“माँ, मैं शादी नहीं करना चाहती।”
नंदिनी ने इतना कहा और चुप हो गई।
कमरे में कुछ पल के लिए ऐसी खामोशी छा गई, जैसे किसी ने अचानक चलते पंखे की आवाज भी बंद कर दी हो।
माँ ने उसकी ओर देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ। नौकरी करना चाहती हूँ। अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हूँ।”
पिता ने अखबार मोड़कर मेज पर रख दिया।
“पढ़ाई तो शादी के बाद भी हो सकती है।”
नंदिनी ने कुछ कहना चाहा, मगर शब्द गले में ही अटक गए।
वह जानती थी, घर में उसकी बात सुनने वाला कोई नहीं था।
नंदिनी एक मध्यमवर्गीय परिवार की इकलौती बेटी थी। माता-पिता ने उसे कभी बेटों से कम नहीं समझा था। उसने भी मन लगाकर पढ़ाई की थी। कॉलेज में उसके अच्छे अंक आए थे और शहर की एक कंपनी में नौकरी का प्रस्ताव भी मिला था।
उसके सपनों का आसमान छोटा नहीं था।
लेकिन तभी मामा जी एक रिश्ता लेकर आए।
लड़का अच्छा था। सरकारी नौकरी में था। परिवार प्रतिष्ठित था। घर बड़ा था।
और सबसे बड़ी बात—लड़के वालों ने कहा था, “हमें कोई दहेज नहीं चाहिए।”
माँ-बाप को लगा, इससे अच्छा रिश्ता उन्हें फिर नहीं मिलेगा।
नंदिनी ने बहुत समझाया।
“पापा, मुझे एक साल दीजिए। मैं नौकरी शुरू कर लूँ। फिर शादी कर लूँगी।”
पिता ने उसकी पीठ थपथपाई।
“बेटी, तुम्हारी खुशी ही हमारी खुशी है।”
लेकिन अगले ही दिन उन्होंने कहा—
“तुम्हारी माँ का कहना है कि ऐसा रिश्ता बार-बार नहीं मिलता।”
नंदिनी समझ गई।
उसकी खुशी से ज्यादा महत्वपूर्ण समाज की नजर थी।
शादी हो गई।
शुरुआत के कुछ दिन अच्छे रहे।
पति विवेक उससे प्यार से बात करता। सास भी मीठा बोलतीं।
“बहू, घर संभालना सीख जाओ। नौकरी की क्या जरूरत है?”
नंदिनी मुस्कुरा देती।
“माँजी, मैं नौकरी भी करना चाहती हूँ।”
सास ने हँसकर कहा—
“पहले घर तो संभाल लो।”
विवेक भी यही कहता।
“अभी कुछ समय घर को दे दो। बाद में देखेंगे।”
‘बाद में’ कब आएगा, नंदिनी नहीं जानती थी।
सुबह से रात तक वह घर के काम में लगी रहती। फिर भी कोई न कोई कमी निकाल दी जाती।
कभी सब्जी में नमक कम होता।
कभी रोटी ठीक नहीं बनती।
कभी चाय देर से मिलती।
एक दिन नंदिनी ने साहस करके कहा—
“माँजी, मैंने नौकरी के लिए इंटरव्यू दिया है।”
सास का चेहरा बदल गया।
“तुम्हें घर में कोई परेशानी है?”
“नहीं।”
“फिर नौकरी क्यों?”
“क्योंकि मैंने पढ़ाई की है।”
सास कुछ पल उसे देखती रहीं।
“पढ़ाई घर चलाने के काम आती है, बहू। नौकरी करने के लिए नहीं।”
नंदिनी को जैसे किसी ने भीतर से चोट कर दी।
उस रात उसने विवेक से कहा—
“मैं नौकरी करना चाहती हूँ।”
विवेक ने करवट बदलते हुए कहा—
“माँ को अच्छा नहीं लगता।”
“लेकिन तुम्हें?”
“मुझे कोई आपत्ति नहीं… मगर घर में रोज झगड़ा कौन करेगा?”
नंदिनी चुप हो गई।
अगले दिन उसने नौकरी का विचार छोड़ दिया।
कुछ महीनों बाद वह गर्भवती हुई।
उसे लगा, शायद अब घर में उसके लिए प्यार बढ़ जाएगा।
लेकिन परिस्थितियाँ और कठिन होती गईं।
सास की अपेक्षाएँ बढ़ती गईं।
“हमारे घर की बहुएँ मायके में बैठकर आराम नहीं करतीं।”
नंदिनी अपने दर्द को छिपाकर काम करती रहती।
एक दिन उसे तेज कमजोरी महसूस हुई। वह रसोई में ही बैठ गई।
सास ने कहा—
“इतना भी क्या नखरा?”
नंदिनी ने सिर उठाया।
“माँजी, सच में तबीयत खराब है।”
विवेक घर आया तो नंदिनी ने उससे डॉक्टर को दिखाने की बात कही।
विवेक ने कहा—
“कल चलते हैं।”
मगर अगले दिन उसके ऑफिस में जरूरी काम था।
फिर अगले दिन।
फिर उसके अगले दिन।
नंदिनी हर बार सोचती—कल शायद समय मिल जाएगा।
एक रात उसने आईने में अपना चेहरा देखा।
आँखों के नीचे काले घेरे थे।
उसे अपना पुराना चेहरा याद आया।
वही चेहरा, जिसमें सपने थे।
वही लड़की, जो कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठकर कहती थी—
“मैं कुछ बनूँगी।”
उसने धीरे से आईने को छुआ।
“कहाँ खो गई मैं?”
उसी रात मायके से माँ का फोन आया।
“बेटी, कैसी है?”
नंदिनी ने हमेशा की तरह कहा—
“बहुत अच्छी हूँ माँ।”
माँ ने पूछा—
“सच?”
नंदिनी की आँखें भर आईं।
“हाँ माँ।”
फोन रखकर वह बहुत देर तक रोती रही।
लेकिन उसने किसी को दोष नहीं दिया।
उसे लगा, शायद यही विवाह है।
समझौते।
चुप्पी।
त्याग।
एक दिन घर में रिश्तेदार आए हुए थे।
नंदिनी सुबह से काम में लगी थी। उसने ठीक से खाना भी नहीं खाया था।
अचानक उसे चक्कर आया और वह गिर पड़ी।
जब आँख खुली तो वह अस्पताल में थी।
माँ उसके पास बैठी थी।
“नंदू…”
नंदिनी ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
“माँ, मुझे घर ले चलो।”
माँ की आँखों से आँसू बह निकले।
“बेटी, पहले ठीक हो जा।”
तभी डॉक्टर ने कहा—
“आपको आराम की बहुत जरूरत है। शरीर को लगातार नजरअंदाज करना ठीक नहीं।”
नंदिनी ने पहली बार अपनी माँ की ओर सीधे देखा।
“माँ, मैंने बहुत सह लिया।”
माँ ने उसका हाथ दबाया।
“तो अब मत सह।”
बस यही तीन शब्द नंदिनी के भीतर उतर गए।
कुछ दिन बाद वह मायके आई।
इस बार वह भागकर नहीं आई थी।
वह सोचने आई थी।
उसने अपनी पुरानी फाइल निकाली। उसमें कॉलेज की डिग्री, प्रमाणपत्र और नौकरी का प्रस्ताव था।
कागज पीले पड़ चुके थे।
लेकिन उसके सपने नहीं।
उसने फोन उठाया और उसी कंपनी में फोन किया।
“क्या मेरी नौकरी का प्रस्ताव अभी भी…?”
उधर से जवाब मिला—
“अगर आप तैयार हैं तो हम भी तैयार हैं।”
नंदिनी की आँखों से आँसू बह निकले।
लेकिन ये आँसू दर्द के नहीं थे।
ये उस लड़की के आँसू थे जिसे बहुत समय बाद अपना रास्ता दिखाई दिया था।
कुछ दिनों बाद विवेक उसे लेने आया।
“चलो नंदिनी, घर चलो।”
नंदिनी ने शांत स्वर में पूछा—
“क्या मैं नौकरी कर सकती हूँ?”
विवेक चुप रहा।
“माँ मान जाएँगी?”
फिर चुप्पी।
नंदिनी ने कहा—
“मैं तुम्हारे साथ चल सकती हूँ, विवेक। लेकिन अपने सपनों को पीछे छोड़कर नहीं।”
विवेक ने पहली बार उसे गौर से देखा।
शायद पहली बार उसे समझ आया कि सामने खड़ी लड़की केवल उसकी पत्नी नहीं थी।
वह एक अलग व्यक्तित्व थी।
एक बेटी थी।
एक पढ़ी-लिखी युवती थी।
एक इंसान थी।
विवेक ने धीमे से कहा—
“मैं माँ से बात करूँगा।”
नंदिनी ने सिर हिला दिया।
“मुझे तुम्हारी लड़ाई नहीं चाहिए। मुझे तुम्हारा साथ चाहिए।”
उस दिन विवेक ने उसका हाथ थाम लिया।
घर लौटने के बाद बहुत कुछ तुरंत नहीं बदला।
सास को समय लगा।
रिश्तेदारों ने बातें बनाईं।
किसी ने कहा—
“बहू नौकरी करेगी तो घर कौन देखेगा?”
किसी ने कहा—
“आजकल की लड़कियाँ घर नहीं बसाना चाहतीं।”
नंदिनी हर बात का जवाब नहीं देती थी।
वह सुबह उठती।
घर संभालती।
ऑफिस जाती।
शाम को लौटकर परिवार के साथ बैठती।
धीरे-धीरे घर को भी समझ आया कि नंदिनी नौकरी करके घर से दूर नहीं जा रही थी।
वह अपने भीतर लौट रही थी।
एक साल बाद कंपनी में उसे प्रमोशन मिला।
उस दिन वह मिठाई का डिब्बा लेकर घर आई।
सबसे पहले उसने सास के पैर छुए।
सास ने मिठाई लेते हुए कहा—
“तुमने सच में अच्छा काम किया है।”
नंदिनी मुस्कुरा दी।
उसकी आँखें नम थीं।
वह जानती थी, मंजिल अभी पूरी नहीं हुई।
लेकिन उसने सबसे कठिन रास्ता पार कर लिया था।
रात को वह अपनी डायरी खोलकर बैठी।
पहले पन्ने पर वर्षों पहले उसने लिखा था—
“मैं अपने जीवन में कुछ बनना चाहती हूँ।”
उसने उसके नीचे आज एक पंक्ति और लिख दी—
“दर्द की इंतहा वह क्षण नहीं जब इंसान रोता है; दर्द की इंतहा वह क्षण है जब उसे लगता है कि उसकी अपनी आवाज कहीं खो गई है। और मुक्ति तब मिलती है, जब वही आवाज फिर सुनाई देने लगे।”
नंदिनी ने डायरी बंद की।
खिड़की के बाहर सुबह होने लगी थी।
आसमान पर हल्की रोशनी फैल रही थी।
वह मुस्कुराई।
अब उसे किसी से लड़ना नहीं था।
उसे केवल अपने भीतर बची हुई उस लड़की को जीवित रखना था, जिसे उसने कभी परिस्थितियों के हाथों खो दिया था।
और शायद यही उसके जीवन का सबसे सुंदर आरंभ था।
स्वरचित मौलिक व अप्रकाशित रचना
लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका ‘
खुर्जा 203131
जि० बुलंदशहर
उत्तर प्रदेश