आँचल की छाँव

 कल्याणी फफक-फफक कर रो पड़ी। पूरा मंडप उस भावुक दृश्य को देखकर सन्न रह गया। वहाँ मौजूद हर आँख नम थी। पीहू अपनी भाभी माँ के गले से लिपट गई और दोनों इस तरह रोईं जैसे कोई माँ अपनी सगी बेटी को विदा कर रही हो। पीहू के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने सिसकते हुए कहा, “भाभी माँ, अगले जन्म में भी मुझे आपकी ही बेटी बनाकर भेजना। आपके बिना मेरी कोई पहचान नहीं है।”

 परिवार में सबसे छोटी और सबकी लाडली थी सात बरस की पीहू। पीहू पूरे घर की धड़कन थी। गोल-मटोल चेहरा, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें और हर समय चेहरे पर थिरकती हुई एक मासूम सी मुस्कान। घर में दो बड़े भाई थे और माता-पिता, पर पीहू सबसे छोटी होने के कारण सबकी आँखों का तारा थी।

घर में उत्सव का माहौल तब और बढ़ गया जब बड़े बेटे आलोक का विवाह संपन्न हुआ और घर में नई बहू कल्याणी का आगमन हुआ। कल्याणी स्वभाव से बेहद शालीन, मृदुभाषी और सुलझे हुए विचारों वाली थी। नए घर की चौखट लांघते समय हर नई बहू के दिल में एक अनजाना डर और झिझक होती है, वही कल्याणी के मन में भी थी। वह सोच रही थी कि इस बड़े परिवार में वह खुद को कैसे ढाल पाएगी। लेकिन गृह-प्रवेश के ठीक बाद, जब कल्याणी बैठक में घूँघट की ओट में बैठी थी, तभी एक नन्ही सी आवाज़ ने पूरे कमरे की खामोशी तोड़ दी।

“अम्मा! ज़रा देखो तो, भैया हमारे लिए कितनी प्यारी भाभी लेकर आए हैं! ऐसा लगता है जैसे परियों के देश से कोई परी उतर आई हो। अम्मा, अब हम सब भाभी को पलकों पर बिठाकर रखेंगे!” सात साल की पीहू अपनी माँ यशोदा जी की साड़ी का पल्लू खींचते हुए चहक रही थी।

कल्याणी ने घूँघट के भीतर से उस नन्हीं बच्ची को देखा, जिसकी आँखों में छल-कपट का कोई नामो-निशान नहीं था, केवल असीम स्नेह और अपनत्व बह रहा था। कल्याणी का सारा संकोच उस एक पल में हवा हो गया। उसने धीरे से घूँघट हटाया और पीहू को देखकर मुस्कुरा दी। पीहू दौड़कर आई और बिना किसी हिचक के अपनी नई भाभी की गोद में जाकर बैठ गई। बस, उसी दिन से उन दोनों के बीच एक ऐसा अटूट बंधन बँध गया जिसकी मिसाल आगे चलकर पूरा खानदान देने वाला था।

दिन भर घर में केवल एक ही गूँज सुनाई देती—”मेरी भाभी कहाँ हैं? मेरी भाभी क्या कर रही हैं?” पीहू अपनी नन्हीं परछाई की तरह कल्याणी के आगे-पीछे घूमती रहती। कल्याणी रसोई में होती तो पीहू वहीं चबूतरे पर बैठकर स्कूल की कहानियाँ सुनाती। कल्याणी जब पूजा करती तो पीहू अगरबत्ती थमाती। कल्याणी अपने मायके को बहुत पीछे छोड़ आई थी, पर पीहू की मासूम बातों और लाड़-प्यार ने उसे कभी अपने मायके के अकेलेपन का अहसास तक नहीं होने दिया।

शादी के बारह दिन बाद जब रस्म के मुताबिक कल्याणी पहली बार अपने मायके विदा हुई, तो घर का सन्नाटा देखने लायक था। आलोक को अपनी दुल्हन के जाने का उतना दुख नहीं हुआ जितना पीहू को हुआ। वह दिन-भर कमरे के एक कोने में मुँह फुलाकर बैठी रहती। खाना खाने के नाम पर सिर्फ़ दो निवाले तोड़ती और रोने लगती।

“अम्मा, भाभी कब आएँगी? तुम भैया से कहो ना कि आज ही भाभी को ले आएँ। भाभी के बिना यह बड़ा सा घर मुझे डरावना लगता है,” पीहू की आँखें भर आतीं।

यशोदा जी ने बेटी को पुचकारते हुए समझाया, “अरे मेरी गुड़िया, भाभी अपने अम्मा-बाबूजी से मिलने गई हैं। दो-चार दिन में तेरे भैया जाकर उन्हें लिवा लाएँगे।”

पर पीहू कहाँ मानने वाली थी! उसने ज़िद पकड़ ली कि जब भैया भाभी को लेने जाएँगे, तो वह भी साथ जाएगी। उसकी मासूम ज़िद के आगे किसी की न चली और आलोक को पीहू को साथ लेकर ही अपनी ससुराल जाना पड़ा।

कार जैसे ही कल्याणी के मायके के दरवाज़े पर रुकी, पीहू गाड़ी का दरवाज़ा खुलते ही भागी और सीधे कल्याणी के गले से लिपट गई। “भाभी! आप हमें छोड़कर क्यों आ गईं? आपके बिना घर बिल्कुल अच्छा नहीं लगता!” कल्याणी ने उस नन्ही ननद को अपनी छाती से चिपका लिया और उसके गालों को चूमते हुए बोली, “मेरी जान, मैं कहीं नहीं जा रही, अब हमेशा तुम्हारे पास रहूँगी।” कल्याणी के मायके वाले भी इस नन्ही ननद का अपनी भाभी के प्रति ऐसा बेपनाह प्यार देखकर दंग रह गए। दो दिन बाद जब कल्याणी वापस ससुराल लौटी, तो पीहू की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था।

ससुराल वापसी के बाद नई बहू से पहली रसोई की रस्म करवाई गई। कल्याणी ने बड़े चाव से बादाम और केसर डालकर मूँग की दाल का हलवा बनाया। परिवार के सभी सदस्यों ने बड़े प्रेम से खाया और बहू के हुनर की दिल खोलकर तारीफ़ की। ससुर जी और यशोदा जी ने शगुन के रूप में सोने की एक सुंदर चेन और कंगन बहू की झोली में डाले।

पीहू एक कोने में खड़ी सब देख रही थी। उसने अचानक आगे आकर कहा, “अम्मा, सबने भाभी को कुछ न कुछ तोहफ़ा दिया है। मैं भी अपनी भाभी को सबसे अच्छा उपहार दूँगी!”

यशोदा जी हँस पड़ीं और बोलीं, “हाँ बिटिया, ज़रूर देना। जो तेरा मन करे दे देना।”

उस रात जब पूरा घर सो गया, सात साल की पीहू अपने स्टडी टेबल पर बैठी रही। उसने अपने गुल्लक से रंग-बिरंगे स्केच पेन और चार्ट पेपर निकाले। उसने पूरी रात जागकर एक सुंदर सा ग्रीटिंग कार्ड बनाया। उस कार्ड पर उसने अपनी टूटी-फूटी ड्राइंग से एक तस्वीर बनाई—एक तरफ़ एक बड़ी सी गुड़िया जैसी भाभी और दूसरी तरफ़ उसका हाथ थामे एक छोटी सी लड़की। नीचे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा—‘मेरी दुनिया की सबसे प्यारी भाभी माँ, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूँ!’

अगली सुबह जब कल्याणी चाय लेकर कमरे में आई, तो पीहू ने दोनों हाथों से वह कार्ड कल्याणी के आगे कर दिया। कल्याणी ने जब वह कार्ड खोला और उस पर मासूम उँगलियों से उकेरी गई तस्वीर और वो शब्द पढ़े, तो उसकी आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसने सोचा कि दुनिया में लोग कहते हैं कि ससुराल में अपना कोई नहीं होता, लेकिन यहाँ तो इस नन्हीं जान ने अपनी पूरी दुनिया ही उसके नाम कर दी थी। उस दिन के बाद से कल्याणी के दिल में पीहू के लिए एक ऐसा कोना बन गया जो सिर्फ़ एक माँ के दिल में अपनी औलाद के लिए होता है।

शादी का एक साल गुज़रते-गुज़रते घर की पूरी तस्वीर बदल गई। पीहू की हर ज़िम्मेदारी कल्याणी ने अपने हाथों में ले ली। सुबह स्कूल के लिए तैयार करना हो, दो चोटियाँ बाँधना हो, यूनिफॉर्म पर इस्त्री करना हो या रात को लोरी गाकर सुलाना—पीहू सिर्फ़ कल्याणी की आवाज़ पर ही उठती और सोती। भाभी कब भाभी से ‘भाभी माँ’ बन गई, और ननद कब एक लाडली बेटी के रूप में दिल में बस गई, किसी को भनक तक न लगी।

वक्त अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ता रहा। तीन साल बाद कल्याणी ने एक बेटे को जन्म दिया और उसके दो साल बाद दूसरा बेटा हुआ। पर कल्याणी के प्यार का तराज़ू कभी नहीं डगमगाया। उसके दोनों बेटों से पहले घर में पीहू की पसंद का ख्याल रखा जाता था।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। जब पीहू बारहवीं कक्षा में पहुँची, तो यशोदा जी की तबीयत अचानक बिगड़ी और एक गंभीर बीमारी के चलते वे इस नश्वर संसार को छोड़ गईं। माँ के जाने से पीहू की दुनिया उजड़ गई। वह कई दिनों तक बेसुध होकर रोती रही। लेकिन कल्याणी उस कठिन घड़ी में एक मज़बूत ढाल बनकर खड़ी हो गई। उसने पीहू को अपने आँचल में छुपा लिया और कहा, “पीहू, तेरी माँ भले ही चली गई हो, पर जब तक तेरी यह भाभी माँ ज़िंदा है, तू कभी खुद को अनाथ मत समझना। मैं तेरी माँ की कमी कभी महसूस नहीं होने दूँगी।”

और कल्याणी ने अपने इस वचन को एक तपस्या की तरह निभाया। उसने पीहू के ग्रेजुएशन से लेकर उसकी हर छोटी-बड़ी ज़रूरतों का इस कदर ख्याल रखा कि समाज में जो भी उन्हें देखता, यही कहता कि सगी माँ भी शायद इतना लाड़-दुलार न दे पाती।

अब पीहू चौबीस वर्ष की एक सुलझी हुई, रूपवान और संस्कारी युवती बन चुकी थी। परिवार में उसके विवाह की चर्चाएँ शुरू हुईं। कल्याणी ने रिश्तेदारों से साफ़ कह दिया, “मेरी बेटी के लिए रिश्ता ऐसा होना चाहिए जहाँ उसे रानी बनाकर रखा जाए। अगर ज़रा भी कोई खोट दिखा, तो मैं अपनी गुड़िया का हाथ किसी के हाथ में नहीं दूँगी।”

कल्याणी ने महीनों की खोजबीन के बाद एक सुशिक्षित और प्रतिष्ठित परिवार का रिश्ता चुना। लड़का मयंक, जो एक बड़ी कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर था, स्वभाव से बेहद भद्र और संस्कारी था। परिवार का इकलौता बेटा और एक छोटी बहन। जब दोनों परिवारों की मुलाकात हुई, तो रिश्ता पक्का हो गया।

घर में शहनाइयों की गूँज सुनाई देने लगी। कल्याणी विवाह की हर तैयारी खुद अपनी देखरेख में कर रही थी। बाज़ार से एक-एक साड़ी, गहने, बर्तन और पीहू की पसंद का हर छोटा-मोटा सामान कल्याणी ने रात-दिन एक करके जुटाया। लेकिन जैसे-जैसे शादी की तारीख नज़दीक आ रही थी, कल्याणी का दिल भीतर ही भीतर तड़प रहा था। रात को जब सब सो जाते, तो वह पीहू के बचपन के पुराने खिलौने और वह पहला ग्रीटिंग कार्ड निकालकर अपनी छाती से लगाकर रोती थी। जिस बच्ची को उसने पंद्रह बरसों तक अपनी पलकों पर पाला था, आज वही बच्ची पराए घर जाने वाली थी। कलेजे के टुकड़े को किसी और को सौंपना एक माँ के लिए कितना असहनीय होता है, यह दर्द कल्याणी पल-पल महसूस कर रही थी।

विवाह का दिन आ गया। लाल जोड़े में सजी पीहू साक्षात लक्ष्मी का रूप लग रही थी। मंडप में मंत्रोच्चार गूँज रहे थे। जब कन्यादान का समय आया, तो पंडित जी ने पूछा, “कन्या के माता-पिता आगे आएँ।”

आलोक ने नम आँखों से अपनी पत्नी कल्याणी की ओर देखा और कहा, “पंडित जी, पीहू की माँ तो सालों पहले चली गई थीं, पर इस घर में उसकी एक माँ हमेशा मौजूद रही है। पीहू का कन्यादान उसकी भाभी माँ ही करेगी।”

कल्याणी काँपते कदमों से आगे बढ़ी। उसने पीहू का कोमल हाथ दामाद मयंक के हाथों में सौंपा। उस समय कल्याणी का पूरा शरीर काँप रहा था। उसकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली।

उसने हाथ जोड़कर मयंक और उसके माता-पिता से भर्राई हुई आवाज़ में कहा, “मैं सुनंदा… मेरी पीहू की सगी माँ नहीं हूँ। पर ईश्वर गवाह है कि मैंने इसे अपनी कोख से जन्मे बच्चों से भी बढ़कर पाला है। आज अपने दिल का सबसे नाज़ुक टुकड़ा आपके हाथों में सौंप रही हूँ। मेरी बच्ची ने कभी कोई दुख नहीं देखा। अगर कभी इससे कोई भूल हो जाए, तो इसे अपनी बेटी समझकर माफ़ कर दीजिएगा, पर कभी इसकी आँखों में आँसू मत आने दीजिएगा। आज मैं अपना फ़र्ज़ निभाकर खुश तो हूँ, लेकिन एक माँ का दिल इस जुदाई को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा…”

कल्याणी फफक-फफक कर रो पड़ी। पूरा मंडप उस भावुक दृश्य को देखकर सन्न रह गया। वहाँ मौजूद हर आँख नम थी। पीहू अपनी भाभी माँ के गले से लिपट गई और दोनों इस तरह रोईं जैसे कोई माँ अपनी सगी बेटी को विदा कर रही हो। पीहू के आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने सिसकते हुए कहा, “भाभी माँ, अगले जन्म में भी मुझे आपकी ही बेटी बनाकर भेजना। आपके बिना मेरी कोई पहचान नहीं है।”

कल्याणी ने बड़ी मुश्किल से अपने कलेजे पर पत्थर रखकर अपनी लाडली को संभाला, उसका माथा चूमा और उसे डोली में बैठाकर विदा किया।

सच्चाई तो यही है कि खून के रिश्ते कुदरत बनाती है, लेकिन जो रिश्ते रूह और दिल की गहराई से सींचे जाते हैं, वे संसार के हर बंधन से कहीं अधिक पवित्र और अटूट होते हैं। एक भाभी जब माँ बन जाए, तो वह पूरे मायके की जान बन जाती है।

यह कहानी उन सभी भाभियों और ननदों को समर्पित है जो समाज की बनाई पुरानी धारणाओं को तोड़कर प्यार, त्याग और सम्मान की एक नई मिसाल कायम करती हैं। क्या आपको लगता है कि अगर हर घर में भाभी और ननद का रिश्ता ऐसा माँ-बेटी जैसा बन जाए, तो कभी कोई परिवार बिखर सकता है? अपने जीवन के ऐसे ही अनमोल अनुभव और विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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