मीरा दीदी की पुरानी संदूकची को साफ करते हुए आज मेरे हाथ में एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर लग गई। तस्वीर पर जमी धूल को मैंने अपने दुपट्टे के कोने से साफ किया, तो उसमें से दो चेहरे उभर कर सामने आए। एक तरफ मेरी बड़ी बहन कावेरी थी, और उनके ठीक बगल में खड़े थे मेरे जीजाजी, शशांक। इस तस्वीर को देखते ही मेरी आँखों से आंसुओं की एक गर्म धार बह निकली। मुझे आज भी याद है वो दिन जब ये तस्वीर खींची गई थी। कावेरी दीदी के चेहरे पर एक अजीब सा संकोच था, और जीजाजी की आँखों में दीदी के लिए एक अथाह समंदर जैसा प्रेम।
कावेरी दीदी हमारे घर में सबसे बड़ी थीं। बचपन से ही उन्होंने माँ की तरह हम सब भाई-बहनों को पाला था। उनके हाथों में जादू था, उनकी आवाज़ में जैसे सरस्वती का वास था, और उनका स्वभाव इतना निर्मल था कि कोई भी उनसे बात करे तो अपनी सारी परेशानियां भूल जाए। लेकिन, समाज की नज़रें अक्सर इंसान के गुणों को नहीं, बल्कि उसकी चमड़ी के रंग और चेहरे की बनावट को देखती हैं। कावेरी दीदी का रंग पक्का सांवला था। चेहरे पर बचपन में निकले चेचक के कुछ हल्के दाग भी रह गए थे। कद भी कुछ खास नहीं था। घर में जब भी उनकी शादी की बात चलती, तो रिश्ते वाले अक्सर लड़की का रूप देखकर ही लौट जाते। जो एकाध रुकते, वो भारी दहेज की मांग कर बैठते। दीदी अंदर ही अंदर टूटती जा रही थीं, लेकिन उन्होंने कभी अपनी मुस्कान कम नहीं होने दी।
फिर एक दिन हमारे घर शशांक जीजाजी का रिश्ता आया। जब शशांक जी पहली बार हमारे घर आए, तो पूरा मोहल्ला उन्हें देखने के लिए छतों पर जमा हो गया था। छह फुट का लंबा कद, गेंहुआ-गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श और किसी फिल्मी हीरो जैसी कसरती देह। वो एक बड़े सरकारी ओहदे पर थे। जब उन्होंने कावेरी दीदी को देखा, तो उन्होंने कोई सवाल नहीं किया, कोई दहेज नहीं मांगा, बस दीदी के हाथों से बनी चाय पीकर हल्की सी मुस्कान के साथ अपने पिता से कह दिया, “मुझे यह रिश्ता मंजूर है।”
शादी वाले दिन तो जैसे लोगों की फुसफुसाहटों का बाज़ार गर्म था। कोई कह रहा था, “लड़के में ही कोई खोट होगा, वरना इतना सुंदर लड़का इस सांवली और साधारण सी लड़की से क्यों ब्याह करेगा?” तो कोई कह रहा था, “कावेरी की किस्मत खुल गई, लेकिन देख लेना, दो दिन बाद ये लड़का इसे घर की नौकरानी बनाकर छोड़ देगा। प्यार-व्यार तो इसे किसी और सुंदर लड़की से ही होगा।” दीदी भी ये बातें सुन रही थीं। मंडप में बैठे हुए वो डर से कांप रही थीं। उन्हें खुद यकीन नहीं हो रहा था कि शशांक जैसा सुदर्शन व्यक्ति उन्हें अपनी पत्नी के रूप में कैसे स्वीकार कर सकता है।
लेकिन शशांक जीजाजी ने दुनिया के हर ताने, हर शक और हर फब्ती को अपने प्यार की ताकत से गलत साबित कर दिया। शादी के बाद जब दीदी ससुराल गईं, तो शशांक जी ने उन्हें वो रुतबा, वो सम्मान और वो प्यार दिया, जिसके लिए शायद दुनिया की सबसे खूबसूरत औरतें भी तरसती होंगी। जीजाजी के लिए दीदी का सांवला रंग कोई मायने नहीं रखता था। वो अक्सर कहते थे, “चेहरे की चमक तो उम्र के साथ ढल जाती है कावेरी, लेकिन तुम्हारी रूह की जो चमक है, वो मुझे हर दिन तुमसे और ज्यादा प्यार करने पर मजबूर कर देती है।”
मुझे याद है, एक बार हम सब एक पारिवारिक शादी में गए हुए थे। वहां शशांक जीजाजी के कुछ दूर के रिश्तेदार भी आए थे। बातों-बातों में एक महिला ने दीदी की तरफ इशारा करते हुए तंज कसा, “शशांक बेटा, तुम तो इतने सुंदर हो, तुम्हें तो कोई अप्सरा मिल जाती। पता नहीं तुमने क्या सोचकर…” उनकी बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि जीजाजी ने बीच महफिल में दीदी का हाथ अपने हाथ में ले लिया। उनकी आवाज़ में कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक शांत और दृढ़ विश्वास था। उन्होंने कहा, “चाची जी, अप्सराएं तो सिर्फ कहानियों में होती हैं, जो शायद सिर्फ आंखों को भली लगती हैं। लेकिन मेरी कावेरी हकीकत है। इसने मेरे घर को स्वर्ग बनाया है। इसकी एक मुस्कान के आगे दुनिया की हर खूबसूरती मेरे लिए मिट्टी के समान है। मैं खुद को बहुत खुशनसीब मानता हूँ कि कावेरी ने मुझे चुना।”
उस दिन दीदी की आँखों में जो आंसू थे, वो किसी दुख के नहीं, बल्कि उस असीम प्रेम के थे जो उन्हें शशांक जी से मिला था। उनका दांपत्य जीवन किसी कविता जैसा था। जीजाजी ऑफिस से लौटते वक्त अक्सर दीदी के लिए मोगरे का गजरा लाना नहीं भूलते थे। जब दीदी रसोई में काम करतीं, तो वो पास खड़े होकर उनसे दिन भर की बातें साझा करते। दीदी बीमार पड़ जातीं, तो वो रात-रात भर जागकर उनके सिरहाने बैठे रहते। दुनिया के लिए दीदी एक साधारण, सांवली सी औरत थीं, लेकिन शशांक जीजाजी के लिए वो उनके जीवन की सबसे कीमती मूरत थीं।
समय अपनी रफ्तार से बीतता गया। उम्र के आखिरी पड़ाव में जब दीदी को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया, तो वो बिल्कुल टूट सी गईं। उनके बाल झड़ने लगे थे, शरीर सूख कर कांटा हो गया था। लेकिन शशांक जी का प्यार रत्ती भर भी कम नहीं हुआ। वो खुद दीदी को अपने हाथों से खाना खिलाते, उनके कमजोर बालों में कंघी करते और उन्हें घंटों अपनी बाहों में लेकर पुरानी बातें करते। दीदी अक्सर रोते हुए कहतीं, “शशांक, मैं अब बिल्कुल अच्छी नहीं दिखती। आप मुझे ऐसे कब तक बर्दाश्त करेंगे?” और जीजाजी उनके माथे को चूम कर कहते, “तुम आज भी मेरे लिए उतनी ही सुंदर हो, जितनी उस दिन थी जब तुमने पहली बार मेरे हाथों से चाय का कप लिया था।”
जब दीदी ने इस दुनिया को अलविदा कहा, तो जीजाजी ने एक आंसू नहीं बहाया। वो बस दीदी के निर्जीव शरीर के पास बैठे रहे, उनका हाथ थामे हुए। जैसे उनकी अपनी रूह भी दीदी के साथ ही चली गई हो। दीदी के जाने के बाद जीजाजी ज्यादा दिन नहीं जिए। महीनों तक वो दीदी की तस्वीर से बातें करते रहे और एक दिन चुपचाप नींद में ही उन्होंने भी अपने प्राण त्याग दिए।
आज इस तस्वीर को देखकर मैं यही सोच रही हूँ कि सच में कावेरी दीदी कितनी किस्मतवाली थीं। उन्हें ताउम्र अपने पति का वो स्नेह और अटूट प्यार मिला, जो आजकल के इस दिखावे भरे दौर में किसी मृगतृष्णा से कम नहीं है। सच्चा प्यार वही है जो देह की सीमाओं को लांघ कर रूह में उतर जाए, और शशांक जीजाजी ने यही तो किया था।
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लेखिका : नंदिता महाजन