हफ्ते भर की कॉर्पोरेट नौकरी, क्लाइंट मीटिंग्स और अनगिनत टारगेट्स ने मेरे दिमाग को किसी मशीन में तब्दील कर दिया था। ऐसा लगता था जैसे मैं जी नहीं रहा हूँ, बस कलैंडर की तारीखों के साथ किसी अंधी दौड़ में भाग रहा हूँ। कई महीनों की इस कमरतोड़ मेहनत के बाद आज जाकर मुझे एक ऐसा रविवार नसीब हुआ था, जब मेरे सिर पर किसी प्रोजेक्ट की डेडलाइन की तलवार नहीं लटक रही थी।
आज मैं पूरी तरह से आराम के मूड में था। मैंने सोच लिया था कि आज न तो कोई अलार्म बजेगा और न ही मैं अपना फोन देखूंगा। लेकिन मेरी इस शांति पर सुबह-सुबह ही ब्रेक लग गया। जब मैं डाइनिंग टेबल पर बैठ कर पोहा खा रहा था, तो माँ ने मेरे सामने पानी का गिलास रखते हुए एक स्पष्ट हिदायत दे दी थी, “तुषार, आज कोई दोस्त, कोई लैपटॉप या कोई ऑफिस का बहाना नहीं चलेगा। आज पूरा दिन तू घर पर ही रहेगा। शाम को हमें एक बहुत ही खास जगह जाना है, इसलिए शाम तक एकदम फ्री रहना।”
मैंने मुंह बनाते हुए पूछना चाहा कि हमें कहाँ जाना है, लेकिन माँ का सख्त चेहरा देखकर मैं चुप रह गया। उन्होंने जगह का नाम नहीं बताया, और सच कहूं तो मुझमें उनसे बहस करने की ऊर्जा भी नहीं थी। काम की थकान ने मुझे इतना खोखला कर दिया था कि मुझे खुद से या माँ से बात किए हुए भी कई हफ्ते बीत चुके थे। हम एक ही छत के नीचे रहकर भी अजनबियों की तरह जी रहे थे। मैंने चुपचाप सिर हिलाया और वापस अपने कमरे में आ गया।
दोपहर का खाना खाने के बाद मैंने यूं ही वक्त काटने के लिए टीवी चालू कर लिया। कोई पुराना क्रिकेट मैच चल रहा था। बाहर हल्की-हल्की बारिश शुरू हो गई थी और उस ठंडी हवा के झोंकों के बीच न जाने कब मेरी आँख लग गई। मैं उसी मुद्रा में सोफे पर ही गहरी नींद में सो गया। उस नींद में एक अजीब सा सुकून था, जो शायद मुझे महीनों बाद मिला था।
मेरी नींद तब टूटी जब माँ ने मेरे कंधे को झकझोर कर मुझे जगाया। बाहर हल्की शाम ढलने लगी थी। कमरे में ट्यूबलाइट जल चुकी थी। माँ के हाथों में अदरक वाली चाय की महकती हुई प्याली थी। उन्होंने कप मेरे हाथ में थमाते हुए कहा, “चल उठ जा, बहुत सो लिया। चाय पी और जल्दी से नहा कर तैयार हो जा। हमें निकलना है।”
मैंने उबासी लेते हुए घड़ी की तरफ देखा, शाम के साढ़े पांच बज रहे थे। मेरा मन तो बिल्कुल नहीं था कहीं जाने का, लेकिन माँ की आंखों में आज एक अजीब सी चमक और चेहरे पर एक अलग सी बेचैनी थी, जिसे मैं टाल नहीं सका। मैंने बिना कोई सवाल किए चाय खत्म की और चुपचाप तैयार होने के लिए अपने कमरे में चला गया।
मैं अलमारी से अपनी शर्ट निकाल ही रहा था कि तभी बाहर ड्राइंग रूम से मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।
“माँ, ये मिठाई के डिब्बे मैं मेज पर रख दूँ?”
वो आवाज़ मेरे कानों में पड़ी और मेरे हाथ वहीं के वहीं रुक गए। मेरी धड़कनें अचानक तेज हो गईं। ऐसा लगा जैसे वक्त का पहिया सात साल पीछे चला गया हो। यह कोई अजनबी आवाज़ नहीं थी। यह एक ऐसी आवाज़ थी जिसे सुनने के लिए मेरे कान बरसों से तरस रहे थे, लेकिन मेरे झूठे अहंकार ने उस आवाज़ को मेरे जीवन से बेदखल कर दिया था।
मैं शर्ट हाथ में लिए हुए, लगभग कांपते कदमों से कमरे के दरवाजे तक आया और परदे के पीछे से बाहर झांका। सामने सोफे के पास एक युवती खड़ी थी। उसने एक सादी सी सूती साड़ी पहनी हुई थी और उसके बाल एक जूड़े में बंधे थे। वह मेरी बड़ी बहन, स्वाति थी।
स्वाति, जिसने सात साल पहले पिताजी की मर्जी के खिलाफ जाकर अपने कॉलेज के दोस्त से शादी कर ली थी। पिताजी इस सदमे को बर्दाश्त नहीं कर पाए थे और कुछ ही महीनों बाद हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया था। मैंने अपने पिता की मौत का जिम्मेदार स्वाति को मान लिया था। जिस बहन ने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, जिसने मेरी हर जिद पूरी की थी, मैंने उसी बहन के लिए अपने घर और दिल के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए थे। इन सात सालों में उसने कई बार राखी भेजी, कई बार फोन करने की कोशिश की, लेकिन मैंने कभी जवाब नहीं दिया।
लेकिन आज… आज वह मेरे घर के ड्राइंग रूम में खड़ी थी। मैं कमरे से बाहर निकला। मेरे कदमों की आहट सुनकर स्वाति ने पीछे मुड़कर देखा। मुझे देखते ही उसके हाथ से मिठाई का डिब्बा छूट गया। सात सालों का फासला आज हमारे सामने खड़ा था। उसकी आंखों में आंसू थे और मेरे गले में जैसे किसी ने रुई ठूंस दी थी।
“तू… तू कैसा है तुषार?” स्वाति की आवाज़ कांप रही थी।
मैं कुछ नहीं बोल पाया। मेरे सारे गिले-शिकवे, मेरा सारा क्रोध न जाने कहां बह गया। मैंने देखा कि उसकी मांग में सिंदूर था, लेकिन उसके चेहरे पर वो पुरानी चुलबुलाहट नहीं थी। एक अजीब सी थकान और परिपक्वता थी।
तभी माँ रसोई से बाहर आईं। उनकी आंखें भी नम थीं। उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “तुषार, मैंने तुझे बताया नहीं था ना कि हमें कहां जाना है? आज हमें स्वाति के घर जाना है। सात साल से ये किराए के मकानों में धक्के खा रही थी। आज इसने और इसके पति ने मिलकर शहर के बाहर एक छोटा सा अपना घर लिया है। आज उसी का गृह प्रवेश है। मेरी बेटी ने कहा था कि जब तक उसका भाई आकर उसके घर की दहलीज पर पहला कदम नहीं रखेगा, वो नए घर में प्रवेश नहीं करेगी।”
माँ की बात सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। जिस बहन को मैंने अपने अहंकार में पूरी तरह से भुला दिया था, वो आज भी अपनी हर खुशी के लिए मेरी मोहताज थी। मेरी सारी कॉर्पोरेट सफलता, मेरा बैंक बैलेंस और मेरा रुतबा, सब इस निस्वार्थ प्यार के सामने बौने पड़ गए।
मैं दौड़कर आगे बढ़ा और मैंने स्वाति को कसकर गले लगा लिया। सात साल से जमा हुआ मेरे दिल का वह भारी पत्थर आज मेरे आंसुओं के रूप में बह निकला। मैं एक छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो रहा था और बार-बार उससे माफी मांग रहा था। स्वाति ने भी मुझे अपने आंसुओं से भिगो दिया और मेरे बालों में हाथ फेरते हुए बोली, “पागल है क्या? भाई से भी कोई नाराज होता है भला?”
उस शाम, जब हम तीनों एक साथ स्वाति के नए घर की तरफ जा रहे थे, तो मुझे अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक मिल चुका था। मैंने महसूस किया कि हम काम की व्यस्तता और झूठे उसूलों के चक्कर में उन लोगों को पीछे छोड़ देते हैं, जो वास्तव में हमारे जीने की वजह होते हैं। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि परिवार सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि वह छत है जिसके बिना कोई भी सफलता सिर्फ एक खाली मकान की तरह होती है।
दोस्तों, क्या आपने भी कभी अपने काम या किसी पुरानी नाराजगी के कारण अपने किसी करीबी को खुद से दूर किया है? क्या हमें अपनी झूठी शान के लिए रिश्तों की बलि चढ़ानी चाहिए? अपने विचार हमें कमेंट करके जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद।