**सिंदूरी वादे की अनकही दास्तान**

लड़के वाले तो सिर्फ लड़की देखने आए थे, लेकिन जब दोनों परिवारों के बुजुर्ग एक साथ बैठे, तो तय हुआ कि बार-बार आने-जाने का खर्च और समय क्यों बर्बाद किया जाए। शुभ मुहूर्त भी था और लड़का भी साथ ही आया था, तो क्यों न आज ही हाथ पीले कर दिए जाएं और दुल्हन को साथ ही विदा करा लिया जाए। फैसला अचानक था, लेकिन दोनों परिवारों के चेहरों पर एक गहरी संतुष्टि थी। दूल्हा राघव छब्बीस साल का एक गठीले बदन और सुलझे हुए विचारों वाला युवक था, और दुल्हन मीरा अभी मुश्किल से उन्नीस बसंत पार कर पाई थी। दोनों की जोड़ी ऐसी थी कि देखने वाले बस नजरें उतारते रह जाएं। एक तरफ राघव की आंखों में दुनिया जीतने का आत्मविश्वास था, तो दूसरी तरफ मासूम मीरा के चेहरे पर एक ऐसी लज्जा और हया थी, जिस पर राघव पहली नजर में ही अपना दिल हार बैठा था।

सर्दियों की गुनगुनी धूप में दिन के ठीक बारह बजे घर के बड़े से आंगन में शादी की रस्में चल रही थीं। गेंदे के फूलों की महक और शहनाई की मंगल ध्वनि से पूरा माहौल गूंज रहा था। आंगन में सारे नाते-रिश्तेदार, चाची-ताई और मोहल्ले की औरतें जमा थीं। हंसी-ठिठोली और मंगलगीतों के बीच मीरा लाल सुर्ख बनारसी साड़ी में सिमटी हुई बैठी थी। भारी गहनों और घूंघट के बोझ से वह और भी ज्यादा झुकी जा रही थी। उसकी धड़कनें इतनी तेज थीं कि उसे लग रहा था जैसे कोई बाहर से भी सुन लेगा। 

रस्मों की इसी आपाधापी और भीड़-भाड़ के बीच, जब पंडित जी ने दोनों को हवन कुंड में आहुति डालने के लिए हाथ आगे करने को कहा, तो राघव से रहा नहीं गया। उसने अपने गुस्ताख और बेबाक स्वभाव का परिचय देते हुए, सबके सामने ही, लेकिन एक ऐसे सलीके से मीरा की कांपती हुई हथेली को अपनी मजबूत उंगलियों के बीच दबा लिया कि किसी और का ध्यान उस ओर गया ही नहीं। एक अनजाने पुरुष के इस पहले स्पर्श से मीरा के बदन में बिजली सी दौड़ गई। वह सकुचाई, घबराई और शर्म से और भी ज्यादा खुद में सिमट गई। उसकी सांसें तेज हो गईं और उसने नजरें और नीचे झुका लीं। 

राघव उसकी इस मासूमियत को देखकर और भी दीवाना हो गया। उसने हवन के धुएं और मंत्रों की गूंज की आड़ में, बहुत ही धीमी लेकिन एक अधिकार भरी आवाज में मीरा के कानों के पास फुसफुसाते हुए पहल की, “सुनो… इस लाल जोड़े में तुम साक्षात कोई अप्सरा लग रही हो। तुम्हारी इस सादगी ने मुझे हमेशा के लिए अपना गुलाम बना लिया है। आज इस अग्नि के सामने मुझे तुमसे एक वादा चाहिए… वादा करो कि आज के दिन, हर साल हमारी सालगिरह पर तुम यही लाल सुहाग का जोड़ा पहनोगी, सिर्फ मेरे लिए।”

मीरा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस पलकें झपका कर अपनी मौन सहमति दे दी। उस दोपहर उस आंगन में एक ऐसा वादा हुआ था, जिसकी गवाह सिर्फ वो दोनों और वो पवित्र अग्नि थी। 

वक्त अपनी रफ्तार से उड़ता रहा। जिंदगी के सफर में कई धूप-छांव आए। बच्चों की परवरिश, घर की जिम्मेदारियां, कुछ आर्थिक उलझनें और समाज के ताने-बाने के बीच राघव और मीरा का वह नवयौवन कहीं पीछे छूट गया। लेकिन उन दोनों के बीच एक चीज कभी नहीं बदली—उनका वह वादा। हर साल शादी की सालगिरह पर, चाहे घर में कितनी भी परेशानी क्यों न हो, मीरा उस पुरानी लाल बनारसी साड़ी को निकालती और राघव के लिए उसी तरह सजती, जैसे वह उस सर्दियों की दोपहर में सजी थी। राघव उसे देखता और उसकी आंखों में वही छब्बीस साल वाले युवा का प्यार छलक आता। 

पर आज बात कुछ और थी। आज उनकी शादी की चालीसवीं सालगिरह थी। मीरा अब उनसठ साल की हो चुकी थी। उसके घने काले बाल अब पूरी तरह सफेद हो चुके थे, चेहरे पर झुर्रियों ने अपना स्थायी घर बना लिया था और जोड़ों के दर्द ने उसे कमजोर कर दिया था। उसने अपनी पुरानी संदूक खोली और उस लाल साड़ी को बाहर निकाला। साड़ी का रेशम अब जगह-जगह से गलने लगा था, बिल्कुल उनके बूढ़े हो रहे शरीरों की तरह। मीरा ने आईने में खुद को देखा और एक गहरी उदासी से भर गई। उसे लगा कि अब इस ढलती उम्र में यह लाल जोड़ा उस पर बिल्कुल अच्छा नहीं लगेगा। वह अब वो उन्नीस साल की खूबसूरत लड़की नहीं रही। आंसुओं की एक बूंद उसकी झुर्रियों पर फिसल गई और उसने साड़ी को वापस संदूक में रखने का मन बना लिया।

तभी दरवाजे पर आहट हुई। राघव, जो अब लाठी के सहारे चलता था, धीरे-धीरे कमरे में दाखिल हुआ। उसने देखा कि मीरा साड़ी को वापस रख रही है। वह उसके पास गया और अपनी कांपती हुई झुर्रीदार उंगलियों से मीरा का हाथ वैसे ही पकड़ लिया, जैसे चालीस साल पहले उस हवन कुंड के पास पकड़ा था। 

“क्या हुआ मीरा? आज तुमने अपना वादा क्यों तोड़ दिया?” राघव ने बहुत ही प्यार से पूछा।

मीरा रो पड़ी। “अब क्या रखा है इस लाल जोड़े में राघव जी? मैं अब वो खूबसूरत मीरा नहीं रही। यह झुर्रियां, यह बुढ़ापा… इस लाल रंग की तौहीन है।”

राघव मुस्कुराया। उसने साड़ी को संदूक से निकाला और मीरा के कंधों पर रख दिया। उसने मीरा की आंखों में देखते हुए कहा, “पगली, मैंने तुमसे तुम्हारी जवानी नहीं मांगी थी, तुम्हारा साथ मांगा था। मेरे लिए तुम्हारी यह झुर्रियां उस उन्नीस साल की खूबसूरती से कहीं ज्यादा कीमती हैं, क्योंकि इन झुर्रियों में मेरे बच्चों का बचपन, मेरा संघर्ष और हमारी जिंदगी की पूरी कहानी लिखी है। आज भी जब तुम इस लाल रंग में होती हो, तो मुझे वही मंडप वाली मेरी डरी हुई, मासूम सी दुल्हन ही नजर आती है।”

मीरा की सारी दुविधाएं उन चंद शब्दों में बह गईं। उसने राघव के कांपते हाथों को चूमा और उस फटी हुई, पुरानी लाल साड़ी के पल्लू को अपने सिर पर ओढ़ लिया। उस दिन उस कमरे में कोई जवान जोड़ा नहीं था, लेकिन जो प्यार वहां महक रहा था, वह किसी भी नई शादीशुदा जोड़ी के प्यार से हजारों गुना ज्यादा गहरा, पवित्र और अमर था। 

**क्या आपको भी लगता है कि सच्चा प्यार उम्र और शारीरिक सुंदरता का मोहताज नहीं होता? अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।**

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लेखक : राजेन्दर सक्सेना 

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