सहारा – करुणा मलिक 

अम्मा, मैं बता रही हूँ कि इस मकान का सहारा है बस तुम्हें, हरगिज़ भी सुनील की बात मानकर इसे बेचने की मत सोचना , याद है ना ताई की दुर्गति, मकान नाम करते ही बिल्लू भाई ने जीते जी मार ही डाला था। 

ना लाली, ऐसी बात नहीं है । पहली बात तो अपना नसीब है, मकान- दुकान का सहारा तो कहने की बात है, सहारा तो भगवान का है। रही बिल्लू और सुनील की बात, तो पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती।  बिल्लू ने तेरी ताई को नहीं पूछा तो भगवान ने धी- जमाई का सहारा दे दिया था। 

देख लो अम्मा, मेरी तो आस करना मत। मुझसे तो अपना ही ना होता। 

ए ना लाली, चिंता ना कर, वैसे तो सुनील और रेखा ने बताने से मना किया था पर बुरा ना माने तो एक बात कह दूँ? 

ना बुरा क्यों मानूँगी?  कह दो। 

लाली, इस समय एक लाख रुपये की बड़ी जरूरत है तेरे भाई को, तेरे लिए तो बड़ी रकम ना है, तेरी भतीजी का आखिरी साल है, उसकी फीस और ऊपर के खर्च में यही कोई लाख रुपये लगेंगे। अगर तू मदद कर दे तो मकान बेचने की नौबत ही ना रहेगी…… 

कैसी बात कह दी अम्मा! अब क्या ससुराल वालों को यह बताऊँ कि लड़की की फीस भरने को उधार माँग रहे मेरे मायके वाले? ब्योंत नहीं था तो ऐसा कोर्स करवाने की जरूरत क्या थी? 

लाली, दुख- सुख तो जीवन में लगे ही रहते हैं, सुनील का काम ठीक चल रहा था। वो तो मैं बीमार होके अस्पताल में जा पडी़, अब बेचारा काम देखे, मुझे देखे…. रेखा घर में आए- गए वालों के चाय- पानी- खाने में लगी थी, किसी का भी तो सहारा नहीं था। 

अम्मा, अब हालचाल पूछने आएँगे तो चाय- रोटी का भी उलाहना दोगी क्या? 

ए लाली, मैं तो बताऊँ थी कि बजट कैसे ऊपर – नीचे हो गया। रेखा ने अपनी बहन से पूछा पर उसकी ननद का ब्याह है, अब महारे जैसों के लिए तो लाख रुपये बड़ी बात है। अब घर- घर जाकर तो पूछ नहीं सकते इसलिए सोचा कि मकान बेचकर छोटा घर ले लेंगे और दूसरे खर्च भी निकल जाएंगे। पढने में बहुत होशियार है तेरी भतीजी… रेखा ने बहुत सलीका सिखाया है। ऐसी जमीन- घर रखके क्या करेंगे जो बच्ची की पढ़ाई रुक जाए। 

देख ले लाली, वैसे तो बहू- बेटे ने इस बात का जिक्र तेरे सामने करने से मना किया था कि बेटी से मत माँगना पर मेरा जी नहीं माना इसलिए कह दिया…. अच्छा- बुरा समय तो निकल ही जाएगा । 

अम्मा, एक लड़की है सुनील के… कल को पहले की तरह काम ना चला या अंबिका को कोई बढिया नौकरी ना मिली तो…. कभी सोचा कि, इस मकान की खातिर बहू- बेटा तेरे आगे- पीछे घूमते है। पुरानी प्रोपर्टी है….. लाखों की है। 

बस मजबूरी है, नहीं तो कौन चाहता है बाप दादा की निशानी बेचना…. तू बता, सबसे पहले थोडे़- थोडे़ करके तेरा उधार चुका एगा तेरा भाई…. 

अम्मा, आज तो जा रही हूँ। दो- चार दिन में बताऊँगी। 

माँ से बात करके सुनीता तो चली गई पर अम्मा समझ गई कि बेटी के सामने पैसों की बात करके नाहक ही छोटी हुई। सुनील ने बहन के बारे में सही अंदाजा लगाया था इसलिए उसने जिक्र करने से मना किया था। अम्मा ने गहरी साँस ली, कितना फर्क है दोनों भाई-  बहन में …. सुनीता के लिए सुनील कलेजा भी निकाल कर देने को तैयार रहता है और एक तरफ संपन्न बहन है, जो उधार तक देने को तैयार नहीं… इतना सोचते- सोचते अम्मा ने हाथ जोड़कर कहा — भगवान्, तेरा ही सहारा है। 

सुनीता के   जाने के बाद अम्मा ने मन ही मन आस बाँध ली थी कि शायद सुनीता पैसे देने की हाँ कह देगी पर दस दिन गुज़र गए। इधर मकान के ग्राहक आने लगे। जिस दिन मकान का सौदा हुआ। सुनील माँ की गोद में सिर रखकर खूब रोया , अम्मा और रेखा का जी भी बहुत भारी था। अंबिका ने सजल आँखों से दादी और माता- पिता की तरफ देखते हुए कहा—-

मैं आप तीनों से वादा करती हूँ कि खूब मेहनत करुँगी और एक दिन इससे भी बड़ा मकान खरीदूँगी। 

बावली छोरी, तू तो ब्याह करके चली जाएगी। हम क्या करेंगे बडे़ मकान का, आदमी का मोह होवे ही है अपनी चीज से। पर बेटा, तेरे भविष्य से बढ़कर थोडे़ ही है कोई चीज। ये तेरे मांँ- बाप बच्चे हैं अभी तक। 

कहते हुए अम्मा ने घर के भारी माहौल को हलका करने की कोशिश की। 

थोडे़ ही दिनों में सुनील ने एक अच्छा बड़ा घर भी खरीद लिया बस फर्क इतना था कि पुराना मकान शहर के बीचों बीच था और नया वाला शहर के बाहर।पर खूब खुला साफ सुथरी जगह बढिया सौदा हो गया था। 

कई महीने बाद अम्मा ने बेटी को फोन किया—

लाली, इतनी डर गई कि पीहर ही भूल गई। वक्त- बेवक्त नाते रिश्ते दारी में पैसे धेले लेने पड़ ही जाते हैं फिर तू तो घर की बेटी है। तूने तो माँ की भी सुध ना ली? 

आज कैसे बेटी को याद कर लिया अम्मा, मैं तो बड़े दिनों से बुखार में पड़ी हूँ। शुरू कर दिए क्या, तेरे बहू बेटे ने रंग दिखाने? मुझे तो पता था कि मकान बिकते ही अम्मा भारी हो जाएगी। 

ए लाली, तू हमेशा उल्टी ही बात क्यों सोचती है। मैं तो राजी खुशी जानने को फोन मिलवाया, माँ का जी ऐसा ही होवे पर तू हमेशा गलत ही बोले। ना भाई- भाभी की पूछी, ना हमारे हालात की, ना भतीजी की…. कैसी पत्थर दिल है तू, ऐसी तो तू ना थी सुनीता। 

अम्मा, जब तुम सुनती ही नहीं तो भुगतो। तुमने हमेशा सुनील की मेर ली है….. घर बेचा, एक बार भी सोचा कि मेरा भी हक है उसमें बराबर का…. 

हाँ लाली, तेरा हक क्यूँ ना है…. अब तो सब ठीक चल रहा है। सुनील और रेखा ने तो कई बार कह लिया मुझे पर मैं ही बाट देखती रही कि देखूँ कब बेटी माँ की सुध लेगी।  तेरी तरफ से बेफिक्री हूँ, भगवान् ने मौज दे रखी, भरा- पूरा परिवार और लक्ष्मी माता की खूब कृपा। 

लक्ष्मी की कृपा होनी चाहिए बस वरना कोई किसी का नहीं होता। 

ना लाली, सहारा तो भगवान् और आदमियों का ही होवे…. कई- कई ऐसे हैं दुनिया में, पैसा तो है पर कंधे पर हाथ रखने वाला कोई नहीं। 

किस जमाने की बात कर रही हो अम्मा, जिसके हाथ पर भी सौ दो सौ रूपये रखो, उसी का खूब सहारा मिले। 

सुनीता की बात सुनकर अम्मा ने सोचा कि बहस करने से क्या फायदा, बखत ही सिखाएगा। 

अम्मा ने बहू- बेटे को अगले ही दिन बेटी की ससुराल भेजकर उसके मकान के हिस्से के पैसे भिजवा दिए और बाकी हिसाब समझा दिया। 

धीरे- धीरे इस बात को दो साल बीत गए। इकलौती भतीजी की शादी में भी सुनीता दिन के दिन आई। खैर भाई- भाभी भी कब तक पूछते, उन्होंने भी धीरे – धीरे किनारा करना शुरू कर दिया। संयोग से जिस शहर में सुनीता रहती थी, वही ं के सिविल अस्पताल में अंबिका और उसके पति नीरज की पोस्टिंग थी। 

एक दिन रात के दो बजे अचानक सुनील के फोन की घंटी बजी, जैसे ही उसने स्क्रीन पर बहन का नाम देखा, उसका जी धडक उठा। पास में सोई रेखा को हिलाते हुए कहा —

उठ, सुनीता का फोन है। 

भाई…. तेरे जीजा के सीने में बहुत तेज दर्द है… पसीना- पसीना हो रहे। ‌सारे घर वाले जयपुर  शादी में गए हैं, कैब भी बुक नहीं हो रही…. क्या करुँ? इतना कहते ही उसकी हिचकी बँध गई। 

घबरा मत। मुन्ना को फोन करता हूँ। 

इतना कहते ही सुनील ने बेटी को फोन मिलाया पर रेखा ने इसी बीच भाई- बहन की बात सुनकर बेटी को सारी बात बता दी थी। 

हाँ पापा, मम्मी ने बता दिया है। आप टेंशन मत लो। मैं गाड़ी निकाल रही हूँ, नीरज मेरे साथ है। आप चिंता मत करना और दादी को अभी रात में कुछ मत बताना। 

उस रात अंबिका और नीरज अगर सही समय पर सुनीता के घर पहुँच कर उन्हें अस्पताल में दाखिल ना करवाते तो शायद उन्हें बचाया ना जा सकता। 

अगले तीन दिनों  के बाद सुनीता के पति को कमरे में शिफ़्ट कर दिया गया। अम्मा एक पल भी बेटी के पास से नहीं हिली थी। आज सुनीता ने मांँ के हाथों को अपने हाथों में लेकर कहा —

अम्मा, आप सच्ची कहती हो, सच्चा सहारा भगवान् होता है। उसकी मर्जी के बिना रुपये पैसे भी धरे रह जाते हैं।अगर उस रात भगवान्  मेरी भतीजी और जमाई के रूप में सहारा ना भेजता तो ना जाने क्या हो जाता। 

हाँ लाली, सबसे बड़ा सहारा तो वही है। रुपया, जमीन, मकान भी जरूरी है पर इंसानियत के बाद। दुनिया में सब तरह के इंसान हैं, जरुरतमंद भी और धोखेबाज़ भी, इसलिए परखना भी आना चाहिए। 

इसी बीच अंबिका चाय का थरमस लेकर भीतर आई। उसे देखते ही सुनीता ने उसे बाँहों में भरते हुए कहा –

देखा अम्मा, हमारी मुन्ना कितनी बड़ी डाक्टर बन गई है, हमारे घर का हीरा है ये। 

बेटी की बात सुनकर अम्मा केवल मंद मंद मुस्कुरा रही थी। 

करुणा मलिक 

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