हवेली के आँगन में रखी वह पुरानी संदूकची पिछले पैंतीस वर्षों से बंद थी।
उस पर जंग लगे पीतल का ताला था और ताले के ऊपर लाल रंग से किसी ने बहुत पहले लिख दिया था—
“घर की मर्यादा।”
नंदिनी ने बचपन से उस संदूकची को देखा था। घर की औरतों के लिए वह किसी रहस्य से कम नहीं थी। दादी उसके पास से गुजरते हुए हमेशा अपनी आवाज धीमी कर लेतीं। माँ कभी उसके बारे में पूछने पर कह देतीं—
“कुछ चीजें जितनी बंद रहें, उतना ही अच्छा होता है।”
नंदिनी को यह बात कभी समझ नहीं आई।
वह शहर में पली-बढ़ी थी। पढ़ी-लिखी थी और अपने फैसले खुद लेने की आदत थी। लेकिन शादी के बाद जब वह ससुराल की इसी पुश्तैनी हवेली में आई तो उसे लगा जैसे वह केवल घर में नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों पुराने नियमों के बीच आ गई है।
घर में बहुत कुछ अच्छा था। बड़े-बुजुर्गों का स्नेह था, परिवार की एकजुटता थी, त्योहारों की रौनक थी।
लेकिन कुछ नियम ऐसे थे जिनका कोई कारण किसी को मालूम नहीं था।
शाम के बाद बहुएँ छत पर नहीं जाती थीं।
घर की औरतें अकेले मायके नहीं जाती थीं।
किसी बहू को परिवार की संपत्ति से जुड़े कागज देखने की अनुमति नहीं थी।
और सबसे बड़ा नियम—
परिवार की कोई बहू अपने नाम से जमीन नहीं खरीदेगी।
नंदिनी को यह नियम अजीब लगा।
एक दिन उसने अपने पति समीर से पूछा, “आखिर क्यों?”
समीर ने कंधे उचका दिए।
“दादी की इच्छा है। हमारे यहाँ से ऐसा ही होता आया है।”
“लेकिन कारण?”
“पता नहीं।”
नंदिनी हँस दी।
“मतलब हम एक ऐसा नियम निभा रहे हैं जिसका कारण किसी को मालूम ही नहीं?”
समीर ने बात बदल दी।
लेकिन नंदिनी के मन में प्रश्न रह गया।
कुछ महीनों बाद परिवार में दादी की तबीयत बिगड़ गई।
एक शाम उन्होंने नंदिनी को अपने कमरे में बुलाया।
“वह संदूकची देखी है?”
नंदिनी चौंक गई।
“जी।”
“कल उसे खोलना।”
“मैं?”
दादी ने सिर हिलाया।
“हाँ। केवल तुम।”
नंदिनी कुछ समझ नहीं पाई।
अगले दिन दादी नहीं रहीं।
तेरहवीं के बाद जब घर के लोग अपने-अपने काम में लग गए, नंदिनी उस संदूकची के सामने जा खड़ी हुई।
समीर भी उसके साथ था।
“दादी ने कहा था इसे खोलना है,” नंदिनी ने कहा।
समीर ने ताले को देखा।
“चाबी?”
नंदिनी ने दादी के तकिए के नीचे से मिली छोटी-सी चाबी निकाली।
ताला खुल गया।
संदूकची में न गहने थे, न पुराने कपड़े।
उसमें दर्जनों कागज थे।
पुराने पत्र।
जमीन के दस्तावेज।
और सबसे ऊपर रखी एक डायरी।
डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था—
“जिस दिन घर की बहू यह डायरी पढ़ेगी, उस दिन शायद यह बंधन समाप्त हो जाएगा।”
नंदिनी के हाथ काँप गए।
उसने पढ़ना शुरू किया।
डायरी उसकी परदादी कमला देवी की थी।
लगभग पचास साल पहले इस परिवार में एक बड़ी जमीन थी। परिवार के पुरुष उस जमीन को बेचकर शहर में व्यापार शुरू करना चाहते थे। लेकिन कमला देवी ने विरोध किया था।
वह जमीन उनके पति ने नहीं, बल्कि उनकी माँ ने उन्हें अपने मायके से दी थी।
कमला देवी ने कहा था—
“यह जमीन मेरे नाम है। इसे मैं बिना अपनी इच्छा के नहीं बेचूँगी।”
परिवार में इसे उस समय विद्रोह माना गया।
बाद में कमला देवी के पति ने परिवार के सामने एक नियम बनाया—
“इस घर की कोई बहू कभी अपने नाम जमीन नहीं रखेगी, ताकि घर की संपत्ति घर से बाहर न जाए।”
लेकिन डायरी में सच्चाई कुछ और थी।
कमला देवी ने जमीन बचा ली थी।
और उसी जमीन पर बने छोटे-से हिस्से में उन्होंने गाँव की लड़कियों के लिए सिलाई और पढ़ाई का केंद्र शुरू किया था।
उन्होंने लिखा था—
“मुझे डर था कि अगर यह जमीन मेरे बाद किसी पुरुष के नाम चली गई तो लड़कियों के लिए बनाया मेरा यह छोटा संसार खत्म हो जाएगा। इसलिए मैंने कागज अपनी छोटी बहू के नाम कर दिए।”
नंदिनी ने अगला पन्ना पलटा।
वहाँ लिखा था—
“मैंने घर की औरतों को बाँधने के लिए यह नियम नहीं बनाया था। मैंने तो अपनी अगली पीढ़ी को यह समझाने के लिए बनाया था कि संपत्ति केवल पुरुषों की चीज नहीं होती। लेकिन समय के साथ मेरी बात का अर्थ ही बदल दिया गया।”
नंदिनी देर तक डायरी देखती रही।
समीर भी स्तब्ध था।
“तो दादी इतने वर्षों से…”
“शायद इसी दिन का इंतजार कर रही थीं,” नंदिनी ने धीरे से कहा।
डायरी के अंतिम पन्ने पर एक और बात लिखी थी—
“जिस दिन घर की कोई बहू बिना डर के यह पूछ सके कि ‘यह नियम क्यों है?’ समझना कि घर बदलने के लिए तैयार है।”
नंदिनी ने डायरी बंद कर दी।
उस रात उसने परिवार के सभी सदस्यों को बुलाया।
बैठक में चाचा, ताऊ, समीर, उसकी माँ और परिवार के दूसरे लोग बैठे थे।
नंदिनी ने संदूकची से कागज निकाले।
“यह जमीन कमला परदादी की थी। और उन्होंने इसे लड़कियों की पढ़ाई के लिए रखा था।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
समीर की माँ की आँखें भर आईं।
“मुझे तो हमेशा बताया गया कि घर की औरतों को संपत्ति से दूर रखना परंपरा है।”
नंदिनी ने कहा, “परंपरा अगर अपना कारण खो दे तो वह बंधन बन जाती है।”
ताऊजी ने पहली बार सिर उठाकर पूछा, “अब तुम क्या करना चाहती हो?”
“वही जो परदादी चाहती थीं।”
“क्या?”
“उस जमीन पर फिर से लड़कियों के लिए पढ़ाई और हुनर का केंद्र शुरू करना।”
कुछ लोग चुप रहे।
कुछ ने विरोध किया।
लेकिन इस बार नंदिनी अकेली नहीं थी।
समीर उसके साथ खड़ा था।
और सबसे बड़ी बात—घर की वे औरतें, जिन्होंने वर्षों तक उस नियम को बिना प्रश्न स्वीकार किया था, पहली बार उसके पक्ष में बोल रही थीं।
कुछ महीनों बाद हवेली के पुराने हिस्से की मरम्मत शुरू हुई।
वहीं एक छोटा-सा केंद्र बना।
दीवार पर एक तस्वीर लगाई गई—कमला देवी की।
नीचे लिखा था—
“बंधन वह नहीं जो जिम्मेदारी सिखाए।
बंधन वह है जो प्रश्न पूछने से रोक दे।”
उद्घाटन के दिन नंदिनी ने उसी पुरानी संदूकची को सामने रखा।
अब उस पर नया ताला नहीं था।
उसने उसकी चाबी उठाकर घर की सबसे छोटी बच्ची के हाथ में रख दी।
बच्ची ने पूछा, “चाची, यह किसकी चाबी है?”
नंदिनी मुस्कुराई।
“उस दरवाजे की, जो बहुत सालों से बंद था।”
“उसके अंदर क्या है?”
नंदिनी ने उसकी हथेली बंद करते हुए कहा—
“हमारी आजादी।”
आँगन में खड़ी बुजुर्ग महिलाएँ एक-दूसरे का चेहरा देख रही थीं।
किसी की आँखों में आँसू थे, किसी के चेहरे पर मुस्कान।
नंदिनी ने हवेली की ओर देखा।
उसे लगा जैसे दीवारें वही हैं, आँगन वही है, दरवाजे वही हैं।
बस घर बदल गया है।
क्योंकि कभी-कभी बंधन लोहे की जंजीरों से नहीं बनते।
वे ‘ऐसा ही होता आया है’ जैसे छोटे-से वाक्य से बनते हैं।
और उन्हें तोड़ने के लिए किसी बड़े विद्रोह की नहीं, केवल एक सवाल की जरूरत होती है—
“लेकिन क्यों?”
उस दिन नंदिनी को समझ आया कि सबसे कठिन बंधन वह नहीं होता जिससे निकलने का रास्ता बंद हो।
सबसे कठिन बंधन वह होता है जिसे हम परंपरा समझकर पीढ़ियों तक ढोते रहते हैं।
और सबसे बड़ी मुक्ति?
उस बंधन को पहचान लेना।
स्वरचित, मौलिक व अप्रकाशित रचना,
लक्ष्मी कनोडिया ‘अनिका’
खुर्जा, उत्तर प्रदेश