शिखा ने एक गहरी सांस ली। “विकास, मैं पिछले कई हफ्तों से देख रही हूं कि माँ जी अंदर ही अंदर घुल रही हैं। वह रात-रात भर सोती नहीं हैं, कल रात भी ढाई बजे बरामदे में अकेली बैठी थीं। उनका खाना-पीना भी नाम मात्र का रह गया है। बाबूजी के अचानक चले जाने का सदमा वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं। मुझे बहुत डर लग रहा है विकास, अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम उन्हें भी खो देंगे।”
विकास का चेहरा उतर गया। वह कुर्सी पर बैठ गया और परेशान होते हुए बोला, “तुम ठीक कह रही हो शिखा। बाबूजी का जाना हम सबके लिए एक बहुत बड़ा झटका था। वो हम सबकी छत थे। मैं आज ही डॉक्टर माथुर से अपॉइंटमेंट फिक्स करता हूं। शाम को ऑफिस से आते ही मैं माँ को क्लिनिक ले जाऊंगा। शायद उन्हें कोई अच्छी नींद की गोली या कोई ताकत की दवाई की जरूरत है।”
रात के करीब ढाई बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड ने पूरे शहर को अपनी चादर में लपेट लिया था। शिखा की नींद अचानक टूट गई। उसे प्यास लगी थी। वह पानी पीने के लिए जैसे ही कमरे से बाहर निकली, उसकी नजर सामने वाले बरामदे पर पड़ी। वहां एक हल्की सी पीली रोशनी जल रही थी। शिखा ने ध्यान से देखा, उसकी सास, सुमित्रा देवी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठी हुई थीं। उनके हाथ में एक पुरानी डायरी थी और उनकी नजरें सामने रखे उस खाली तख्त पर टिकी थीं जहां कभी उनके ससुर जी, पंडित रामनाथ, बैठकर अखबार पढ़ा करते थे।
शिखा दबे पांव उनके पास पहुंची। “माँ जी? आप इतनी रात गए यहां क्यों बैठी हैं? इतनी ठंड है, आपको कमरे में सो जाना चाहिए था।”
सुमित्रा देवी एकदम से चौंक गईं, जैसे कोई गहरे ख्यालों से अचानक बाहर आ गया हो। उन्होंने जल्दी से अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी नम आंखें पोंछीं और एक फीकी सी मुस्कान चेहरे पर लाते हुए बोलीं, “अरे कुछ नहीं शिखा बहू। बस ऐसे ही… नींद नहीं आ रही थी तो सोचा थोड़ी देर बाहर बैठ लूं। उम्र हो गई है ना, अब इस बुढ़ापे में नींद कहां आती है। तू जा, जाकर सो जा। सार्थक भी तो उठ गया होगा, उसे तेरी जरूरत होगी।”
शिखा ने सुमित्रा देवी के ठंडे पड़ चुके हाथों को अपने हाथों में लिया। “माँ जी, आपकी तबीयत तो ठीक है ना? आपके हाथ कितने ठंडे हो रहे हैं। चलिए, मैं आपको कमरे तक छोड़ देती हूं।”
सुमित्रा देवी ने हल्के से हाथ छुड़ाते हुए कहा, “मैं बिल्कुल ठीक हूं बहू। तू बेकार में चिंता करती है। जा, जाकर सो जा।”
शिखा अपने कमरे में लौट तो आई, लेकिन उसके मन में एक अजीब सी बेचैनी छा गई। उसने बिस्तर पर करवटें बदलते अपने पति, विकास, की तरफ देखा। विकास दिन भर ऑफिस के काम में इतना थका होता था कि बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद में चला जाता था। शिखा ने उसे जगाना ठीक नहीं समझा, लेकिन सुमित्रा देवी की वह उदास और खाली आंखें शिखा को सोने नहीं दे रही थीं।
पिछले चार महीनों से, जब से रामनाथ जी का दिल का दौरा पड़ने से अचानक निधन हुआ था, शिखा ने अपनी सास में एक बहुत बड़ा बदलाव देखा था। जो सुमित्रा देवी कभी पूरे घर में अपनी चहकती आवाज और निर्देशों से जान डाल कर रखती थीं, वह अब बिल्कुल खामोश हो गई थीं। ना तो वह ढंग से खाना खाती थीं, ना ही किसी से ज्यादा बात करती थीं। शिखा कई बार उन्हें अकेले में शून्य में घूरते या सुबकते हुए देख चुकी थी।
अगली सुबह, नाश्ते की मेज पर विकास जल्दी-जल्दी अपने लैपटॉप के बैग में फाइलें ठूंस रहा था। “शिखा, मेरा टिफिन पैक कर दिया? आज बोर्ड मीटिंग है, मुझे बहुत जल्दी निकलना है।”
शिखा ने टिफिन विकास के हाथ में दिया और फिर गंभीरता से बोली, “विकास, मुझे तुमसे कुछ बहुत जरूरी बात करनी है।”
विकास ने घड़ी देखते हुए कहा, “शिखा, अभी बहुत देर हो रही है। हम शाम को बात करें?”
“नहीं विकास, यह बात शाम तक नहीं रुक सकती। यह माँ जी के बारे में है।” शिखा की आवाज में जो सख्ती थी, उसने विकास को रुकने पर मजबूर कर दिया।
“क्या हुआ माँ को? उनकी तबीयत खराब है क्या? ब्लड प्रेशर तो नॉर्मल है ना?” विकास ने घबराते हुए पूछा।
शिखा ने एक गहरी सांस ली। “विकास, मैं पिछले कई हफ्तों से देख रही हूं कि माँ जी अंदर ही अंदर घुल रही हैं। वह रात-रात भर सोती नहीं हैं, कल रात भी ढाई बजे बरामदे में अकेली बैठी थीं। उनका खाना-पीना भी नाम मात्र का रह गया है। बाबूजी के अचानक चले जाने का सदमा वह बर्दाश्त नहीं कर पा रही हैं। मुझे बहुत डर लग रहा है विकास, अगर ऐसा ही चलता रहा तो हम उन्हें भी खो देंगे।”
विकास का चेहरा उतर गया। वह कुर्सी पर बैठ गया और परेशान होते हुए बोला, “तुम ठीक कह रही हो शिखा। बाबूजी का जाना हम सबके लिए एक बहुत बड़ा झटका था। वो हम सबकी छत थे। मैं आज ही डॉक्टर माथुर से अपॉइंटमेंट फिक्स करता हूं। शाम को ऑफिस से आते ही मैं माँ को क्लिनिक ले जाऊंगा। शायद उन्हें कोई अच्छी नींद की गोली या कोई ताकत की दवाई की जरूरत है।”
शिखा ने विकास के हाथ से फोन ले लिया और उसे टेबल पर रख दिया। “विकास, माँ जी की बीमारी का इलाज किसी डॉक्टर के पास या किसी मेडिकल स्टोर की गोलियों में नहीं है। उनका इलाज इस घर में है, हमारे पास है।”
“क्या मतलब? मैं कुछ समझा नहीं शिखा।” विकास ने उलझन भरे स्वर में पूछा।
शिखा विकास के पास बैठ गई और उसकी आंखों में देखते हुए बोली, “विकास, जब तुम छोटे थे और तुम्हें किसी भयानक सपने से डर लगता था, या जब बाहर तेज आंधी-तूफान आता था और तुम घबरा जाते थे, तब तुम क्या करते थे?”
विकास ने पुरानी यादों में गोता लगाते हुए कहा, “मैं दौड़कर माँ के पास चला जाता था। उनकी गोद में सिर रखकर मुझे लगता था कि दुनिया की कोई भी बुरी चीज मुझे छू नहीं सकती। उनके आंचल की गर्माहट में सारा डर खत्म हो जाता था।”
“बिल्कुल सही,” शिखा ने कहा। “आज माँ जी उसी आंधी-तूफान के बीच अकेली खड़ी हैं। बाबूजी के जाने के बाद उनकी दुनिया में जो अंधेरा और डर छा गया है, उससे वह बहुत घबरा गई हैं। जब हम बच्चे डरते हैं, तो माँ-बाप के पास जाकर बेखौफ सो जाते हैं। लेकिन जब माँ-बाप बुढ़ापे में अकेलेपन और मौत के डर से कांपते हैं, तो क्या यह हमारा फर्ज नहीं है कि हम उनके लिए वही सुरक्षित आंचल बनें? विकास, माँ जी को दवाई की नहीं, सहारे की जरूरत है। तुम्हारे वक्त और तुम्हारे प्यार की जरूरत है।”
विकास की आंखों में आंसू तैरने लगे। उसे एहसास हुआ कि वह अपनी जिम्मेदारियों की दौड़ में इतना अंधा हो गया था कि उसने अपनी ही माँ की सिसकियों को अनसुना कर दिया था। उसने बाबूजी के जाने के बाद सारा आर्थिक जिम्मा तो उठा लिया था, लेकिन भावनात्मक रूप से वह अपनी माँ को बिल्कुल अकेला छोड़ चुका था।
“तुम बिल्कुल सच कह रही हो शिखा। मैं कितना बड़ा मूर्ख हूं। मुझे क्या करना चाहिए?” विकास ने रुंधे हुए गले से पूछा।
शिखा ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा। “आज से तुम दिन भर ऑफिस का काम करोगे, लेकिन रात का समय सिर्फ माँ जी का होगा। आज रात से तुम माँ जी के कमरे में सोओगे। मैं और सार्थक दिन में उनके साथ समय बिताएंगे, और रात को तुम। तुम उनसे बातें करना, बाबूजी की यादें साझा करना, उनके बचपन के किस्से सुनना। उन्हें महसूस कराना कि वह इस दुनिया में अकेली नहीं हैं।”
विकास ने दृढ़ता से सिर हिलाया। “मैं समझ गया शिखा। मैं आज रात से ही माँ के पास सोऊंगा।”
रात के दस बज चुके थे। सुमित्रा देवी अपने कमरे में एक छोटी सी डिब्बी से रामनाथ जी का चश्मा निकालकर उसे बार-बार साफ कर रही थीं। कमरे में उदासी का एक भारी पर्दा पसरा हुआ था। तभी दरवाजे पर आहट हुई। विकास अपने हाथ में अपना तकिया और एक चादर लेकर कमरे में दाखिल हुआ।
सुमित्रा देवी ने हैरानी से अपने बेटे की तरफ देखा। “विकास? तू यहां क्या कर रहा है बेटा? इतनी रात गए? कोई जरूरी कागज ढूंढने आया है क्या?”
विकास ने अपना तकिया सुमित्रा देवी के पलंग के बिल्कुल पास नीचे जमीन पर बिछे गद्दे पर रख दिया। “नहीं माँ, मैं आज से आपके पास, यहीं सोऊंगा।”
सुमित्रा देवी घबरा गईं। “क्या? तू मेरे पास क्यों सोएगा? शिखा से कोई लड़ाई हो गई है क्या? देख बेटा, पति-पत्नी में छोटी-मोटी नोकझोंक होती रहती है। शिखा बहुत अच्छी और समझदार बहू है। तू जा, जाकर उसे मना ले। ऐसे अपना कमरा छोड़कर यहां आना ठीक नहीं है।”
विकास अपनी माँ के पलंग के किनारे बैठ गया। उसने अपनी माँ के दोनों झुर्रीदार हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसकी आंखें भीग चुकी थीं।
“माँ, मेरी शिखा से कोई लड़ाई नहीं हुई है। वो तो इस दुनिया की सबसे अच्छी पत्नी है जिसने मेरी बंद आंखें खोल दीं। माँ, आपको याद है, जब मैं सात-आठ साल का था और मुझे तेज बुखार में रात को डरावने सपने आते थे, तब मैं क्या करता था?”
सुमित्रा देवी की आंखों में वात्सल्य की एक चमक आ गई। “हां, याद है ना। तू रोते हुए मेरे कमरे में आ जाता था और तब तक नहीं सोता था जब तक मैं तुझे अपनी छाती से लगाकर तेरी पीठ नहीं सहलाती थी।”
विकास की आंखों से आंसू छलक पड़े। “माँ, जैसे बचपन में मैं डरा हुआ और कमजोर था, और आपके पास आकर मेरी सारी घबराहट खत्म हो जाती थी… वैसे ही आज मैं जानता हूं कि बाबूजी के जाने के बाद आप अंदर से बहुत डरी हुई हैं। आप बहुत अकेला महसूस कर रही हैं। माँ, हम बड़े तो हो जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमें एक-दूसरे के सहारे की जरूरत खत्म हो जाती है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तो उन्हें अपने बुजुर्ग माता-पिता का सहारा बनना चाहिए।”
सुमित्रा देवी, जो पिछले चार महीनों से अपने आंसुओं को एक मजबूत बांध के पीछे रोके हुए थीं, विकास के इन शब्दों से पिघल गईं। उनके भीतर का सारा गुबार, सारा दुख और एकाकीपन आंसुओं के रूप में फूट पड़ा।
“तेरा बाबूजी मुझे बीच रास्ते में अकेला छोड़कर चला गया रे विकास…” सुमित्रा देवी फफक-फफक कर रोने लगीं। “मुझे उस कमरे में, उस बरामदे में हर जगह उसकी आवाज सुनाई देती है। मुझे बहुत डर लगता है विकास, बहुत डर लगता है।”
विकास ने अपनी माँ को मजबूती से अपने गले से लगा लिया। वह भी अपनी माँ के साथ रोने लगा। “आप अकेली नहीं हो माँ। मैं हूं ना। आपका यह बेटा अभी जिंदा है। बाबूजी की जगह कोई नहीं ले सकता, लेकिन मैं उनका साया बनकर हमेशा आपके साथ रहूंगा। अब आपको अकेले डरने की कोई जरूरत नहीं है।”
उस रात, सुमित्रा देवी ने विकास का हाथ कसकर पकड़ रखा था। कई महीनों की घुटन और दर्द के आंसुओं में बह जाने के बाद, सुमित्रा देवी को एक अजीब सी शांति महसूस हो रही थी। विकास उन्हें तब तक बाबूजी के पुराने मजेदार किस्से सुनाता रहा, जब तक कि वह गहरी नींद में नहीं चली गईं।
कुछ ही देर में, विकास ने देखा कि उसकी माँ का चेहरा बिल्कुल शांत था और उनकी सांसें एक नियमित लय में चल रही थीं। महीनों बाद सुमित्रा देवी बेखौफ और चैन की नींद सो रही थीं। विकास को समझ में आ गया था कि रिश्तों में केवल पैसा और सुविधाएं देना ही काफी नहीं होता, बल्कि अपनों के दिल का खालीपन भरना ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है।
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