शादी के बारह बसंत बीत जाने के बाद भी जब सुमित्रा और देवेश के घर की देहरी पर किसी नन्हे पाँव की आहट नहीं गूँजी थी, तो मोहल्ले और कुल-कुटुंब की निगाहें पथराने लगी थीं। कभी इस सिद्ध पीठ की परिक्रमा, कभी उस दरगाह की मन्नत, तो कभी नर्मदा किनारे खड़े वटवृक्ष पर बंधे धागों की फेहरिस्त ही इनकी जिंदगी बन गई थी। जब आस की आखिरी डोर भी टूटने लगी, तब पतझड़ के पत्तों की तरह सूख चुके जीवन में एक नन्ही कली ने जन्म लिया। सावन की झड़ी के बीच जब वह आँगन में पहली बार रोई, तो लगा जैसे बंजर धरती पर अमृत की फुहारें बरस पड़ी हों। देवेश नर्मदा के अनन्य भक्त थे, जल की तरह पावन और स्वच्छ उस मासूम को देख उन्होंने उसका नाम रखा—रेवा।
रेवा के आने से उस बड़े पुश्तैनी हवेलीनूमा मकान में जैसे रौनक के दीप जल उठे थे। चहकती पायल, तुतलाते बोल और खिलखिलाती हँसी ने घर की पुरानी उदासी को धो डाला था। वह परिवार केवल सुमित्रा और देवेश तक सीमित नहीं था; संयुक्त परिवार की बड़ी छत के नीचे जेठ-देवर, ममेरे-फुफेरे भाइयों और रिश्तेदारों का तांता हमेशा लगा रहता था। त्योहारों के मौसम में तो हवेली किसी मेले जैसी गुलजार हो उठती थी। जब रेवा सातवें वर्ष में पहुँची, तो उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें दुनिया को कौतूहल से देखने लगी थीं। लेकिन उसी भरे-पूरे परिवार की आड़ में एक ऐसा स्याह सच भी रेंग रहा था, जिससे अनजान देवेश और सुमित्रा अपनी लाडली को दुनिया भर के लाड़-प्यार से सींच रहे थे।
परिवार के ही एक दूर के चचेरे भाई, जो उम्र में रेवा से करीब दस साल बड़ा था, का हवेली में अक्सर आना-जाना था। बाहर से बेहद संस्कारी और नम्र दिखने वाला वह लड़का अंदर से विकृत मानसिकता का शिकार था। रेवा जब भी खेलती हुई उसके पास से गुजरती, वह उसे अपनी ओर खींच लेता। कभी गोद में बिठाने के बहाने अनचाहा स्पर्श, तो कभी अकेले कमरे में बुलाकर अजीब सी जकड़न। सात साल की नन्ही रेवा उस स्पर्श की भाषा पूरी तरह नहीं समझ पाती थी, पर उसके भीतर का अबोध मन एक असहज सिहरन से काँप उठता था। जब भी वह लड़का उसे छूता, रेवा को लगता जैसे किसी ने उस पर गीली, बदबूदार राख फेंक दी हो। वह छटपटा कर छूटने की कोशिश करती, लेकिन लड़का उसे ‘प्यार’ का नाम देकर धमका देता कि अगर किसी से कहा तो डाँट पड़ेगी।
एक दोपहर जब हवेली के अधिकांश बड़े लोग किसी रिश्तेदार के लग्न-समारोह में गए हुए थे और सुमित्रा रसोई के काम में व्यस्त थी, सन्नाटे का फायदा उठाकर वह चचेरा भाई रेवा के कमरे में जा घुसा। रेवा अपनी गुड़िया के बाल सँवार रही थी। उसने झपटकर दरवाजा भीतर से बंद कर दिया। उसके चेहरे पर फैली हवस की मैली छाया देख नन्ही रेवा की रूह काँप गई। उसने भागने की कोशिश की, मगर उस दरिंदे ने उसे अपनी बाहों में भींच लिया। रेवा का दम घुटने लगा। चीख उसके हलक में ही दब गई थी। ठीक उसी पल, रेवा की नजर मेज पर रखी अपनी नुकीली क्राफ्ट कैंची पर पड़ी, जिससे वह गुड़िया के कपड़े काटती थी। बिना एक पल गँवाए, आत्मरक्षा की स्वाभाविक आग में उसने पूरी ताकत से उस कैंची को उस लड़के के हाथ की कलाई और चेहरे पर दे मारा। खून का फव्वारा छूटा और दर्द से बिलबिलाता हुआ वह लड़का पीछे हट गया। रेवा ने झटके से सिटकनी खोली और बदहवास होकर रसोई की तरफ भागी।
रसोई में सुमित्रा के आँचल में मुँह छुपाकर वह फूट-फूट कर रोने लगी। उसका पूरा शरीर थर-थर काँप रहा था। जब उसने हिचकियों के बीच अपनी टूटी-फूटी जुबान से उस वहशी हरकत का ब्योरा दिया, तो सुमित्रा के पैरों तले से जमीन खिसक गई। सुमित्रा का खून खौल उठा। उसी क्षण बाहर से लाउडस्पीकर पर भजन की पंक्ति हवा में तैरती हुई आई—”मन की मैल न धोई रे, तूने गंगा नहाई क्या…”
सुमित्रा ने रेवा को सीने से कसकर चिपटा लिया। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, पर उन आँसुओं में लाचारी नहीं, एक माँ का दहकता हुआ संकल्प था। उसने अपनी सिसकती बेटी के माथे को चूमा और कहा, “मेरी बच्ची, तू रोएगी नहीं। रोते वो हैं जो कमजोर होते हैं, जो गुनाह करते हैं। तूने जो किया, वो तेरी बहादुरी थी। तूने अपने अस्तित्व को उस मैल से बचाया है।”
रेवा ने रोते हुए अपनी माँ की आँखों में देखा और पूछा, “माँ, भैया तो अपने थे ना? फिर अपने ही इतने गंदे क्यों हो जाते हैं? लोग बाहर भगवान की पूजा करते हैं, पर अंदर से इतने मैले क्यों होते हैं?”
सुमित्रा ने एक गहरी साँस ली। वह समझ गई कि आज उसकी बेटी के मन में जो सवाल उठा है, उसका जवाब सिर्फ ढाढ़स बंधाना नहीं, बल्कि उसके जीवन की नींव को फौलाद बनाना है। सुमित्रा ने खिड़की की ओर इशारा किया, जहाँ से दूर बहती हुई नर्मदा नदी का किनारा दिखाई देता था।
सुमित्रा ने कहा, “रेवा, देख उस नदी को। वो माँ नर्मदा है, जिसे हम सब पूजते हैं। अमरकंटक की पवित्र पहाड़ियों से निकलकर हजारों किलोमीटर का सफर तय करती है ताकि धरती की प्यास बुझा सके। जब वो पहाड़ों से उतरती है, तो उसका जल आईने जैसा साफ होता है। लेकिन जब वो इंसानी बस्तियों, शहरों और कारखानों के बीच से गुजरती है, तो लोग उसके साथ क्या करते हैं? वही लोग जो किनारे खड़े होकर हाथ जोड़ते हैं, वही उसमें नालों की गंदगी, जहरीले रसायन और सड़ांध बहा देते हैं। इंसान का लालच और उसकी गंदी नीयत इतनी अंधी है कि वह अपनी जीवनदायिनी माँ को भी मैला करने से बाज नहीं आता।”
रेवा अपनी सिसकियाँ रोककर माँ की बातें सुनने लगी। उसने मासूमियत से पूछा, “माँ, तो क्या वो बेचारी नदियाँ कुछ बोल नहीं सकतीं? जब लोग उन पर गंदा कचरा डालते हैं, तो क्या उन्हें दर्द नहीं होता?”
“दर्द बहुत होता है बेटा,” सुमित्रा ने भावुक होकर समझाया, “जब कारखानों का तेजाब उनकी रगों में घुलता है, जब बाँधों और प्लास्टिक के मलबे से उनका दम घुटता है, तो नदियाँ भी तड़पती हैं। लेकिन वो बेजुबान हैं। वो इंसानों की तरह चीख नहीं सकतीं, वो चुपचाप सब सहती हैं और एक दिन उनका जीवन सूख जाता है, वो नाला बन जाती हैं। पर तू बेजुबान नहीं है, रेवा!”
सुमित्रा ने रेवा के दोनों कंधे मजबूती से पकड़े और उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा, “प्रकृति ने नदियों को जुबान नहीं दी, पर ईश्वर ने तुझे आवाज दी है, हिम्मत दी है। तू मेरी कोख से जन्मी है, किसी की जागीर नहीं है। कोई भी, चाहे वो बाहर का हो या घर का अपना, अगर तेरी गरिमा को मैला करने की कोशिश करे, तो तुझे सहना नहीं है, पलटकर प्रहार करना है। तेरे पापा तुझे कराटे की क्लास में भेजते हैं, वो सिर्फ एक खेल नहीं है, वो तेरी ढाल है। आज जैसे तूने बहादुरी दिखाई, वैसे ही हमेशा याद रखना—बुराई के सामने सिर झुकाना उसे बढ़ावा देना होता है।”
रेवा के नन्हे मन पर माँ की बातों का गहरा असर हुआ। उसके भीतर का खौफ धीरे-धीरे एक अद्भुत साहस में तब्दील होने लगा। उसने अपनी मुट्ठियाँ भींची और पूछा, “माँ, अगर हम लड़ सकते हैं, तो बेचारी नदियों के लिए कौन लड़ेगा? क्या उनके लिए कोई नियम, कोई रक्षक नहीं है?”
सुमित्रा ने मुस्कुराते हुए उसके आँसू पोंछे, “हैं ना बेटा! सरकार ने कानून बनाए हैं, ‘नमामि नर्मदे’ और नदी संरक्षण के बड़े-बड़े अभियान चलाए जा रहे हैं। गुजरात में साबरमती के तट को संवारा गया, नर्मदा के किनारों पर पौधारोपण हो रहा है, प्रदूषण फैलाने वालों पर सख्ती की जा रही है। लेकिन असली बदलाव तब आता है जब समाज खुद जागता है। जैसे तू अपनी हिफाजत खुद कर रही है, वैसे ही हर नागरिक को इन जीवनदायिनी नदियों की हिफाजत के लिए आगे आना होगा।”
रेवा ने अपनी छाती पर हाथ रखा। उसका दिल अब तेजी से धड़क रहा था, डर से नहीं बल्कि एक नए जज्बे से। उसने माँ से कहा, “माँ, मैं वादा करती हूँ। मैं कभी किसी गलत बात के आगे नहीं झुकूँगी। मैं अपनी सहेलियों को भी सिखाऊँगी कि कोई गलत तरीके से छुए तो चुप नहीं रहना है। और जब मैं बड़ी होऊँगी ना माँ, तो मैं नदियों को बचाने के लिए भी एक बड़ी सेना बनाऊँगी। हम नदियों को कभी मैला नहीं होने देंगे!”
सुमित्रा की आँखों में गर्व के आँसू छलक आए। उसने उस चचेरे भाई को उसी शाम पूरे परिवार के सामने बेनकाब किया। जब घर के कुछ बड़े लोग कुल की बदनामी का हवाला देकर बात दबाने लगे, तो सुमित्रा और देवेश चट्टान की तरह खड़े हो गए। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि बेटी के स्वाभिमान और सुरक्षा से बढ़कर कोई खानदान नहीं होता। उस लड़के को न सिर्फ घर से बेदखल किया गया, बल्कि पुलिस में शिकायत दर्ज कराकर उसे उसके किए की कानूनी सजा दिलवाई गई। इस घटना ने पूरे परिवार को हिला कर रख दिया और हवेली में बेटियों के मान-सम्मान की नई इबारत लिखी गई।
उस रात जब रेवा सोई, तो उसने कोई डरावना सपना नहीं देखा। उसने देखा कि वह सफेद अश्व पर सवार वीरांगना बनकर हाथ में तलवार लिए खड़ी है और उसके सामने कलकल करती नर्मदा नदी अपनी नीली चुनरी लहराते हुए मुक्त भाव से नाच रही है, मानों कह रही हो—’तू सुरक्षित है बेटी, तो मैं भी सुरक्षित हूँ।’
वर्ष बीतते गए। बचपन का वह बीजारोपण रेवा के भीतर एक विशाल वटवृक्ष बन चुका था। रेवा ने आत्मरक्षा में ब्लैक बेल्ट हासिल किया और पर्यावरण विज्ञान में उच्च शिक्षा पूरी की। वह केवल किताबों तक सीमित नहीं रही। बाईस वर्ष की उम्र में उसने कॉलेज के युवाओं और महिलाओं को मिलाकर एक संस्था की नींव रखी, जिसका नाम रखा गया—”निर्मल नीर, निर्भय नारी”।
यह संस्था दोहरे मोर्चे पर काम करती थी। एक तरफ यह गाँव-गाँव और कस्बों में जाकर किशोरियों और युवतियों को ‘गुड टच-बैड टच’, कानूनी अधिकारों और आत्मरक्षा (मार्शल आर्ट्स) का कड़ा प्रशिक्षण देती थी, ताकि कोई भी भेड़िया उनके बचपन को कुचल न सके। दूसरी तरफ, रेवा की यह टोली नर्मदा और उसकी सहायक नदियों के घाटों पर जाकर सफाई अभियान चलाती, कारखानों के अवैध नालों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ती और लोगों को नदियों में प्लास्टिक व कचरा न फेंकने के लिए जागरूक करती।
एक बार जब शहर के एक रसूखदार उद्योगपति ने अपनी केमिकल फैक्ट्री का दूषित पानी रात के अंधेरे में नदी में बहाने की कोशिश की, तो रेवा और उसकी युवा टोली ने उस गंदे नाले के मुहाने पर मानव श्रृंखला बनाकर धरना दे दिया। उद्योगपति के गुंडों ने धमकाने की कोशिश की, पर रेवा के फौलादी हौसले के आगे वे टिक न सके। प्रशासन को झुकना पड़ा, फैक्ट्री पर ताला लगा और उस गंदे प्रवाह को हमेशा के लिए रोक दिया गया।
उस दिन जब पूरा शहर रेवा की इस साहसिक जीत पर तालियाँ बजा रहा था, मंच पर खड़ी रेवा ने माइक थामा। उसने भरी सभा में कहा, “यह जीत मेरी नहीं, मेरी माँ की उस सीख की है, जो उन्होंने मुझे उस दिन दी थी जब मेरा बचपन अपनों के ही साए में लहुलूहान होने से बचा था। एक स्त्री और एक नदी दोनों ही जीवनदायिनी हैं। जब तक एक बेटी खुद पर उठने वाले गंदे हाथों को मरोड़ना नहीं सीखेगी, तब तक वह अपने समाज और अपनी प्रकृति की रक्षा भी नहीं कर पाएगी। अपनी बेटियों को सहना नहीं, लड़ना सिखाइए। और अपनी नदियों को पूजना ही नहीं, उन्हें स्वच्छ रखना सिखाइए।”
सभा में बैठी सुमित्रा और देवेश की आँखें छलक पड़ीं। जिस आँगन में मरुभूमि जैसी मायूसी थी, आज उसी आँगन से निकली बेटी ने हजारों बेटियों के मन में साहस की लौ जला दी थी और हजारों बेजुबान जलधाराओं को एक बुलंद आवाज दे दी थी। घाट पर बहती नर्मदा की लहरें उस शाम ढलते सूरज की लालिमा में ऐसे चमक रही थीं, मानो अपनी उस साहसी बेटी को झुककर प्रणाम कर रही हों। समाज की सोच बदल रही थी, क्योंकि अब नदियाँ भी पावन थीं और बेटियाँ भी निर्भीक थीं।
दोस्तों, एक बेटी को केवल सहनशीलता का पाठ पढ़ाना काफी नहीं है, उसे अपनी गरिमा की रक्षा के लिए दुर्गा और काली बनना सिखाना भी आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। साथ ही, जो प्रकृति हमें जीवन देती है, उसे मैला होने से बचाना हमारा साझा कर्तव्य है। क्या आपको भी लगता है कि हर परिवार को अपनी बेटियों को आत्मरक्षा और खुलकर बोलने की आजादी देनी चाहिए? अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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