जैसे ही डोरबेल बजी, निमित्त तेज़ी से उठा और दरवाज़े की तरफ दौड़ पड़ा। जब तक उसकी पत्नी वाणी किचन से निकल आई, उसने दरवाजा खोल दिया था। बाहर दरवाज़े पर डाकिया खड़ा था। उसने तुरंत उसके हाथ से लिफ़ाफ़ा लिया और उसे वहीं दरवाज़े पर खड़े-खड़े लिए खोल दिया, मानो उससे सब्र ही नहीं हो रहा हो।
ये सब देखकर नई-नवेली वाणी को बहुत अचंभा हो रहा था। वह निमित्त जो बार-बार बेल बजने पर अपनी जगह से हिलता नहीं था, आज दौड़कर दरवाजा खोल रहा था और लिफ़ाफ़ा खोलने की इतनी जल्दबाज़ी कि डाकिया के जाने का भी इंतज़ार नहीं कर सका।
आखिर ऐसा है क्या इसमें जो निमित्त इसे खोलने के लिए इतना बेसब्र हुआ जा रहा है? ये सोचकर वो वहीं खड़ी होकर लिफ़ाफ़े की ओर देखने लगी। लिफ़ाफ़े के खुलते ही उसके अंदर से एक सुंदर सी राखी निकली।
राखी देखते ही निमित्त का चेहरा खुशी से खिल उठा और वाणी बुरी तरह चौंक गई।
“राखी, ये किसकी राखी है? दोनों दीदी तो पहले ही राखी भेज चुकी हैं और निमित्त की दूर-दूर तक रिश्ते की कोई और बहन है नहीं, तो ये राखी किसने भेजी?”
अभी वो ये सोच ही रही थी कि निमित्त की आवाज़ उसके कानों में पड़ी— “वाणी, जल्दी चलो। कान्हा जी को राखी चढ़ाने के बाद पंडित जी से राखी भी बंधवानी है।”
ये सुनते ही वाणी तुरंत अपनी सोच से बाहर आई और पूजा की थाली लेकर निमित्त के साथ मंदिर की ओर चल पड़ी।
सुबह से ही वाणी कई बार निमित्त से चलकर पंडित जी के पास मंदिर चलने के लिए बोल चुकी थी, क्योंकि इस बार उसकी दोनों ननदें किसी कारणवश राखी पर नहीं आ पा रही थीं। लेकिन निमित्त कभी कुछ बहाना बनाकर टाले जा रहा था, और अब जैसे ही लिफ़ाफ़े वाली राखी आई, वो तुरंत मंदिर की ओर चल पड़ा।
गाड़ी में बैठते ही वाणी निमित्त की ओर देखते हुए बोली— “निमित्त, ये राखी किसकी है? दोनों दीदी तो पहले ही राखी भेज चुकी हैं।”
ये सुनते ही निमित्त ने उसकी ओर देखा और शांत स्वर में बोला— “ये राखी मेरी सबसे छोटी बहन की है।”
“पर तुम्हारी तो दो बड़ी बहनें हैं, फिर ये तीसरी…?”
“सब बताऊंगा। पहले राखी बंधवा लेते हैं। मंदिर आ गया।”
मंदिर पहुँचकर कान्हा को राखी चढ़ाने के बाद निमित्त ने पंडित जी से अपनी दोनों बड़ी बहनों की राखी के साथ वह लिफ़ाफ़े वाली राखी भी अपनी कलाई पर बंधवा ली।
“वाणी, मेरी एक तस्वीर ले लो ना।” उसके ये कहते ही वाणी ने राखी बंधी कलाई के साथ उसकी प्यारी सी तस्वीर ले ली।
मंदिर से निकलते ही निमित्त ने गाड़ी घर के बजाय बाज़ार की ओर घुमा दी। “निमित्त, अब घर की बजाय बाज़ार क्यों जा रहे हैं?” वाणी ने आश्चर्य से पूछा।
“अभी पता चल जाएगा।” उसने गाड़ी एक फ़ोटो स्टूडियो के बाहर रोक दी। ये देखकर वाणी चौंक गई और निमित्त के पीछे-पीछे स्टूडियो के अंदर चली गई।
अंदर जाते ही निमित्त ने वाणी द्वारा मंदिर में खींची गई तस्वीरें दिखाते हुए कहा—
“भैया, मुझे इसकी दो कॉपी चाहिए।”
“शाम को 6:00 बजे मिल जाएगी।”
“ज़रूरी है, अभी चाहिए।”
“अभी चाहिए तो 100 रुपये एडवांस लगेगा। 10 मिनट में मिल जाएगी।”
ये सुनते ही निमित्त तुरंत तैयार हो गया। 10 मिनट बाद जैसे ही तस्वीर उसके हाथ आई, वो तुरंत कूरियर कंपनी के दफ़्तर पहुँचा और उस लिफ़ाफ़े वाले पते पर अपनी वो तस्वीर कूरियर कर दी।
ये सब देखकर वाणी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। कूरियर कंपनी के दफ़्तर से निकलकर निमित्त ने जैसे ही गाड़ी घर की ओर मोड़ी, वाणी का सब्र जवाब दे गया।
“निमित्त, तुम मुझे बताओगे ये सब क्या चल रहा है? राखी, तस्वीर, कूरियर… क्या है ये?”
ये सुनते ही निमित्त ने गहरी साँस ली— “वाणी, ये राखी मिली ने भेजी है। आज से दस साल पहले जब मैं हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहा था, एक बार मुझे कोचिंग से लौटने में कुछ देर हो गई। मेरा हॉस्टल थोड़े सुनसान इलाके में पड़ता है। मैं तेज़ी से कदम बढ़ाते हुए जा रहा था तभी मेरे कानों में एक लड़की के चिल्लाने की आवाज़ आई।”
“जब मैं आवाज़ की दिशा में गया तो मैंने देखा एक लड़का 12-13 साल की मिली के साथ ज़बरदस्ती करने की कोशिश कर रहा था। उसके कपड़े जगह-जगह से फट चुके थे और उसकी हालत बहुत खराब थी। ये देखकर मेरा खून खौल उठा। मैंने उस लड़के की बहुत पिटाई की, जिससे वह वहाँ से भाग निकला।”
“घबराई हुई मिली ‘भैया’ कहकर मुझसे लिपट गई। मैं उसे डॉक्टर के पास ले गया और मरहम-पट्टी के बाद उसे उसके घर छोड़ दिया। लेकिन उसने मुझसे वादा लिया कि दो दिन बाद रक्षाबंधन वाले दिन मैं उससे हॉस्टल के बगल वाले मंदिर में राखी बंधवाने ज़रूर आऊँगा।”
“ठीक दो दिन बाद जब मैं मंदिर पहुँचा तब मिली वहाँ राखी लेकर मेरा इंतज़ार कर रही थी। मुझे देखते ही दौड़कर मेरे पास आई और मेरे हाथ पर राखी बाँधते हुए बोली—
‘जिस प्रकार कान्हा ने द्रौपदी की लाज बचाई थी, उसी प्रकार आपने साक्षात् कान्हा स्वरूप उस दिन मेरी लाज बचाई। इसीलिए आप मेरे कान्हा स्वरूप हैं। अब से हर रक्षाबंधन मैं कान्हा के साथ आपको भी राखी ज़रूर बाँधूँगी।’
इतना ही नहीं, निमित्त यादों में खोते हुए बोला “राखी बँधवाकर जब मैंने उसे शगुन देना चाहा तो उसने लिफ़ाफ़ा वापस मुझे देते हुए कहा था—
”भैया, मुझे मेरा शगुन तो आप उसी दिन दे चुके हैं मेरी रक्षा करके। अब तो बस मुझे आपकी सलामती चाहिए। अब से मैं हर रक्षाबंधन में आपको राखी भेजूँगी और आप मुझे शगुन के तौर पर अपनी राखी बँधी कलाई के साथ अपनी तस्वीर भेजना, ताकि मुझे तसल्ली हो सके कि आप ठीक हैं। लेकिन भैया, आप फोटो डाक से ही भेजना क्योंकि मोबाइल की फोटोज तो एक स्क्रॉल से ही खो जाती हैं, पर हाथों से छूकर महसूस करने वाली तस्वीर में अपनेपन और दुआओं की खुशबू होती है।’”
ये कहकर वो मेरा एड्रेस लेकर मेरे पैर छूकर वहाँ से चली गई। तब से इस बात को 10 साल बीत गए हैं। उस दिन के बाद से ना हम कभी नहीं मिले और ना ही कभी एक दूसरे से बात की। लेकिन ना तो वह हर रक्षाबंधन पर राखी भेजना भूलती है और ना मैं उसे अपनी फोटो।”
फिर वाणी की ओर देखते हुए निमित्त गहरी सांस लेकर बोला “तुम्हें विश्वास नहीं होगा लेकिन हम दोनों के पास एक दूसरे का मोबाइल नंबर भी नहीं है। वह जिस एड्रेस से मुझे राखी भेजती हैं। मैं उसी पर अपनी फोटो भेज देता हूॅं। बस यही एक धागा है जिसने हम दोनों को पिछले दस साल से एक दूसरे से बाँध रखा है।”
ये सुनकर वाणी चुप हो गई। उसकी आँखों से आँसू बह गए। वह सोचने लगी— ये कैसा बंधन है, निःस्वार्थ, अद्भुत, अप्रतिम!
इसी तरह साल बीतते गए। अब निमित्त की शादी को भी 20 साल बीत चुके थे। पर मिली के राखी भेजने और निमित्त के तस्वीर भेजने का सिलसिला अनवरत जारी रहा।
बस एक चीज़ बदली थी— अब निमित्त के साथ-साथ वाणी को भी बेसब्री से मिली की राखी का इंतज़ार रहता और अब उस तस्वीर में निमित्त के साथ वाणी भी शामिल हो गई थी।
***
फिर एक साल रक्षाबंधन से ठीक एक दिन पहले एक भयानक हादसा हो गया।
ऑफिस से लौटते वक्त निमित्त की कार का जोरदार एक्सीडेंट हो गया। गंभीर रूप से घायल निमित्त को अस्पताल में एडमिट कराया गया।
निमित्त कोमा में था। डॉक्टरों ने उसे चार-पांच दिनों के कड़े ऑब्ज़र्वेशन में रखने के बाद साफ़ कह दिया कि सिर के अंदरूनी हिस्से में बना ब्लड क्लॉट बेहद नाज़ुक जगह पर है। हालत लगातार बिगड़ रही थी और अगले कुछ घंटे बहुत क्रिटिकल थे।
इधर अपने शहर में मिली खिड़की पर टकटकी लगाए बैठी थी। हर साल रक्षाबंधन के ठीक दूसरे या तीसरे दिन दोपहर को डाकिया आवाज़ देकर निमित्त की तस्वीर वाला लिफ़ाफ़ा दे जाता था। इस बार तीसरा दिन बीता, फिर चौथा दिन भी ढलने लगा।
आखिरकार मिली ने बेचैन होकर गली में रोज़ आने वाले डाकिए से अपनी डाक के बारे में पूछा।
डाकिए ने अपने थैले में देखते हुए सिर हिलाया— “नहीं बिटिया, आज भी आपके नाम की कोई डाक या कूरियर नहीं है।”
इतने सालों में ऐसा पहली बार हुआ था। मिली का दिल किसी गहरी अनहोनी की आशंका से काॅंप उठा।
बिना एक पल गंवाए वह तुरंत उस पते पर निकल पड़ी जिसपर वह हर साल राखी भेजती थी।
जब वह उस पते पर पहुँची, तो घर के दरवाज़े पर ताला लटका था और बाहर पायदान पर वही राखी का लिफ़ाफ़ा बिना खुला पड़ा था जो उसने भेजा था।
उसका कलेजा मुँह को आ गया। पड़ोसियों से पूछताछ करने पर पता चला कि तीन-चार दिन पहले निमित्त का भयानक एक्सीडेंट हुआ है और वह अस्पताल के आईसीयू में अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा है।
मिली बदहवास हालत में सीधे अस्पताल पहुँची। आईसीयू के बाहर रोती-बिलखती वाणी को देखकर उसने आगे बढ़कर उसका हाथ थाम लिया।
“भाभी…”
वाणी ने भीगी आँखों से उस अजनबी लड़की को देखा।
“भाभी, मैं मिली … भैया कैसे हैं?”
वाणी यह सुनकर उससे लिपटकर फूट-फूट कर रो पड़ी,
“मिली, डॉक्टर कह रहे हैं कि हालत बहुत नाज़ुक है… सिर का क्लॉट हटाने के लिए कोई बड़ा न्यूरोसर्जन चाहिए, पर यहाँ कोई रास्ता नहीं मिल रहा…”
“आप हौसला रखिए भाभी, जब तक उसकी बहन ज़िंदा है, भैया को कुछ नहीं हो सकता।”
उस दिन निमित्त ने जिस सहमी हुई बच्ची को बचाया था, आज वही मिली देश के एक प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान की कुशल और अनुभवी न्यूरोसर्जन बन चुकी थी।
मिली ने बिना एक क्षण गंवाए तुरंत अस्पताल के डायरेक्टर और मेडिकल बोर्ड से मुलाक़ात की। अपने क्रेडेंशियल्स और मेडिकल आई कार्ड दिखाते हुए उसने बिना देर किए निमित्त की उस बेहद जटिल सर्जरी की कमान खुद अपने हाथों में ले ली।
ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती जल उठी। कई घंटों चले ऑपरेशन के बाद जब मिली बाहर आई, तो उसने मास्क हटाकर भीगी आँखों से मुस्कुराते हुए कहा— “भाभी, भैया ख़तरे से बाहर हैं। क्लॉट पूरी तरह निकाल दिया गया है।”
यह सुनते ही पूरे परिवार ने राहत की सांस ली।
वाणी हाथ जोड़कर रुंधे गले से बोली, “मिली, तुमने आज निमित्त को दूसरा जीवन दिया है। हम तुम्हारा यह कर्ज़ जीवन भर कैसे चुकाएंगे?”
मिली की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “भाभी, कर्ज़ तो मैं उतार रही हूँ। अगर उस दिन भैया ने मुझे बचाया न होता तो शायद ये मिली आज आपके सामने जिंदा ही ना खड़ी होती। उन्होंने मुझे सम्मान और जीवन दिया था, उसी प्रेरणा ने मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं अपने भाई की साँसें वापस लौटा सकी हूॅं।”
कुछ हफ़्तों बाद जब निमित्त पूरी तरह स्वस्थ हो गया, तो उसके सामने उसकी दोनों बड़ी बहनें, वाणी और सफ़ेद कोट पहने मुस्कुराती हुई मिली खड़ी थी।
मिली ने आगे बढ़कर अपने भैया की कलाई पर वही राखी बांधी जो उस दिन अस्पताल पहुँचने से पहले वह घर के बाहर से उठा लाई थी।
वाणी ने अपने कैमरे से तस्वीर लेते हुए कहा, ” इस बार की तस्वीर सबसे ख़ास है।”
उस तस्वीर में मुस्कुराते हुए निमित्त के एक तरफ वाणी थी और दूसरी तरफ अपने डॉक्टर वाले कोट में निमित्त का हाथ थामे मिली खड़ी थी।
कमरे में मौजूद हर शख्स की आँखें नम थीं, और हर किसी के दिल में बस एक ही बात गूँज रही थी-
“ये कैसा बंधन है…
निःस्वार्थ, पवित्र, अलौकिक और अमर!”
धन्यवाद ।
साप्ताहिक कहानी प्रतियोगिता -#ये कैसा बंधन
शीर्षक- ये कैसा बंधन है!
लेखिका- श्वेताअग्रवाल
धनबाद, झारखंड