स्वाभिमान की धार

 जाने से पहले रघुपति सुरभि के पास आया। उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर सुरभि के सिर के ऊपर रखे और कांपती आवाज में बोला, “बिटिया, आज तुमने सिर्फ इस बूढ़े को काम नहीं दिया, तुमने मेरे स्वाभिमान को मरने से बचा लिया। आज मेरी बच्चियां पेट भर खाना खाएंगी और कल गर्व से स्कूल जाएंगी। भगवान तुम्हारे घर में हमेशा बरकत रखे, तुम्हारे बच्चों को लंबी उम्र दे।”

 सुरभि अपने किचन में सुबह की आपाधापी में लगी हुई थी। पति नवीन को ऑफिस जाना था और दोनों बच्चों को स्कूल। सुरभि जल्दी-जल्दी गोभी और गाजर काटने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसके हाथ में जो चाकू था,

उसकी धार बिल्कुल खत्म हो चुकी थी। वो झुंझलाते हुए बार-बार चाकू को स्लैब पर घिस रही थी। सर्दियों की सुबह और ये काम की जल्दी, सुरभि का पारा चढ़ रहा था। तभी बाहर गली से एक भारी, लेकिन कांपती हुई और बेहद कमजोर आवाज गूंजी, “चाकू-कैंची पर धार लगवा लो… धार लगवा लो बाबूजी!”

सुरभि को लगा जैसे भगवान ने उसकी पुकार सुन ली हो। उसने तुरंत खिड़की से बाहर झांका। कोहरे के बीच से एक बूढ़ा आदमी अपनी पुरानी सी साइकिल को धकेलता हुआ नजर आया। साइकिल के पिछले हिस्से पर धार लगाने वाला गोल पत्थर और पैडल से जुड़ा एक पट्टा बंधा हुआ था। सुरभि ने बिना एक पल गंवाए बालकनी से आवाज दी, “अरे बाबा, रुको! जरा इधर आना।”

उस बूढ़े आदमी ने अपनी साइकिल मोड़ी और सुरभि के मकान के गेट पर आकर खड़ा हो गया। सुरभि ने गेट खोला और उसे अंदर ओसारे में साइकिल खड़ी करने का इशारा किया।

पास आने पर सुरभि ने देखा कि वह बुजुर्ग वाकई बहुत कमजोर था। उम्र कम से कम सत्तर के पार होगी। गाल अंदर की तरफ धंसे हुए थे, माथे पर झुर्रियों का जाल था

और उसके शरीर पर एक पुराना, कई जगह से उधड़ा हुआ स्वेटर था जो इस हाड़ कंपाने वाली ठंड के आगे बिल्कुल बेबस था। सिर पर एक मटमैला सा सूती गमछा बंधा था और पैरों में प्लास्टिक के घिसे हुए चप्पल थे, जिनसे उसकी फटी हुई एड़ियां साफ नजर आ रही थीं।

“कितना लोगे बाबा एक चाकू का?” सुरभि ने पूछा।

बुजुर्ग ने अपने कांपते हाथों को रगड़ते हुए कहा, “बीस रुपया ले लूंगा बिटिया। बढ़िया धार बना दूंगा, एकदम नया जैसा।”

सुरभि ने सहमति में सिर हिलाया और कहा, “ठीक है, मैं अंदर से दो चाकू और एक कैंची लाती हूँ।”

सुरभि अंदर गई और सामान के साथ-साथ एक गिलास गर्म पानी भी ले आई। “बाबा, पहले ये गर्म पानी पी लो, ठंड बहुत है।” सुरभि ने गिलास उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।

बुजुर्ग ने कृतज्ञता भरी नजरों से सुरभि को देखा और गिलास दोनों हाथों से पकड़ लिया। गर्म पानी पीते ही जैसे उसके शरीर में थोड़ी जान आई हो। सुरभि को अपनी स्वर्गीय दादी की बात याद आ गई कि सुबह-सुबह काम पर निकले किसी मजदूर को कभी खाली पेट या सिर्फ पानी नहीं देना चाहिए। सुरभि ने पूछा, “बाबा, चाय पियोगे?”

बुजुर्ग की आंखें चमक उठीं। उसने सकुचाते हुए कहा, “अगर तकलीफ ना हो बिटिया, तो एक कप पिला देना। सुबह से गला सूखा है।”

सुरभि तुरंत किचन में गई। उसने चाय के पानी में अदरक-इलायची कूटकर डाली और साथ ही रात की बची हुई चार रोटियों को तवे पर घी लगाकर सेंक लिया। एक प्लेट में गरमा-गरम रोटियां, आलू-गोभी की सब्जी और एक बड़ा कप चाय लेकर वह बाहर आई। बुजुर्ग ने तब तक अपनी साइकिल का स्टैंड लगा लिया था और पट्टे को पहिए पर चढ़ा रहा था। सुरभि ने पास रखी एक छोटी सी चौकी पर प्लेट और चाय रख दी।

“बाबा, पहले ये थोड़ा सा नाश्ता कर लो, फिर आराम से काम करना,” सुरभि ने कहा।

बुजुर्ग ने प्लेट देखी तो उसकी आंखें डबडबा गईं। उसने कहा, “बिटिया, मैं पैसे सिर्फ बीस रुपये ही लूंगा, इस नाश्ते के पैसे नहीं हैं मेरे पास।”

सुरभि का दिल पसीज गया, “बाबा, ये खाना पैसों के लिए नहीं है। आप मेरे पिता समान हैं, पहले पेट पूजा कर लीजिए।”

बुजुर्ग ने कांपते हाथों से रोटी का निवाला तोड़ा और मुंह में रखा। उसे खाते हुए देखकर कोई भी समझ सकता था कि वह कई दिनों का भूखा है। उसने बड़ी जल्दी-जल्दी रोटियां खत्म कीं और चाय का आखिरी घूंट पीकर गहरी सांस ली। सुरभि वहीं पास में खड़ी थी। बातों ही बातों में उसने पूछा, “बाबा, आप रहते कहाँ हैं? इतनी सुबह-सुबह और इतनी ठंड में निकल गए?”

बुजुर्ग ने एक संतोष भरी डकार ली और बोला, “बिटिया, मेरा नाम रघुपति है। मैं यहां से करीब चालीस किलोमीटर दूर घाटमपुर के पास एक गांव है, वहां रहता हूँ। रात के तीन बजे घर से साइकिल लेकर निकला था, तब जाकर अब यहां शहर पहुंचा हूँ। तुम मेरी आज की पहली बोहनी (ग्राहक) हो।”

सुरभि हैरान रह गई। पैंसठ-सत्तर साल का एक बूढ़ा आदमी, इस जानलेवा ठंड में चालीस किलोमीटर साइकिल चलाकर आया है! “इतनी दूर? इतनी ठंड में? आपके घर में कोई और कमाने वाला नहीं है बाबा? बेटे क्या करते हैं?” सुरभि के मुंह से सवालों की झड़ी लग गई।

रघुपति की आंखों में एक गहरा सन्नाटा छा गया। उसने एक लंबी सांस खींची और अपनी साइकिल के पैडल को हाथ से घुमाते हुए बोला, “था बिटिया, एक ही बेटा था। बड़ा होनहार था। शहर की एक फैक्ट्री में काम करता था। तीन साल पहले मशीन में खराबी आई और मेरा बेटा उसी में दबकर मर गया। फैक्ट्री वालों ने कोई मुआवजा भी नहीं दिया। सदमे में बहू बीमार पड़ गई और छह महीने बाद वो भी मुझे छोड़कर चली गई। अब घर में मेरी दो छोटी-छोटी पोतियां हैं। एक दस साल की है, एक आठ साल की। उनके पेट की आग बुझाने के लिए इस बूढ़ी हड्डियों को खींचकर रोज शहर लाना पड़ता है। आज बड़ी वाली पोती कह रही थी कि स्कूल की फीस जमा करनी है मास्टर जी ने नाम काटने को कहा है। घर में अन्न का एक दाना नहीं था। रात को दोनों बच्चियों को गुड़ का पानी पिलाकर सुलाया था। सोचा था आज शहर जाऊंगा, कुछ कमाई होगी तो लौटते हुए राशन और फीस के पैसे ले जाऊंगा।”

ये सब कहते-कहते रघुपति के झुर्रीदार गालों पर आंसुओं की दो बूंदें फिसल गईं। सुरभि की आंखें भी नम हो गईं। तभी उसके पति नवीन भी तैयार होकर बाहर आ गए। उन्होंने रघुपति की सारी बातें सुन ली थीं। नवीन का स्वभाव बहुत भावुक और मददगार था। वो रघुपति की बात सुनकर इतने दुखी हुए कि उन्होंने तुरंत अपना पर्स निकाला और उसमें से पांच-पांच सौ के दो नोट निकालकर रघुपति की तरफ बढ़ा दिए।

“बाबा, ये एक हजार रुपये रख लीजिए। बच्चियों की फीस भर दीजिएगा और उनके लिए कुछ अच्छा खाने को ले जाइएगा। आपको ये चाकू-कैंची घिसने की जरूरत नहीं है। आप आराम से घर लौट जाइए,” नवीन ने बेहद सम्मान के साथ कहा।

सुरभि को भी नवीन का यह कदम बहुत अच्छा लगा। लेकिन जो इसके बाद हुआ, उसने सुरभि और नवीन दोनों को अंदर तक झकझोर दिया।

रघुपति ने हाथ जोड़ लिए, लेकिन उसने पैसे लेने के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाया। उसकी आंखों के आंसू अब सूख चुके थे और चेहरे पर एक अजीब सा स्वाभिमान तैर रहा था।

“बाबूजी, आपकी दया के लिए भगवान आपको हमेशा खुश रखे। लेकिन ये पैसे मैं नहीं ले सकता,” रघुपति ने बड़ी दृढ़ता से कहा।

नवीन को लगा शायद बुजुर्ग संकोच कर रहा है। “अरे बाबा, संकोच मत कीजिए। ये पैसे मेरी तरफ से उन बच्चियों के लिए आशीर्वाद समझ लीजिए।”

रघुपति ने अपनी साइकिल का पैडल घुमाना शुरू किया और पत्थर पर चाकू लगाते हुए बोला, “बाबूजी, मैं गरीब जरूर हूँ, मजबूर भी हूँ, लेकिन मैं भिखारी नहीं हूँ। मैं अपनी पोतियों को मेहनत की रोटी खिलाना चाहता हूँ, खैरात की नहीं। अगर आज मैंने आपसे बिना काम किए ये पैसे ले लिए, तो कल मुझे काम करने की हिम्मत नहीं होगी और मेरी पोतियां जब बड़ी होंगी तो मैं उन्हें कौन सा मुंह दिखाऊंगा? उन्हें कैसे सिखाऊंगा कि ईमानदारी क्या होती है? मैं सिर्फ अपने पसीने की कमाई लूंगा। आपको मेरी मदद ही करनी है, तो मुझे काम दीजिए।”

रघुपति की बातें किसी हथौड़े की तरह नवीन और सुरभि के दिल पर लगीं। उस फटे-पुराने कपड़ों वाले इंसान का कद उनकी नजरों में हिमालय से भी ऊंचा हो गया था। नवीन ने चुपचाप पैसे वापस अपने पर्स में रख लिए। सुरभि ने रघुपति को काम करते हुए देखा। वह पैडल मारता, चक्का तेजी से घूमता और चाकू से चिंगारियां निकलने लगतीं। उसके काम में गजब की फुर्ती और ईमानदारी थी।

सुरभि से अब रहा नहीं गया। वह सिर्फ साठ रुपये देकर इस खुद्दार इंसान को वापस नहीं भेजना चाहती थी। उसने तुरंत अपना फोन उठाया और अपनी हाउसिंग सोसाइटी के व्हाट्सएप ग्रुप में एक मैसेज डाल दिया— “नीचे मेरे घर के बाहर एक बहुत अच्छे और जरूरतमंद बाबा आए हैं जो चाकू-कैंची पर बहुत शानदार धार लगाते हैं। मेरी गुजारिश है कि आप सभी अपने घर के धार वाले औजार लेकर नीचे आएं। इन्हें काम की बहुत जरूरत है।”

सुरभि का मैसेज जाते ही सोसाइटी में जैसे हलचल मच गई। पांच मिनट के अंदर ही अगल-बगल के फ्लैट्स से महिलाएं और बच्चे अपने हाथों में चाकू, कैंची, गार्डन के कटर, और यहां तक कि नारियल छीलने वाले हंसिये लेकर नीचे आने लगे। देखते ही देखते रघुपति के सामने काम का एक बड़ा ढेर लग गया। रघुपति की आंखें खुशी से चमक उठीं। उसने बिना थके, पूरी लगन के साथ पैडल मारना शुरू किया। ‘घर्र-घर्र’ की आवाज के साथ चिंगारियां उड़ती रहीं और एक-एक करके सारे औजार चमकने लगे।

करीब तीन घंटे तक रघुपति लगातार काम करता रहा। सुरभि बीच-बीच में उसे चाय और पानी पूछती रही। जब सारा काम खत्म हुआ, तो सोसाइटी के लोगों ने खुशी-खुशी उसे पैसे दिए। किसी ने बीस की जगह तीस रुपये दिए, तो किसी ने पचास। रघुपति ने एक-एक पैसा गिना। आज उसकी कमाई छह सौ रुपये से ऊपर हो गई थी। वह इतना खुश था जैसे उसे दुनिया का सारा खजाना मिल गया हो। उसने सारे पैसे अपने गमछे के छोर में बांधकर एक मजबूत गांठ लगाई।

जाने से पहले रघुपति सुरभि के पास आया। उसने अपने दोनों हाथ जोड़कर सुरभि के सिर के ऊपर रखे और कांपती आवाज में बोला, “बिटिया, आज तुमने सिर्फ इस बूढ़े को काम नहीं दिया, तुमने मेरे स्वाभिमान को मरने से बचा लिया। आज मेरी बच्चियां पेट भर खाना खाएंगी और कल गर्व से स्कूल जाएंगी। भगवान तुम्हारे घर में हमेशा बरकत रखे, तुम्हारे बच्चों को लंबी उम्र दे।”

रघुपति अपनी साइकिल को धकेलता हुआ कोहरे में आगे बढ़ गया। सुरभि और नवीन उसे तब तक देखते रहे जब तक कि वह पूरी तरह से आंखों से ओझल नहीं हो गया। सुरभि सोच रही थी कि आज उस अनपढ़ और गरीब बुजुर्ग ने उन्हें जीवन का कितना बड़ा पाठ पढ़ा दिया था। उसने सिखाया कि गरीबी इंसान का पेट खाली रख सकती है, लेकिन उसका जमीर नहीं। उसने सिखाया कि किसी मजबूर पर दया करके उसे पैसे दे देना आसान है, लेकिन उसके स्वाभिमान को ठेस पहुंचाए बिना उसे काम देकर उसके पैरों पर खड़ा करना असली मदद है। आज सुरभि के घर के चाकू-कैंची ही तेज नहीं हुए थे, बल्कि जीवन के प्रति उसके नजरिए पर भी एक नई धार लग गई थी।

दोस्तों, क्या आपने भी कभी किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है जो চরম गरीबी में होने के बावजूद अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करता? हम अक्सर दान-पुण्य के नाम पर पैसे देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं, लेकिन क्या सच में किसी को उसके काम का सम्मान देना सबसे बड़ा दान नहीं है? आपके इस बारे में क्या विचार हैं, हमें कमेंट करके जरूर बताएं!

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