“अगले दिन विहान ने दादी से बहाना बनाया कि आपने उसे दो जैकेट दिलवाई हैं। एक स्कूल के लिए और एक घर के लिए। उसने कहा कि नीली वाली जैकेट उसे चुभती है इसलिए वह इसे नहीं पहनेगा। वो मासूम अपनी दादी को वह जैकेट ओढ़ाकर सुला देता है। और क्योंकि उसका खुद का कमरा भी ठंडा रहता है और उसने अपना मोटा कंबल भी दादी को दे दिया है, वो बच्चा रात भर ठंड से सिकुड़ता रहता है और सो नहीं पाता। इसलिए वो क्लास में सो जाता है। और स्कूल आते समय अपनी वो पतली सी स्वेटर बस में ही पहन लेता है ताकि दादी को शक ना हो।”
दिसंबर का महीना अपने चरम पर था और दिल्ली की सर्द हवाएं हड्डियों तक को कंपा रही थीं। सुबह के आठ बज रहे थे, लेकिन कोहरे की घनी चादर ने सूरज की किरणों को धरती तक पहुँचने से रोक रखा था। सुमेधा के घर में रोज की तरह भागमभाग मची हुई थी। वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थी और उसका पति सिद्धार्थ भी एक बड़े बैंक में ऊंचे पद पर था। दोनों की जिंदगी घड़ी की सुइयों के साथ भागती थी। सुमेधा एक हाथ से अपने लैपटॉप पर ईमेल चेक कर रही थी और दूसरे हाथ से अपने आठ साल के बेटे विहान के लिए सैंडविच पैक कर रही थी।
“विहान! जल्दी करो, तुम्हारी स्कूल बस आने वाली है,” सुमेधा ने अपनी फाइलें समेटते हुए जोर से आवाज लगाई।
तभी उसकी सास, सावित्री देवी, धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए कमरे से बाहर आईं। उनके चेहरे पर झुर्रियों का जाल था और शरीर ठंड से हल्का-हल्का कांप रहा था। सिद्धार्थ के पिता के गुजर जाने के बाद सावित्री देवी गांव छोड़कर अपने बेटे-बहू के पास शहर आ गई थीं। उनका कमरा घर के सबसे पिछले हिस्से में था, जहां सर्दियों में धूप का नामोनिशान नहीं होता था।
“सुमेधा बेटा,” सावित्री देवी ने हिचकिचाते हुए कहा, “वो मेरे कमरे का हीटर कल रात से चल नहीं रहा है। और मेरी शॉल भी काफी पुरानी हो गई है, ठंड सीधी छाती में लगती है।”
सुमेधा ने बिना उनकी तरफ देखे ही जल्दी से कहा, “मां जी, आपको पता है न कि मैं और सिद्धार्थ इस हफ्ते कितने बिजी हैं? मेरा आज एक बहुत इम्पॉर्टेंट प्रेजेंटेशन है। मैंने ऑनलाइन एक नया हीटर और आपके लिए एक स्वेटर ऑर्डर कर दिया है, वीकेंड तक आ जाएगा। तब तक आप दो कंबल ओढ़ लीजिए।” यह कहकर सुमेधा ने अपना बैग उठाया, विहान को उसकी भारी और महंगी जैकेट पहनाई और उसे बस तक छोड़ने चली गई।
सावित्री देवी कुछ नहीं बोलीं और वापस अपने ठंडे कमरे में चली गईं। वे जानती थीं कि उनके बेटे और बहू बुरे नहीं हैं, बस उनके पास वक्त नहीं है।
दिन बीतते गए। सुमेधा और सिद्धार्थ अपने-अपने प्रोजेक्ट्स में इतने उलझे रहे कि वीकेंड कब आकर चला गया, उन्हें एहसास ही नहीं हुआ। हीटर का ऑर्डर किसी वजह से कैंसिल हो गया था, लेकिन सुमेधा को यह चेक करने की फुर्सत ही नहीं मिली। सावित्री देवी भी चुप रहीं, उन्होंने दोबारा याद दिलाना मुनासिब नहीं समझा।
करीब एक हफ्ते बाद, सुमेधा जब ऑफिस में एक अहम मीटिंग में बैठी थी, तभी उसके फोन की स्क्रीन पर विहान के स्कूल से कॉल फ्लैश होने लगी। सुमेधा ने दो बार कॉल काटी, लेकिन जब तीसरी बार वही नंबर आया तो वह घबरा गई। उसने मीटिंग से बाहर आकर फोन उठाया। दूसरी तरफ विहान की क्लास टीचर, मिस पल्लवी थीं।
“मिसेज शर्मा, क्या आप अभी स्कूल आ सकती हैं? मुझे आपसे विहान के बारे में कुछ बहुत जरूरी बात करनी है,” मिस पल्लवी की आवाज में एक अजीब सी गंभीरता थी।
सुमेधा का दिल जोर से धड़कने लगा। “क्या हुआ मैम? विहान ठीक तो है? उसे कोई चोट तो नहीं लगी?”
“वह शारीरिक रूप से ठीक है, लेकिन आपको यहां आना होगा,” कहकर टीचर ने फोन रख दिया।
सुमेधा ने तुरंत सिद्धार्थ को फोन किया, लेकिन उसका नंबर व्यस्त था। वह बदहवास सी अपनी कार की चाबियां लेकर स्कूल की तरफ भाग खड़ी हुई। रास्ते भर उसके दिमाग में बुरे-बुरे ख्याल आते रहे। विहान बहुत सीधा और होनहार बच्चा था। कभी किसी से लड़ता नहीं था और पढ़ाई में भी अव्वल था। फिर ऐसा क्या हो गया कि टीचर ने उसे बीच ऑफिस से बुलवा लिया?
स्कूल पहुंचकर सुमेधा सीधे मिस पल्लवी के केबिन में गई। वह गुस्से और घबराहट से भरी हुई थी।
“मैम, क्या बात है? विहान कहां है? मुझे इस तरह बीच मीटिंग से क्यों बुलाया गया?” सुमेधा ने अंदर घुसते ही सवालों की झड़ी लगा दी।
मिस पल्लवी कुर्सी पर शांत बैठी थीं। उन्होंने सुमेधा को बैठने का इशारा किया और गहरी सांस लेते हुए बोलीं, “मिसेज शर्मा, आप विहान को स्कूल में इतनी पतली सी स्वेटर पहनाकर क्यों भेजती हैं? और वह पिछले चार-पांच दिनों से क्लास में बार-बार सो क्यों जाता है?”
सुमेधा का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा। “एक्सक्यूज मी? आप क्या कह रही हैं? मैं विहान को रोज सुबह विदेश से मंगवाई गई वह मोटी और गर्म नीली जैकेट पहनाकर बस में बिठाती हूँ। और जहां तक सोने की बात है, वह रात को नौ बजे बिस्तर पर चला जाता है और पूरे नौ घंटे की नींद लेता है। मेरा बच्चा बहुत अनुशासित है।”
मिस पल्लवी ने सुमेधा की तरफ एक अजीब सी नजर से देखा। “मैंने भी यही सोचा था मिसेज शर्मा। लेकिन जब मैंने विहान से बात की और सच जाना, तो…” कहते-कहते मिस पल्लवी रुक गईं। उनके चेहरे पर एक गहरी उदासी छा गई और उन्होंने अपनी आंखें झुका लीं।
“क्या… क्या बताया विहान ने? कहीं कोई उसे स्कूल बस में परेशान तो नहीं कर रहा? या कोई उसकी जैकेट छीन लेता है?” सुमेधा किसी अनहोनी के डर से कांपने लगी।
मिस पल्लवी ने पानी का एक घूंट पिया और अचानक एक बिल्कुल अलग सवाल पूछा, “छोड़िए इन बातों को, यह बताइए कि आपकी सास कैसी हैं? सिद्धार्थ जी के पिताजी के जाने के बाद तो वह काफी अकेलापन महसूस करती होंगी, है ना?”
सुमेधा को इस बेतुके सवाल पर उलझन और गुस्सा दोनों आए। “वो… वो ठीक हैं मैम। लेकिन आप उनकी बात छोड़िए, मुझे विहान के बारे में बताइए। मेरी बहुत जरूरी मीटिंग छूट रही है।”
मिस पल्लवी ने सुमेधा की आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “सुबह-सुबह अपने ऑफिस और मीटिंग्स की तैयारी के चक्कर में आप अपनी सास का ठीक से ख्याल नहीं रख पाती होंगी। यह आम बात है कामकाजी महिलाओं के साथ।”
“नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है,” सुमेधा बचाव की मुद्रा में बोली। “मैं उनके खाने-पीने का पूरा ध्यान रखती हूँ। उन्हें समय पर चाय नाश्ता मिलता है।”
“पर शायद उन्हें आपके समय और थोड़ी गर्माहट की ज्यादा जरूरत है,” मिस पल्लवी का स्वर अब कुछ तीखा हो गया था। “विहान बता रहा था कि कुछ दिन पहले उसकी दादी ने आपसे ठंड से बचने के लिए हीटर और स्वेटर मांगा था, और आपने कह दिया था कि आपके पास समय नहीं है और आप वीकेंड पर देंगी।”
सुमेधा सन्न रह गई। “हां… पर इसका विहान की जैकेट और उसके सोने से क्या संबंध?” सुमेधा की उलझन अब डर में बदल रही थी।
मिस पल्लवी की आंखों में अब हल्के आंसू तैर रहे थे। उन्होंने भारी आवाज में कहा, “आपका बेटा, अपनी उस बूढ़ी और ठंड से कांपती दादी को अपनी नई और सबसे गर्म जैकेट पहना देता है। दादी ने पहले दिन यह कहकर जैकेट लेने से इंकार कर दिया था कि यह बच्चे की है और उसे ठंड लग जाएगी। तब आपके आठ साल के बेटे ने अपनी दादी से झूठ बोलना सीखा।”
सुमेधा की सांसें जैसे रुक सी गईं। वह बुत बनकर सुन रही थी।
“अगले दिन विहान ने दादी से बहाना बनाया कि आपने उसे दो जैकेट दिलवाई हैं। एक स्कूल के लिए और एक घर के लिए। उसने कहा कि नीली वाली जैकेट उसे चुभती है इसलिए वह इसे नहीं पहनेगा। वो मासूम अपनी दादी को वह जैकेट ओढ़ाकर सुला देता है। और क्योंकि उसका खुद का कमरा भी ठंडा रहता है और उसने अपना मोटा कंबल भी दादी को दे दिया है, वो बच्चा रात भर ठंड से सिकुड़ता रहता है और सो नहीं पाता। इसलिए वो क्लास में सो जाता है। और स्कूल आते समय अपनी वो पतली सी स्वेटर बस में ही पहन लेता है ताकि दादी को शक ना हो।”
“क्या…?” सुमेधा के मुंह से सिर्फ यही शब्द निकला। उसके हाथ-पैर सुन्न पड़ गए थे। उसका अपना बच्चा, जिसे वह दुनिया की हर सुख-सुविधा दे रही थी, वो रात भर ठंड में ठिठुर रहा था, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसकी मां अपने अहंकार और व्यस्तता में इतनी अंधी हो गई थी कि उसे एक बुजुर्ग औरत की तकलीफ नजर नहीं आई।
मिस पल्लवी ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “ऐसा क्यों होता है मिसेज शर्मा कि ये छोटे बच्चे दूसरों की तकलीफ और उनके मन को हम समझदार बड़ों से बहुत पहले पढ़ लेते हैं? हम उन्हें दुनिया भर की शिक्षा देने का दावा करते हैं, लेकिन असल में इंसानियत वो हमें सिखा जाते हैं।”
मिस पल्लवी के शब्द सुमेधा के सीने में किसी तीर की तरह चुभ रहे थे। उसे याद आया कि कैसे सावित्री देवी कमरे में सिकुड़ कर बैठी रहती थीं और कैसे उसने उनकी बात को अनसुना कर दिया था। उसे अपने आप पर घिन आने लगी। जो औरत अपनी कंपनी में सैकड़ों लोगों को मैनेज करती थी, वह अपने ही घर में अपनी मां समान सास की एक छोटी सी जरूरत पूरी नहीं कर पाई।
“वो…। आई एम सॉरी मैम। मैं बहुत बड़ी गुनेहगार हूँ। आइंदा ऐसा कभी नहीं होगा,” शर्म, अपराधबोध और पश्चाताप के आंसुओं से गड़ते हुए सुमेधा ने कांपती आवाज में कहा।
मिस पल्लवी ने थोड़ा नरम पड़ते हुए कहा, “और प्लीज, मेरी आपसे एक गुजारिश है। विहान को इस बारे में कुछ मत कहिएगा। उसे यह नहीं पता चलना चाहिए कि मैंने उसका यह राज आपको बता दिया है। वर्ना उस मासूम का अपनी दादी के प्रति जो भोलापन और निस्वार्थ प्रेम है, वह आहत हो जाएगा।”
सुमेधा ने अपने आंसू पोंछे और खड़ी हो गई। “डोंट वरी मैम। मेरे बेटे ने अनजाने में ही सही, लेकिन मुझे जिंदगी का जो सबसे बड़ा पाठ आज पढ़ाया है, वह मैं मरते दम तक नहीं भूलूंगी। अब मेरे विहान को अपनी दादी को अपनी जैकेट पहनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। मैं खुद उनके लिए गर्माहट बनूंगी।”
कहते हुए सुमेधा उठी और धीरे-धीरे कमरे से बाहर निकल गई। आज वह ऑफिस वापस नहीं गई। उसने सीधे बाजार का रुख किया। उसने अपनी सास के लिए सबसे बेहतरीन और गर्म शॉल, एक शानदार रूम हीटर और उनकी पसंद की कुछ मिठाइयां खरीदीं।
घर पहुंचकर उसने सीधे अपनी सास का दरवाजा खोला। सावित्री देवी उसी पुरानी पतली शॉल और विहान की नीली जैकेट में सिकुड़ी हुई सो रही थीं। सुमेधा ने धीरे से वह जैकेट हटाई और उनके ऊपर वह नई, मुलायम और बेहद गर्म शॉल ओढ़ा दी। उसने चुपचाप हीटर चालू किया और कमरे में फैलती गर्माहट को महसूस करने लगी।
सावित्री देवी की आंख खुली तो उन्होंने अपने सामने सुमेधा को आंसुओं से भीगे चेहरे के साथ पाया। सुमेधा ने आगे बढ़कर उनके पैर पकड़ लिए। “मुझे माफ कर दीजिए मां जी। मैं आपके बेटे की पत्नी तो बन गई, लेकिन कभी आपकी बेटी नहीं बन पाई। मुझे भूलने में बहुत देर हो गई।”
सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए अपने कांपते हाथों से सुमेधा को उठाया और गले से लगा लिया। घर के दरवाजे पर खड़ा विहान अपनी मां और दादी को गले मिलते देख रहा था, और उसके मासूम चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान तैर रही थी। आज उस घर में सिर्फ हीटर की गर्माहट नहीं थी, बल्कि रिश्तों की वह गर्माहट लौट आई थी जो कहीं बहुत पीछे छूट गई थी।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
#रिश्तों की गर्माहट: एक अनकहा एहसास
लेखिका : नर्मदा श्रीवास्तव