‘कुछ नहीं कर पाएगा नालायक! जब भी पी टीएम में जाता हूं तो रिपोर्ट कार्ड देखकर मुंह लटकाए चला आता हूं। इस लड़के को तो शर्म नाम की कोई चीज ही नहीं !अब इन्हें बाइक चाहिए। जितनी मेरी तनख्वाह है ,उसी में ना अपनी गृहस्थी चलाऊंगा। तुम्हारे लिए चोरी- बाजारी तो नहीं करूंगा न! अरे माधुरी, कुछ तो समझा आपने शहजादे को! बेटी बड़ी हो रही,
सब तुम्हारी गलती है माधुरी ,तूने इसे सर पर चढ़ा रखा है। टेंशन से सर फटता रहता है कि कैसे सब जुगाड़ हो पायेगा।लेकिन किसी को मेरी रत्तीभर फिक्र नहीं।खटता रहूं,कोल्हू की बैल की तरह। सब तुम्हारी गलती है माधुरी! तूने ही इसे सर पर चढ़ा रखा है। कुछ तो सीखा कर ऋतिक से, जो हमेशा अब्बल आता है और तुम ??हमेशा मेरा सर नीचा ही रखते।’
रामानंद बाबू सर पड़कर धम्म से सोफे पर बैठ गए। बेटी सौम्या जो किशन से छोटी है, पापा के बगल में जा खड़ी हुई और कहा, ‘पापा इतना गुस्सा मत कीजिए तबीयत खराब हो जाएगी। अभी मैं बढ़िया सा चाय पिला रही हूं।’कह कर रसोई घर की तरफ चली गई।
मां -बेटा बहुत देर तक खामोश बैठे रहे। कुछ देर बाद मां किशन के पास बैठ सर को सहलाते हुए प्यार से कहा, ‘क्यों जिद्द करते हो बेटा, अब तुम कॉलेज के स्टूडेंट हो,
तुम्हें समझदारी तो होनी चाहिए अब !कैसे दे पाएंगे बाइक!तुम पढ़ लिखकर इस काबिल बन जाओ कि बाइक तो क्या, कार खरीद सको।पापा कैसे-कैसे घर को चला रहे। कंपनी भी घाटे में चल रही, सैलरी पहले से भी कम हो गई है ।’बेटा यूं खामोश बैठा रहा ।कुछ देर बाद बिना कुछ कहे घर से बाहर निकल गया।
अगले दिन रक्षा-बंधन था।बहन ने भाई को राखी बांधा। मां ने 500 का नोट किशन को देते हुए कहा ,’ले बहन को शगुन दे दे।बहन को नोट पकड़ाते हुए किशन ने कहा,’ये ले।एक दिन तुम्हारा भैया बहुत
बढ़िया गिफ्ट देगा।’
पापा की बातें हर पल किशन के दिलों -दिमाग पर प्रहार कर रहे थे। जिसकी चोट से वह आहत होते रहता था ।अपने ऊपर उसे ग्लानी होते रहती थी।
एक सुबह बिना बताए घर छोड़कर भाग निकला। सभी जहां-तहां उसे ढूंढे लेकिन वह नहीं मिला। पापा अपने आप को कोसते रहते थे
कि मेरी वजह से मेरा बेटा हमसे दूर चला गया ।मां बेजान- सी हो गई थी ।बहन की आंखें हमेशा दरवाजे पर टिकी रहती थी। हर एक आहट पर दौड़ कर जाती, कहीं मेरा भैया तो नहीं आया। बरसों गुजर गए लेकिन किशन का कहीं कोई अता-पता नहीं मिला।समय कब रुकता है भला!देखते-देखते पांच साल हो गए।
एक दिन बनारस की गली में किशन और तरुण का आमना-सामना हुआ। दोनों चौक गए। तरुण तपाक से बोला,’किशन तुम यहां?’ किशन कुछ बोलता,उसके पहले तरुण एक सूर में बोलने लगा….’क्या तुम्हें अपने मां-बाप और बहन पर रत्तीभर भी तरस नहीं आयी?अंकल तुम्हारे जाने के बाद बीमार रहने लगे हैं।
आंटी तो कंकाल हो गई हैं।सौम्या अपने दिल पर पत्थर रख दोनों और खुद को संभाल रही है। ‘ किशन चुपचाप सुनता रहा और उसकी आंखों से झर- झर आंसू बहे जा रहे थे….।’अरे हां, पता है,तुम्हारी बहन की शादी इसी साल नवम्बर में है।’क्या?? मेरी बहन बड़ी हो गई और उसकी शादी भी हो रही !’हां यार ! तुम्हारे लिए बहुत रो रही थी,जब मैं गया था।अब मैं चलता हूं।’कहां?’किशन उसकी हाथ पकड़ पूछा।
‘अरे हां,बताना भूल गया।कल रक्षा-बंधन है न,मैं अपनी दीदी के यहां आया हूं।’किशन चौंका।’क्या कहा,कल ही रक्षा-बंधन है?’किशन रो पड़ा।तरुण उसे अपने आलिंगन में भींच लिया और कहा,’अब कुछ मत सोच यार!चला जा अपने घर। ‘हां तरुण, मैं जरुर जाऊंगा। ‘ कहते हुए वह अपने आंसू पोछने लगा।
‘ये तो मैंने पूछा ही नहीं कि तुम यहां कर क्या रहे?’तरुण ने पूछा। ‘बताता हूं।’किशन ने कहा। तुम्हें तो पता है कि पढ़ाई में मेरा जरा भी मन नहीं लगता था।खींच – खाच कर जैसे-तैसे पास कर जाता था।घरवालों को कभी खुश नहीं कर पाया।पापा की बात से आहत हो एक सुबह बिन बताए घर से निकल गया।सीधे स्टेशन की ओर भागा और एक ट्रेन में जा बैठा।
मुझे नहीं पता था कि ट्रेन कहां जा रही और मुझे जाना कहां है।कब आंखे लग गई पता नहीं चला।नींद खुली तो वह बनारस था।मैं वहीं उतरा और अपने धुन में चला जा रहा था।बहुत दूर निकल जाने के बाद, एक मंदिर के पास चबूतरे पर बैठ टेक लगा सोचता रहा…।कुछ देर बाद
आंखें बंद कर..
‘दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समांई काहे को दुनिया बनाई…..’गाना गाने लगा।
जैसे ही गाना खत्म हुआ ,तालियों की गड़गड़ाहट से मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा। ‘
‘अरे! तुम कहां रहते हो भाई? क्या गजब गाते हो!तुम मेरे गाने के एल्बम के लिए गाओगे? ‘मैं उनकी बात सुन हक्का-बक्का हो गया।मैनें ईमानदारी से भाग कर आने का वृतांत कह डाला।वे मुझे अपने साथ रख लिए। जब मेरा पहला एल्बम निकला तो धमाल हो गया!धीरे-धीरे मेरा एल्बम निकलने लगा और मेरी कमाई होने लगी। तब से मैं यही काम कर रहा हूं
जिसकी बदौलत आज मेरे पास गाड़ी, बंगला सबकुछ है।मैं भी अकेले में बहुत रोता हूं। ऐसा नहीं ,मैं घर नहीं जाता, पर अभी नहीं जाता।जब तुमने रक्षा-बंधन की याद दिलाई तब तो मैं जरुर जाउंगा।’दोनों गले मिले और चल दिए। किशन आनन-फानन अपने घर को चल दिया।
रक्षा-बंधन की सुबह अपने घर पहुंचा। दरवाजे पर खामोशी पसरी थी।धड़कते दिल से दरबाजा खटखटाया।दरबाजा खुली,…मां-पापा को सामने देख लिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा।कहा,’मुझे माफ कर दें।मैंने आपसबों को बहुत कष्ट दिया।’
तीनों रोते एक-दूसरे को संभालते सामान्य हुए। ‘सौम्या कहां है मां!’किशन ने पूछा। रोते हुए मां ने कहा,’पीछे कमरे में है बेटा!हर साल की तरह आज भी थाल सजा कर बैठी है कि मेरा भैया जरुर आयेगा…।’किशन लपककर पीछे कमरे की ओर भागा।देखा,टेबल पर उसकी फोटो रखी है।
सामने राखी और मिठाई से सजी थाल…।एकटक फोटो देख रोये जा रही है।किशन दबे पांव पीछे से उसके कंधे पर हाथ रखा।सौम्या ने चौंक पलटकर पीछे देखा और लिपटकर जोर-जोर से रोने लगी।
किशन उसे कलेजे से लगाते हुए कहा,’ मैं तुम्हें कैसे छोड़ सकता हूं पगली!!मैं भी रोज रोता था….लेकिन मुझे कुछ बनकर आना था।चल उठ, राखी बांध!आज हमारा दिन है..भाई-बहन का दिन रक्षा-बंधन…अटूट-बंधन!!!’सौम्या ने राखी बांधा,मिठाई खिलाई।
‘अच्छा,अब मेरे साथ आ।’हाथ पकड़ बाहर ले गया।चाभी देते हुए कहा,’देख तुम्हारा गिफ्ट!’सामने सफेद रंग की चमचमाती कार खड़ी थी।सभी के मुंह खुले के खुले रह गए…।’सुन इसी कार से तुम्हारी विदाई भी करुंगा।तरुण ने मुझे सबकुछ बता दिया है।मेरी बहना दुल्हनिया बनने वाली है!अब मैं तुम्हारी शादी करके ही जाउंगा।’सौम्या भैयाऽऽऽ’ कह लिपट गई।
मां-पापा यह दृश्य देख गद -गद हो रहे थे….
स्वरचित
संगीता श्रीवास्तव
लखनऊ