रात के करीब दस बज रहे थे। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे सुमित्रा जी की तेज और गुस्से से कांपती हुई आवाज़ ने चीर दिया। “राघव! मेरे कमरे में आ अभी के अभी!” सुमित्रा जी का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था और उनकी सांसें तेज़ चल रही थीं। राघव, जो अपने कमरे में लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, माँ की ऐसी घबराई हुई आवाज़ सुनकर तुरंत दौड़ा चला आया। उसे लगा शायद माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई है।
“क्या हुआ माँ? आप इतनी परेशान क्यों लग रही हैं?” राघव ने उनके पास बैठते हुए पूछा।
सुमित्रा जी ने अपने माथे पर आया पसीना पोंछा और रुंधे हुए, लेकिन बेहद तल्ख स्वर में कहा, “धोखा हुआ है हमारे साथ राघव, बहुत बड़ा धोखा! आज मेरा तो जैसे दिल ही फट गया। मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि शर्मा जी का परिवार इतना गिर सकता है। आज जब निहारिका नहा कर निकली और गलती से उसका तौलिया कंधे से थोड़ा नीचे खिसका, तो मेरी तो जैसे चीख ही निकल गई। उसकी पीठ और बांहों के ऊपरी हिस्से पर सफेद दाग हैं! बहुत बड़े-बड़े सफेद दाग। अब मुझसे यह सब और नहीं सहा जाता। किस कदर उसके घरवालों ने हमारी आँखों में धूल झोंकी है।”
राघव अवाक रह गया। वह चुपचाप अपनी माँ को सुनता रहा। सुमित्रा जी का गुस्सा अब एक ज्वारभाटे का रूप ले चुका था।
“अब मुझे सारी बातें समझ में आ रही हैं,” सुमित्रा जी कमरे में टहलते हुए बड़बड़ाने लगीं। “मैं भी सोचूं कि जब हमने शादी में एक पैसे की भी मांग नहीं की थी, तो शर्मा जी ने बिना मांगे इतना भारी दहेज क्यों दिया? वो महंगी गाड़ी, वो सोने के भारी गहने, हर रस्म में पानी की तरह बहाया गया पैसा… और शादी के बाद भी! हर तीज-त्यौहार पर वो जो फलों और मिठाइयों के बड़े-बड़े टोकरे भिजवाते रहते हैं, वो कोई प्यार या सम्मान नहीं था। वो तो बस अपनी बेटी के इसी ऐब को छिपाने के लिए एक तरह की चापलूसी थी। उन्होंने हमारी शराफत का फायदा उठाया है। आज ही, अभी के अभी हम उनकी इस बेटी को उनके घर पटक कर आएंगे, तब उन्हें पता चलेगा कि धोखा देने का अंजाम क्या होता है!”
कमरे के दरवाज़े के ठीक बाहर खड़ी निहारिका के हाथों से पानी का गिलास छूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा। कांच के टुकड़ों के बिखरने की आवाज़ ने कमरे के अंदर के तनाव को और बढ़ा दिया। सुमित्रा जी और राघव ने मुड़कर देखा। निहारिका दरवाज़े की चौखट पकड़कर खड़ी थी, और उसकी आँखों से आंसुओं की अविरल धारा बह रही थी। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था और पूरा शरीर एक सूखे पत्ते की तरह कांप रहा था। वह जानती थी कि यह दिन एक न एक दिन जरूर आएगा, लेकिन जब यह आया, तो उसे लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो।
सुमित्रा जी ने उसे देखते ही अपना मुँह फेर लिया। लेकिन राघव अपनी जगह से उठा और धीरे-धीरे चलकर निहारिका के पास गया। निहारिका ने रोते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। “मुझे माफ़ कर दीजिए माँ जी,” उसकी आवाज़ में एक गहरी पीड़ा थी। “मैं जानती हूँ कि मेरे माता-पिता ने बहुत बड़ी गलती की है। मैं आपको सब कुछ बता देना चाहती थी। शादी से पहले जब आप लोग मुझे देखने आए थे, तब भी मैंने पापा से कहा था कि मैं राघव को सच बताना चाहती हूँ। लेकिन मेरे पापा… वो बहुत डर गए थे।”
निहारिका सिसकते हुए ज़मीन पर बैठ गई। “मेरे पापा ने समाज के तानों को देखा है माँ जी। सफेद दाग कोई छूत की बीमारी नहीं है, लेकिन हमारा समाज इसे एक अभिशाप की तरह देखता है। मेरे पापा ने मुझे एक राजकुमारी की तरह पाला, मुझे खूब पढ़ाया-लिखाया, लेकिन जब शादी की उम्र हुई, तो इस छोटे से दाग की वजह से कई रिश्ते टूट गए। वो अंदर से टूट चुके थे। उन्हें डर था कि अगर वो आपको सच बताएंगे, तो आप भी मुझे ठुकरा देंगी। उन्होंने दहेज या तोहफे आपको रिश्वत देने के लिए नहीं दिए थे, वो तो बस एक लाचार और डरे हुए पिता की कोशिश थी कि उनकी बेटी को ससुराल में प्यार मिल सके। आप चाहें तो मुझे घर से निकाल दें, लेकिन मेरे माता-पिता को मत कोसिए, उनकी गलती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने अपनी बेटी को बसते हुए देखना चाहा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी अभी भी गुस्से में थीं, लेकिन निहारिका के आंसुओं ने उनके अंदर एक हल्की सी हलचल जरूर पैदा कर दी थी। तभी राघव ने निहारिका के कंधे पर हाथ रखा और उसे सहारा देकर खड़ा किया।
राघव ने अपनी माँ की तरफ देखा। उसकी आँखों में न तो गुस्सा था और न ही कोई शिकायत। उसकी आँखों में एक अजीब सी शांति और परिपक्वता थी। “माँ,” राघव ने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “निहारिका के माता-पिता ने जो किया, वो गलत था। रिश्ते की शुरुआत झूठ से नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन क्या हम भी वही गलती करें जो समाज करता आया है? क्या हम एक इंसान को उसकी त्वचा के रंग से तौलेंगे?”
सुमित्रा जी ने पलटकर कहा, “बात सिर्फ रंग की नहीं है राघव, बात धोखे की है!”
“मैं समझता हूँ माँ,” राघव ने निहारिका का हाथ अपने हाथ में थाम लिया। “लेकिन आप एक बात सोचिए। निहारिका को हमारे घर आए छह महीने हो गए हैं। इन छह महीनों में क्या उसने कभी आपको शिकायत का कोई मौका दिया? जब आपको पिछले महीने डेंगू हुआ था, तो क्या इसी निहारिका ने रात-दिन जागकर आपकी सेवा नहीं की थी? क्या इसके हाथ के बने खाने और इसके मीठे व्यवहार की तारीफ आप खुद अपनी सहेलियों से नहीं करती थीं? माँ, त्वचा का रंग तो उम्र के साथ वैसे भी बदल जाएगा, लेकिन जो मन का रंग निहारिका के पास है, वो बहुत कम लोगों को नसीब होता है। अगर शादी के बाद कल को मुझे कोई बीमारी हो जाती, तो क्या निहारिका मुझे छोड़कर चली जाती? नहीं ना! तो फिर हम क्यों एक ऐसी चीज के लिए उसे ठुकरा दें, जिस पर उसका कोई ज़ोर ही नहीं है?”
राघव की बातों ने सुमित्रा जी के मन पर पड़े गुस्से के जाले को साफ करना शुरू कर दिया। उनके दिमाग में निहारिका की वो छवि घूमने लगी, जब वह सुबह उठकर सबसे पहले उनके लिए बिना चीनी की चाय बनाती थी, जब उनके पैरों में दर्द होने पर वह बिना कहे उन्हें तेल मल देती थी। सुमित्रा जी को एहसास हुआ कि जो लड़की उनके घर को इतने प्यार से संवार रही है, उसे सिर्फ एक शारीरिक अपूर्णता के लिए घर से निकाल देना कहां का न्याय है?
शर्मा जी का डर और उनका दिया हुआ दहेज अब सुमित्रा जी को एक पिता की बेबसी लगने लगा था। एक पिता, जो अपनी बेटी को समाज के तानों से बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था।
सुमित्रा जी की आँखों में आँसू आ गए। उनका सारा अहंकार और गुस्सा एक पल में पिघल गया। वे धीरे-धीरे निहारिका के पास गईं और अपने कांपते हाथों से उसके गालों पर बहते आँसुओं को पोंछा।
“तुम्हारे पापा सच में बहुत बेवकूफ हैं निहारिका,” सुमित्रा जी ने भारी आवाज़ में कहा और निहारिका को अपने सीने से लगा लिया। “उन्हें लगा कि वो इस घर की खुशियां गहनों और गाड़ियों से खरीद लेंगे। उन्हें यह नहीं पता था कि उनकी असली दौलत तो तुम हो। माना कि उन्होंने सच छुपाकर गलती की, लेकिन मैं तुम्हें इस घर से निकालकर उससे भी बड़ी गलती नहीं कर सकती। आज के बाद इस घर में तुम्हारे इन सफेद दागों का या तुम्हारे मायके वालों की इस गलती का कोई जिक्र नहीं होगा। तुम इस घर की बेटी थी, और बेटी ही रहोगी।”
निहारिका फूट-फूट कर सुमित्रा जी के गले लगकर रोने लगी, लेकिन अब ये आँसू दर्द के नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत और सम्मान के थे। उस दिन उस घर में एक नया रिश्ता बना था, जो किसी दहेज या दिखावे पर नहीं, बल्कि इंसानियत, समझ और सच्चे प्रेम की नींव पर खड़ा था।
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लेखिका : भूमि तनेजा