लाल सुर्ख रंग, उस पर चमकता हुआ असली ज़री का सुनहरा काम और रेशम की वो मखमली छुअन… मालती की गोद में रखी वो बनारसी साड़ी किसी नवविवाहिता के सपनों जैसी हसीन लग रही थी। लेकिन मालती की आँखों से गिरते आंसुओं की अनवरत धारा उस रेशम पर गिरकर गहरे धब्बे बना रही थी। अभी कुछ ही देर पहले उसका बेटा रोहन यह साड़ी उसकी गोद में रखकर गया था। रोहन के कदम घर की देहरी पार कर चुके थे और उसके जाने की आहट भी अब शून्य में विलीन हो चुकी थी। उस भारी, सुनहरी बनारसी साड़ी को हाथों में पकड़े मालती पत्थर की मूरत बनी बैठी थी। साड़ी की सरसराहट उसे अपनी ज़िन्दगी के उस पेंडुलम पर वापस ले गई थी, जो सालों से उम्मीद और हकीकत के बीच झूलता रहा था, लेकिन आज जब वो उम्मीद पूरी हुई, तो हकीकत अपना वजूद ही खो चुकी थी।
मालती का मन स्मृतियों के उस अथाह समंदर में गोते लगाने लगा, जहाँ से लौटना अब उसके बस में नहीं था। यादों के झरोखे से उसे अपना और रमेश का शुरुआती वैवाहिक जीवन नज़र आने लगा। रमेश एक साधारण से सरकारी क्लर्क थे। संयुक्त परिवार, सीमित आय और ज़िम्मेदारियों का पहाड़। जब मालती ब्याह कर आई थी, तो मायके की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के कारण उसे कोई बहुत भारी या महंगे कपड़े नहीं मिले थे। मालती ने कभी इस बात की शिकायत नहीं की। वो सूती और साधारण सिंथेटिक साड़ियों में ही पूरा घर चहकाए रखती थी।
रमेश, जो उसे दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करते थे, अक्सर मालती को काम करते हुए निहारते और पास आकर मुस्कुराते हुए कहते, “मालती, तुम इन सादी सूती साड़ियों में भी मुझे किसी महारानी से कम नहीं लगती। असली सुंदरता इन महंगे कपड़ों में थोड़ी है, वो तो तुम्हारी इस निश्छल मुस्कान और मेरे प्रति तुम्हारे समर्पण में है। तुम्हारी ये सादी साड़ियाँ मेरे लिए दुनिया के सबसे कीमती रेशम से भी बढ़कर हैं।”
रमेश की इन मीठी बातों से मालती का मन खिल उठता था, लेकिन शब्दों से परे भी एक सच था—मालती का वो छिपा हुआ स्त्री-मन, जो करवा चौथ या दीवाली पर दूसरी औरतों को भारी बनारसी साड़ियों में सजे देखकर एक पल के लिए मचल उठता था। उसकी एक ही ख्वाहिश थी, एक असली लाल बनारसी साड़ी पहनने की। एक ऐसी साड़ी जो भारी हो, जिसमें सुनहरे तार पिरोए गए हों और जिसे पहनकर वो रमेश के सामने जाए तो उनकी आँखें फटी रह जाएँ।
रमेश मालती के मन की इस दबी हुई इच्छा को बहुत अच्छी तरह समझते थे। वो अक्सर कहते, “मालती, मुझे पता है तुम्हें लाल बनारसी साड़ी का कितना शौक है। बस ये महीने के खर्चे थोड़े सँभल जाएँ, दीवाली पर बोनस आएगा तो सबसे पहले तुम्हारे लिए वही साड़ी लाऊँगा।” लेकिन हर बार बोनस आते ही घर में कोई न कोई ऐसा खर्च मुँह फाड़े खड़ा हो जाता कि रमेश चाहकर भी वो साड़ी नहीं ला पाते। कभी छत की मरम्मत, कभी बच्चों की स्कूल की फीस, तो कभी बूढ़ी माँ की दवाइयाँ। रमेश का चेहरा उतर जाता, पर मालती उनके माथे की शिकन देखकर तुरंत बात पलट देती, “अरे छोड़िए भी! मैं उस भारी साड़ी को पहनकर ये चौका-बर्तन कैसे सँभालूंगी? मेरे लिए तो यही सूती साड़ियाँ भली हैं।”
लेकिन मालती ने हार नहीं मानी थी। उसने राशन के पैसों में से, सब्जी वाले से मोलभाव करके, और कभी-कभार पड़ोस की औरतों के स्वेटर बुनकर कुछ-कुछ पैसे बचाने शुरू किए। रसोई के सबसे ऊपरी छज्जे पर एक पुराना लोहे का डिब्बा रखा था, जो उसका गुप्त खज़ाना था। वो सोचती थी कि एक दिन इसमें इतने पैसे हो जाएँगे कि वो खुद जाकर अपने लिए वो लाल बनारसी साड़ी खरीदेगी और रमेश को चौंका देगी।
पैसे जुड़ते गए, लेकिन मालती की वो बनारसी साड़ी हमेशा भविष्य के किसी धुंधले कोने में सरकती गई। जब डिब्बे में अच्छे-खासे पैसे जमा हुए, तो अचानक बेटे रोहन का कॉलेज में दाखिले का वक्त आ गया। डोनेशन के लिए पैसे कम पड़ रहे थे। रमेश रात भर चिंता में करवटें बदलते रहे। सुबह मालती ने बिना एक शब्द कहे वो लोहे का डिब्बा रमेश के हाथों में रख दिया। रमेश की आँखों में आँसू थे, “मालती, ये तो तुम्हारी साड़ी के पैसे हैं ना?” मालती हँस पड़ी, “साड़ी का क्या है जी, अगले साल ले लूँगी। अभी तो बेटे का भविष्य ज़्यादा ज़रूरी है।”
समय अपनी रफ़्तार से भागता रहा। मालती की सूती साड़ियों का रंग उड़ता रहा, लेकिन उसके भीतर वो लाल बनारसी साड़ी का सपना कभी फीका नहीं पड़ा। रोहन के बाद बेटी नेहा की शादी की ज़िम्मेदारी आ गई। मालती ने फिर से पैसे जोड़ने शुरू किए थे, लेकिन बेटी की शादी में उसे कोई कमी नहीं रखनी थी। उसने अपने सारे शौक, अपनी सारी बचत बेटी के पीहर के कपड़ों पर लुटा दी। नेहा को विदा करते समय मालती ने वही अपनी पुरानी गुलाबी सूती साड़ी पहनी थी, लेकिन उसके चेहरे का संतोष किसी भी रेशम से ज़्यादा चमक रहा था।
बच्चे अपनी-अपनी ज़िंदगी में सेटल हो गए। रोहन को एक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिल गई और वो शहर जाकर बस गया। अब घर में सिर्फ रमेश और मालती बचे थे। रमेश अब रिटायर हो चुके थे। एक शाम रमेश ने मालती का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “मालती, जीवन भर तुमने सिर्फ इस परिवार के लिए अपनी इच्छाओं की बलि दी है। मैंने तुम्हारी सूती साड़ियों को कभी बनारसी में नहीं बदल पाया। पर अब मुझे प्रोविडेंट फंड का पैसा मिलने वाला है। इस बार हमारी सालगिरह पर हम बाज़ार चलेंगे, और तुम सबसे महँगी बनारसी साड़ी पसंद करना।”
मालती की आँखें खुशी से छलक उठी थीं। उसे लगा जैसे दशकों पुराना वनवास अब खत्म होने वाला है। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंज़ूर था। सालगिरह आने से कुछ दिन पहले ही रमेश को दिल का गंभीर दौरा पड़ा। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। प्रोविडेंट फंड का सारा पैसा, रोहन की भेजी हुई मदद और मालती की बची-खुची सारी जमा-पूँजी रमेश के इलाज में पानी की तरह बह गई। मालती दिन-रात अस्पताल में उसी पुरानी सूती साड़ी में रमेश के सिरहाने बैठी रहती। वो साड़ी के पल्लू से रमेश का पसीना पोंछती और ईश्वर से बस उनके जीवन की भीख माँगती।
“तुम्हारी साड़ी… रह गई ना मालती…” रमेश ने एक दिन ऑक्सीजन मास्क के पीछे से हाँफते हुए कहा था।
“मुझे कुछ नहीं चाहिए! आप बस जल्दी से ठीक होकर घर चलिए, मेरे लिए आपका साथ ही मेरी सबसे कीमती बनारसी है,” मालती फूट-फूट कर रो पड़ी थी।
पर रमेश घर नहीं लौटे। वो मालती को इस भरी-पूरी दुनिया में एकदम अकेला छोड़कर उस अनंत यात्रा पर निकल गए, जहाँ से कोई वापस नहीं आता।
मालती की दुनिया उजड़ गई। जिस घर में रमेश की आवाज़ गूँजती थी, वो अब उसे काटने को दौड़ता था। रमेश के जाने के बाद मालती ने रंगों से नाता तोड़ लिया था। अब उसके बदन पर सिर्फ सफेद या हल्के रंग की सादी सूती साड़ियाँ ही होती थीं। रोहन रमेश के अंतिम संस्कार और बाकी रस्मों के लिए आया था। पंद्रह दिन कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। अब रोहन को वापस लौटना था क्योंकि उसकी छुट्टियाँ खत्म हो रही थीं।
जाने से ठीक पहले, रोहन ने एक बड़ा सा पैकेट लाकर मालती के सामने रखा। “माँ, मुझे पता है तुम ज़िंदगी भर एक बनारसी साड़ी पहनना चाहती थी। पापा तो नहीं दिला पाए, पर मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ। इसे रख लो माँ… अब मैं चलता हूँ, मेरी फ्लाइट का टाइम हो रहा है। अपना ख्याल रखना।” रोहन ने रस्म अदायगी की तरह मालती के पैर छुए और सूटकेस लेकर दरवाज़े से बाहर निकल गया।
और अब, मालती अकेली उस खाली कमरे में बैठी थी। उसके कांपते हाथों ने उस डिब्बे को खोला था और वो लाल सुर्ख बनारसी साड़ी उसकी गोद में पड़ी थी। वही साड़ी, जिसे वो ज़िंदगी भर एक बार रमेश के सामने पहनकर इठलाना चाहती थी। वो साड़ी, जिसके लिए उसने अपनी जवानी की अनगिनत इच्छाओं का गला घोंटा था।
मालती की सूनी आँखें उस साड़ी की ज़री को घूर रही थीं। “अब क्या करूँ मैं इसका?” उसके सूखे होंठ बुदबुदाए। “जिसके लिए सजना था, वो आँखें तो अब हमेशा के लिए बंद हो गईं। जिसके प्यार की छाँव में वो खुरदरी सूती साड़ी भी मुझे मखमल लगती थी, वो इंसान ही नहीं रहा।”
मालती को महसूस हुआ कि यह कीमती रेशम आज उसे चुभ रहा है। यह बनारसी साड़ी उसे किसी उपहार की तरह नहीं, बल्कि उसके अकेलेपन के क्रूर मज़ाक की तरह लग रही थी। उसके रमेश ने उसे हमेशा उन सूती साड़ियों में भी दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री महसूस कराया था। उन पुरानी, घिसी हुई साड़ियों में रमेश के हाथों की छुअन थी, उनके प्यार की गर्माहट थी, उनके साथ बिताए गए सालों की मीठी महक थी। लेकिन यह नई, कोरी बनारसी साड़ी एकदम ठंडी थी—बिल्कुल उस सन्नाटे की तरह जो अब रमेश के बिना इस घर में पसर गया था।
“ये रेशम नहीं, मेरी सूनी ज़िंदगी का कफ़न है,” मालती ने साड़ी को एक किनारे रख दिया और फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अब समझ आ रहा था कि इच्छाओं की नश्वरता के आगे जीवन का सच कितना भारी होता है। उसने ज़िंदगी भर उस चीज़ का मोह किया जो महज़ एक कपड़ा था, जबकि उसका असली श्रृंगार तो उसका पति था, जिसका साथ छूटने के बाद दुनिया का हर रंग, हर रेशम बेरंग और बेमानी हो गया था।
क्या सच में इंसान को चीज़ों की कीमत तब समझ आती है जब उन्हें महसूस करने वाला ही दूर चला जाता है?
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#रेशमी धागों की चुभन
लेखिका : रीता शर्मा