सुमित्रा स्वभाव से बहुत ही शांत, सुलझी हुई और दूसरों का खयाल रखने वाली महिला थी। उसके पति, सुधीर, एक सरकारी बैंक में मैनेजर थे। उनका परिवार एक बहुत ही सुंदर और शांत हाउसिंग सोसाइटी में रहता था। उसी सोसाइटी के एक दूसरे ब्लॉक में सुधीर के छोटे भाई का परिवार रहता था। सुधीर के छोटे भाई की पत्नी का नाम देविका था। देविका, सुमित्रा की देवरानी थी, लेकिन दोनों की उम्र में ज्यादा फासला नहीं था। देविका का स्वभाव सुमित्रा से बिलकुल विपरीत था। वह चंचल, बातूनी, खुद को हमेशा सही साबित करने वाली और अपनी हर छोटी-बड़ी बात का बखान करने वाली महिला थी।
चूंकि दोनों एक ही सोसाइटी में रहती थीं, इसलिए देविका का सुमित्रा के घर आना-जाना लगभग रोज़ का ही था। अक्सर दोपहर के समय, जब घर के सारे काम खत्म हो जाते और सुमित्रा थोड़ा आराम करने के लिए बैठती, तभी दरवाज़े की घंटी बजती और देविका चहकती हुई अंदर दाखिल हो जाती। देविका के पास दुनिया भर की बातें होती थीं। कभी वह अपनी मायके की तारीफों के पुल बांधती, तो कभी अपने पति के ऑफिस की राजनीति पर चर्चा करती। कभी वह सोसाइटी की दूसरी महिलाओं की चुगलियां करती, तो कभी अपने महंगे कपड़ों और गहनों का दिखावा करती।
“भाभी, आपको पता है कल मेरे मिस्टर ने मुझे जो साड़ी दिलवाई है, वो पूरे पच्चीस हज़ार की है। और उसमें जो कढ़ाई है न, वो असली ज़री की है। मैंने तो कह दिया था कि मुझे ये सस्ती साड़ियां बिलकुल पसंद नहीं आतीं। और हाँ, वो जो शर्मा जी की पत्नी हैं न, कल वो जो हार पहन कर आई थीं, वो तो मुझे साफ-साफ नकली लग रहा था।” देविका बिना रुके, बिना थके बस बोलती चली जाती।
सुमित्रा एक अच्छी श्रोता थी। वह देविका की सारी बातें बहुत ध्यान से सुनती, बीच-बीच में हाँ-हूँ करती और जहाँ ज़रूरत होती, अपनी सलाह भी देती। सुमित्रा को लगता था कि रिश्ते ऐसे ही निभाए जाते हैं, एक-दूसरे की बातें सुनकर, एक-दूसरे का साथ देकर। लेकिन समस्या तब शुरू होती थी जब सुमित्रा के बोलने की बारी आती। जब सुमित्रा अपने मन की कोई बात, अपनी कोई परेशानी या अपनी कोई खुशी देविका के साथ बांटना चाहती, तो देविका का रवैया अचानक बदल जाता।
“अच्छा देविका, कल सुधीर जी की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी, डॉक्टर ने उन्हें…” सुमित्रा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाती थी कि देविका अचानक अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखती या अपने फोन की स्क्रीन को घूरने लगती।
“अरे बाप रे! भाभी, मुझे तो याद ही नहीं रहा, आज तो मुझे बच्चों को ट्यूशन छोड़ने जाना है। मेड भी आने वाली होगी। मैं चलती हूँ, आपकी बात फिर कभी सुनूंगी।” यह कहकर देविका झट से उठती और दरवाज़े की तरफ भाग खड़ी होती। सुमित्रा बस अपना सा मुँह लेकर रह जाती। उसके दिल की बात उसके दिल में ही रह जाती।
यह सिलसिला एक या दो बार नहीं, बल्कि महीनों तक चलता रहा। जब भी देविका का मन करता, वह सुमित्रा को फोन मिला लेती। फोन पर भी उसका वही रवैया रहता। “भाभी, आज तो मेरे सिर में बहुत दर्द है, सास जी ने सुबह-सुबह फोन करके दिमाग खराब कर दिया…” और फिर उसकी आधे घंटे की लंबी कहानी शुरू हो जाती। सुमित्रा अपना सारा काम छोड़कर उसकी बातें सुनती। लेकिन जब सुमित्रा कहती, “देविका, आज मेरे घुटनों में बहुत दर्द है, रात भर सो नहीं पाई,” तो देविका तुरंत कहती, “ओह हो भाभी, गैस पर दूध उबल रहा है, लगता है गिर जाएगा! मैं बाद में फोन करती हूँ।” और खटाक से फोन कट जाता।
सुमित्रा कोई मूर्ख महिला नहीं थी। उसे धीरे-धीरे समझ आने लगा था कि देविका को सिर्फ अपनी सुनाने का शौक है, उसे सुमित्रा की भावनाओं या उसकी बातों से कोई लेना-देना नहीं है। वह सिर्फ सुमित्रा को एक ‘डस्टबिन’ की तरह इस्तेमाल करती थी, जिसमें वह अपनी सारी मानसिक भड़ास, अपनी डींगें और अपनी शिकायतें डाल सके। लेकिन सुमित्रा पारिवारिक शांति बनाए रखना चाहती थी, इसलिए वह खून का घूंट पीकर रह जाती थी। वह सोचती कि चलो, देवरानी है, नासमझ है, क्या उससे बहस करना।
एक दिन दोपहर के समय सुमित्रा ने कुछ खास तरह के लड्डू बनाए थे, जो देविका को बहुत पसंद थे। सुमित्रा ने सोचा कि चलो, देविका को भी दे आती हूँ। वह एक डिब्बे में लड्डू लेकर देविका के ब्लॉक की तरफ गई। देविका के घर का दरवाज़ा थोड़ा सा खुला हुआ था। सुमित्रा ने सोचा कि घंटी बजाकर उसे परेशान करने से अच्छा है कि सीधे अंदर ही चली जाऊं, आखिर घर की ही तो बात है।
सुमित्रा जैसे ही ड्राइंग रूम में दाखिल हुई, उसने देखा कि देविका सोफे पर आराम से लेटी हुई है और फोन पर किसी से बहुत मज़े लेकर बातें कर रही है। सुमित्रा को देखकर देविका ने मुस्कुराते हुए हाथ के इशारे से उसे सामने वाली कुर्सी पर बैठने को कहा। सुमित्रा चुपचाप बैठ गई और देविका के फोन पर बात खत्म होने का इंतज़ार करने लगी।
देविका शायद अपनी किसी बहुत पुरानी सहेली या रिश्तेदार से बात कर रही थी। उसकी आवाज़ पूरे कमरे में गूंज रही थी।
“हाँ यार सुरभि, मैंने तो पहले ही कह दिया था कि मैं उस छोटे से होटल में पार्टी नहीं करूंगी। तुम्हें तो पता है मेरा स्टैंडर्ड क्या है। अरे, मेरे पति ने तो कहा कि चलो फाइव स्टार में ही बुक कर लेते हैं। और पता है, मैंने जो उस दिन डिज़ाइनर गाउन पहना था, सब बस मुझे ही देखते रह गए…” देविका अपनी उसी पुरानी रौ में बहती जा रही थी। वह लगभग पंद्रह मिनट तक बिना रुके बोलती रही।
इतनी देर में सुमित्रा को लगा कि शायद उसे डिब्बा रखकर चले जाना चाहिए क्योंकि देविका की बात खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी। सुमित्रा ने दो बार उठने की कोशिश भी की, लेकिन देविका ने हर बार उसे उंगली के इशारे से रोक दिया और बैठने को कहा।
कुछ देर बाद, फोन के दूसरी तरफ वाली सुरभि ने शायद बोलना शुरू किया। जैसे ही सुरभि ने अपनी कोई बात बतानी शुरू की, देविका के चेहरे के हाव-भाव अचानक बदल गए। उसके चेहरे पर बोरियत साफ झलकने लगी। उसने एक गहरी सांस ली, अपनी आँखें घुमाईं और फिर अचानक सुमित्रा की तरफ देखकर एक अजीब सा इशारा किया। देविका ने सेंटर टेबल पर रखे एक स्टील के चम्मच की तरफ इशारा करते हुए सुमित्रा से कहा कि वह उस चम्मच को कांच की प्लेट पर ज़ोर से पटके।
सुमित्रा को कुछ समझ नहीं आया। उसने इशारे से पूछा- “क्यों?”
देविका ने फुसफुसाते हुए और आँखें बड़ी करते हुए कहा, “बजाओ न भाभी, प्लीज़!”
सुमित्रा ने झिझकते हुए चम्मच को प्लेट पर मारा, जिससे ‘छन्न’ की एक तेज़ आवाज़ हुई।
आवाज़ होते ही देविका ने फोन के माइक पर हाथ हटाते हुए सुरभि से घबराए हुए स्वर में कहा, “अरे सुरभि! लगता है किचन में बिल्ली घुस आई है और उसने कुछ कांच का बर्तन गिरा दिया है। मुझे तुरंत जाना पड़ेगा, कहीं बच्चों को चोट न लग जाए। मैं तुम्हें बाद में कॉल करती हूँ, बाय!” और यह कहकर देविका ने तुरंत फोन काट दिया।
फोन काटते ही देविका ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगी। वह सोफे पर उठकर बैठ गई और सुमित्रा से बोली, “थैंक यू भाभी! आपने मुझे बचा लिया। उफ़! ये सुरभि भी न, पकाने में नंबर वन है। आधा घंटा तो मैंने उसकी बकवास सुनी (जबकि सच ये था कि देविका ही बोल रही थी), और अब वो अपनी सास का रोना लेकर बैठ गई। मेरे पास इतना फालतू टाइम थोड़ी है कि मैं उसकी बोरिंग बातें सुनती रहूं। उसे चुप कराने के लिए मुझे आपसे ये आवाज़ करवानी पड़ी।”
सुमित्रा हैरान थी। उसने पूछा, “देविका, अगर तुम्हें बात नहीं करनी थी, तो तुम सीधे भी तो कह सकती थी कि तुम व्यस्त हो। ऐसे झूठ बोलने की और मुझसे ये बर्तन बजवाने की क्या ज़रूरत थी?”
देविका ने एक कुटिल मुस्कान के साथ जवाब दिया, “अरे भाभी, आप भी कितनी भोली हैं। आज के ज़माने में थोड़ा स्मार्ट बनना पड़ता है। अगर मैं सीधे कह देती कि मुझे तुम्हारी बात नहीं सुननी, तो उसे बुरा लग जाता। ये मैनर्स (शिष्टाचार) के खिलाफ है न। इसलिए कोई ऐसा बहाना बनाना पड़ता है जिस पर सामने वाले को पूरा यकीन हो जाए। बर्तन की आवाज़ सुनकर उसे लगा होगा कि सच में कोई इमरजेंसी आ गई है। इसे कहते हैं स्मार्ट टाइम मैनेजमेंट! मैं तो अक्सर ऐसे ही करती हूँ, जब भी मुझे किसी की बात सुनकर बोरियत होने लगती है, मैं कोई न कोई बहाना बना देती हूँ।”
देविका के ये शब्द सुमित्रा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतरे। पल भर में सुमित्रा के दिमाग में पिछले दो सालों की वो सारी घटनाएं किसी फिल्म की रील की तरह घूम गईं। ‘गैस पर दूध उबल रहा है’, ‘मेड आ गई है’, ‘बच्चों की स्कूल बस आ गई है’, ‘पति देव आने वाले हैं’—ये सारे वो बहाने थे जो देविका हमेशा तब बनाती थी जब सुमित्रा कुछ कहना चाहती थी। सुमित्रा को यह समझने में एक सेकंड भी नहीं लगा कि देविका के लिए उसकी बातें, उसकी भावनाएं भी सुरभि की तरह ही ‘बोरिंग’ थीं। देविका ने हमेशा उसे बेवकूफ बनाया था।
सुमित्रा का दिल बहुत दुखा। उसे लगा जैसे किसी ने उसकी शराफत का सरेआम मज़ाक उड़ाया हो। उसका मन किया कि वह उसी वक्त देविका को खरी-खोटी सुना दे और बता दे कि उसे उसकी सारी चालाकियों का पता चल चुका है। लेकिन सुमित्रा एक समझदार महिला थी। उसने खुद पर नियंत्रण रखा। उसने चुपचाप लड्डू का डिब्बा मेज़ पर रखा, एक हल्की सी कृत्रिम मुस्कान अपने चेहरे पर लाई और बोली, “अच्छा देविका, स्मार्ट तो तुम सच में बहुत हो। चलो, मैं चलती हूँ, मुझे भी घर पर बहुत काम है।”
सुमित्रा वहां से लौट तो आई, लेकिन उसके अंदर एक अजीब सा तूफ़ान चल रहा था। उसे समझ आ गया था कि रिश्ते निभाने का ठेका सिर्फ उसका नहीं है। जो इंसान आपकी भावनाओं की कद्र नहीं कर सकता, जो आपकी आवाज़ को अनसुना कर देता है, उसके लिए अपने मन को दुखाना सबसे बड़ी मूर्खता है। सुमित्रा ने मन ही मन एक पक्का फैसला कर लिया था कि अब वह देविका के इस स्वार्थी रवैये को और बर्दाश्त नहीं करेगी। उसे उसी की भाषा में जवाब देना ज़रूरी था, ताकि उसे एहसास हो कि जब कोई आपकी बात को बीच में ही काट देता है, तो कैसा महसूस होता है।
इस घटना को बीते हुए करीब चार दिन हो चुके थे। एक दोपहर, जब सुमित्रा अपने लिविंग रूम में बैठकर एक किताब पढ़ रही थी, तभी उसके फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर देविका का नाम चमक रहा था। सुमित्रा के चेहरे पर एक शांत, लेकिन दृढ़ मुस्कान आ गई। उसने फोन उठाया।
“हैलो भाभी! क्या कर रही हैं?” देविका की चहकती हुई आवाज़ आई।
“कुछ नहीं देविका, बस खाली बैठी थी,” सुमित्रा ने बहुत ही सामान्य स्वर में कहा।
“ओह गुड! भाभी, आपको पता है कल रात को क्या हुआ? मेरे मिस्टर को ऑफिस की तरफ से बैंकॉक जाने का मौका मिल रहा है। और उन्होंने कहा है कि वो मुझे और बच्चों को भी साथ ले जाएंगे। मैं तो अभी से शॉपिंग की लिस्ट बनाने बैठ गई हूँ। मुझे न वो नए डिज़ाइन वाले सनग्लासेस लेने हैं, और बच्चों के लिए स्विमिंग कॉस्ट्यूम। और हाँ, भाभी…” देविका की एक्सप्रेस ट्रेन छूट चुकी थी। वह अपनी ट्रिप, अपनी शॉपिंग और अपनी खुशियों का बखान पूरे उत्साह के साथ कर रही थी।
सुमित्रा ने अपने पास रखी मेज़ पर से एक स्टील का गिलास और एक चम्मच उठाया। उसने देविका को ठीक दो मिनट तक बोलने दिया। जैसे ही देविका एक सांस लेने के लिए रुकी, सुमित्रा ने जानबूझकर उस स्टील के चम्मच को गिलास पर बहुत ज़ोर से दे मारा। ‘टनन-टनन!’ की तेज़ आवाज़ फोन के माइक से होती हुई देविका के कानों तक पहुंची।
“अरे सुमित्रा भाभी, ये कैसी आवाज़ थी? कुछ गिर गया क्या?” देविका ने अपनी बात बीच में रोककर पूछा।
सुमित्रा ने बहुत ही घबराई हुई और नाटकीय आवाज़ में कहा, “अरे देविका! साॅरी… वो बाहर वाला दरवाज़ा बहुत ज़ोर से बजा है। लगता है कोई बहुत ज़रूरी मेहमान आ गए हैं या शायद कोई इमरजेंसी है। मुझे तुरंत जाना पड़ेगा। मैं तुम्हारी बात फिर कभी सुनूंगी… बाय!”
“लेकिन भाभी, सुनिए तो…” देविका ने कुछ कहना चाहा, लेकिन इससे पहले कि वह अपनी बैंकॉक ट्रिप की अगली लाइन बोल पाती, सुमित्रा ने झटके से फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।
फोन काटने के बाद सुमित्रा ने एक गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर एक अपार संतुष्टि और शांति थी। उसे लग रहा था जैसे उसने सालों का कोई भारी बोझ अपने कंधों से उतार फेंका हो। उसे पता था कि फोन के उस पार देविका का मुँह खुला का खुला रह गया होगा। उसे यह भी पता था कि देविका को अपना ही ‘स्मार्ट टाइम मैनेजमेंट’ का फॉर्मूला पहचान में आ गया होगा।
रिश्तों में सम्मान दोनों तरफ से होना चाहिए। जो कान आपकी बातें सुनने के लिए तैयार नहीं हैं, उनके सामने अपनी भावनाओं के मोती बिखेरना बेकार है। सुमित्रा ने उस दिन के बाद से देविका के फोन उठाना काफी कम कर दिया और जब भी बात होती, वह बस काम की बात करके फोन रख देती। देविका को भी शायद अपने बर्ताव का आईना दिख गया था, क्योंकि उसके बाद उसने कभी सुमित्रा से अपनी लंबी गाथाएं सुनाने की कोशिश नहीं की। सुमित्रा खुश थी, क्योंकि अब वह अपने समय और अपनी भावनाओं की असली मालकिन थी।
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