खानदान का चिराग: एक नई सुबह

 सुरभि जो अब तक खामोश थी, आज उसके सब्र का पैमाना छलक गया। वह हमेशा अपनी सास का सम्मान करती थी और उनकी कड़वी बातों को घूंट बनाकर पी जाती थी, लेकिन आज बात सिर्फ उसकी नहीं, उसकी बेटी मायरा के वजूद की थी।

 सुरभि रसोई में सबके लिए अदरक वाली चाय और पोहा बना रही थी, जबकि उसके पति निशांत लॉन में बैठकर अख़बार पढ़ रहे थे। उनकी छह साल की बेटी, मायरा, अपने रंगों के साथ खेल रही थी। मायरा ने हाल ही में राज्य स्तर की चित्रकला प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार जीता था, जिसकी ट्रॉफी ड्रॉइंग रूम में टीवी के ठीक बगल में शान से रखी हुई थी। घर का माहौल शांत और खुशनुमा था, लेकिन यह शांति ज्यादा देर टिकने वाली नहीं थी।

तभी सुरभि की सास, सुमित्रा देवी, हाथ में पूजा की थाली लिए मंदिर से लौटीं। उन्होंने तुलसी में जल चढ़ाया और आकर सीधे निशांत के पास कुर्सी पर बैठ गईं। सुरभि ने मुस्कुराते हुए उन्हें चाय का कप पकड़ाया। सुमित्रा देवी ने चाय का एक घूंट लिया और अख़बार पढ़ते हुए निशांत की तरफ देखकर एक गहरी साँस छोड़ी।

“आज मंदिर में शर्मा जी की पत्नी मिली थीं,” सुमित्रा देवी ने बात शुरू की। “उनके छोटे बेटे के घर भी लड़का हुआ है। पूरा परिवार फूला नहीं समा रहा है। और एक हमारा घर है, जहाँ खुशियों के नाम पर बस ये कागज़ के सर्टिफिकेट और प्लास्टिक की ट्रॉफियां आती रहती हैं। मैं तो तरस गई हूँ कि कब मेरे घर में मेरे वंश का चिराग खेलेगा।”

सुरभि के हाथ ठिठक गए। यह कोई पहला मौका नहीं था जब सुमित्रा देवी ने इस तरह की बात की थी। मायरा के जन्म के बाद से ही सुमित्रा देवी के मन में एक टीस सी बैठी हुई थी कि घर में लड़का नहीं हुआ।

निशांत ने अख़बार नीचे रखा और झिझकते हुए कहा, “माँ, आप फिर वही बात लेकर बैठ गईं? मायरा क्या हमारी ख़ुशी नहीं है? कल ही तो उसने पूरे शहर में हमारा नाम रोशन किया है। और वैसे भी, आज के ज़माने में लड़के और लड़की में क्या फर्क है?”

“फर्क क्यों नहीं है?” सुमित्रा देवी ने आवाज़ थोड़ी ऊँची करते हुए कहा। “फर्क तो है बेटा, और ये बात तू भी जानता है। बेटी चाहे कितनी भी पढ़-लिख जाए, कितना भी नाम कमा ले, आखिर में तो उसे दूसरे के घर ही जाना है। वो तो पराया धन होती है। हमारे मरने के बाद हमें मुखाग्नि कौन देगा? हमारे इस घर को, इस खानदान के नाम को आगे कौन बढ़ाएगा? मैं तो सुरभि से भी कह चुकी हूँ कि अब एक बेटे की प्लानिंग कर लो। अभी मेरी उम्र है, हाथ-पैर चल रहे हैं, मैं बच्चा खिला लूंगी।”

सुरभि जो अब तक खामोश थी, आज उसके सब्र का पैमाना छलक गया। वह हमेशा अपनी सास का सम्मान करती थी और उनकी कड़वी बातों को घूंट बनाकर पी जाती थी, लेकिन आज बात सिर्फ उसकी नहीं, उसकी बेटी मायरा के वजूद की थी।

सुरभि ने पोहे की प्लेट मेज़ पर रखी और पूरी दृढ़ता के साथ बोली, “माँ जी, लड़का और लड़की में जो अंतर आप बता रही हैं, वो भगवान ने नहीं, हमारे और आपके जैसे समाज ने ही बनाया है। आप कहती हैं कि लड़की पराया धन होती है, तो क्या इस बात का मतलब यह है कि मायरा इस घर का हिस्सा नहीं है? क्या वो सिर्फ एक मेहमान है?”

सुमित्रा देवी ने सुरभि की तरफ घूर कर देखा, “तू मेरी बातों का गलत मतलब निकाल रही है बहु। मेरा मतलब है कि बुढ़ापे का सहारा तो बेटा ही होता है ना। बेटी तो शादी करके चली जाएगी।”

“क्यों चली जाएगी माँ जी?” सुरभि ने शांत लेकिन सधे हुए स्वर में पूछा। “क्या शादी के बाद बेटियां अपने माँ-बाप को भूल जाती हैं? अभी पिछले महीने जब आपके भाई, यानी मेरे मामा ससुर जी को हार्ट अटैक आया था, तो क्या उनके दोनों बेटों ने अस्पताल में रातें गुज़ारी थीं? नहीं न! आपकी अपनी बेटी, मेरी ननद दीदी ने शहर से आकर पंद्रह दिन तक उनकी सेवा की, अस्पताल के बिल भरे और उनका ख्याल रखा। तब आपको यह अंतर क्यों नहीं दिखा? तब वो ‘पराया धन’ बुढ़ापे की लाठी कैसे बन गई?”

सुमित्रा देवी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। वे असहज होकर इधर-उधर देखने लगीं।

सुरभि रुकी नहीं, उसने आगे कहा, “माँ जी, मैं सिर्फ इसलिए दूसरा बच्चा पैदा नहीं करूंगी क्योंकि मुझे लड़का चाहिए। लड़का कोई लॉटरी का इनाम नहीं है, और मेरी बेटी कोई बोझ या पनौती नहीं है कि उसके होने के बाद भी मुझे अधूरापन महसूस हो। आप उन लोगों से पूछिए जो सालों तक एक बच्चे की किलकारी सुनने के लिए डॉक्टरों के और मंदिरों के चक्कर काटते हैं। उनके लिए सिर्फ ‘बच्चा’ होना मायने रखता है, लड़का या लड़की नहीं। भगवान ने हमें इतनी प्यारी, स्वस्थ और होनहार बच्ची दी है, और हम उसकी कद्र करने के बजाय उस चीज़ के पीछे भाग रहे हैं जो हमारे पास नहीं है।”

निशांत अपनी जगह से उठा और सुरभि के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला, “माँ, सुरभि बिल्कुल सही कह रही है। मायरा ही मेरा चिराग है और वही मेरी लाठी बनेगी। मुझे किसी वंश को आगे बढ़ाने के लिए किसी बेटे की ज़रूरत नहीं है। मेरे लिए मेरा वंश मेरी बेटी से ही शुरू होता है और उसी पर खत्म होता है। मैं नहीं चाहता कि कल को मेरी बेटी बड़ी होकर यह सोचे कि उसके माता-पिता उसे पर्याप्त नहीं मानते थे, इसलिए उन्होंने एक बेटे की चाह रखी।”

सुमित्रा देवी स्तब्ध रह गईं। उन्होंने पहली बार अपनी बहू को इतने कड़े और स्पष्ट शब्दों में बोलते सुना था। और उससे भी बड़ी बात, उनका अपना बेटा अपनी पत्नी और बेटी के समर्थन में चट्टान की तरह खड़ा था। उन्होंने मायरा की तरफ देखा, जो मासूमियत से अपनी ड्रॉइंग बुक में एक बड़ा सा घर बना रही थी। सुमित्रा देवी को एहसास हुआ कि वे एक अनजाने लालच में उस ख़ुशी को ठुकरा रही थीं जो साक्षात उनके सामने बैठी थी। उन्हें अपनी पुरानी सोच पर शर्मिंदगी महसूस होने लगी।

कुछ देर की भारी ख़ामोशी के बाद, सुमित्रा देवी की आँखों से दो बूँद आँसू छलक पड़े। उन्होंने धीरे से मायरा को आवाज़ दी, “मायरा बेटा, इधर आ अपनी दादी के पास।”

मायरा दौड़कर सुमित्रा देवी के गले लग गई। दादी ने उसे कसकर चूम लिया और सुरभि की तरफ देखकर रुंधे हुए गले से बोलीं, “तूने आज मेरी आँखें खोल दीं बहू। सच कहती है तू, चिराग वो नहीं होता जो सिर्फ घर का नाम आगे बढ़ाए, चिराग तो वो होता है जो घर में रौशनी करे। और मेरी इस बच्ची ने तो पहले ही मेरे घर को रौशन कर दिया है। मुझे माफ़ कर दे, आज के बाद इस घर में कभी लड़के और लड़की में कोई अंतर नहीं होगा।”

सुरभि के चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर गई। आज उस घर में सिर्फ एक बहस नहीं खत्म हुई थी, बल्कि सदियों से चली आ रही एक रूढ़िवादी सोच का अंत हुआ था। उस दिन की चाय शायद रोज़ से थोड़ी ज्यादा मीठी थी।


दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या आज भी हमारे समाज में लड़के की चाहत में बेटियों को वह प्यार और सम्मान नहीं मिल पाता जिसकी वे हकदार हैं? क्या खानदान का नाम सच में सिर्फ बेटों से आगे बढ़ता है? अपने विचार और अनुभव कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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लेखिका : महक दुआ

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