शाम के धुंधलके ने अभी घर के आँगन में कदम ही रखा था कि तभी अंदर के कमरे से एक ज़ोरदार आवाज़ आई। मीरा दौड़कर अपनी सास, शांति देवी के कमरे में पहुँची। शांति देवी ज़मीन पर बेसुध पड़ी थीं। उनके हाथ से पानी का गिलास छूटकर टूट चुका था। मीरा की साँसें जैसे गले में अटक गईं। घर में उस वक्त कोई बड़ा नहीं था। पति अमित अपनी कंपनी के एक ज़रूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में पिछले हफ़्ते ही सिंगापुर गए हुए थे। घर में मीरा, उसकी पाँच साल की बेटी किंजल और सात साल का बेटा आरव ही थे।
मीरा ने बिना एक पल गँवाए पड़ोस के शर्मा जी को आवाज़ लगाई और शांति देवी को तुरंत नज़दीकी अस्पताल ले गई। डॉक्टर ने तुरंत उन्हें आईसीयू में भर्ती किया, लेकिन शायद नियति ने अपना फ़ैसला पहले ही लिख दिया था। कुछ ही घंटों की जद्दोजहद के बाद मॉनिटर पर चलती वो धड़कन की टेढ़ी-मेढ़ी लकीर एकदम सीधी हो गई। डॉक्टर ने बाहर आकर भारी आवाज़ में कहा, “आई एम सॉरी, उन्हें एक मैसिव कार्डियक अरेस्ट आया था। हम उन्हें बचा नहीं सके।”
मीरा वहीं अस्पताल के गलियारे में दीवार के सहारे नीचे बैठ गई। उसका मन चीख-चीख कर रोने को कर रहा था। शांति देवी उसके लिए केवल सास नहीं थीं, पिछले बारह सालों में वो उसकी एक सहेली, एक मार्गदर्शक और एक माँ बन चुकी थीं। जब मीरा पहली बार इस घर में ब्याह कर आई थी, तब शांति देवी ने ही उसे अपनी बेटी की तरह सहेजा था। लेकिन आज, जब वो हमेशा के लिए जा चुकी थीं, मीरा के पास बैठकर आँसू बहाने का भी वक्त नहीं था।
अस्पताल की औपचारिकताएँ, बिल का भुगतान, डेथ सर्टिफ़िकेट बनवाना—ये सब कौन करता? मीरा ने एक गहरी साँस ली, अपनी आँखों में आए समंदर को पलकों के पीछे ही कैद किया और उठ खड़ी हुई। उसने काँपते हाथों से सबसे पहले अमित को फोन मिलाया। अमित यह खबर सुनते ही बुरी तरह टूट गया, लेकिन फ्लाइट की टाइमिंग और वीज़ा की दिक्कतों के कारण उसे वापस पहुँचने में कम से कम चौबीस घंटे लगने वाले थे। अब इन चौबीस घंटों तक शांति देवी के पार्थिव शरीर को सहेज कर रखना, रिश्तेदारों को सूचना देना, और अंतिम संस्कार की सारी तैयारियाँ करना… इन सब की ज़िम्मेदारी अब अकेली मीरा के कंधों पर थी।
रात के ग्यारह बजे एंबुलेंस से शांति देवी का पार्थिव शरीर घर लाया गया। बर्फ़ की सिल्ली का इंतज़ाम करना, घर के हॉल से सारा फर्नीचर हटाकर ज़मीन पर गद्दे बिछाना, ताकि लोग आकर बैठ सकें। मीरा एक मशीन की तरह काम कर रही थी। उसने अपने दोनों बच्चों को पड़ोस की आंटी के घर सुला दिया था ताकि वो इस खौफ़नाक मंज़र से दूर रहें।
आधी रात के बाद से ही घर में रिश्तेदारों का ताँता लगना शुरू हो गया। शहर में रहने वाले दूर-दराज़ के रिश्तेदार भी पहुँचने लगे थे। तड़के सुबह शांति देवी की बेटी, यानी मीरा की ननद, पूजा अपने पति के साथ पहुँची। दरवाज़े से घुसते ही पूजा पछाड़ खाकर गिर पड़ी, “हाय मेरी माँ! मुझे छोड़कर कहाँ चली गई! मैं तो अनाथ हो गई!” पूजा का रोना इतना हृदयविदारक था कि वहाँ मौजूद हर इंसान की आँखें नम हो गईं। पूजा दौड़कर अपनी माँ के शव से लिपट गई और ज़ार-ज़ार रोने लगी।
मीरा भी वहीं खड़ी थी। उसके गले में जैसे काँटे चुभ रहे थे। वो भी चाहती थी कि पूजा की तरह अपनी सास के सीने से लगकर फूट-फूट कर रोए, उनसे शिकायत करे कि वो उसे ऐसे बीच राह में अकेला छोड़कर कैसे जा सकती हैं। लेकिन तभी हलवाई का फोन आ गया जो सुबह के लिए चाय और नाश्ते का इंतज़ाम करने वाला था, फिर पंडित जी को अंतिम संस्कार की सामग्री की लिस्ट भी देनी थी। बर्फ़ का पानी पिघल कर फ़र्श पर फैल रहा था, उसे साफ़ करवाने के लिए भी किसी को देखना था। मीरा ने होंठ चबाए, अपने आँसुओं को वापस गले के नीचे उतारा और दरवाज़े की तरफ़ चली गई।
सुबह होते-होते घर में पूरा मोहल्ला और कुनबा इकट्ठा हो चुका था। औरतें शांति देवी के शव के चारो ओर घेरा बनाकर बैठी थीं। पूजा रो-रोकर बेहाल थी, उसे कभी पानी पिलाया जा रहा था तो कभी उसके मुँह पर छींटे मारे जा रहे थे। वहीं दूसरी तरफ़ मीरा कभी दरवाज़े पर आने वाले मेहमानों को संभाल रही थी, कभी अंतिम यात्रा के लिए बाँस और रस्सियों का इंतज़ाम देख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी सुन्नता थी, आँखें एकदम सूखी थीं और आवाज़ में एक मशीनी ठहराव था।
रिश्तेदारों की नज़रों से मीरा का यह ‘व्यवहार’ छुप नहीं सका। कानाफूसी शुरू हो गई।
बड़ी चाची ने मुँह बनाते हुए मौसी से फुसफुसाकर कहा, “देखा जीजी! इस मीरा को। सास यहाँ सामने मरी पड़ी है और मजाल है जो इसकी आँख से एक बूँद भी पानी गिरा हो! उधर देखो बेचारी पूजा को, रो-रोकर हलकान हुई जा रही है।”
मौसी ने भी हामी भरते हुए ताना मारा, “अरे बहू तो बहू ही होती है ना! बेटी का दर्द बहू क्या समझेगी? पराया खून है, इसे क्या फ़र्क पड़ रहा है। उल्टा देखो, कैसे इधर-उधर घूमकर हुक्म चला रही है जैसे यहाँ कोई मौत नहीं, कोई फंक्शन चल रहा हो।”
पास ही बैठी ताई जी ने भी अपनी बात जोड़ी, “अरे माना कि पराया घर है, लेकिन बारह साल उस बेचारी शांति ने इसे पलकों पर बिठा कर रखा। थोड़ा बहुत तो लिहाज होना चाहिए। कम से कम चार लोगों को दिखाने के लिए ही पल्लू से मुँह ढँक कर झूठे आँसू बहा लेती। कलियुग है भाई, बहुओं के सीने में दिल नहीं, पत्थर होता है।”
यह सारी बातें मीरा के कानों तक पहुँच रही थीं। हर एक ताना उसके सीने को छलनी कर रहा था। वो चीख कर उन औरतों से कहना चाहती थी कि अगर वो भी यहाँ बैठकर रोने लगेगी, तो बाहर जो पंडित जी इंतज़ार कर रहे हैं उन्हें कौन देखेगा? अगर वो भी बेसुध हो जाएगी, तो अमित के आने तक माँ जी के शरीर को सुरक्षित कैसे रखा जाएगा? लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वो चुपचाप सारे ताने सहती रही और अपने फ़र्ज़ निभाती रही।
अगले दिन दोपहर को अमित पहुँचा। घर में घुसते ही जब उसने अपनी माँ का चेहरा देखा, तो वो भी धड़ाम से ज़मीन पर बैठ गया। मीरा ने दौड़कर अमित को संभाला, उसे ढाँढस बंधाया। अब अंतिम यात्रा का समय हो गया था। मोहल्ले के लोगों ने अर्थी उठाई। “राम नाम सत्य है” की गूँज के साथ जब अर्थी ने घर की दहलीज पार की, तब अचानक घर के अंदर एक दिल दहला देने वाली चीख गूँजी।
“माँऽऽऽऽ!”
सबने पीछे मुड़कर देखा। मीरा, जो पिछले छत्तीस घंटों से एक पत्थर की मूरत बनी सारे काम संभाल रही थी, दरवाज़े की चौखट पकड़ कर बेसुध होकर गिर पड़ी थी। अब उसे रोकने वाला कोई फ़र्ज़ नहीं था, कोई ज़िम्मेदारी अब उसके कंधों पर नहीं थी। अमित आ चुका था, बेटे ने अपना फ़र्ज़ सँभाल लिया था, और अब उस ‘पत्थर की बहू’ के अंदर की बेटी बाहर आ गई थी।
मीरा ज़मीन पर पछाड़ खा रही थी। उसके आँसुओं का वो बाँध, जिसे उसने अपने फ़र्ज़ की ईंटों से छत्तीस घंटों तक रोक रखा था, अब टूट चुका था। उसका विलाप इतना गहरा और दर्दनाक था कि वहाँ बैठी बड़ी चाची, मौसी और ताई जी सब सन्न रह गईं। वो औरतें जो कल से मीरा को पत्थर दिल बता रही थीं, अब दौड़कर उसे संभालने की कोशिश कर रही थीं।
“बस कर बेटी, शांत हो जा… शांति को तकलीफ़ होगी,” ताई जी ने रुंधे गले से मीरा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा।
मीरा रोते हुए बड़बड़ा रही थी, “किससे पूछकर चली गईं आप माँ? मैंने तो अभी बहुत कुछ सीखना था आपसे… मैं अकेले कैसे सँभालूंगी सब…”
वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें छलक उठी थीं। सबको समझ आ गया था कि मीरा के आँसू सूखे नहीं थे, उसने तो बस ज़िम्मेदारियों की आग में अपने आँसुओं को जला लिया था। एक बेटी को रोने की आज़ादी होती है, लेकिन एक बहू को कई बार अपने दुख से पहले अपने फ़र्ज़ की वेदी पर अपनी भावनाओं की बलि चढ़ानी पड़ती है। जब तक ज़िम्मेदारी पूरी नहीं हुई, उसने एक बूँद नहीं गिरने दी, और जब फ़र्ज़ पूरा हुआ, तो उसका दर्द किसी सगी बेटी से कम नहीं था।
आपको क्या लगता है, क्या समाज आज भी बेटियों और बहुओं के दुख को अलग-अलग तराजू में तौलता है? अपने विचार कमेंट्स में ज़रूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें
मूल लेखिका : संगीता अग्रवाल