कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है – मधु वशिष्ठ

कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है और मैंने वही किया है। मैं यहां ही खुश हूं। पापा अब आपकी अकेले रहने की उम्र नहीं है, माधुरी ने कहा। पवन भी साथ में ही खड़ा था, उसने भी धीरे से कहा पापा आप चाहो तो आप मेरे साथ आकर रह सकते हो? पहली बात तो तुम दोनों समझ लो यहां पर मैं अकेला नहीं हूं

यहां है तुम्हारी मां की यादें और वह हर पल मेरे साथ है, अगर कभी जरुरत हुई तो मैं तुम दोनों को फोन करके बुला लूंगा, अब मुझे शाम को पार्क में जाना है सुबह के सीनियर सिटीजन क्लब के कुछ इंतजाम भी करने हैं। वर्मा जी ने कमरे को ताला लगाया और जाने लगे माधुरी और पवन दोनों वर्मा जी को जाते हुए देख रहे थे।

       आइए आपको वर्मा जी से मिलाऊं। एक साधारण गृहस्थ के जैसे वर्मा जी ने बहुत संघर्ष किया था। गांव से आने के बाद जब उनकी सरकारी नौकरी लग गई थी और उनके पिता की मृत्यु के बाद जब पांचो भाई बहनों  ने  गांव के मकान बिकने के बाद में पैसा बांटा था उस पैसे से वर्मा जी ने यह एक कमरे वाला बी.एच.के घर खरीदा था।

छोटे से क्लर्क से नौकरी करते हुए  बहुत बड़े ऑफिसर तक की यात्रा पूरी की। कुछ डिपार्टमेंटल एग्जाम दिए और बहुत मेहनत करी।उनका बेटा पवन सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और माधुरी एक अध्यापिका। इस छोटे से मकान को किराए पर देकर उन्होंने अच्छी सोसाइटी में 500 गज की जमीन भी खरीद ली थी। ढाई सौ गज में उन्होंने अपना दो मंजिला घर बनाया था। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था।

माधुरी की शादी हो चुकी थी और पवन 12वीं क्लास में था तभी उनकी पत्नी का डेंगू बुखार से स्वर्गवास हो गया था। माधुरी ससुराल से भी आती जाती वर्मा जी का ख्याल रखती थी और पवन का ख्याल वर्मा जी रखते थे। पढ़ाई करने के बाद जब उसकी पोस्टिंग हैदराबाद में हुई तो वहां ही पवन ने अपनी मर्जी से अपनी दोस्त रीतिका से विवाह कर लिया था।

वर्मा जी रीतिका से मिले भी थे परंतु उन्हें रीतिका कभी भी पसंद नहीं थी। अपनी सेवानिवृत्ति के बाद वह हैदराबाद भी गए थे परंतु वर्मा जी जो पूरे जीवन बेहद अनुशासित रहे थे वह यह देख ही नहीं सकते थे

कि उनका पुत्र और उनकी पुत्रवधू शाम को अक्सर नशे में धुत शराब की पार्टी करें और साथ में मीट मछली दिखाएं।वह वापस अपने घर आ गए थे। माधुरी कभी-कभी उनसे मिलने और उनके पास रहने के लिए भी आ जाया करती थी। 

     तभी रिसेशन का समय आया और पवन की हैदराबाद वाली नौकरी छूट गई थी तो वह दोनों दिल्ली वापस अपने घर में आ गए थे। यहां पर भी उनका वही रवैया रहा, एक तो पवन की नौकरी छूट गई थी और बुरी आदतें बहुत पक चुकी थी। रीतिका और पवन की अक्सर लड़ाई होती रहती थी, वर्मा जी बेहद तंग आ गए थे, पवन और रीतिका को माधुरी  भी समझाती थी पर उन पर कोई असर नहीं होता था। 

   शांताबाई अभी भी वर्मा जी का खाना अलग ही बनाती थी।  पवन और रीतिका की आपसी लड़ाई इस हद तक बढ़ गई थी कि रीतिका ने पवन के ऊपर केवल हरासमेंट का ही नहीं अपितु उसने वर्मा जी के ऊपर भी बहुत गंदे और झूठे इल्जाम लगाए।

तलाक की एवज में रितिका ने साथ वाला खाली प्लॉट लेने की इच्छा करी परंतु वर्मा जी ने तभी वह प्लाट बेच दिया और अपने दो मंजिल मकान में माधुरी को उसके परिवार के साथ बुला लिया। बहुत मुश्किलों से बात कुछ लाख पर सेटल हुई और वर्मा जी ने रितिका को धन राशि देकर तलाक करवाया। 

       पवन शर्मिंदा था, इसकी पह नौकरी लग गई थी।  वर्मा  जी ने माधुरी की नंद की रिश्तेदारी में ही एक लड़की माया को देख कर पवन का दोबारा से विवाह करवा दिया। कुछ दिन तो ठीक चले परंतु माया को यह लगता था कि घर पर पूरा अधिकार उसी का ही है। उसने वर्मा जी पर जोर डाला कि वह पहले घर पवन के नाम करे। वर्मा जी के पास तो सरकारी पेंशन भी आती है।

माधुरी के सास ससुर भी अक्सर रहने को आते ही रहते थे। एक ही घर में रहने के कारण दोनों भाई बहनों में प्रेम की बजाय झगड़े अधिक बढ़ रहे थे। माधुरी की सासू मां भी कहती थी कि मेरे बेटे ने जब-जब भी जरूरत पड़ी हम लोगों से भी ज्यादा तुम्हारे पिता का ख्याल रखा है

इसलिए तुम्हारे पिता को चाहिए कि वह पहले ही अपने जायदाद का हिस्सा तुम्हारे नाम करे। माधुरी के पति भी अपनी मां की इस बात से पूर्णतया सहमत थे और वह माधुरी पर अपने पिता को हिस्सा देने के लिए राजी करने पर जोर दिया करते थे। 

             वर्मा जी का खाना अभी शांताबाई ही बनाती थी या वह खुद ही अपना जुगाड़ करते थे। दोनों बच्चों के लिए भले ही उन्होंने कुछ भी किया हो पर वह दोनों अब उनसे उलझते ही रहते थे। वर्मा जी 5 दिनों से बीमार थे परंतु दोनों बच्चों को उनकी बीमारी से भी ज्यादा चिंता इस बात की थी कि उनकी मृत्यु के बाद दोनों भाई  बहन मुश्किल में आ जाएंगे इसलिए वह अपने पिता के ठीक होने की बजाय उनसे वसीयत लिखने पर ज्यादा जोर दे रहे थे।

यह तो उनके सीनियर सिटीजन क्लब के दोस्त रामनाथ जी जब उनसे मिलने आए और उन्हें वर्मा जी की बीमारी का पता चला तो एकदम उन्होंने उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाया और वहां से ठीक होने के बाद वर्मा जी उस घर में नहीं गए अपितु अपने उस पुराने एक भी.एच.के कमरे वाले फ्लैट में आ गए जहां से कि उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत करी थी।

वहां पर उनके सीनियर सिटीजन क्लब के दोस्त ही उनका ख्याल रखते थे और शांताबाई वहां भी उनका खाना बनाने के लिए आती थी। शुरू शुरू में तो उनका वहां जाना दोनों में से किसी को भी बुरा नहीं लगा क्योंकि अब सवाल यह आ गया था कि बीमार पिता की सेवा  सुश्रुषा कौन करेगा?

ना बहुरानी तैयार थी और माधुरी के साथ तो अपनी सारी बीमारियां लेकर बहुत समय से माधुरी की सासू मां ही सेवा करवा रही थी। वर्मा जी भी उनकी परवाह करे बिना अपने जीवन में सीनियर सिटीजन क्लब के अपने दोस्तों में व्यस्त होते जा रहे थे। उस पुराने घर में उन्हें अक्सर यह एहसास होता था

कि उनकी पत्नी उनके साथ है। पिछले सप्ताह जब वह अपनी कुछ बुजुर्ग साथियों के साथ वृद्धआश्रम में गए थे तो वहां उन्होंने कुछ धनराशि भी दान दी थी। वही न्यूज़ अखबार में भी आई थी। हो सकता है इसी न्यूज़ ने दोनों बच्चों को उनके पास आने के लिए आकर्षित किया हो, दोनों ही अब उन्हें  घर में बुला रहे थे परंतु वर्मा जी ने स्पष्ट कह दिया कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा है।

तुम लोग सुखी रहो। मुझे क्या करना है मैं अपने आप देख लूंगा तुम लोग वहां रहना चाहो तो रहो वहां से जाना चाहते हो तो जाओ। मुझे जरूरत होगी तो मैं तुम्हें बुला लूंगा। हालांकि वर्मा जी ने वह घर तो वसीयत में दोनों बच्चों के नाम लिख दिया था बाकि वह अपनी जिंदगी अब अकेले ही समाज सेवा करते हुए अपने मित्रों के साथ काटना चाहते थे। 

पाठकगण उन्होंने सही किया ना? कॉमेंट्स में बताइए?

मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा

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