दीपावली का दिन था। छोटे से कस्बे के उस पुराने लेकिन सजे-धजे घर के आंगन में दीये जल रहे थे। घर के दालान में बैठे रिटायर्ड मास्टर दीनानाथ जी की नज़रें बार-बार दरवाज़े की तरफ उठ रही थीं। उनका छोटा बेटा समीर आँगन में रंगोली बना रहा था, जबकि उनकी पत्नी रसोई से पकवानों की खुशबू के बीच बार-बार बाहर झांक रही थीं। आज उनका बड़ा बेटा अनुभव पूरे दो साल बाद शहर से गांव आ रहा था। अनुभव शहर का एक बहुत बड़ा बिजनेसमैन बन चुका था। उसकी तरक्की की कहानियाँ अक्सर अखबारों में छपती थीं, लेकिन उसकी यह तरक्की उसे अपने परिवार से बहुत दूर ले गई थी।
तभी एक चमचमाती महंगी गाड़ी दरवाज़े पर आकर रुकी। अनुभव गाड़ी से बाहर निकला। उसके हाथ में कुछ महंगे विदेशी गिफ्ट्स थे। घर में कदम रखते ही उसने चारों तरफ नज़र दौड़ाई और एक अजीब सी मुस्कुराहट के साथ बोला, “पापा, आपने इस घर में अभी तक पेंट नहीं करवाया? मैंने कहा तो था कि पैसे मैं भेज दूंगा, फिर आप लोग इस खस्ताहाल घर में क्यों रह रहे हैं?”
समीर ने आगे बढ़कर बड़े भाई के पैर छुए, लेकिन अनुभव ने उसे गले लगाने के बजाय दूर से ही पीठ थपथपा दी। “और तू समीर? अभी भी उसी छोटी सी सरकारी नौकरी में अटका है? देख मुझे, आज शहर के सबसे पॉश इलाके में मेरा बंगला है। करोड़ों का टर्नओवर है। इंसान को हमेशा पैसा कमाने पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि आज के ज़माने में जिसकी जेब भारी है, दुनिया उसी को सलाम ठोकती है।”
दीनानाथ जी ने गहरी सांस ली और अपने पास सोफे पर अनुभव को बिठाते हुए बहुत ही शांत स्वर में कहा, “बेटा, पैसा बहुत ज़रूरी है, मैं इस बात से इंकार नहीं करता। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना कि रिश्तों की कदर भी पैसों की तरह ही करनी चाहिए, क्योंकि दोनों को कमाना मुश्किल है पर गँवाना आसान। तू जो ये दौलत की मीनार खड़ी कर रहा है, उसकी नींव में अपने रिश्तों को मत दफन कर।”
अनुभव ने पिता की बात को पुराने ज़माने का डायलॉग समझकर अनसुना कर दिया। वह सिर्फ दो दिन रुका। इन दो दिनों में उसका फोन लगातार बजता रहा, वह अपनी बिज़नेस डील्स में व्यस्त रहा और फिर “समय की कमी” का बहाना बनाकर वापस शहर लौट गया। उसे लगता था कि उसने अपने परिवार को महंगे तोहफे देकर अपना फर्ज़ पूरा कर दिया है।
वक्त अपनी रफ्तार से गुज़रता रहा। अनुभव की दौलत का नशा उसके सिर चढ़कर बोलने लगा था। उसने अपने उन पुराने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी दूरी बना ली थी जो उसके ‘स्टेटस’ से मेल नहीं खाते थे। उसके आसपास अब सिर्फ वही लोग थे जो उसकी दौलत के इर्द-गिर्द मंडराते थे—बड़े-बड़े इन्वेस्टर्स, पार्टी करने वाले रईस दोस्त और चापलूस लोग।
लेकिन कहते हैं न, वक्त का पहिया जब घूमता है, तो राजा को रंक बनने में देर नहीं लगती।
अनुभव की कंपनी ने एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट लिया था, जिसमें उसने अपनी सारी पूंजी लगा दी थी। यहाँ तक कि अपना घर और ऑफिस भी गिरवी रख दिया था। उसे अपने जिस पार्टनर पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वह एक दिन अचानक सारा पैसा लेकर देश छोड़कर भाग गया। शेयर मार्केट में अनुभव की कंपनी के शेयर धड़ाम से गिर गए। रातों-रात अनुभव अर्श से फर्श पर आ गिरा। बैंक के नोटिस उसके दरवाज़े पर चिपक गए। कर्जदारों ने उसका जीना मुहाल कर दिया।
जब मुसीबत आई, तो अनुभव ने अपने उन ‘स्टेटस वाले’ दोस्तों को फोन लगाया जो उसकी महंगी पार्टियों में शैम्पेन उड़ाते थे। किसी ने फोन नहीं उठाया, किसी ने नंबर ब्लॉक कर दिया, तो किसी ने साफ कह दिया कि “यार, हम इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते।” जिस दौलत के दम पर वह दुनिया खरीदने का घमंड करता था, वह दौलत रेत की तरह उसकी मुट्ठी से फिसल चुकी थी।
एक हफ्ता बीत गया। अनुभव अपने एक छोटे से किराए के कमरे में अंधेरे में बैठा था। उसका आलीशान बंगला छिन चुका था। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे और मन में आत्महत्या के विचार आने लगे थे। उसे लग रहा था कि अब इस दुनिया में उसका कोई नहीं है। उसने पैसों को ही अपना सब कुछ माना था और अब जब पैसे नहीं थे, तो उसका वजूद ही खत्म हो गया था।
तभी कमरे के दरवाज़े पर दस्तक हुई। अनुभव ने भारी कदमों से जाकर दरवाज़ा खोला। सामने उसका छोटा भाई समीर खड़ा था। समीर के कंधे पर एक बैग था और उसकी आँखों में अपने बड़े भाई के लिए गहरी तड़प थी।
“भैया…” समीर ने बस इतना ही कहा और आगे बढ़कर अनुभव को कसकर गले लगा लिया।
अनुभव, जो इतने दिनों से पत्थर बना हुआ था, समीर के गले लगते ही बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगा। “मैं बर्बाद हो गया समीर… मेरा सब कुछ लुट गया। मेरे पास कुछ नहीं बचा… मैं सड़क पर आ गया हूँ।”
समीर ने उसे संभाला, उसे पानी पिलाया और उसके पास बैठकर बोला, “किसने कहा आपके पास कुछ नहीं बचा? आपका परिवार अभी भी आपके साथ है भैया। मुझे जैसे ही न्यूज़ से पता चला, मैं तुरंत आ गया। पापा ने कहा है कि अनुभव को अकेला मत छोड़ना, उसे घर लेकर आना।”
अनुभव ने अपनी नज़रें झुका लीं। “मैं किस मुँह से घर चलूँ समीर? मैंने हमेशा तुम लोगों का मज़ाक उड़ाया। अपनी दौलत के घमंड में मैंने तुम सबको बहुत पीछे छोड़ दिया था।”
समीर ने अनुभव का हाथ अपने हाथों में लिया और अपनी जेब से एक चेक निकालकर टेबल पर रख दिया। अनुभव ने चेक देखा, वह पूरे पंद्रह लाख रुपये का था।
“यह पैसे कहाँ से आए समीर?” अनुभव ने चौंक कर पूछा।
“भैया, पापा ने मेरे नाम जो पुश्तैनी ज़मीन की थी, वो मैंने बेच दी है। और मेरी जो प्रोविडेंट फंड की सेविंग्स थी, वो भी इसमें है। यह रकम आपके करोड़ों के कर्ज़ को तो नहीं उतार सकती, लेकिन जो सबसे ज़रूरी देनदारियां हैं और जो कानूनी मामले हैं, उनसे आपको बाहर निकाल लेगी। बाकी हम दोनों भाई मिलकर कोई नया काम शुरू करेंगे। आप घबराइए मत।”
अनुभव सन्न रह गया। जिस भाई को वह ‘गरीब’ और ‘असफल’ समझता था, आज वही भाई अपना सब कुछ दांव पर लगाकर उसे बचाने आया था। और जिन अमीर दोस्तों पर वह पैसे लुटाता था, उन्होंने उसे मुड़कर भी नहीं देखा।
उसे अपने पिता दीनानाथ जी की कही हुई वह बात याद आ गई— “रिश्तों की कदर भी पैसों की तरह ही करनी चाहिए…”
आज अनुभव को समझ में आ गया था कि पैसा कमाना तो उसने सीख लिया था, लेकिन रिश्ते कमाना भूल गया था। उसने पैसा गंवाया तो सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन समीर ने जो रिश्ते कमाए थे, उसी ने आज अनुभव की जान बचा ली थी। अनुभव ने समीर के हाथ चूम लिए और अपने उस घमंड को हमेशा के लिए उसी अंधेरे कमरे में दफन कर दिया। वह अपने भाई के साथ उस घर लौट आया जहाँ दौलत नहीं, बल्कि असली सुकून रहता था।
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