प्रायश्चित के आंसू

लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं था। जब स्वाति के पति नरेश और उसके ससुराल वालों को इस बात का पता चला, तो घर में तूफान आ गया। नरेश ने साफ शब्दों में कह दिया, “तुम पागल हो गई हो स्वाति? यह कोई खून देने जैसी छोटी बात नहीं है, यह एक बहुत बड़ा ऑपरेशन है। तुम्हारा अपना एक पांच साल का बच्चा है। कल को अगर ऑपरेशन के दौरान तुम्हें कुछ हो गया, तो मेरे बेटे का क्या होगा? और वैसे भी, तुम्हारे पिता ने कभी तुम्हारे लिए किया ही क्या है जो तुम अपनी जान दांव पर लगा रही हो? अगर तुम इस ऑपरेशन के लिए गईं, तो इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।”

शहर के सबसे बड़े अस्पताल के तीसरे माले पर स्थित ऑपरेशन थियेटर के बाहर का सन्नाटा ऐसा था, जैसे वक्त ने अपनी सांसें रोक ली हों। अस्पताल के गलियारे में फिनाइल और दवाओं की वह अजीब सी गंध तैर रही थी, जो इंसान को उसके बेबस होने का एहसास कराती है। रात के दो बज चुके थे, लेकिन रामस्वरूप जी की आंखों में नींद का एक कतरा भी नहीं था। उनके कदम मशीन की तरह बस एक दीवार से दूसरी दीवार तक नाप रहे थे। उनके माथे पर पसीने की बूंदें थीं और होंठ लगातार किसी अनजाने मंत्र का जाप कर रहे थे। पास ही रखी स्टील की ठंडी बेंच पर उनकी पत्नी सावित्री निढाल सी बैठी थीं, जिनकी आंखों से आंसुओं का बहना जैसे रुक ही नहीं रहा था। उनके हाथों में एक छोटी सी गीता थी, जिसे उन्होंने कसकर सीने से लगा रखा था। आज उस बंद दरवाजे के पीछे उनके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा, उनका इकलौता बेटा चिराग जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था। चिराग का लिवर ट्रांसप्लांट हो रहा था। लेकिन इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी हकीकत यह थी कि उस बंद दरवाजे के पीछे सिर्फ उनका बेटा ही नहीं, बल्कि उनकी बड़ी बेटी स्वाति भी थी। वही स्वाति, जिसे अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा देकर, आज अपने भाई को नई जिंदगी देने के लिए ऑपरेशन टेबल पर लेटी थी।

रामस्वरूप जी के दिमाग में आज अतीत के पन्ने किसी तेज आंधी में उड़ते हुए पन्नों की तरह फड़फड़ा रहे थे। उन्हें आज से पैंतीस साल पुरानी वह सर्द सुबह याद आ रही थी, जब इसी अस्पताल के एक साधारण से वॉर्ड में स्वाति का जन्म हुआ था। जब नर्स ने बाहर आकर कहा था कि ‘बधाई हो, बेटी हुई है’, तो रामस्वरूप जी के चेहरे पर कोई खुशी नहीं थी। उनके माथे पर सिलवटें पड़ गई थीं। वे तो अपने वंश को आगे बढ़ाने वाले चिराग की उम्मीद लगाए बैठे थे। घर में कोई जश्‍न नहीं मना था, किसी को मिठाई नहीं बांटी गई थी। सावित्री भी पति की नाराजगी के डर से अपनी नवजात बच्ची को खुलकर प्यार नहीं कर पाती थी। स्वाति का बचपन एक अनचाहे मेहमान की तरह ही बीता। उसके आठ साल बाद, जब घर में चिराग का जन्म हुआ, तो रामस्वरूप जी ने पूरे मोहल्ले में दावत दी थी। बैंड-बाजे बुलाए गए थे और घर को दिवाली की तरह सजाया गया था। रामस्वरूप जी को लगा था जैसे उन्हें दुनिया की सारी दौलत मिल गई हो।

बचपन से ही दोनों भाई-बहनों की परवरिश में जमीन-आसमान का फर्क था। चिराग को शहर के सबसे महंगे अंग्रेजी माध्यम स्कूल में दाखिला दिलाया गया, जबकि स्वाति सरकारी स्कूल में पढ़ती रही। जब चिराग के लिए महंगे खिलौने आते, तो स्वाति बस उन्हें दूर से देखकर खुश हो लेती। लेकिन इन सब के बावजूद, स्वाति के मन में अपने छोटे भाई के लिए कभी कोई ईर्ष्या या कड़वाहट नहीं पनपी। वह चिराग से बहुत प्यार करती थी। रामस्वरूप जी का कड़क मिजाज स्वाति को हमेशा सहमा कर रखता था, लेकिन भाई के पास आते ही वह खिलखिला उठती थी। हर भैया दूज पर वह चिराग के माथे पर तिलक लगाते हुए एक ही बात कहती थी, “चिराग, तू मेरा सबसे प्यारा भाई है। भगवान तेरी सारी बलाएं मेरे सिर ले ले। जब तक तेरी ये बड़ी बहन जिंदा है, तुझ पर कोई आंच नहीं आने देगी।” चिराग भी अपनी दीदी से बहुत लाड़ करता था, लेकिन रामस्वरूप जी को यह सब नाटक लगता था। वे अक्सर कहते, “लड़कियां पराया धन होती हैं, आज हैं कल अपने घर चली जाएंगी। बुढ़ापे में तो बेटा ही काम आएगा।”

यही सोचकर उन्होंने मात्र इक्कीस साल की उम्र में स्वाति के हाथ पीले कर दिए थे। दहेज का ज्यादा बोझ न पड़े, इसलिए एक साधारण से परिवार में उसकी शादी कर दी गई थी। विदाई के वक्त जब स्वाति फूट-फूट कर रो रही थी, तो रामस्वरूप जी ने बस औपचारिकता के लिए उसके सिर पर हाथ रखा था। उनका पूरा ध्यान तो चिराग की उच्च शिक्षा के लिए पैसे बचाने पर था। शादी के बाद स्वाति अपने गृहस्थ जीवन में उलझ गई। उसका एक पांच साल का बेटा भी था।

सब कुछ रामस्वरूप जी की योजना के अनुसार ही चल रहा था। चिराग ने इंजीनियरिंग पूरी कर ली थी और उसे एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में शानदार नौकरी भी मिल गई थी। रामस्वरूप जी का सीना गर्व से चौड़ा रहता था। वे हर रिश्तेदार के सामने अपने बेटे की कामयाबी के कसीदे पढ़ते नहीं थकते थे। लेकिन तकदीर को शायद कुछ और ही मंजूर था। एक दिन अचानक ऑफिस में चिराग बेहोश होकर गिर पड़ा। जब उसे अस्पताल ले जाया गया और तमाम जांचें हुईं, तो जो रिपोर्ट सामने आई, उसने रामस्वरूप जी और सावित्री की दुनिया ही उजाड़ दी। डॉक्टरों ने बताया कि चिराग को एक दुर्लभ ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसकी वजह से उसका लिवर पूरी तरह से खराब हो चुका है। अगर एक महीने के भीतर लिवर ट्रांसप्लांट नहीं हुआ, तो उसका बचना नामुमकिन है।

रामस्वरूप जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। उन्होंने अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई अस्पताल के बिलों में लगा दी। उन्होंने हर जगह हाथ-पैर मारे। लेकिन समस्या पैसे की नहीं थी, समस्या थी डोनर की। चिराग का ब्लड ग्रुप बहुत दुर्लभ था। रामस्वरूप जी और सावित्री, दोनों की उम्र और बीमारियों (मधुमेह और रक्तचाप) के कारण वे डोनर नहीं बन सकते थे। रामस्वरूप जी ने उन सभी रिश्तेदारों और दोस्तों के आगे हाथ जोड़े, जिन्हें वे अपनी शान समझते थे, लेकिन कोई भी अपनी जान जोखिम में डालने को तैयार नहीं हुआ। चिराग की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। आईसीयू के बिस्तर पर मौत से लड़ते अपने जवान बेटे को देखकर रामस्वरूप जी का सारा गुरूर, सारा अभिमान टूट कर बिखर चुका था। उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि दौलत और रसूख मौत के आगे कितने बौने होते हैं।

जब यह खबर स्वाति तक पहुंची, तो वह बदहवास हालत में मायके दौड़ी चली आई। अपने हंसते-खेलते भाई को तारों और मशीनों के बीच पीला पड़ा देखकर उसकी चीख निकल गई। बिना किसी को बताए, वह डॉक्टर के पास गई और अपना टेस्ट करवाया। भगवान की मर्जी कहिए या खून का रिश्ता, स्वाति का लिवर चिराग के लिए एक परफेक्ट मैच निकला। जब डॉक्टरों ने यह बात बताई, तो रामस्वरूप जी की सूखी आंखों में उम्मीद की एक किरण तो जागी, लेकिन साथ ही एक गहरा अपराधबोध भी छा गया। जिस बेटी को उन्होंने हमेशा एक बोझ समझा, आज वही बेटी उनके वंश के चिराग को बुझने से बचाने का एकमात्र जरिया थी।

लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं था। जब स्वाति के पति नरेश और उसके ससुराल वालों को इस बात का पता चला, तो घर में तूफान आ गया। नरेश ने साफ शब्दों में कह दिया, “तुम पागल हो गई हो स्वाति? यह कोई खून देने जैसी छोटी बात नहीं है, यह एक बहुत बड़ा ऑपरेशन है। तुम्हारा अपना एक पांच साल का बच्चा है। कल को अगर ऑपरेशन के दौरान तुम्हें कुछ हो गया, तो मेरे बेटे का क्या होगा? और वैसे भी, तुम्हारे पिता ने कभी तुम्हारे लिए किया ही क्या है जो तुम अपनी जान दांव पर लगा रही हो? अगर तुम इस ऑपरेशन के लिए गईं, तो इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे।”

यह वह पल था जहां कोई भी आम इंसान टूट जाता। ससुराल की धमकियां, अपनी बसी-बसाई गृहस्थी उजड़ने का डर और खुद की जान का जोखिम। रामस्वरूप जी ने भी फोन पर दामाद की ये बातें सुन ली थीं। वे अपनी बेटी के पास गए और कांपते हाथों से उसके सामने हाथ जोड़कर रो पड़े। “मुझे माफ कर दे बेटी। मैंने जिंदगी भर तेरे साथ अन्याय किया है। तेरा पति सही कह रहा है। तू एक मां है। मैं अपने बेटे को बचाने के लिए तेरी जिंदगी और तेरा घर बर्बाद नहीं कर सकता। तू वापस चली जा, मैं चिराग की किस्मत भगवान पर छोड़ दूंगा।”

लेकिन स्वाति की आंखों में उस दिन एक अजीब सी दृढ़ता थी। उसने अपने पिता के हाथ पकड़ लिए और आंसू पोंछते हुए कहा, “पिताजी, आपने मुझे क्या दिया और क्या नहीं, इसका हिसाब लगाने का यह वक्त नहीं है। चिराग सिर्फ आपका बेटा नहीं है, मेरा इकलौता भाई भी है। बचपन में मैंने भैया दूज पर उसे वचन दिया था कि मैं हमेशा उसकी रक्षा करूंगी। आज जब उसे मेरी सबसे ज्यादा जरूरत है, तो मैं अपने घर और अपनी जान के डर से उसे मरने के लिए कैसे छोड़ दूं? अगर मैंने ऐसा किया, तो मैं खुद को कभी आईने में नहीं देख पाऊंगी और ना ही एक अच्छी मां बन पाऊंगी। मेरा पति आज गुस्से में है, कल समझ जाएगा। लेकिन अगर मेरा भाई चला गया, तो वो कभी लौट कर नहीं आएगा।”

स्वाति ने अपने पति और ससुराल वालों की घोर नाराजगी के बावजूद, अपनी जिद नहीं छोड़ी। उसने अस्पताल के फॉर्म पर दस्तखत कर दिए। और आज, वही महायज्ञ उस बंद दरवाजे के पीछे चल रहा था।

अचानक ऑपरेशन थियेटर के ऊपर जल रही लाल बत्ती बुझ गई। रामस्वरूप जी की तंद्रा भंग हुई। उनके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। थियेटर का भारी दरवाजा खुला और मुख्य सर्जन बाहर आए। उनके चेहरे पर थकान थी, लेकिन साथ ही एक राहत भरी मुस्कान भी।

“बधाई हो रामस्वरूप जी,” डॉक्टर ने अपने दस्ताने उतारते हुए कहा, “ऑपरेशन पूरी तरह से सफल रहा। आपके बेटे का शरीर नए लिवर को स्वीकार कर रहा है। लेकिन मैं आपको एक बात बता दूं, आपकी बेटी बहुत बहादुर है। उसने अपनी परवाह किए बिना आपके बेटे को एक नया जन्म दिया है। आप लोग कुछ देर में उन्हें रिकवरी रूम के कांच से देख सकते हैं।”

सावित्री भगवान का शुक्रिया अदा करते हुए वहीं फर्श पर बैठ गईं। रामस्वरूप जी के पैरों में जैसे जान आ गई। वे लगभग दौड़ते हुए रिकवरी रूम की तरफ गए। कांच की पारदर्शी दीवार के उस पार, दो अलग-अलग बिस्तरों पर उनके दोनों बच्चे लेटे हुए थे। चिराग अभी भी बेहोशी की गहरी नींद में था, लेकिन उसके चेहरे पर अब मौत की वह पीलाहट नहीं थी। वहीं पास के बिस्तर पर स्वाति लेटी थी। उसके शरीर में अनगिनत नलियां लगी थीं। चेहरा सफेद पड़ गया था, लेकिन बेहोशी की हालत में भी उसके होंठों पर एक ऐसी अलौकिक और पवित्र मुस्कान थी, जैसे किसी तपस्विनी को उसकी तपस्या का फल मिल गया हो।

रामस्वरूप जी ने अपने दोनों हाथ उस कांच की दीवार पर रख दिए और वहीं फूट-फूट कर रो पड़े। ये आंसू सिर्फ खुशी के नहीं थे; ये उन बत्तीस सालों के पश्चाताप के आंसू थे। उन्हें याद आ रहा था कि कैसे उन्होंने हमेशा बेटी को पराया और बेटे को अपना माना था। लेकिन आज हकीकत उनके सामने थी। जिस समाज में बेटे को बुढ़ापे का सहारा माना जाता है, वहां आज एक बेटी ने अपने पिता के उस सहारे को ही टूटने से बचा लिया था। रामस्वरूप जी को आज समझ आ गया था कि बेटा भले ही पिता का अंश होता है, लेकिन बेटियां पिता की आत्मा होती हैं। बेटियां कभी पराया धन नहीं होतीं, वे तो वह पूंजी होती हैं जो सबसे बुरे वक्त में बिना मांगे अपना सब कुछ लुटा देती हैं। आज एक बहन ने सिर्फ अपना फर्ज नहीं निभाया था, बल्कि एक पिता को जीवन का सबसे बड़ा सच सिखा दिया था।

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