“मम्मी, आप ये ड्रेस ले लीजिए…” काव्या ने दुकान में रखी हल्के नीले रंग की खूबसूरत ड्रेस उठाकर अपनी सास रूपा की तरफ बढ़ा दी।
रूपा ने ड्रेस को देखा और फिर अपनी बहू को प्यार भरी नजरों से देखते हुए बोलीं,
“लेकिन बेटा, मैं तो सिर्फ साड़ी पहनती हूँ… ड्रेस नहीं।”
“तो क्या हुआ मम्मी? आज से ड्रेस भी पहनिए।”
“लेकिन बेटा… मेरी उम्र में ड्रेस थोड़ी अच्छी लगेगी?”
काव्या हँस पड़ी।
“आपकी उम्र की सभी औरतें ड्रेस पहनती हैं। और वैसे भी आपको कौन-सी अपनी उम्र से ज्यादा दिखना है? आप तो वैसे ही बहुत सुंदर हैं।”
रूपा के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।
“लेकिन दादी को पसंद नहीं आएगा।”
इतना सुनते ही काव्या का चेहरा गंभीर हो गया।
“मम्मी, … आज आपको अपनी पसंद की ड्रेस पहननी है।”
“काव्या…”
“मैं कुछ नहीं सुनना चाहती। आप ये ड्रेस पहनेंगी।”
रूपा कुछ कहती, उससे पहले काव्या ने ड्रेस उनके हाथ में रख दी।
छह महीने पहले ही काव्या इस घर की बहू बनकर आई थी। आरंभ इस घर का इकलौता बेटा था और काव्या उसकी पत्नी।
लेकिन इन छह महीनों में काव्या और रूपा का रिश्ता सास-बहू से कहीं आगे निकल चुका था।
काव्या जब पहली बार इस घर में आई थी, तब उसे सबसे ज्यादा डर अपनी सास से नहीं बल्कि दादी से लगा था।
दादी इस घर की सबसे बड़ी थीं। उनके लिए घर की बहू का मतलब था, सुबह जल्दी उठना, सिर पर पल्लू रखना, साड़ी पहनना और परिवार के हर सदस्य की पसंद का ध्यान रखना।
लेकिन रूपा ने कभी काव्या को बहू की तरह नहीं देखा।
“बेटा, थक गई हो तो आराम कर लो।”
“बेटा, आज खाना बनाने का मन नहीं है तो बाहर से मंगा लेते हैं।”
“तुम्हें जो पहनना अच्छा लगे, पहनो।”
और शायद इसी वजह से काव्या के मन में रूपा के लिए सास का नहीं, मां का स्थान बन गया था।
आज भी वह अपनी सास के लिए ड्रेस लेकर आई थी।
शाम को जब दोनों घर लौटीं तो दादी की नजर सबसे पहले काव्या के हाथ में पकड़े बैग पर गई।
“क्या लाई हो?”
काव्या ने मुस्कुराकर कहा,
“दादी, मम्मी के लिए ड्रेस।”
दादी के चेहरे के भाव बदल गए।
“ड्रेस?”
उनकी नजर रूपा पर गई।
“तुम पहनोगी?”
रूपा ने नजरें झुका लीं।
“मैंने तो मना किया था… काव्या ही जिद कर रही है।”
दादी ने काव्या की तरफ देखा।
“बहू को बहू ही रहने दो। इस उम्र में ये सब अच्छा नहीं लगता। हमारे घर की औरतों ने कभी ड्रेस नहीं पहनी।”
कुछ पल के लिए घर में सन्नाटा छा गया।
काव्या ने पहली बार महसूस किया कि रूपा के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई थी।
वह कुछ कहना चाहती थीं, लेकिन वर्षों की आदत ने उनके शब्दों को होंठों तक आने से रोक दिया।
काव्या ने धीरे से उनका हाथ पकड़ लिया।
“मैं भी तो बहू हूं! लेकिन मुझ पर तो ऐसा कोई बंधन नहीं है!”
दादी जी ने तुनक कर जवाब दिया,
“तु ऑफिस जाती है इसलिए तुझे ऐसे कपड़े पहनने की आजादी है। लेकिन ये तो घर में ही रहती है!”
रूपा की आँखों के कोर गीले हो गए।
“मम्मी, कमरे में चलिए।”
कमरे में पहुंचकर रूपा ने ड्रेस वापस बैग में रखने की कोशिश की।
“रहने दे बेटा। दादी ठीक कहती हैं।”
“नहीं मम्मी।”
“क्यों बेटा?”
“क्योंकि आपने जिंदगी भर दूसरों की पसंद के कपड़े पहने हैं। कभी सोचा है आपने कि आपको क्या पसंद है?”
रूपा चुप रहीं।
काव्या ने उनकी अलमारी खोली। साड़ियों की कतार लगी थी।
एक जैसी साड़ियां… एक जैसे रंग… एक जैसी तहे।
काव्या ने पूछा,
“इनमें आपकी पसंद की कौन-सी है?”
रूपा ने बहुत देर तक अलमारी को देखा। फिर धीमे से बोलीं,
“पता नहीं बेटा।”
“पता नहीं?”
“जब शादी हुई थी तब तुम्हारे पापा जी को साड़ी पसंद थी। तुम्हारी दादी को भी मैं साड़ी में ही पसंद थी। फिर आरंभ छोटा था… उसके सामने भी साड़ी ही पहनती रही। धीरे-धीरे मुझे लगा कि मेरी पसंद नाम की कोई चीज है ही नहीं।”
काव्या की आंखें भर आईं।
“मम्मी… यही तो है वो बंधन।”
रूपा ने उसकी तरफ देखा।
“कैसा बंधन?”
“वो बंधन जिसमें औरत के शरीर पर कपड़े बदलते रहते हैं, लेकिन उसकी पसंद कभी नहीं बदलने दी जाती।”
रूपा की आंखों से आंसू बह निकले। काव्या ने ड्रेस उनके हाथ में थमा दी।
“आज आप इसे पहनेंगी। किसी को खुश करने के लिए नहीं… सिर्फ इसलिए क्योंकि आपको अच्छा लगता है।”
कुछ देर बाद कमरे का दरवाजा खुला। रूपा बाहर आईं।
हल्की नीली ड्रेस में वह खुद को आईने में देखकर जैसे वर्षों बाद मुस्कुराई थीं।
काव्या उनके पास आई और बोली,
“देखा मम्मी… कितनी सुंदर लग रही हैं!”
दादी भी वहीं बैठी थीं। उन्होंने रूपा को कुछ देर देखा।
फिर अचानक बोलीं,
“बहुत सुंदर लग रही हो।”
रूपा ने हैरानी से उनकी ओर देखा। दादी मुस्कुराईं।
“शायद गलती मेरी थी। मैंने भी अपनी जिंदगी में कभी ये नहीं सोचा कि मुझे क्या पहनना है… बस वही पहना जो घरवालों ने कहा।”
काव्या ने दादी के पास जाकर उनका हाथ पकड़ लिया।
“तो दादी… अब आप भी अपनी पसंद की चीज पहनिए।”
दादी हँस पड़ीं।
“इतनी जल्दी मुझे भी बिगाड़ देगी क्या?”
पूरा घर हँसी से भर गया।
रूपा ने काव्या को गले लगा लिया।
“तू बहू बनकर आई थी… लेकिन बेटी बन गई।”
काव्या ने उनकी आंखों में देखते हुए कहा,
“नहीं मम्मी… मैं आपकी बेटी नहीं बनी। आपने मुझे बेटी मानकर ये रिश्ता बनाया है।”
और उस दिन उस घर में सिर्फ एक ड्रेस नहीं बदली थी, बदल गई थी एक सोच।
वर्षों से चली आ रही पहनावे की परंपरा में आजादी मिल गई थी।
शायद यही बंधन था…..और शायद इस बंधन को तोड़ने के लिए किसी बड़े विद्रोह की नहीं…सिर्फ एक छोटी-सी बेटी जैसी बहू की जरूरत थी।
रेखा जैन
अहमदाबाद, गुजरात
#ये कैसा बंधन