मयंक ने अपनी पत्नी के इस बदले हुए रूप, चेहरे की सौम्यता और घर में लौटी शांति को देखकर मुस्कुराते हुए चुटकी ली, “अरे वाह शालिनी! आज तो घर सचमुच घर लग रहा है। अगर अल्पना भाभी के घर जाकर ऐसा चमत्कार होता है, तो मेरा सुझाव है कि तुम महीने में दो-चार बार उनके घर हो आया करो!”
कमरे में ठहाका गूंज उठा। शालिनी ने नजरें झुकाकर मुस्कुराते हुए अपनी सास के हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
उस दिन शालिनी ने समझ लिया था कि संस्कार किसी महंगे स्कूल की किताबों में नहीं पढ़ाए जाते, और न ही आधुनिकता का मतलब अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने बुजुर्गों को भूल जाना होता है।
शालिनी अपनी चमचमाती गाड़ी एक पुराने मोहल्ले के सादे से मकान के सामने रोकती है। उसके साथ उसके दोनों बच्चे, दस साल का आरव और आठ साल की मायरा भी पिछली सीट पर टैबलेट में आंखें गड़ाए बैठे थे। शालिनी अपने कॉलेज के दिनों की सबसे करीबी सहेली अल्पना से मिलने आई थी। पूरे सात साल बीत चुके थे दोनों को मिले। शालिनी के पति मयंक का हाल ही में इसी शहर में एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट के पद पर तबादला हुआ था। शालिनी ने सोचा कि क्यों न गृहस्थी के नए झमेलों में उलझने से पहले अल्पना से मिलकर पुरानी यादें ताजा कर ली जाएं।
दरवाजे की घंटी बजते ही अल्पना ने दरवाजा खोला। सूती साड़ी में लिपटी, माथे पर छोटी सी लाल बिंदी और होठों पर वही बरसों पुरानी निश्चल मुस्कान लिए अल्पना को देखकर शालिनी की खुशी का ठिकाना न रहा। दोनों सहेलियां एक-दूसरे से गले मिलीं। बैठक में बैठकर अभी कॉलेज के दिनों की बातें शुरू ही हुई थीं कि मुख्य दरवाजे से अल्पना के पति राघवेंद्र अंदर आए। दफ्तर के थैले को एक किनारे सलीके से रखते हुए उन्होंने हाथ जोड़कर शालिनी का अभिवादन किया।
“अरे, नमस्ते भाभी जी! आप कब आईं? अगर मैं गलत नहीं हूं तो हमारी शादी के बाद आज पहली बार आपके दर्शन हो रहे हैं।”
शालिनी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “जी राघवेंद्र जी, बिल्कुल सही पहचाना आपने। मयंक का ट्रांसफर अब यहीं हो गया है, तो सोचा सबसे पहले अल्पना से ही मिल आऊं।”
मयंक का नाम सीधे शालिनी के मुंह से सुनकर राघवेंद्र के चेहरे पर एक पल के लिए हल्का सा अचरज उभरा। उनके अपने घर में अल्पना ने कभी उनका नाम सीधे नहीं लिया था; वह हमेशा आदर के साथ ‘सुनिए’ या ‘इनके पापा’ कहकर ही संबोधित करती थी। राघवेंद्र ने सहज होते हुए कहा, “यह तो बहुत अच्छी बात है भाभी जी। आज दोपहर का खाना यहीं खाइए, फिर आराम से गपशप कीजिएगा।”
शालिनी ने औपचारिकता निभाते हुए कहा, “अरे नहीं-नहीं, मैं बस थोड़ी देर में निकल जाऊंगी। घर पर अभी सामान व्यवस्थित करना है।”
लेकिन अल्पना ने रसोई की ओर कदम बढ़ाते हुए प्यार भरे अधिकार से कहा, “ऐसे कैसे चली जाएगी शालिनी? इतने सालों बाद आई है। तू बैठ, मैं जल्दी से गरम-गरम रोटियां सेकती हूं। राघवेंद्र जी और बच्चे भी भूखे होंगे। सब साथ मिलकर खाना खाएंगे, फिर आराम से बातें करेंगे।”
जैसे ही रसोई से खाने की खुशबू फैली, अल्पना के ग्यारह साल के बेटे तन्मय ने फुर्ती से कोने में रखी खजूर के पत्तों की साफ-सुथरी चटाई उठाई और कमरे के बीचों-बीच बड़े सलीके से बिछा दी। वहीं उसकी नौ साल की बहन नव्या धीरे-धीरे अपनी बुजुर्ग दादी को हाथ का सहारा देते हुए कमरे में लेकर आई। नव्या ने अपनी दादी को बड़े जतन से दीवार के सहारे बिठाया और उनके घुटनों पर एक साफ सूती तौलिया रख दिया। राघवेंद्र, तन्मय और नव्या तीनों हाथ-मुंह धोकर चटाई पर पालथी मारकर बैठ गए। पूरा माहौल किसी मंदिर के आंगन जैसा शांत और पवित्र लग रहा था।
लेकिन दूसरी तरफ, शालिनी के बच्चे आरव और मायरा कमरे में रखे बड़े दीवान पर जूते समेत चढ़कर बैठे रहे। उनके हाथ से टैबलेट नहीं छूटा था। राघवेंद्र ने बड़े अपनेपन से आवाज लगाई, “आओ बच्चों, आप दोनों भी आ जाओ। नीचे बैठकर गरम-गरम खाना खाते हैं।”
आरव ने स्क्रीन से नजरें हटाए बिना तुनककर कहा, “नो वे अंकल! हम नीचे जमीन पर बैठकर नहीं खाते। जमीन पर तो सिर्फ गरीब और अनपढ़ लोग बैठते हैं। हम तो हमेशा अपने एसी बेडरूम में बेड पर बैठकर टीवी देखते हुए खाते हैं। मम्मा, बहुत भूख लगी है, हमारा खाना यहीं मंगा दो ना!”
शालिनी के चेहरे का रंग उड़ गया। उसे लगा मानो किसी ने भरे समाज में उसके गाल पर तमाचा जड़ दिया हो। यह किसी और की नहीं, बल्कि उसी की दी हुई परवरिश थी जिसे आज उसका बेटा सबके सामने गर्व से दोहरा रहा था। शालिनी ने झेंपते हुए दोनों बच्चों को डांट पिलाई और खींचकर चटाई पर ला बैठाया। बच्चे मुंह फुलाए, अनिच्छा से बैठ तो गए, लेकिन उनका ध्यान खाने पर कम और कमियां निकालने पर ज्यादा था।
अल्पना ने पीतल की थालियों में गरमा-गरम कढ़ी, चावल, बाजरे की रोटी और हरी चटनी परोसी। जैसे ही अल्पना की सास ने अपने कांपते हाथों से कढ़ी और चावल को अच्छी तरह मसलकर एक निवाला बनाया, मायरा ने जोर से अपनी नाक सिकोड़ ली। वह चीख पड़ी, “ची… याक! मम्मा, देखो ना, ये बूढ़ी औरत कितनी गंदी तरह से खाना खा रही है! दोनों हाथों में खाना लपेट लिया। इन्हें तो खाना खाना भी नहीं आता, मैनर्स ही नहीं हैं!”
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा खिंच गया। शालिनी शर्म से पानी-पानी हो गई। उसकी समझ में नहीं आया कि वह धरती में कैसे समा जाए।
तभी अल्पना की छोटी बेटी नव्या बहुत ही सहजता और मासूमियत से बोली, “आरव भैया, मायरा दीदी, दादी को ऐसे गंदा नहीं बोलते। क्या आपके घर में दादी-बाबा नहीं हैं? आपको पता नहीं है कि जब लोग बहुत ओल्ड हो जाते हैं, तो उनके दांत कमजोर हो जाते हैं। अगर वे हाथ से खाने को अच्छे से नर्म नहीं करेंगे, तो खाना उनके गले में अटक जाएगा और पेट में दर्द होगा। यह गंदगी नहीं, बल्कि खुद की देखभाल है।”
नव्या की यह छोटी सी बात शालिनी के सीने में किसी तीखे खंजर की तरह चुभ गई। शालिनी के अपने घर में भी मयंक की सत्तर साल की बूढ़ी मां, यानी उसकी अपनी सास रहती थीं। लेकिन शालिनी के बच्चों ने उन्हें कभी साथ बैठकर खाते देखा ही नहीं था। शालिनी हमेशा सास का खाना एक स्टील की ट्रे में सजाकर उनके पिछले कमरे में भिजवा देती थी। सास ने कई बार हाथ जोड़कर समझाने की कोशिश की थी, “बहू, खाना हमेशा जमीन पर बैठकर, पालथी मारकर खाना चाहिए। बिस्तर पर अन्न का अपमान करने से दरिद्रता आती है, मन में विकार आते हैं और रात को बुरे सपने घेरते हैं।”
लेकिन आधुनिकता के नशे में चूर शालिनी ने कभी उनकी बात पर कान नहीं धरा था। उसके घर में बिस्तर ही डाइनिंग टेबल था, बिस्तर ही स्टडी टेबल था और बिस्तर ही खेल का मैदान था। बच्चे उसी गद्दे पर बैठकर सॉस और चिप्स गिराते, कई बार तो बिना चादर झाड़े उसी जूठन पर सो जाते। स्कूल से आकर पसीने से तर-बतर कपड़े उसी गद्दे पर फेंक देते। और जब रात में बच्चे चौंककर रोने लगते या डर जाते, तो शालिनी को लगता कि किसी ने नजर लगा दी है और वह डॉक्टरों की दवाइयां खिलाने लगती। उसे आज समझ आ रहा था कि हमारे पुरखों ने शास्त्रों में जमीन पर बैठकर भोजन करने का नियम केवल परंपरा के लिए नहीं बनाया था, बल्कि वह स्वास्थ्य, पवित्रता और धरती के प्रति सम्मान का प्रतीक था।
खाना शुरू करने से पहले राघवेंद्र, अल्पना और दोनों बच्चों ने हाथ जोड़े, आंखें बंद कीं और अन्नपूर्णा मां का श्लोक पढ़कर अन्न को नमन किया। यह देखकर आरव जोर से हंस पड़ा और बोला, “अरे वाह, खाने को भी कोई हाथ जोड़ता है क्या? खाना तो पैसे से आता है!”
शालिनी ने आरव की बांह पर चिकोटी काटी, तब जाकर वह चुप हुआ। बच्चों ने बेमन से दो-चार निवाले खाए और बाकी खाना थाली में ही मसलकर छोड़ दिया। इतना ही नहीं, जैसे ही बच्चों का मन भरा, उन्होंने उसी पीतल की थाली में अपने हाथ धो लिए।
यह देखकर राघवेंद्र का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया। भारतीय संस्कारों में थाली में हाथ धोना अन्नपूर्णा का सबसे बड़ा तिरस्कार माना जाता है। लेकिन उन्होंने मेहमानों का लिहाज करते हुए कुछ नहीं कहा। राघवेंद्र उठे, अपनी थाली दोनों हाथों से उठाकर रसोई के सिंक में रखी, उसमें पानी डाला और हाथ धोकर आए।
शालिनी के दोनों बच्चों ने अपनी भरी हुई थालियां वहीं चटाई पर छोड़ दीं और उठकर सोफे पर जाकर कूदने लगे। थालियों में आधी से ज्यादा कढ़ी और रोटियां बर्बाद पड़ी थीं। अल्पना की बेटी नव्या ने बिना किसी शिकायत के उन जूठी थालियों से बचा हुआ खाना एक मिट्टी के कटोरे में समेटा और बाहर गली के भूखे आवारा कुत्तों के आगे डाल दिया। फिर उसने चटाई को बाहर ले जाकर झाड़ा और सलीके से लपेटकर दीवार के सहारे खड़ा कर दिया।
अल्पना ने रसोई से बाहर आकर बड़े प्यार से कहा, “चल शालिनी, अब हम दोनों भी आराम से खाना खा लेते हैं। आज बहुत दिनों बाद साथ बैठेंगे।”
लेकिन शालिनी किसी गहरे वैचारिक भंवर में डूब चुकी थी। उसका गला रुंधा हुआ था। वह हड़बड़ाकर खड़ी हो गई।
“नहीं अल्पना… मुझे माफ करना। मुझे अभी निकलना होगा। घर पर… मयंक और मां जी इंतजार कर रहे होंगे। मुझे वहां जाकर देखना है। मैं फिर कभी फुर्सत से आऊंगी।”
अल्पना ने बहुत रोका, “अरे, थोड़ा सा तो खा ले! भूखे पेट जाएगी?”
लेकिन शालिनी के पैर वहां एक पल भी टिकने को तैयार नहीं थे। वह किसी और ही दुनिया में पहुंच चुकी थी। वह दोनों बच्चों का हाथ खींचते हुए तेजी से बाहर निकल आई। गाड़ी में बैठते ही उसके मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर फूड डिलीवरी ऐप के डिलीवरी बॉय का नंबर चमक रहा था, जो दोपहर के खाने का ऑर्डर लेकर उसके नए फ्लैट पर पहुंच चुका था।
शालिनी ने कांपती उंगलियों से फोन उठाया और बेहद दृढ़ आवाज में कहा, “भैया, हम घर पर नहीं हैं। आप वह खाना किसी जरूरतमंद को दे दीजिए, मैं अपना ऑर्डर कैंसिल कर रही हूं।”
उसने फोन काट दिया। गाड़ी चलाते हुए उसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसे याद आ रहा था कि पिछले कितने महीनों से उसने अपने घर के चूल्हे पर ढंग से रोटी नहीं सेकी थी। हर दिन मोबाइल पर कुछ उंगलियां फिराकर बाहर का बासी, चिकनाई और मसालों से भरा खाना मंगा लिया जाता था। उसकी बूढ़ी सास उस सख्त, रबड़ जैसी तंदूरी रोटियों को कटोरी के गर्म पानी में भिगो-भिगोकर चबाने की कोशिश करती थीं, क्योंकि उनके कमजोर दांतों में इतनी ताकत नहीं थी। कई रातें उस बूढ़ी मां ने सिर्फ आधा पेट खाकर या भूखे ही गुजार दी थीं, पर कभी शिकायत का एक लफ्ज जुबान पर नहीं लाया था।
शालिनी ने रास्ते में ही गाड़ी एक सब्जी मंडी के सामने रोकी। उसने ताजी हरी मेथी, नए छोटे आलू, अदरक, हरी मिर्च और शुद्ध चक्की का आटा खरीदा।
घर पहुंचकर उसने सबसे पहले बच्चों को सख्त हिदायत दी कि वे अपने हाथ-पैर अच्छी तरह धोएं और कपड़े बदलें। फिर वह सीधे रसोई में गई। उसने अपने हाथ से मेथी को साफ किया, आलुओं को काटा और मसालों की सौंधी महक के साथ मेथी-आलू की सूखी सब्जी छौंकी। एक तरफ उसने तवे पर शुद्ध घी की खस्ता पूड़ियां और नरम फुलके सेकने शुरू किए।
पूरे घर में बरसों बाद सात्विक और ताजे खाने की वह खुशबू फैल गई जो किसी भी घर को ‘स्वर्ग’ बना देती है।
शालिनी ने सबसे पहले एक साफ थाली सजाई। उसमें गरमा-गरम मेथी-आलू की सब्जी, फूली हुई पूड़ियां, ताजा दही और थोड़ा सा गुड़ रखा। वह थाली लेकर सीधे अपनी सास के कमरे में गई।
सास बिस्तर पर बैठी माला फेर रही थीं। शालिनी ने नीचे फर्श पर एक साफ दरी बिछाई और आगे बढ़कर सास के चरण स्पर्श किए। सास चौंक गईं।
“अरे बहू, यह क्या कर रही हो? तबीयत तो ठीक है ना तुम्हारी?”
शालिनी की आंखों से पश्चाताप के आंसू छलक पड़े। उसने सास का हाथ थामते हुए रुंधे गले से कहा, “मां जी, मेरी तबीयत तो ठीक थी, पर मेरी मति मारी गई थी। मुझे माफ कर दीजिए मां। इतने दिनों तक मैंने आपको बाहर की सूखी और बेस्वाद रोटियां खिलाईं, आपका अनादर किया। आज अपनी इस अंधी बहू का यह छोटा सा प्रायश्चित स्वीकार कर लीजिए। आज हम सब आपके साथ नीचे बैठकर खाना खाएंगे।”
शालिनी ने बाहर आवाज लगाई। आरव और मायरा सहमे हुए अंदर आए। शालिनी ने दोनों को दादी के पैरों के पास बैठाया। उसने मयंक को भी पुकारा जो अभी-अभी दफ्तर से लौटे थे। मयंक कमरे का यह नजारा देखकर स्तब्ध रह गए।
सबने नीचे बैठकर, हाथ जोड़कर ईश्वर को धन्यवाद दिया और पहला निवाला मुंह में रखा। नरम पूड़ी और ताजी सब्जी का स्वाद लेते ही सास की आंखों में बरसों बाद तृप्ति और सुख के आंसू छलक आए। न जाने कितने महीनों बाद उस बूढ़ी मां ने भरपेट और मनपसंद खाना खाया था।
मयंक ने अपनी पत्नी के इस बदले हुए रूप, चेहरे की सौम्यता और घर में लौटी शांति को देखकर मुस्कुराते हुए चुटकी ली, “अरे वाह शालिनी! आज तो घर सचमुच घर लग रहा है। अगर अल्पना भाभी के घर जाकर ऐसा चमत्कार होता है, तो मेरा सुझाव है कि तुम महीने में दो-चार बार उनके घर हो आया करो!”
कमरे में ठहाका गूंज उठा। शालिनी ने नजरें झुकाकर मुस्कुराते हुए अपनी सास के हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
उस दिन शालिनी ने समझ लिया था कि संस्कार किसी महंगे स्कूल की किताबों में नहीं पढ़ाए जाते, और न ही आधुनिकता का मतलब अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने बुजुर्गों को भूल जाना होता है। असली संपन्नता डाइनिंग टेबल की कीमत में नहीं, बल्कि जमीन पर बैठकर पूरे परिवार के साथ एक थाली में प्रेम और आदर का निवाला बांटने में होती है।
आपके विचार: क्या आपको भी लगता है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और ऑनलाइन फूड कल्चर ने हमारे घरों से परिवार के साथ नीचे बैठकर भोजन करने की पवित्र परंपरा और बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता को छीन लिया है? क्या आधुनिक बनने की होड़ में हम अपने बच्चों को बुनियादी संस्कार देना भूलते जा रहे हैं? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : मीनाक्षी सिंह