पंडित शिवशंकर जी के पुश्तैनी मकान का बड़ा सा आँगन अब हमेशा खामोश रहता था। कभी इस आँगन में उनके बेटे रोहन की किलकारियां गूंजा करती थीं, लेकिन आज यहाँ सिर्फ शिवशंकर जी की सूखी खांसी और उनकी पत्नी, रमा देवी की अस्थमा से उखड़ती हुई सांसों की आवाज़ सुनाई देती है।
उम्र के सातवें दशक को पार कर चुके शिवशंकर जी के घुटने अब उनका साथ नहीं देते। गठिया के भयानक दर्द से जूझते हुए जब वे सुबह उठकर अपनी बीमार पत्नी के लिए चाय बनाते हैं, तो उनके कांपते हाथों से अक्सर चाय की प्याली छलक कर ज़मीन पर गिर जाती है। उस गिरे हुए कप को उठाने के लिए भी उन्हें कई बार सोचना पड़ता है।
रोहन, उनका इकलौता बेटा, आज से बारह साल पहले अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करके अमेरिका के सिलिकॉन वैली चला गया था। शिवशंकर जी ने रोहन के सपनों को उड़ान देने के लिए अपनी ज़िंदगी की सारी जमा-पूंजी लगा दी थी। यहाँ तक कि अपनी पुश्तैनी ज़मीन का एक हिस्सा और रमा देवी के गहने भी गिरवी रख दिए थे।
उनका एक ही सपना था कि उनका बेटा दुनिया का बहुत बड़ा और कामयाब आदमी बने। और रोहन बड़ा आदमी बन भी गया। आज वह अमेरिका की एक बहुत बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट है। लेकिन इस शानदार कामयाबी की कीमत शिवशंकर जी और रमा देवी को अपने बुढ़ापे के घोर अकेलेपन से चुकानी पड़ रही है।
पिछले कुछ महीनों से रमा देवी की तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी। वे पूरी तरह से बिस्तर पकड़ चुकी थीं। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि दवाइयों से ज्यादा अब उन्हें अपनों के प्यार, देखभाल और एक मानसिक संबल की ज़रूरत है। बुढ़ापे में जब शरीर पूरी तरह से लाचार हो जाता है,
तब बैंक में रखे लाखों रुपये भी बेमानी लगने लगते हैं। रात के अंधेरे में प्यास लगने पर पानी का गिलास थमाने वाला कोई अपना खून चाहिए होता है,
न कि कोई किराए का नौकर जो घड़ी देखकर ड्यूटी करता हो। शिवशंकर जी ने रोहन को कई बार फोन किया, संदेश भिजवाए कि उसकी माँ की हालत अब ठीक नहीं है और इस वक्त उन्हें अपने बेटे की सख्त ज़रूरत है। वे बस यही चाहते थे कि रोहन कुछ दिनों के लिए ही सही, अपनी सारी व्यस्तताएं छोड़कर उनके पास वापस आ जाए।
आज सुबह ही मोहल्ले के डाकिए ने एक नीले रंग का मोटा लिफाफा शिवशंकर जी के हाथों में थमाया था। वह लिफाफा अमेरिका से कूरियर द्वारा आया था। शिवशंकर जी ने अपने धुंधले और मोटे चश्मे को धोती के पल्लू से साफ किया और कांपते हाथों से उस लिफाफे को खोला। अंदर एक पत्र था और साथ में एक बहुत बड़े विदेशी बैंक का भारी-भरकम ड्राफ्ट।
पत्र को देखते ही उनकी सूखी और धंसी हुई आँखों में एक उम्मीद की चमक आ गई। उन्हें लगा कि शायद रोहन ने अपने आने की तारीख लिखी होगी या अपनी फ्लाइट का टिकट भेजा होगा। उन्होंने तुरंत अपनी बीमार पत्नी के सिरहाने बैठकर वह पत्र ऊँची आवाज़ में पढ़ना शुरू किया ताकि रमा देवी भी सुन सकें।
पत्र में लिखा था:
“पूज्य बाबूजी और माँ, सादर प्रणाम। मुझे आपका संदेश मिला। माँ की तबीयत के बारे में जानकर मन बहुत दुखी हुआ। बाबूजी, आपके आशीर्वाद और आपके द्वारा किए गए महान त्याग से आज मैं उस मुकाम पर पहुँच गया हूँ, जिसका सपना आपने और माँ ने मेरे लिए देखा था। यहाँ अमेरिका में मेरे पास वो सब कुछ है जो एक बेहद सफल इंसान के पास होना चाहिए—
एक बहुत बड़ा और आलीशान बंगला, दुनिया की सबसे महंगी गाड़ियां, नौकर-चाकर, भारी बैंक बैलेंस और समाज में एक बहुत बड़ा रुतबा। मैंने आप दोनों की सभी भौतिक इच्छाओं को पूरा किया है। लेकिन बाबूजी, इस मुकाम पर पहुँचने के बाद मेरी ज़िम्मेदारियां इतनी अधिक बढ़ गई हैं कि मैं चाहकर भी यहाँ से हिल नहीं सकता। मेरे पास सब कुछ है,
लेकिन अगर कुछ नहीं है, तो वो है ‘समय’। मेरी लगातार होने वाली मीटिंग्स और बड़े प्रोजेक्ट्स मुझे एक दिन की भी मोहलत नहीं देते। मैं माँ के बेहतरीन इलाज के लिए एक बहुत बड़ा ड्राफ्ट भेज रहा हूँ। आप शहर के सबसे महंगे अस्पताल में उनका इलाज करवाइए और घर पर देखभाल के लिए एक चौबीस घंटे वाली ट्रेंड नर्स रख लीजिए। पैसों की आप बिल्कुल भी कोई चिंता मत कीजिएगा, मैं हर महीने और पैसे भेजता रहूँगा। आपका आज्ञाकारी बेटा, रोहन।”
पत्र के आखिरी शब्द पढ़ते-पढ़ते शिवशंकर जी की आवाज़ गले में ही किसी पत्थर की तरह अटक कर रह गई। उनके कांपते हाथों से वह कागज़ का टुकड़ा और वो लाखों रुपये का ड्राफ्ट ज़मीन पर गिर पड़ा। बिस्तर पर लेटी रमा देवी की आँखों से आंसुओं की एक खामोश और दर्दभरी धारा बह निकली।
शिवशंकर जी ने ज़मीन पर पड़े उस ड्राफ्ट की तरफ एक हताश नज़र से देखा और फिर अपनी बेबस और लाचार पत्नी की तरफ। उन्हें आज बहुत गहराई से समझ आ रहा था कि उन्होंने अपने बेटे को आसमान में बहुत ऊँचा उड़ना तो सिखा दिया, लेकिन ज़मीन से और अपने संस्कारों से जुड़े रहने की वो नाज़ुक डोर उनके हाथों से कब छूट गई, उन्हें पता ही नहीं चला।
उन्हें वो दिन याद आ गया जब रोहन छोटा था और उसे एक बार तेज़ टाइफाइड बुखार हो गया था। तब शिवशंकर जी अपनी सरकारी नौकरी से बिना तनख्वाह की छुट्टी लेकर और अपने सारे ज़रूरी काम छोड़कर हफ्तों तक उसके सिरहाने बैठे रहे थे। रात-रात भर जागकर उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखी थीं। तब तो उन्होंने एक बार भी यह नहीं कहा था कि उनके पास ‘समय’ नहीं है। आज जब उनके प्राण उनके बेटे की एक झलक पाने के लिए, उसके हाथों के स्पर्श के लिए तरस रहे थे, तो उस बेटे ने अपनी सफलता और समय की कमी का हवाला देकर कुछ बेजान कागज़ के टुकड़े भेज दिए थे।
उन दोनों बूढ़े और कमज़ोर शरीरों को अब पैसों की नहीं, बल्कि अपने उस बेटे की ज़रूरत थी जो उन्हें सहारा देकर बाथरूम तक ले जा सके, जो उन्हें उनके कांपते हाथों से खाना खिला सके और जो उनके बुढ़ापे की मज़बूत लाठी बन सके। वो विशाल बंगला और सुख-सुविधाएं अमेरिका में खड़ी थीं, लेकिन यहाँ बनारस के उस छोटे से पुराने घर में एक भयानक, जानलेवा और कभी न खत्म होने वाला सन्नाटा पसर गया था। शिवशंकर जी ने एक बहुत लंबी और गहरी सांस ली, अपनी नम आँखों से छत की तरफ देखा और रुंधे हुए गले से बुदबुदाए, “कैसी सफलता है यह मेरे मालिक, जिसने मेरे जीते-जी मुझे मेरे ही बच्चे से अनाथ कर दिया।”
क्या आपको भी लगता है कि आधुनिकता, दौलत और करियर की अंधी दौड़ में हमने अनजाने में अपने उन रिश्तों को बहुत पीछे छोड़ दिया है जिन्होंने हमारे आज के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था? क्या सच में कोई भी पैसा बुढ़ापे का अकेलापन और अपनों की कमी को पूरा कर सकता है? अपने विचार और अपने अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
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