रिश्ता और स्वाभिमान – ज्योति गुप्ता

 रविवार का दिन था, किंतु शहर के जाने-माने व्यापारी और व्यापारी मंडल के अध्यक्ष राजेंद्र जी अपनी आलीशान कोठी के शानदार शयनकक्ष में उदास अकेले बैठे थे। व्यापार जगत में उनकी धाक थी; हर छोटा-बड़ा व्यापारी उनकी बात सिर-आँखों पर रखता था। मगर आज उनकी आँखों के सामने बीती रात का वह कड़वा दृश्य बार-बार घूम रहा था। 

बीती रात, खाना खाने के बाद राजेंद्र जी अपने कमरे में व्यापार संबंधी फाइलों में उलझे थे। तभी उनकी सुशील और पूरे परिवार को समर्पित पत्नी सरिता जी हाथ में एक फॉर्म लिए कमरे में आई थीं। उन्होंने बड़े प्रेम से कहा, “सुनिए जी, यह हमारे बेटे रवि के कॉलेज का फॉर्म है। वह नाटक प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए दूसरे शहर जाना चाहता है। इस पर आपके हस्ताक्षर चाहिए।” 

यह सुनते ही राजेंद्र जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वे आग-बबूला होकर चिल्लाए, “मैंने कितनी बार कहा है कि रवि को इन नाटक-नौटंकी के चक्करों में नहीं पड़ना है! उसे साफ़ कह दो कि चुपचाप अपनी पढ़ाई पूरी करे और आकर मेरा बिज़नेस संभाले।” 

सरिता जी ने खुद को संयत किया और शांति से समझाने का प्रयास किया, “देखिए जी, रवि अब बीस साल का हो गया है। उस पर ज़बरदस्ती अपनी इच्छाएँ थोपना ठीक नहीं है। उम्र के इस पड़ाव पर हमें माता-पिता से ज़्यादा उसका दोस्त बनना चाहिए। और…” 

राजेंद्र जी ने उनकी बात पूरी भी नहीं होने दी। अपने घमंड में आकर वे बोले, “लगता है आजकल माँ-बेटे में कुछ ज़्यादा ही गहरी दोस्ती हो रही है! पर यह मत भूलो कि तुम दोनों जिस ऐशो-आराम की ज़िंदगी जी रहे हो, वह सब मेरी ही कमाई का नतीजा है।” 

यह वाक्य सुनते ही सरिता जी के भीतर जैसे कुछ टूटकर चटक गया। सालों का समर्पण, त्याग और सेवा एक पल में व्यर्थ हो गई। उनकी आँखों में क्रोध और अपमान के आँसू छलक आए। किंतु अगले ही पल उन्होंने खुद को सँभाला। उनकी आँखों में एक आत्मविश्वासी चमक आ गई।

वे दृढ़ स्वर में बोलीं, “आप शायद भूल रहे हैं कि मैंने भी पूरी निष्ठा और ईमानदारी से इस घर को सँभाला है। शादी से पहले मैं भी एक प्रसिद्द लेखिका थी, लेकिन आपकी और इस परिवार की ख़ुशी के लिए मैंने अपने उस सपने का त्याग कर दिया। पर आज बात मेरे बेटे के भविष्य और उसकी ख़ुशी की है। मैं उसका पूरा साथ दूँगी। उसका जो मन करेगा, वह वही करेगा।” 

इतना कहकर सरिता जी पूरे स्वाभिमान के साथ सिर उठाकर कमरे से बाहर निकल गईं। 

उसी क्षण राजेंद्र जी को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्हें समझ आ गया कि अपने अहम् के कारण उन्होंने अपनी पत्नी के स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुँचाई है। यह सोचते हुए उन्होंने पूरी रात करवटें बदलते हुए बिताई। करवट बदलते बदलते वे सोचते रहे की कैसे सरिता जी सुख और दुःख दोनों में उनके साथ हमेशा कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ी रही हैं।

विवाह के पश्चात जब उनका व्यापार छोटे स्तर पर ही था , तब भी सरिता जी ने किसी कमी का एहसास उनको नहीं होने दिया। व्यापार के ज़िम्मेदारी में वे इतने व्यस्त थे , की कब उनकी पत्नी ने उनके बेटे रवि की सारी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली उनको पता ही नहीं चला।

रवि कब बालक से किशोर हो गया राजेंद्र जी को इस बात का अंदाजा भी नहीं हुआ। आज जब उनका व्यापार सफलता की अधिकतम ऊंचाइयों पर था तो उन्होंने अपने अहम के चलते सरिता जी के त्याग को सिरे से नकार दिया था। किन्तु इसका एहसास होते ही उन्होंने अपने मन में कुछ दृढ़ संकल्प ले लिया था जिसके बाद उनका दिल और दिमाग दोनों शांत हो गए और वो आराम से सो गए। 

रविवार की सुबह उदासी के घने बादल छँटने लगे थे।

राजेंद्र जी कमरे से बाहर आए और उन्होंने सरिता जी व रवि दोनों को अपने पास बुलाया। उन्होंने सबसे पहले सरिता जी से अपने व्यवहार के लिए सच्चे दिल से माफ़ी माँगी। सरिता जी के चेहरे पर एक शांत और विनम्र मुस्कान तैर गई। उन्होंने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि उनका स्वाभिमान भी बच गया और परिवार का पवित्र रिश्ता भी टूटने से सँभल गया। 

इसके बाद राजेंद्र जी ने रवि के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, आज से तुम जो भी करना चाहते हो, उसमें मैं और तुम्हारी माँ हमेशा तुम्हारे साथ खड़े हैं।” 

यह सुनते ही रवि की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। वह दौड़कर अपने पिता के गले से लग गया। घर की दीवारें तीनों के एक साथ खिलखिलाकर हँसने की आवाज़ से गूँज उठीं। 

लेखिका – ज्योति गुप्ता

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