लखनऊ के गोमती नगर में रहने वाली कमला देवी का परिवार आस-पड़ोस में काफी प्रतिष्ठित माना जाता था। उनके पति दीनानाथ जी एक सरकारी विभाग से रिटायर्ड अधिकारी थे। परिवार में एक बेटा था सौरभ,
जिसकी शादी को अभी महज़ दो साल ही हुए थे, और घर में एक प्यारी सी बहू थी मेघा। सबसे छोटी और सबकी लाडली थी बेटी रिद्धि, जो अभी अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी कर रही थी। कमला देवी स्वभाव से एक ठेठ पारंपरिक महिला थीं, जिनका मानना था कि घर की असली डोर औरत के ही हाथ में होती है और उसे ही सब कुछ अपने तरीके से चलाना चाहिए।
कमला देवी का अपनी बहू मेघा के प्रति रवैया वैसा ही था जैसा अक्सर हमारे समाज की पुरानी सोच वाली सासों का होता है। मेघा सुबह पाँच बजे उठकर पूरे घर का काम करती, सबके लिए नाश्ता बनाती, फिर सौरभ का टिफिन तैयार करती। इन सबके बावजूद कमला देवी को उसके काम में कोई न कोई खोट नज़र आ ही जाता। “अरे मेघा, चाय में आज फिर इलायची कम है। कितनी बार कहा है दीनानाथ जी को कड़क चाय पसंद है।
तुम लड़कियाँ आज-कल मायके से कुछ सीख कर ही नहीं आतीं।” ऐसी बातें मेघा के लिए रोज़मर्रा का हिस्सा बन चुकी थीं। वहीं दूसरी ओर, उनकी अपनी बेटी रिद्धि सुबह नौ बजे तक सोती रहती। उसके उठने पर कमला देवी खुद उसके बिस्तर पर जूस और चाय लेकर जातीं।
“मेरी बच्ची रात भर जग कर पढ़ाई करती है, उसे आराम की ज़रूरत है,” यह कहकर वह रिद्धि की हर लापरवाही को ढंक देती थीं। मेघा चुपचाप यह सब देखती और अपने काम में लग जाती। वह जानती थी कि इस घर में बेटी और बहू के बीच एक बहुत बड़ी और अदृश्य दीवार है, जिसे वह कभी नहीं गिरा सकती।
वक़्त के साथ रिद्धि की पढ़ाई पूरी होने को आई और घर में उसकी शादी की चर्चाएं शुरू हो गईं। कमला देवी के बड़े भाई, वीरेंद्र प्रताप सिंह, जो बनारस में एक इंटर कॉलेज के रिटायर्ड प्रिंसिपल थे, अक्सर लखनऊ आते-जाते रहते थे। समाज में उनकी अच्छी पकड़ थी और कई परिवारों से उनका आना-जाना था। कमला देवी ने अपनी बेटी के लिए लड़का ढूंढ़ने की ज़िम्मेदारी अपने इन्ही वीरेंद्र भैया को सौंप दी।
एक रविवार की दोपहर, जब वीरेंद्र जी लखनऊ आए हुए थे, तो खाने की मेज़ पर रिद्धि की शादी को लेकर गंभीर चर्चा शुरू हुई। मेघा ने बहुत सलीके से खाना परोसा था और चुपचाप एक कोने में खड़ी सबकी ज़रूरतें देख रही थी। कमला देवी ने निवाला तोड़ते हुए कहा, “भैया, अब रिद्धि की पढ़ाई लगभग पूरी हो गई है। मैं चाहती हूँ कि आप उसके लिए कोई ऐसा लड़का देखें जो बिल्कुल हीरे जैसा हो। हमारी बच्ची ने कभी घर के काम-काज नहीं किए हैं, बहुत नाज़ों से पली है। उसे ऐसा घर मिले जहाँ उसे राज करने का मौका मिले।”
वीरेंद्र जी ने मुस्कुराते हुए हामी भरी, “हाँ कमला, मुझे पता है। मेरी भी तो भानजी है। मैं कोई अच्छी सी नौकरी वाला, संस्कारी लड़का ही देखूँगा। तुम अपनी शर्तें तो बताओ, आखिर तुम्हें कैसा दामाद चाहिए?”
कमला देवी ने थोड़ा आगे झुकते हुए आवाज़ धीमी की, जैसे कोई बहुत बड़ा राज़ खोल रही हों। “देखिए भैया, लड़का तो पढ़ा-लिखा और बढ़िया कमाने वाला होना ही चाहिए, लेकिन मेरी एक खास शर्त है। मैं चाहती हूँ कि लड़का अपने घर का इकलौता वारिस हो। परिवार बहुत छोटा हो। कोई ननद या देवर का झंझट न हो। और सच कहूँ भैया…” कमला देवी ने मेघा की तरफ एक तिरछी नज़र डाली, जो रसोई में बर्तन समेट रही थी, और फिर बोलीं, “सच कहूँ तो अगर लड़के के माँ-बाप न हों, या फिर लड़का अपनी नौकरी के सिलसिले में माँ-बाप से बिल्कुल अलग किसी दूसरे शहर या विदेश में रहता हो, तो उससे अच्छा कुछ नहीं। आज-कल की सासों का तो आपको पता ही है, कितना ताना मारती हैं, बात-बात पर हुक्म चलाती हैं। मेरी फूल जैसी बच्ची यह सब कैसे सहेगी? अगर सासु माँ की तस्वीर पर माला टंगी हो, तो समझो सोने पे सुहागा! रिद्धि अकेले अपने घर की मालकिन बनकर रहेगी, उसे कोई टोकने वाला नहीं होगा।”
यह बात सुनकर वीरेंद्र प्रताप सिंह के हाथ से निवाला छूट गया। उन्होंने अवाक होकर अपनी सगी बहन का चेहरा देखा। उनके कानों में कमला के शब्द गूँज रहे थे—’अगर सासु माँ की तस्वीर पर माला टंगी हो तो सोने पे सुहागा’। उन्होंने बेसाख्ता रसोई की तरफ देखा, जहाँ मेघा खामोशी से अपने आँसू पोंछ रही थी, क्योंकि शायद उसने यह क्रूर बात सुन ली थी। वीरेंद्र जी को समझ नहीं आ रहा था कि एक औरत, जो खुद एक जवान बेटे की माँ है, जिसकी अपनी एक बहू है, वह किसी दूसरे बेटे के माँ-बाप के मरने की कामना कैसे कर सकती है? क्या बहू लाते वक़्त उसने यही सोचा था कि बहू के माँ-बाप यह दुआ करें कि कमला देवी दुनिया से उठ जाएं ताकि उनकी बेटी चैन से रह सके?
वीरेंद्र जी बहुत सुलझे हुए और बुद्धिमान व्यक्ति थे। उन्होंने उस वक़्त गुस्सा करने या बहस करने के बजाय खुद को शांत रखा। उन्होंने पानी का गिलास उठाया, एक घूंट पिया और गंभीर स्वर में बोले, “ठीक है कमला, जैसी तुम्हारी इच्छा। मैं तुम्हारी शर्तों को ध्यान में रखकर ही कोई रिश्ता ढूँढूँगा।” इसके बाद वे बनारस लौट गए, लेकिन कमला देवी के वे स्वार्थ से भरे शब्द उनके दिल में एक काँटे की तरह चुभते रहे। उन्होंने ठान लिया कि अपनी बहन को आईना दिखाना बहुत ज़रूरी है, वरना वह अपनी बहू मेघा की ज़िंदगी तो नर्क बना ही रही है, अपनी बेटी के मन में भी रिश्तों के प्रति ज़हर घोल देगी।
करीब डेढ़ महीने बाद वीरेंद्र जी का कमला देवी को फोन आया। उनकी आवाज़ में एक गज़ब का उत्साह था। “कमला, खुशखबरी है! रिद्धि के लिए एक बहुत ही शानदार रिश्ता आया है। लड़का अमेरिका के सिएटल शहर में एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट है। करोड़ों का पैकेज है। लड़का दिखने में किसी फिल्मी हीरो से कम नहीं है और सबसे बड़ी बात…” वीरेंद्र जी थोड़ा रुके।
कमला देवी की तो खुशी के मारे साँस फूलने लगी, “सबसे बड़ी बात क्या भैया? जल्दी बताइये न!”
“सबसे बड़ी बात यह है कि लड़का बिल्कुल अकेला है। उसके माता-पिता का एक सड़क दुर्घटना में बहुत साल पहले देहांत हो गया था। आगे-पीछे कोई नहीं है। कोई ननद नहीं, देवर नहीं, सास-ससुर का तो नामो-निशान नहीं। तुम्हारा सपना पूरा हो गया कमला। लड़के के पास बेशुमार दौलत है और उस पर राज करने वाली सिर्फ तुम्हारी रिद्धि होगी।”
यह सुनते ही कमला देवी खुशी से उछल पड़ीं। उन्होंने तुरंत दीनानाथ जी और सौरभ को आवाज़ लगाई। पूरे घर में खुशी की लहर दौड़ गई। कमला देवी तो मन ही मन शादी के कार्ड के डिज़ाइन और अपनी साड़ियों के रंग तक तय करने लगीं। उन्होंने उत्साह से पूछा, “भैया, तो फिर देर किस बात की? आप बस हाँ कर दीजिये। हम रिद्धि का रिश्ता पक्का कर रहे हैं। लड़के वाले कब आ रहे हैं देखने?”
दूसरी तरफ से वीरेंद्र जी ने एक गहरी और लंबी साँस ली। उनकी आवाज़ अचानक बहुत गंभीर और धीमी हो गई। “कमला… रिश्ता तो बहुत अच्छा है, लेकिन एक छोटी सी अड़चन है। उन्होंने भी एक शर्त रखी है।”
कमला देवी का उत्साह थोड़ा कम हुआ, लेकिन फिर भी वह आत्मविश्वास से बोलीं, “शर्त? कैसी शर्त भैया? आप कहिये, हम पूरी दहेज की रकम देंगे। हम किसी भी चीज़ में पीछे नहीं हटेंगे। रिद्धि को हम सोने से लाद कर भेजेंगे।”
“बात दहेज की नहीं है कमला,” वीरेंद्र जी ने कहा। “लड़का बहुत आधुनिक और खुले विचारों का है। उसे पैसे का कोई लालच नहीं है। लेकिन उसका मानना है कि आज-कल की लड़कियों की माँएं उनके वैवाहिक जीवन में बहुत ज़्यादा दखलंदाज़ी करती हैं। हर छोटी-बड़ी बात पर लड़कियाँ अपनी माँ को फोन मिला देती हैं, और माँएं भी अपनी बेटियों के घर को अपने तरीके से चलाने की कोशिश करती हैं, जिससे पति-पत्नी के रिश्ते में दरार आती है।”
कमला देवी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि बात किस दिशा में जा रही है। उन्होंने घबराते हुए पूछा, “तो… तो लड़का क्या चाहता है भैया? साफ-साफ कहिये।”
वीरेंद्र प्रताप सिंह ने अपने शब्दों को बिल्कुल वैसे ही धारदार बनाया, जैसे डेढ़ महीने पहले कमला देवी के शब्द थे। उन्होंने कहा, “लड़का कहता है कि उसे ऐसी लड़की चाहिए जिसकी माँ इस दुनिया में न हो। अगर लड़की के सिर से माँ का साया उठ चुका हो, या लड़की की माँ की तस्वीर पर हार लटक चुका हो, तो वह तुरंत शादी के लिए तैयार है। क्योंकि उसे भी बाद में किसी सास की कोई खिट-पिट नहीं चाहिए।”
फोन पर सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा इतना गहरा था कि मानो कमला देवी के घर का सारा कोलाहल किसी ने पल भर में सोख लिया हो। कमला देवी के हाथ से फोन लगभग फिसलने को था। उनका चेहरा पीला पड़ गया, माथे पर पसीने की बूँदें छलक आईं और होंठ कांपने लगे। उन्हें अपने ही कहे हुए वे भयंकर शब्द किसी खौफ़नाक गूँज की तरह सुनाई देने लगे—’अगर सासु माँ की तस्वीर पर माला टंगी हो तो सोने पे सुहागा’।
“भैया… यह… यह आप क्या कह रहे हैं?” कमला देवी की आवाज़ भर्रा गई। “कोई लड़का किसी लड़की की माँ के मरने की कामना कैसे कर सकता है? यह तो घोर पाप है! क्या उसे पता नहीं कि माँ का दिल अपनी बच्ची के लिए कितना तड़पता है? मैं अपनी रिद्धि के बिना मर जाऊँगी… और कोई मुझसे मेरी ही मौत की शर्त लगा रहा है?” उनके गले से एक रुलाई फूट पड़ी।
वीरेंद्र जी ने बहुत शांत लेकिन कड़े स्वर में जवाब दिया, “क्यों कमला? अब दर्द हो रहा है? जब डेढ़ महीने पहले तुम किसी और के बेटे के लिए यही कामना कर रही थी, तब तुम्हें पाप और पुण्य याद नहीं आया? तब तुम्हें नहीं लगा कि उस लड़के की माँ का दिल भी अपने बच्चे के लिए तड़पता होगा? तुम्हारी बेटी बेटी है, और जो मेघा अपना सब कुछ छोड़कर तुम्हारे घर आई है, क्या वह किसी की बेटी नहीं है? तुम खुद दो बच्चों की माँ हो, सौरभ की शादी तुमने यह सोचकर की थी क्या कि तुम दुनिया से चली जाओगी? जब तुम खुद सास होकर अपनी बहू पर हुक्म चलाना अपना अधिकार समझती हो, तो अपनी बेटी के लिए बिना सास-ससुर का घर कैसे मांग सकती हो?”
कमला देवी के पास कोई जवाब नहीं था। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उनका सारा घमंड, उनका सारा स्वार्थ, उनके अपने ही शब्दों के बोझ तले दबकर चकनाचूर हो गया था। वीरेंद्र जी ने आगे कहा, “कमला, यह कोई असली रिश्ता नहीं था। यह लड़का, यह अमेरिका की नौकरी, यह सब मैंने गढ़ा था… सिर्फ तुम्हें यह एहसास दिलाने के लिए कि जब तीर खुद के सीने पर लगता है, तो दर्द कितना होता है। हम समाज की उस सड़ी हुई सोच का हिस्सा बन गए हैं, जहाँ हम अपने लिए तो सारे अधिकार चाहते हैं, लेकिन दूसरों को उनका वजूद तक नहीं देना चाहते। अगर तुम चाहती हो कि तुम्हारी बेटी को ससुराल में प्यार मिले, तो तुम्हें भी अपनी बहू को बेटी मानना होगा। जो बोओगी, वही काटोगी।”
फोन कट चुका था, लेकिन कमला देवी वहीं सोफे पर धम्म से बैठ गईं। आज पहली बार उन्हें अपनी गलती का इतनी गहराई से एहसास हुआ था। उन्होंने मुड़कर रसोई की तरफ देखा। मेघा अभी भी चुपचाप काम में लगी हुई थी। कमला देवी उठीं, धीरे-धीरे रसोई के दरवाज़े तक गईं। मेघा ने घबराकर सास को देखा, उसे लगा शायद फिर किसी काम में गलती हो गई है। लेकिन आज कमला देवी की आँखों में गुस्सा नहीं, पश्चाताप के आँसू थे। उन्होंने आगे बढ़कर मेघा को अपने गले से लगा लिया और फफक कर रो पड़ीं। मेघा हैरान थी, लेकिन उसे कमला देवी के सीने में उस वक़्त एक ‘सास’ नहीं, बल्कि एक ‘माँ’ का धड़कता हुआ दिल महसूस हो रहा था।
उस दिन के बाद गोमती नगर वाले उस घर की पूरी तस्वीर ही बदल गई। कमला देवी ने समझ लिया था कि रिश्तों की नींव स्वार्थ और दूसरों की बर्बादी पर नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और त्याग पर टिकी होती है। जिस तरह उन्होंने मेघा को पूरे मन से अपनाया, किस्मत ने भी रिद्धि के लिए एक ऐसा घर चुना, जहाँ उसके सास-ससुर ने उसे बेटी से बढ़कर प्यार दिया। आखिरकार, इंसान जिस तरह का आईना दुनिया को दिखाता है, दुनिया भी पलटकर उसे वैसा ही अक्स दिखाती है।
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लेखिका : सीमा कँवल