसकी आवाज में जो चहक थी, वो ठीक वैसी ही थी जैसी बचपन में स्कूल से घर आते वक्त हुआ करती थी।

आज जब वो दरवाजे से अंदर आएगी, तो मैं जानता हूं कि वो सबसे पहले दौड़कर मेरे गले लगेगी। सुशीला उसकी नजर उतारेगी और देवकीनंदन गर्व से अपनी बेटी को पूरे घर में घुमाकर दिखाएगा कि कैसे उसने उसके स्वागत के लिए पूरे घर का कायाकल्प कर दिया है। ये जो तैयारियां हैं, ये जो लिपाई-पुताई है, ये असल में घर को सुंदर बनाने के लिए नहीं है; ये तो उस बेइंतहा प्यार का प्रकटीकरण है जो एक माता-पिता अपने बच्चों के लिए अपने सीने में दबाए बैठे रहते हैं।

जब बच्चे पास होते हैं, तो शायद हम उन्हें इतना जता नहीं पाते। लेकिन जब वो दूर चले जाते हैं, तो उनकी एक झलक पाने, उनके लिए कुछ भी कर गुजरने की तड़प दोगुनी हो जाती है। यह घर, यह नया फर्नीचर, यह रसोई की महक—सब कुछ मानसी के उसी प्यार के इंतजार का गवाह है। मैं अपनी कुर्सी पर आंखें मूंदे उस पल का इंतजार कर रहा हूं जब बाहर टैक्सी का हॉर्न बजेगा और मेरा घर, मेरा आंगन एक बार फिर से अपनी बेटी की हंसी से गूंज उठेगा। सच कहूं तो, इन दूरियों ने हमें एक-दूसरे से दूर नहीं किया, बल्कि हमारे बीच के प्यार को, हमारे इस पारिवारिक बंधन को और भी ज्यादा मजबूत और खूबसूरत बना दिया है।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या अपने देश की मिट्टी और अपनों के प्यार की महक दुनिया की किसी भी चकाचौंध से बढ़कर होती है? क्या आपने भी कभी अपनों के लौटने का ऐसा ही बेसब्री से इंतजार किया है? अपने अनुभव और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।

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#प्रतीक्षा के वो सात समंदर

 मूल लेखिका : के कामेश्वरी 

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