खामोश इंतज़ार की चुभन

 बस, वही एक पल था जिसने दोनों के बीच जमी बरसों की बर्फ को पिघला दिया। उस दिन के बाद से उनका मेल-मिलाप शुरू हो गया। कल्याणी का नर्म दिल अविनाश के उस शालीन और अनवरत समर्पण के आगे हार गया था। धीरे-धीरे वह भी अविनाश को चाहने लगी। दोनों एक-दूसरे पर अपनी जान छिड़कने लगे।

कॉलेज के पीछे वाली पहाड़ी, वो पुरानी कैंटीन की चाय, और ढलती शामें उनके प्यार की गवाह बनने लगीं। वादों, कसमों और भविष्य के सुनहरे सपनों के बीच वे दोनों प्रेम के आसमान में आज़ाद परिंदों की तरह उड़ने लगे। कल्याणी ने अविनाश में अपना पूरा संसार देख लिया था।

रात का गहरा सन्नाटा जब पूरी दुनिया को अपनी आगोश में ले लेता, तब उस पुराने घर के एक कमरे से रुक-रुक कर आती लंबी और भारी सांसों की आवाज़ उस सन्नाटे को चीर देती थी। ये सांसें कल्याणी की थीं। जिस दिन से उसके पति, अविनाश, उसे और उनके बेटे कुणाल को छोड़कर हमेशा के लिए अमेरिका गए थे, कल्याणी की आँखों से नींद ने जैसे हमेशा के लिए विदाई ले ली थी। एक गहरा, नासूर बन चुका धोखा उसके सीने में दफ्न था।

अविनाश ने कल्याणी को बीच भंवर में अकेला छोड़ दिया था, एक ऐसे समंदर में जहाँ दूर-दूर तक कोई किनारा नज़र नहीं आता था। इस अप्रत्याशित और भयानक सदमे ने कल्याणी को भीतर तक खोखला कर दिया था। कभी पूरे घर को अपनी चहक से गुंजाने वाली

कल्याणी अब एक ज़िंदा लाश की तरह थी। दिन के उजालों में भी वह किसी गहरी सोच में डूबी, शून्य में ताकती रहती थी। और रातें… रातें तो उसके लिए किसी सज़ा से कम नहीं थीं। नींद न आने के कारण उसकी उलझनें, बेचैनी और मानसिक पीड़ा हर गुज़रते पल के साथ बढ़ती जा रही थी।

कुणाल, जो अब काफी समझदार हो गया था, अपनी माँ की इस हालत को देखकर खून के घूंट पीकर रह जाता था। उसे अक्सर यह सोचकर हैरानी होती थी कि उसकी माँ उस विश्वासघाती और फरेबी इंसान को क्यों नहीं भुला पाती, जिसने महज़ अपने स्वार्थ के लिए एक हँसते-खेलते परिवार को तबाह कर दिया। लेकिन कुणाल यह भी जानता था कि उसकी माँ के लिए यह इतना आसान नहीं था। कुणाल को यह सब किसी और ने नहीं, बल्कि खुद उसकी माँ ने अपने उन गिने-चुने सामान्य पलों में बताया था, जब वह अतीत के झरोखों में झांकने लगती थी।

बात उन दिनों की है जब कल्याणी विश्वविद्यालय में साहित्य की पढ़ाई कर रही थी। वह अपने शहर की सबसे होनहार और खूबसूरत लड़कियों में से एक थी। अविनाश ने उसे पाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

वह एक परछाईं की तरह कल्याणी के आस-पास मंडराता रहता था। कॉलेज जाते समय कल्याणी अक्सर अपने घर से कुछ दूर स्थित सिटी लाइब्रेरी में पढ़ने जाती थी। अविनाश भी ठीक उसी समय वहाँ पहुँच जाता। वह कल्याणी के मोहल्ले के नुक्कड़ पर ही रहता था। लाइब्रेरी में जब कल्याणी किताबों में खोई होती, तब अविनाश अपनी किताबों के पीछे से कनखियों से कल्याणी के मासूम और सुंदर चेहरे को निहारता रहता था। वह कभी उसे परेशान नहीं करता, बस खामोशी से अपनी आँखों में उसकी तस्वीर उतारता रहता।

कल्याणी की सबसे अच्छी दोस्त, सुनयना, हमेशा उसके साथ रहती थी। लाइब्रेरी की एक खास मेज़ पर वे दोनों बैठती थीं, और सुनयना अक्सर कल्याणी के लिए कुर्सी पहले से ही रोक कर रखती थी। अविनाश चाहता था कि वह किसी तरह कल्याणी के साथ उसी मेज़ पर बैठे, उससे बात करे, लेकिन सुनयना की मौजूदगी और कल्याणी के गंभीर स्वभाव के कारण उसे कभी हिम्मत नहीं हुई। वह बस दूर बैठकर हाथ मलता रह जाता। जब कल्याणी लाइब्रेरी से निकलकर अपनी सहेली के साथ पैदल कॉलेज की तरफ बढ़ती, तो अविनाश भी कुछ कदम की दूरी बनाकर उनके पीछे-पीछे चलता रहता। उसकी यह खामोश दीवानगी पूरे कॉलेज में चर्चा का विषय बनने लगी थी, लेकिन वह कभी किसी मर्यादा को लांघता नहीं था। बातें करते और हँसते-मुस्कुराते हुए कल्याणी और सुनयना जब कॉलेज के मुख्य द्वार में प्रवेश कर जातीं, तभी अविनाश राहत की सांस लेता और अपनी क्लास की ओर मुड़ता।

विश्वविद्यालय के गलियारों में जब कभी इत्तेफाक से कल्याणी और अविनाश का आमना-सामना होता, तो अविनाश बड़े ही अदब से कहता, “आपकी सादगी में जो नूर है, वह इन किताबों के अक्षरों से भी ज़्यादा गहरा है।” कल्याणी, जो एक संकोची लड़की थी, इन बातों का कोई जवाब नहीं देती थी। वह बस नज़रें झुकाती और उसे अनसुना करके तेज़ कदमों से आगे बढ़ जाती थी। लेकिन अंदर ही अंदर, एक लड़की होने के नाते, उसे यह तवज्जो बुरी भी नहीं लगती थी।

अविनाश की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह कभी भी भीड़ में या अन्य छात्र-छात्राओं की मौजूदगी में कल्याणी पर कोई टिप्पणी नहीं करता था। वह उसके सम्मान की बहुत परवाह करता था। लेकिन जब कभी कॉलेज के गार्डन में या लाइब्रेरी की सीढ़ियों पर कल्याणी उसे अकेली मिल जाती, तो वह उसे ‘चाँदनी’ या ‘ग़ज़ल’ कहकर पुकारता। वह कहता कि कल्याणी की आँखें किसी गहरी झील की तरह हैं, जिसमें डूबने का मन करता है। इसके अलावा उसने कभी कोई फूहड़, सस्ती या हल्की बात नहीं की। उसका प्यार जताने का तरीका इतना शालीन और काव्यात्मक था कि पत्थर दिल भी पिघल जाए।

एक दिन हल्की बारिश हो रही थी। कल्याणी कॉलेज के बरामदे में खड़ी बारिश रुकने का इंतज़ार कर रही थी। सुनयना उस दिन नहीं आई थी। अविनाश वहाँ आया और उसने अपनी छतरी कल्याणी की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “अगर यह बारिश रुक भी गई, तो आपके हुस्न की जो बिजली गिर रही है, उससे मैं खुद को कैसे बचाऊँगा? आप सच में किसी खूबसूरत ग़ज़ल की तरह हैं।” उस दिन, पहली बार, कल्याणी की गंभीरता ने जवाब दे दिया। उसके होठों पर एक मीठी सी मुस्कान तैर गई और उसने अपनी नज़रें झुकाते हुए धीमे स्वर में कहा, “आपकी इस खूबसूरत कविता के लिए शुक्रिया।”

बस, वही एक पल था जिसने दोनों के बीच जमी बरसों की बर्फ को पिघला दिया। उस दिन के बाद से उनका मेल-मिलाप शुरू हो गया। कल्याणी का नर्म दिल अविनाश के उस शालीन और अनवरत समर्पण के आगे हार गया था। धीरे-धीरे वह भी अविनाश को चाहने लगी। दोनों एक-दूसरे पर अपनी जान छिड़कने लगे। कॉलेज के पीछे वाली पहाड़ी, वो पुरानी कैंटीन की चाय, और ढलती शामें उनके प्यार की गवाह बनने लगीं। वादों, कसमों और भविष्य के सुनहरे सपनों के बीच वे दोनों प्रेम के आसमान में आज़ाद परिंदों की तरह उड़ने लगे। कल्याणी ने अविनाश में अपना पूरा संसार देख लिया था।

हालात यह हो गए कि दोनों की आँखें हर पल एक-दूसरे को तलाशती रहती थीं। अगर किसी दिन अविनाश कॉलेज नहीं आता, तो कल्याणी का मन पढ़ाई में नहीं लगता, वह बेचैन होकर बार-बार गेट की तरफ देखती रहती। और अगर कल्याणी छुट्टी कर लेती, तो अविनाश पागलों की तरह उसके मोहल्ले के चक्कर काटने लगता। दोनों के बीच प्यार की डोर इतनी मज़बूत हो गई थी कि उनकी धड़कनें जैसे एक ही लय में धड़कने लगी थीं। वे घंटों भविष्य की योजनाएं बनाते, एक छोटे से घर का सपना देखते और जीवन भर एक-दूसरे का हाथ थामे रहने की कसमें खाते।

लेकिन किस्मत को शायद यह मुकम्मल इश्क मंज़ूर नहीं था। संयोग और खुशियों का यह खूबसूरत दौर बहुत लंबा नहीं चला। अविनाश हमेशा से विदेश में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। उसने सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग में मास्टर्स के लिए अमेरिका की एक नामी यूनिवर्सिटी में आवेदन किया हुआ था। एक दिन अचानक उसका बुलावा आ गया। उसकी स्कॉलरशिप मंज़ूर हो गई थी और उसे जल्द ही अमेरिका के लिए निकलना था।

यह खबर कल्याणी के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं थी। विरह की वेदना तो अविनाश के चेहरे पर भी थी, लेकिन कल्याणी की हालत पागलों जैसी हो गई थी। वह अंदर ही अंदर घबराने लगी थी। उसे लगने लगा था कि यह दूरी उनके रिश्ते को खा जाएगी। दोनों के दिलों में जुदाई की आग धधक रही थी, लेकिन करियर और भविष्य की मजबूरी थी। अविनाश ने जाते समय कल्याणी को गले लगाकर ढेरों कसमें खाई थीं। उसने वादा किया था कि वह अपनी पढ़ाई पूरी करते ही वापस आएगा, नौकरी लगते ही उसे भी अपने साथ अमेरिका ले जाएगा और वे हमेशा साथ रहेंगे। उन दोनों ने एक-दूसरे के बिना न जीने की कसमें खाई थीं, इसलिए इस प्यार और भरोसे ने कल्याणी को उस मुश्किल वक्त में भी इंतज़ार करने की ताकत दी।

अविनाश चला गया। शुरुआत के कुछ महीनों तक खूब खत आए, लंबे-लंबे फोन कॉल्स हुए। कल्याणी हर दिन उसके वापस आने के दिन गिनती रहती। फिर शादी का वक्त आया। अविनाश ने अपने परिवार वालों को मनाकर छुट्टियाँ लेकर भारत आया और दोनों ने शादी कर ली। शादी के कुछ महीनों बाद ही कुणाल कल्याणी की कोख में आ गया। सब कुछ एक सपने जैसा लग रहा था। लेकिन यह सपना बहुत जल्दी टूटने वाला था। कुणाल के जन्म के बाद अविनाश वापस अमेरिका गया और फिर उसका व्यवहार बदलने लगा। कॉल्स कम हो गए, खतों का आना बंद हो गया। बहाने बढ़ने लगे – ‘काम का प्रेशर है’, ‘टाइम ज़ोन अलग है’, ‘वक्त नहीं मिलता’।

और फिर एक दिन, एक ऐसा सच कल्याणी के सामने आया जिसने उसकी दुनिया ही उजाड़ दी। अविनाश ने अमेरिका में नागरिकता और ग्रीन कार्ड पाने के लालच में वहीं की एक महिला से शादी कर ली थी। उसने कल्याणी और अपने खून, कुणाल, को हमेशा के लिए अपनी ज़िंदगी से बेदखल कर दिया था। उसने एक चिट्ठी में बस इतना लिखा कि वह अब भारत वापस नहीं आ सकता और कल्याणी अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ जाए।

‘आगे बढ़ जाए?’ यह शब्द कल्याणी के लिए बेमानी थे। वह इंसान जिसने एक कली के पीछे भंवरे की तरह बरसों चक्कर काटे, जिसने उसके बिना एक पल न जीने की कसमें खाईं, वह इतनी आसानी से उसे भूलकर किसी और का कैसे हो गया? यही सवाल कल्याणी के दिमाग में हर रात हथौड़े की तरह बजता था। आज कुणाल पच्चीस साल का हो चुका था, लेकिन कल्याणी अभी भी उसी कॉलेज के बरामदे, उस लाइब्रेरी की मेज़ और अविनाश की उन मीठी बातों में कैद थी। वह शरीर से वर्तमान में थी, लेकिन उसकी रूह उसी अतीत के धोखे में भटक रही थी, उन वादों की राख को समेटते हुए, जो कभी आग बनकर उसके दिल में धड़के थे।

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