शिखा , जो दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी, धीरे से कमरे में आई। उसकी आंखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने अपने माता-पिता के हाथ पकड़े और आंसुओं को रोकते हुए कहा, “नहीं पिताजी, मैं आपके साथ वापस नहीं जा सकती। जिस दिन मेरा कन्यादान हुआ था, उसी दिन से यह घर मेरा हो गया था।
माधव चले गए, इसका मतलब यह नहीं कि मेरे रिश्ते भी इस घर से खत्म हो गए। अगर मैं आज आपको छोड़कर चली गई, तो बाबूजी (शिवनारायण जी) का क्या होगा? वो तो पूरी तरह टूट चुके हैं। माधव का जो फर्ज अपने पिता के प्रति अधूरा रह गया है, अब उसे मैं पूरा करूंगी।
बनारस के घाटों की आरती की तरह ही शांत और पवित्र स्वभाव वाले पंडित शिवनारायण जी के घर में आज उत्सव का माहौल था। पूरा घर गेंदे के फूलों, आम के पल्लवों और जगमगाती रोशनी से नहाया हुआ था। अवसर ही कुछ ऐसा था, उनके इकलौते बेटे माधव का विवाह। माधव शहर के सबसे प्रतिष्ठित बैंक में जोनल मैनेजर था,
एक ऐसा पद जिसे उसने अपनी मेहनत और लगन से बहुत कम उम्र में ही हासिल कर लिया था। शिवनारायण जी शहर के एक जाने-माने सेवानिवृत्त शिक्षक थे,
जिन्होंने अपना पूरा जीवन बच्चों को सही दिशा दिखाने और समाज सेवा में व्यतीत किया था। उनका स्वभाव इतना सरल और व्यवहार इतना मधुर था कि बनारस की तंग गलियों से लेकर बड़े-बड़े अधिकारियों तक, हर कोई उनका सम्मान करता था। बेटे की शादी के लिए उन्होंने अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी लगा दी थी। उनके दिल में अनगिनत अरमान थे, जिन्हें वे आज हकीकत में बदलते हुए देख रहे थे।
शहर का कोई भी प्रतिष्ठित व्यक्ति, नाते-रिश्तेदार, आस-पड़ोस या माधव के दफ्तर का कोई ऐसा सहकर्मी नहीं था जिसे उन्होंने सप्रेम निमंत्रण न भेजा हो। बारात जब दुल्हन के दरवाजे पर पहुंची, तो शिवनारायण जी की आंखों में खुशी के आंसू थे। विवाह की सभी रस्में बहुत ही विधि-विधान और हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुईं।
भोर की पहली किरण के साथ जब विदाई हुई, तो शिवनारायण जी अपने घर एक बहू नहीं, बल्कि एक बेटी लेकर आए। बहू का नाम था शिखा । शिखा जितनी सुंदर थी, उतनी ही संस्कारी और गुणी भी। माधव जितना शांत और आज्ञाकारी था, शिखा भी उतनी ही समझदार और परिवार को जोड़कर रखने वाली लड़की थी
। उसके घर में कदम रखते ही जैसे शिवनारायण जी के सूने आंगन में वसंत आ गया। शिखा ने कुछ ही दिनों में न केवल घर की पूरी जिम्मेदारी अपने नाजुक कंधों पर उठा ली, बल्कि शिवनारायण जी को भी अपने सगे पिता से बढ़कर सम्मान और प्रेम दिया। सब कुछ किसी खूबसूरत सपने जैसा चल रहा था। घर में रोज हंसी-ठिठोली गूंजती, त्योहारों की रौनक दोगुनी हो गई थी।
पर कहते हैं न, इंसान जो सोचता है, नियति के पन्नों पर हमेशा वैसा नहीं लिखा होता। शादी को अभी बमुश्किल सात महीने ही बीते थे। शिखा के हाथों की वह गाढ़ी लाल मेहंदी अभी पूरी तरह से फीकी भी नहीं पड़ी थी कि एक मनहूस शाम ने इस हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को हमेशा के लिए ग्रहण लगा दिया। माधव एक आधिकारिक दौरे पर बैंक की तरफ से किसी दूसरे शहर जा रहा था। तेज बारिश और खराब मौसम के कारण हाइवे पर उसकी गाड़ी का भयानक एक्सीडेंट हो गया। खबर जब बनारस पहुंची, तो शिवनारायण जी के घर में जैसे भूचाल आ गया। जिस घर में कुछ महीने पहले शहनाइयां गूंजी थीं, वहां अब मातम की चीखें उठ रही थीं। माधव नहीं रहा। यह एक ऐसा सच था जिसे स्वीकार करना किसी के लिए भी संभव नहीं था।
जवान बेटे की चिता को मुखाग्नि देते समय शिवनारायण जी का पूरा शरीर कांप रहा था। वे भीतर से टूट कर बिखर चुके थे। और शिखा ? उसकी तो मानो दुनिया ही लुट गई थी। लाल जोड़े में जिस घर में वह सपनों की डोली सजाकर आई थी, आज उसी घर में वह सफेद कपड़ों में जड़वत बैठी थी। उसकी आंखों के आंसू भी जैसे सूख गए थे। शोक और दुख के इस भयानक बवंडर ने पूरे परिवार को अपनी चपेट में ले लिया था। समय किसी के लिए नहीं रुकता, तेरहवीं और बाकी के सभी कर्मकांड पूरे हो गए। धीरे-धीरे रिश्तेदार भी अपने-अपने घरों को लौटने लगे।
एक दिन शिखा के माता-पिता नम आंखों से शिवनारायण जी के पास आए। उनके पिता ने रुंधे हुए गले से कहा, “समधी जी, जो हुआ वह ईश्वर की मर्जी थी। इसमें किसी का कोई दोष नहीं। पर अब हमारी बेटी का क्या होगा? उसकी तो पूरी जिंदगी पड़ी है। इस सूने घर में वह अकेले माधव की यादों के सहारे कैसे जिएगी? हम चाहते हैं कि शिखा अब हमारे साथ वापस लौट चले। हम उसे यहां इस दर्द में घुट-घुट कर मरते हुए नहीं देख सकते।”
शिवनारायण जी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आंखों में एक अजीब सा खालीपन था। उन्होंने भारी आवाज में कहा, “आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। मैं खुद एक पिता हूं, आपकी पीड़ा समझ सकता हूं। माधव के जाने के बाद मैं खुद एक जिंदा लाश बन गया हूं, मैं इस बच्ची को क्या भविष्य दे पाऊंगा? फैसला पूरी तरह से शिखा के हाथ में है। मैं उसे कभी किसी बात के लिए बाध्य नहीं करूंगा।”
तभी शिखा , जो दरवाजे के पास खड़ी सब सुन रही थी, धीरे से कमरे में आई। उसकी आंखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने अपने माता-पिता के हाथ पकड़े और आंसुओं को रोकते हुए कहा, “नहीं पिताजी, मैं आपके साथ वापस नहीं जा सकती। जिस दिन मेरा कन्यादान हुआ था, उसी दिन से यह घर मेरा हो गया था। माधव चले गए, इसका मतलब यह नहीं कि मेरे रिश्ते भी इस घर से खत्म हो गए। अगर मैं आज आपको छोड़कर चली गई, तो बाबूजी (शिवनारायण जी) का क्या होगा? वो तो पूरी तरह टूट चुके हैं। माधव का जो फर्ज अपने पिता के प्रति अधूरा रह गया है, अब उसे मैं पूरा करूंगी। मैं इस घर की बहू बनकर आई थी, लेकिन अब मैं इस घर का बेटा बनकर दिखाऊंगी। मैं बाबूजी को इस बुढ़ापे में अकेले दर-दर की ठोकरें खाने के लिए नहीं छोड़ सकती।”
शिखा की बातें सुनकर कमरे में सन्नाटा छा गया। शिवनारायण जी फूट-फूट कर रो पड़े। उन्होंने शिखा के सिर पर हाथ रखा और उसे आशीर्वाद दिया। शिखा के माता-पिता भी अपनी बेटी के इस त्याग और संकल्प के आगे नतमस्तक हो गए और भारी मन से उसे वहीं छोड़कर लौट गए।
दिन, महीने और फिर साल बीतने लगे। शिखा ने सचमुच एक बेटे की तरह घर की कमान संभाल ली। उसने अपनी पढ़ाई आगे बढ़ाई और एक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी कर ली ताकि घर का खर्च चल सके। सुबह उठकर शिवनारायण जी को चाय देने से लेकर, उनकी दवाइयों का ध्यान रखने और घर के हर छोटे-बड़े काम को वह खुद देखती थी। शिवनारायण जी भी उसे बहू नहीं, अपनी सगी बेटी से ज्यादा मानने लगे थे। लेकिन एक पिता का दिल हमेशा अपनी संतान की चिंता में रहता है। जैसे-जैसे शिवनारायण जी की उम्र ढल रही थी, उनके मन में एक डर घर करने लगा था कि उनके जाने के बाद शिखा का क्या होगा? यह दुनिया बहुत जालिम है, एक अकेली औरत को यह चैन से जीने नहीं देगी।
एक दिन शिवनारायण जी के परम मित्र, वकील रघुवीर सहाय उनसे मिलने आए। दोनों बचपन के दोस्त थे और एक-दूसरे से हर बात साझा करते थे। चाय पीते हुए रघुवीर जी ने गंभीर स्वर में कहा, “शिव, हम दोनों की उम्र अब ढलान पर है। कभी भी बुलावा आ सकता है। पर तूने कभी शिखा के बारे में सोचा है? उस बच्ची ने अपनी पूरी जवानी तेरे और इस घर के नाम कर दी। पर तेरे बाद उसका क्या? उसकी उम्र ही क्या है अभी? पूरी जिंदगी अकेले काटना कोई आसान काम नहीं है। तूने उसे बेटी तो मान लिया, पर क्या एक पिता होने के नाते तेरा यह फर्ज नहीं बनता कि तू उसका घर दोबारा बसाए? उसकी दूसरी शादी कर दे शिव, उसे एक नई जिंदगी दे।”
शिवनारायण जी की आंखें भर आईं। उन्होंने रुंधे गले से कहा, “तू क्या सोचता है रघुवीर, मुझे यह चिंता नहीं सताती? मैं हर रात यही सोचकर सो नहीं पाता कि मेरे बाद मेरी इस बच्ची का क्या होगा। लेकिन समाज क्या कहेगा? एक विधवा से कौन शादी करेगा? और सबसे बड़ी बात, मैं खुद शिखा से यह बात कैसे कहूं? वह माधव की यादों और मेरे प्रति अपने फर्ज में इतनी बंधी है कि वह कभी इसके लिए तैयार नहीं होगी। मेरी हिम्मत नहीं पड़ती उसे यह सब समझाने की।”
रघुवीर जी ने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “तू समाज की चिंता मत कर। समाज रोटी देने नहीं आता। रही बात शिखा की, तो तू मुझे मौका दे। मैं उससे बात करूंगा।”
कुछ दिनों बाद, जब शिवनारायण जी किसी काम से बाजार गए हुए थे, रघुवीर जी घर आए। शिखा ने सम्मान से उन्हें बैठाया। बातों-बातों में रघुवीर जी ने शिखा के सामने दूसरी शादी का प्रस्ताव रख दिया। सुनते ही शिखा नाराज हो गई और बोली, “चाचा जी, आप यह क्या कह रहे हैं? मैं माधव की जगह किसी और को नहीं दे सकती। और सबसे बड़ी बात, अगर मैं यह घर छोड़कर चली गई, तो बाबूजी का क्या होगा? मैं जीते जी उन्हें अनाथ नहीं कर सकती।”
रघुवीर जी ने बहुत ही प्यार से उसे समझाया, “बेटी, तेरे बाबूजी भी यही चाहते हैं। बल्कि, यह उनका ही सपना है कि वो तुझे एक बार फिर लाल जोड़े में हंसता हुआ देखें। अगर तू वाकई उन्हें अपना पिता मानती है, तो उनकी इस आखिरी इच्छा को पूरा कर दे। उन्हें तेरे भविष्य की चिंता अंदर ही अंदर खाए जा रही है। तू बस अपनी नई जिंदगी शुरू करने के लिए हां कर दे, बाकी सब हम संभाल लेंगे।”
यह जानकर कि यह शिवनारायण जी की इच्छा है, शिखा के पास मना करने का कोई तर्क नहीं बचा। वह चुपचाप रोने लगी, जो उसकी मूक सहमति थी।
अब सवाल यह था कि शिखा के योग्य वर कहां से लाया जाए? माधव का एक बहुत करीबी दोस्त था, विनीत। विनीत माधव के साथ ही बैंक में काम करता था और माधव के जाने के बाद से ही वह लगातार शिवनारायण जी और शिखा का हालचाल लेने आता रहता था। उसने हर मुश्किल घड़ी में एक बेटे की तरह शिवनारायण जी का साथ दिया था। वह शिखा के स्वभाव, उसके त्याग और उसकी गरिमा से भली-भांति परिचित था और मन ही मन उसका बहुत सम्मान करता था।
रघुवीर जी ने जब विनीत के सामने यह प्रस्ताव रखा, तो वह कुछ पल के लिए शांत रहा। फिर उसने शिवनारायण जी के पास जाकर उनके चरण छुए और कहा, “बाबूजी, माधव मेरा भाई था और शिखा जी मेरे लिए हमेशा से एक प्रेरणा रही हैं। अगर आप मुझे इस लायक समझते हैं कि मैं आपके परिवार का हिस्सा बन सकूं, तो मुझे यह रिश्ता पूरी तरह से मंजूर है। मैं आपको वचन देता हूं कि मैं शिखा जी की आंखों में कभी आंसू नहीं आने दूंगा और आपको भी हमेशा अपने पिता के रूप में मानूंगा।”
शिवनारायण जी ने रोते हुए विनीत को गले लगा लिया। आखिर वह दिन भी आ गया जब बनारस के उसी घर में फिर से शहनाइयां गूंजी। शिवनारायण जी ने समाज की तमाम पुरानी रूढ़ियों और दकियानूसी सोच को दरकिनार करते हुए, अपनी ही बहू का एक पिता के रूप में कन्यादान किया। जब शिखा की विदाई होने लगी, तो वह शिवनारायण जी के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। शिवनारायण जी ने उसके आंसू पोंछे और कहा, “तूने एक बेटे का फर्ज बहुत अच्छे से निभाया मेरी बच्ची, आज मुझे एक पिता का फर्ज निभाने दे। जा, हमेशा खुश रह।”
शिखा विदा हो गई, लेकिन वह एक बहू के रूप में नहीं, बल्कि उस घर की सबसे लाडली बेटी के रूप में विदा हुई। शिवनारायण जी की आंखों में आंसू जरूर थे, लेकिन वो दुख के नहीं, बल्कि एक अजीब से संतोष और परम शांति के आंसू थे।
दोस्तों, आपको यह कहानी कैसी लगी? क्या समाज के डर से हमें अपने बच्चों की खुशियों का गला घोंट देना चाहिए या शिवनारायण जी की तरह एक साहसिक कदम उठाकर रिश्तों को एक नया अर्थ देना चाहिए? शिखा के त्याग और शिवनारायण जी के इस महान फैसले पर अपने विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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लेखिका :सरिता गोयल