वकील साहब ने आगे कहा, “जानकी भाभी ने आज सुबह ही इस निरस्तीकरण याचिका पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही तुम्हारे पापा की चारों दुकानें, यह पुश्तैनी मकान और बैंक के सारे खाते वापस जानकी भाभी के अधिकार में जा रहे हैं। और हां, पिछले डेढ़ साल से जिस तरह तुमने उन्हें हर महीने के इकतीसवें दिन भूखा रखा और घर से बेदखल किया, उसके आधार पर तुम दोनों के खिलाफ घरेलू हिंसा और बुजुर्ग उत्पीड़न का आपराधिक मुकदमा भी दर्ज करवाया जा रहा है। पुलिस बस आने ही वाली है।”
अभी बमुश्किल दो साल पहले की ही तो बात थी, जब जानकी देवी और उनके पति त्रिलोकीनाथ जी के चेहरे पर ऐसा सुकून था मानो जीवन की सारी जंग जीत ली हो। त्रिलोकीनाथ जी रेलवे से क्लास-वन अफसर पद से रिटायर हुए थे। उन्होंने जीवन भर पाई-पाई जोड़कर शहर में चार दुकानें, एक बड़ा मकान और बैंक में अच्छी खासी रकम जमा की थी। बड़ी बेटी रंजना का ब्याह रायपुर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार में बड़े ही धूमधाम से किया था। दो साल पहले छोटे बेटे प्रणय की शादी भी जबलपुर की एक संभ्रांत परिवार की लड़की अंकिता से संपन्न हो गई।
दोनों बच्चों के हाथ पीले करने के बाद त्रिलोकीनाथ जी अपने को जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त महसूस कर रहे थे। एक शाम उन्होंने जानकी देवी से कहा था, “जानकी, अब हम अपनी उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां से आगे सिर्फ ईश्वर का नाम लेना बाकी है। हम यह सारी जायदाद अपने साथ तो बांधकर ले नहीं जाएंगे। मैं चाहता हूं कि जीते-जी बच्चों के बीच सब कुछ साफ-सुथरा कर दूं, ताकि कल को कोई मनमुटाव न रहे। समाज कहता है कि बेटियों का कोई हक नहीं होता, लेकिन मैं अपनी रंजना को बेटे के बराबर ही मानूंगा।”
जानकी देवी ने तब पति को समझाने की हल्की कोशिश की थी, “सुनिए जी, सब कुछ अभी से बांट देना ठीक नहीं। अपने पास भी तो कुछ सहारा होना चाहिए। बुढ़ापे में हाथ खाली हो तो इंसान की कद्र नहीं रहती।”
लेकिन त्रिलोकीनाथ जी ने अपनी पत्नी की शंका को हंसकर उड़ा दिया था, “अरे जानकी, तुमने अपने बच्चों को अपने दूध से सींचा है। प्रणय मेरा श्रवण कुमार है और रंजना मेरी लाडली। हमारे बच्चे वैसे नहीं हैं जो संपत्ति देखकर प्यार करें। तुम बेवजह डरती हो।”
अगले ही हफ्ते त्रिलोकीनाथ जी ने वकील को बुलाकर पूरी संपत्ति के दो बराबर टुकड़े कर दिए। दो दुकानें और बैंक की आधी फिक्स्ड डिपॉजिट बेटी रंजना के नाम कर दीं, और दो दुकानें व पुश्तैनी मकान का बड़ा हिस्सा बेटे प्रणय के नाम कर दिया। शहर भर में त्रिलोकीनाथ जी की खूब वाह-वाही हुई। अखबारों और रिश्तेदारों में चर्चा छिड़ गई कि त्रिलोकी बाबू ने बेटी को बेटे के बराबर संपत्ति देकर कितना प्रगतिशील और महान काम किया है। हर कोई उनके संस्कारों की कसमें खाता था।
लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। संपत्ति के बंटवारे को अभी छह महीने भी नहीं बीते थे कि एक दिन सुबह की सैर पर निकले त्रिलोकीनाथ जी को अचानक सीने में तेज दर्द उठा। अस्पताल ले जाते-जाते उनकी सांसों की डोर टूट गई। मैसिव हार्ट अटैक ने हसते-खेलते संसार को एक झटके में उजाड़ दिया।
त्रिलोकीनाथ जी के चले जाने के बाद उस विशाल घर में जानकी देवी अकेली रह गईं। तेरहवीं की रस्में खत्म होते ही जैसे हवा का रुख बदल गया। जिस दिन रिश्तेदार विदा हुए, उसी शाम घर के भीतर की कड़वाहट खुलकर सतह पर आ गई।
शुरुआत बहू अंकिता ने की। उसने डाइनिंग टेबल पर पानी का गिलास रखते हुए साफ शब्दों में कहा, “देखिए प्रणय, अब पापा जी नहीं रहे। हमारा अपना खर्चा है, बच्चों की महंगी स्कूल फीस है और आपकी प्राइवेट नौकरी में कोई पेंशन तो मिलने से रही। दीदी ने पूरी आधी जायदाद पर हक जमाया है। दो प्राइम लोकेशन की दुकानें उनके हिस्से में हैं, जिनसे हर महीने मोटा किराया आता है। जब जायदाद में आधा हिस्सा लिया है, तो सास की सेवा का जिम्मा भी तो आधा होना चाहिए। पूरी जिम्मेदारी हमारे सिर क्यों मढ़ी जाए? दीदी को कहिए कि मां जी को आधे समय अपने पास रखें।”
प्रणय ने अपनी बहन रंजना को फोन मिलाया। लेकिन रंजना ने तुरंत अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, “भैया, यह तुम क्या कह रहे हो? हमारे समाज में मां तो बेटे और बहू के घर ही अच्छी लगती है। बेटी के घर मां का रहना क्या शोभा देता है? ससुराल वाले क्या कहेंगे? और वैसे भी, वो दुकानें पापा ने मुझे अपनी मर्जी से दी थीं, वो मेरा हक था। उसका मां की सेवा से क्या लेना-देना?”
दोनों तरफ से तीखी बहस हुई। शब्दों के बाण चले। कोई भी उस बूढ़ी मां को अपने पास पूर्णकालिक रूप से रखने को तैयार नहीं था, जिसने अपनी पूरी जवानी उन दोनों को पालने में खपा दी थी। जानकी देवी अपने कमरे के दरवाजे की ओट में खड़ी यह सब सुन रही थीं। उनकी आंखों से आंसुओं की धार बह रही थी, लेकिन आवाज हलक में ही घुट कर रह गई।
अंततः दोनों पक्षों के बीच एक बड़ा ही शर्मनाक और दिल दहला देने वाला समझौता हुआ। तय यह पाया कि महीने की पहली तारीख से पंद्रह तारीख तक जानकी देवी बेटे प्रणय के पास रहेंगी और बहू अंकिता उन्हें खाना देगी। फिर सोलह तारीख से लेकर महीने की तीस तारीख तक वे बेटी रंजना के घर रायपुर में रहेंगी।
यह फैसला किसी बुजुर्ग के लिए रोटी का नहीं, बल्कि उसकी आत्मा की नीलामी का फरमान था। जानकी देवी हर पंद्रह दिन पर अपना छोटा सा बक्सा समेटतीं और बस में बैठकर कभी बिलासपुर तो कभी रायपुर के चक्कर काटतीं।
बेटे के घर जब पंद्रह तारीख की शाम होती, तो बहू अंकिता की निगाहें बार-बार दीवार घड़ी पर टिक जातीं। वह जानकी देवी के कमरे के बाहर आकर बर्तनों को जोर-जोर से पटकती और कहती, “प्रणय, अपनी बहन को फोन करो। आज पंद्रह तारीख हो गई है। कल सुबह की गाड़ी से मां जी को रवाना करो, हमारा कोटा आज रात को खत्म हो रहा है।”
और जब रंजना के घर जातीं, तो वहां दामाद के तंज और समधिन के तीखे बोल सुनने पड़ते। रंजना हर छोटी बात पर अहसान जताती, “मां, मैंने तो तुम्हारे लिए अपने कमरे का एसी चालू करवा दिया है, पर तुम्हारे बेटे ने कभी पूछा कि मेरी क्या हालत है?”
लेकिन इस अमानवीय बंटवारे का सबसे क्रूर चेहरा तब सामने आता था, जब कोई महीना इकतीस दिन का होता था।
तीस तारीख की रात को ही रंजना कह देती, “मां, मेरा पंद्रह दिन का हिसाब तीस तारीख की रात को पूरा हो गया। इकतीसवीं तारीख तो महीने के अतिरिक्त दिन में आती है, उसका जिम्मा मेरा नहीं है। आप भैया के घर जाइए।”
और जब वे बेटे के यहां पहुंचतीं, तो बहू अंकिता दरवाजे पर ही मुंह बिचका लेती, “अरे, आज इकतीस तारीख है! हमारा नियम तो पहली तारीख से शुरू होता है। आज के दिन का खाना हमारे बजट में नहीं है। आप जाकर मंदिर में बैठिए या किसी रिश्तेदार के यहां।”
नतीजा यह निकलता कि हर इकतीस तारीख को जानकी देवी को दिन भर भूखा-प्यासा रहकर उपवास का बहाना बनाना पड़ता था। वे मोहल्ले के मंदिर की सीढ़ियों पर जाकर बैठ जातीं और जब कोई पूछता, “अरे जानकी अम्मा, आज यहां कैसे?” तो वे आंसुओं को छुपाकर झूठी मुस्कान के साथ कह देतीं, “कुछ नहीं बेटा, आज एकादशी का निर्जला व्रत रखा है… बस भगवान के चरणों में बैठने का मन था।”
कोई नहीं जानता था कि वह उपवास किसी धर्म या आस्था का नहीं, बल्कि अपनी ही कोख से जन्मे बच्चों की बेरुखी का दिया हुआ एक खामोश घाव था। बूढ़े पेट की भूख को वो पानी के दो घूंट पीकर शांत कर लेती थीं, लेकिन आत्मा की उस भूख का क्या जो सिर्फ अपने बच्चों के थोड़े से मान-सम्मान के लिए तड़पती थी?
अक्टूबर का महीना था। यह महीना भी इकतीस दिनों का था। तीस अक्टूबर की दोपहर को रंजना ने अपनी मां का बक्सा ऑटो में रखवा दिया और बिलासपुर के लिए रवाना कर दिया। जब जानकी देवी शाम को बिलासपुर में प्रणय के घर की चौखट पर पहुंचीं, तो घर के मुख्य द्वार पर ताला लटक रहा था।
पड़ोस की एक महिला ने आकर बताया, “अरे जानकी मौसी, आप आ गईं? प्रणय भैया और अंकिता भाभी तो बच्चों को लेकर दो दिन के लिए किसी शादी में बाहर गए हैं। वो कह रहे थे कि मां तो एक तारीख को आने वाली हैं, इसलिए वो परसों सुबह लौटेंगे।”
जानकी देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। बाहर सर्द हवाएं चलने लगी थीं। शाम का अंधेरा गहरा रहा था। उनके पास न तो घर की चाबी थी और न ही जेब में कोई पैसा बचा था। पेंशन की जो थोड़ी बहुत रकम मिलती थी, वह भी कभी बेटे के राशन में तो कभी बेटी की दवाइयों के नाम पर दोनों छीन चुके थे।
वे अपने बक्से पर ही सिर रखकर उस बंद दरवाजे की दहलीज पर बैठ गईं। ठंड से उनके बूढ़े हाथ-पैर कांप रहे थे। भूख के मारे पेट में मरोड़ उठ रहे थे।
तभी सामने वाली गली से एक कार आकर रुकी। कार से एक नौजवान उतरा। वह कोई और नहीं, बल्कि मोहल्ले का ही लड़का राघव था। राघव बचपन में उसी मोहल्ले में रहता था। उसके पिता एक मामूली दर्जी थे। जब राघव की इंजीनियरिंग की फीस भरने के पैसे नहीं थे, तब त्रिलोकीनाथ जी और जानकी देवी ने उसकी पूरी पढ़ाई का खर्च चुपचाप उठाया था। आज राघव बेंगलुरु की एक बड़ी टेक कंपनी में बड़े पद पर कार्यरत था और दिवाली की छुट्टियों में अपने घर आया हुआ था।
राघव ने जब अंधेरे में जानकी देवी को इस हाल में ठिठुरते देखा, तो वह दौड़कर उनके पास आया।
“दादी! आप यहां बाहर इस ठंड में क्यों बैठी हैं? घर का दरवाजा क्यों बंद है?” राघव ने हैरान होकर पूछा।
जानकी देवी ने अपने आंसुओं को छुपाने की कोशिश की, “कुछ नहीं राघव बेटा… वो प्रणय किसी काम से बाहर गया है। बस आता ही होगा।”
लेकिन राघव कोई अनजान नहीं था। मोहल्ले भर में इस बंटवारे और इकतीसवें दिन के उपवास की चर्चा फैल चुकी थी। राघव ने जब जानकी देवी का थरथराता हुआ बदन और उनके चेहरे की बेबसी देखी, तो उसका दिल पसीज गया। उसकी आंखों में आंसू और सीने में गुस्सा भर आया।
राघव ने बिना एक पल गंवाए जानकी देवी का बक्सा अपनी गाड़ी में रखा और उनका हाथ पकड़कर सहारा देते हुए बोला, “दादी, अब आप इस चौखट पर एक पल भी नहीं बैठेंगी। चलिए मेरे साथ।”
“नहीं बेटा, लोग क्या कहेंगे… बेटी-बहू के होते हुए मैं किसी पराए के घर…” जानकी देवी ने संकोच से कहा।
राघव ने हाथ जोड़कर कहा, “दादी, जिन्होंने आपको जन्म दिया वो पराए हो चुके हैं, और जिसने आपकी बदौलत अपनी जिंदगी संवारी, वो पराया कैसे हो सकता है? अगर आज त्रिलोकी दादाजी जिंदा होते, तो क्या मुझे इस हाल में सड़क पर छोड़ देते? आप मेरी सगी दादी से बढ़कर हैं।”
राघव जानकी देवी को अपने घर ले गया। राघव की मां और पत्नी ने जैसे ही जानकी देवी को देखा, उन्होंने बड़े आदर से उन्हें गले लगाया। तुरंत उनके लिए गर्म खिचड़ी बनाई गई, उन्हें गर्म दूध दिया गया और एक साफ, सुंदर कमरे में नर्म रजाई ओढ़ाकर सुलाया गया। महीनों बाद उस रात जानकी देवी को किसी अपमान के डर के बिना चैन की नींद आई।
अगले दिन इकतीस अक्टूबर था। सुबह-सुबह राघव ने एक बड़ा कदम उठाने का फैसला किया। उसने शहर के जाने-माने वकील, जो त्रिलोकीनाथ जी के पुराने साथी भी थे, उनको फोन करके अपने घर बुला लिया।
दोपहर तक प्रणय और अंकिता अपनी गाड़ी से लौटे। जब उन्होंने घर के बाहर मां को नहीं देखा, तो उन्हें कोई खास चिंता नहीं हुई। उन्होंने सोचा कि किसी मंदिर में बैठी होंगी, शाम तक आ जाएंगी। तभी रंजना और उसके पति भी अपनी गाड़ी से बिलासपुर पहुंचे। वे दिवाली के सिलसिले में कुछ खरीदारी करने आए थे और औपचारिकता निभाने के लिए मायके रुक गए थे।
दोनों भाई-बहन ड्राइंग रूम में बैठकर आराम से चाय पी रहे थे।
तभी राघव, वकील साहब और मोहल्ले के चार प्रतिष्ठित बुजुर्गों के साथ उनके घर में दाखिल हुआ। राघव के चेहरे पर एक कठोर गंभीरता थी।
प्रणय ने चौंककर पूछा, “राघव? तुम यहां इस वक्त? और वकील साहब आप सब लोग इस तरह अचानक?”
राघव ने बहुत ही शांत लेकिन तीखे स्वर में कहा, “प्रणय भैया, रंजना दीदी… हम यहां किसी औपचारिकता के लिए नहीं आए हैं। हम यहां आपकी उस मां का हिसाब करने आए हैं जिसे आपने कैलेंडर की तारीखों में बांट रखा है।”
अंकिता ने भड़कते हुए कहा, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई हमारे पारिवारिक मामलों में दखल देने की? मां जी कहां हैं?”
वकील साहब ने अपने चश्मे को ठीक करते हुए आगे बढ़कर मेज पर एक कानूनी नोटिस की फाइल रखी। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, “अंकिता बहू, आवाज नीची रखिए। यह कानूनी नोटिस है। शायद आप लोगों को यह गुमान है कि स्वर्गीय त्रिलोकीनाथ जी ने जो संपत्ति आप दोनों के नाम आधी-आधी बांटी थी, वो अब आपकी बपौती हो चुकी है और आप अपनी मां को सड़क पर फेंक सकते हैं।”
रंजना का चेहरा पीला पड़ गया, “वकील अंकल, वो रजिस्ट्री तो पक्की हो चुकी है। अब उसमें क्या हो सकता है?”
वकील साहब ने कड़क आवाज में कहा, “शायद तुम दोनों भूल गए हो कि तुम्हारे पिता ने संपत्ति दान पत्र (गिफ्ट डीड) के तहत दी थी। और भारत सरकार के सीनियर सिटीजन एक्ट (माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम) के तहत, यदि कोई संतान संपत्ति लेने के बाद अपने बुजुर्ग माता-पिता की उचित देखभाल, भोजन, सम्मान और सुरक्षा नहीं करती, तो माता-पिता को यह कानूनी अधिकार है कि वे उस डीड को एक झटके में रद्द करवा सकते हैं!”
कमरे में मानो सन्नाटा पसर गया। प्रणय और रंजना के होश उड़ गए।
वकील साहब ने आगे कहा, “जानकी भाभी ने आज सुबह ही इस निरस्तीकरण याचिका पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही तुम्हारे पापा की चारों दुकानें, यह पुश्तैनी मकान और बैंक के सारे खाते वापस जानकी भाभी के अधिकार में जा रहे हैं। और हां, पिछले डेढ़ साल से जिस तरह तुमने उन्हें हर महीने के इकतीसवें दिन भूखा रखा और घर से बेदखल किया, उसके आधार पर तुम दोनों के खिलाफ घरेलू हिंसा और बुजुर्ग उत्पीड़न का आपराधिक मुकदमा भी दर्ज करवाया जा रहा है। पुलिस बस आने ही वाली है।”
‘जायदाद हाथ से चली जाएगी और जेल होगी…’ यह सुनते ही प्रणय के हाथ से चाय का कप छूटकर फर्श पर चकनाचूर हो गया। अंकिता के चेहरे का सारा घमंड पल भर में काफूर हो गया। रंजना का पति भी घबराकर खड़ा हो गया और रंजना को डांटने लगा, “मैंने तुमसे पहले ही कहा था कि मां को अपने पास रखो, पर तुमने मेरी एक न सुनी! अब भुगतो!”
प्रणय कांपते हुए घुटनों के बल गिर पड़ा। उसने राघव के पैर पकड़ लिए, “राघव भाई, प्लीज ऐसा मत करो। हम बर्बाद हो जाएंगे। दुकानें छिन गईं तो हम खाएंगे क्या? मां कहां हैं? मुझे मेरी मां से मिला दो!”
रंजना भी फूट-फूट कर रोने लगी, “वकील अंकल, हमें एक मौका दीजिए। हम अपनी मां को सिर-आंखों पर रखेंगे। हमसे बहुत बड़ा गुनाह हो गया।”
तभी दरवाजे का पर्दा हटा और जानकी देवी धीरे-धीरे कमरे में दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर वही ममता, लेकिन साथ में एक नया आत्मसम्मान और गरिमा थी।
प्रणय और रंजना घिसटते हुए अपनी मां के पैरों में गिर पड़े।
“मां! हमें माफ कर दो मां! हम अंधे हो गए थे। हमने उस दौलत के लिए तुम्हें बांट दिया जिसने तुम्हें कभी खुशी नहीं दी। मां, हमें जेल मत भिजवाओ, हमसे यह मकान और दुकानें मत छीनो… हम तुम्हारे बिना कहीं के नहीं रहेंगे,” दोनों बिलख-बिलख कर रो रहे थे।
जानकी देवी ने अपने उन दोनों बच्चों को देखा। उनके दिल में एक मां की ममता ने फिर करवट ली, लेकिन इस बार वह ममता अंधी नहीं थी। उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए।
जानकी देवी ने बहुत ही सधे हुए और दृढ़ स्वर में कहा, “उठो प्रणय, उठो रंजना। आज तुम मेरी ममता के लिए नहीं रो रहे हो, आज तुम उस संपत्ति के छिन जाने के डर से रो रहे हो जिसके लिए तुमने अपनी मां का सौदा कर दिया था। तुम्हारे पिता ने मुझे हमेशा समझाया था कि बच्चे ही हमारी असली वसीयत होते हैं। पर तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे लिए मैं सिर्फ एक बोझ थी, जिसे तारीखों के तराजू में तौला जाता था।”
कमरे में खड़े सभी लोग चुपचाप जानकी देवी को देख रहे थे।
जानकी देवी ने आगे कहा, “मैं तुम्हें जेल नहीं भिजवाऊंगी, क्योंकि मेरी कोख इतनी कमजोर नहीं है कि अपने ही बच्चों को सलाखों के पीछे देखकर खुश हो सके। लेकिन अब मैं तुम दोनों में से किसी के टुकड़ों पर भी नहीं पलूंगी। वकील साहब, इन दुकानों और इस मकान की रजिस्ट्री रद्द करवाइए। अब यह पूरी संपत्ति एक ट्रस्ट बनेगी। इन दुकानों से आने वाले किराए से इसी शहर में बेसहारा बुजुर्गों के लिए ‘संध्या छाया’ नाम से एक अन्नक्षेत्र और आश्रय चलेगा। और मैं… मैं अपने इस पुश्तैनी मकान के एक हिस्से में अपने स्वाभिमान के साथ रहूंगी।”
प्रणय और रंजना ने जब देखा कि मां का फैसला पत्थर की लकीर बन चुका है, तो उनकी आत्माएं शर्म से तार-तार हो गईं। वे समझ चुके थे कि उन्होंने सिर्फ दौलत नहीं खोई थी, बल्कि उस ईश्वर रूपी साए को हमेशा के लिए खो दिया था जिसकी दुआएं उनकी तरक्की का सबब थीं।
जानकी देवी ने राघव के सिर पर हाथ रखा, “बेटा राघव, तूने आज मुझे सिर्फ रोटी नहीं दी, मुझे जीने का मकसद और मेरा खोया हुआ सम्मान लौटा दिया। इंसानियत कभी सगे-पराए का भेद नहीं देखती।”
उस दिन के बाद, बिलासपुर की उस पुश्तैनी हवेली में फिर कभी कोई इकतीसवां दिन उपवास का दिन नहीं बना। जानकी देवी ने अपनी बाकी जिंदगी समाज के उन बुजुर्गों की सेवा में लगा दी जिन्हें उनके अपने ठुकरा चुके थे। और प्रणय व रंजना, अपनी ही बनाई स्वार्थ की चारदीवारी में पश्चाताप की आग में जलते हुए यह सीख गए कि मां-बाप का आशीर्वाद दुनिया की किसी भी वसीयत से कहीं बड़ा होता है।
आज के समाज में बुजुर्गों को संपत्ति के बंटवारे के साथ तारीखों और जिम्मेदारियों में बांट देना एक कड़वी सच्चाई बन चुका है। क्या आपको भी लगता है कि माता-पिता को जीते-जी अपनी सारी संपत्ति बच्चों के नाम नहीं करनी चाहिए, और बुजुर्गों का स्वाभिमान ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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लेखक
एम पी सिंह