ताली दोनों हाथों से बजती है

  सरोजिनी जी सिद्धांतों की पक्की, बेहद सुलझी हुई और ममतामयी महिला थीं। उनके पति सरकारी बैंक से उच्च पद से सेवानिवृत्त हुए थे और अब एक संतोषी जीवन बिता रहे थे। परिवार में उनका बड़ा बेटा हर्षित, जो एक निजी कंपनी में आर्किटेक्ट था, उसकी पत्नी तूलिका और सरोजिनी जी की छोटी बेटी प्रज्ञा साथ रहते थे। प्रज्ञा अभी-अभी स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करके प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी।

घर की बहू तूलिका को इस घर में आए अभी मुश्किल से डेढ़ वर्ष हुआ था। वह एक साधारण, संस्कारी परिवार की बेटी थी और स्वभाव से बेहद विनम्र, कर्मठ और संवेदनशील थी। सुबह पाँच बजे उठने से लेकर रात को सबके सोने के बाद तक, तूलिका घर के हर छोटे-बड़े काम को अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी समझकर सहेजती थी। कभी ससुर जी के काढ़े का ध्यान रखना, कभी सास के घुटनों में तेल की मालिश करना, तो कभी पति के ऑफिस बैग में ज़रूरी फाइलें सहेजना—तूलिका ने बहुत कम समय में इस घर को अपना बना लिया था। सरोजिनी जी भी एक पारखी आँख वाली महिला थीं; उन्होंने देखा था कि बहू ने कभी किसी बात पर मुँह नहीं फुलाया और न ही कभी काम से जी चुराया।

परंतु घर की बेटी प्रज्ञा का स्वभाव थोड़ा अलग था। वह घर की सबसे छोटी और लाडली संतान थी, इसलिए उसमें एक अनजाना सा अधिकार भाव और ज़रा सा बचपना था। उसे अक्सर यह लगता था कि मायके में बेटी का स्थान हमेशा बहू से ऊपर होता है। जब भी घर में कोई नया काम होता या ज़िम्मेदारियों की बात आती, प्रज्ञा अनजाने में ही सही, यह मान बैठती थी कि गृहस्थी का सारा पसीना बहाना केवल बहू का कर्तव्य है। तूलिका ने कभी इस बात का बुरा नहीं माना। वह प्रज्ञा को अपनी छोटी बहन की तरह ही मानती थी और उसकी पढ़ाई के समय चुपचाप उसके कमरे में बादाम का दूध या शाम की चाय रख आती थी।

सर्दियों के एक शनिवार की बात है। उस दिन सुबह से ही घर में सामान्य दिनों की तुलना में कुछ ज़्यादा ही भागदौड़ थी। दरअसल, तूलिका ने एक दिन पहले ही पूरे घर की गहरी सफाई की थी, पर्दे बदले थे और ऊपर के कमरों की जाले साफ किए थे। उस अत्यधिक श्रम के कारण उसकी कमर और पैरों में तीव्र दर्द हो रहा था। रात को वह ठीक से सो भी नहीं पाई थी। सुबह उठकर भी उसने पूरे घर के लिए चाय, नाश्ता और दोपहर के खाने की आधी तैयारी पूरी निष्ठा से की। उसकी आँखों के नीचे हल्की सूजन थी और चेहरे पर स्पष्ट रूप से थकान की गहरी लकीरें तैर रही थीं।

उसी दोपहर करीब तीन बजे, तूलिका के कॉलेज के दिनों की तीन पुरानी सहेलियाँ अचानक उससे मिलने आ पहुँचीं। वे तीनों लगभग तीन साल बाद एक साथ मिल रही थीं और संयोगवश किसी पारिवारिक कार्यक्रम के सिलसिले में ग्वालियर आई हुई थीं। जब दरवाज़े पर घंटी बजी और तूलिका ने अपनी सहेलियों को देखा, तो उसकी थकी हुई आँखों में एक चमक सी दौड़ गई। उसने अपनी सहेलियों को बड़े आदर और उत्साह के साथ बैठक में बिठाया। वे सभी कॉलेज के दिनों की यादों में खो गईं और हँसी-मज़ाक का दौर शुरू हो गया।

तूलिका ने औपचारिकतावश कहा, “तुम लोग बैठो, मैं रसोई से फटाफट चाय और कुछ गरमा-गरम नाश्ता बनाकर लाती हूँ।” वह सोफे से उठने ही वाली थी कि उसकी कमर में एक तेज़ दर्द की टीस उठी। उसने अनजाने में ही अपनी कमर पर हाथ रख लिया और उसके मुँह से हल्की सी ‘सीह’ निकल गई।

बैठक के पास वाले कमरे में बैठी सरोजिनी जी ने यह सब अपनी आँखों से देख लिया था। उन्होंने सुबह ही भाँप लिया था कि तूलिका की तबीयत ठीक नहीं है और वह केवल अपने फर्ज़ के दबाव में खुद को घसीट रही है। सरोजिनी जी तुरंत बैठक में आईं। उन्होंने बहुत ही सौम्य मुस्कान के साथ तूलिका की सहेलियों का स्वागत किया। जब सहेलियों ने झुककर उनके चरण स्पर्श किए, तो सरोजिनी जी ने उन्हें ढेरों आशीर्वाद दिए।

फिर सरोजिनी जी ने तूलिका के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से कहा, “तूलिका, तू बैठ अपनी सहेलियों के साथ। कितने दिनों बाद तो तुम्हारी ये सहेलियाँ आई हैं। तुम लोग आराम से बातें करो, पुरानी यादें ताज़ा करो। चाय और नाश्ता मैं रसोई से अभी बनाकर लाती हूँ।”

तूलिका घबराकर तुरंत खड़ी होने लगी, “अरे नहीं माँ जी! आप क्यों तकलीफ करेंगी? आप बैठिए, मैं अभी दस मिनट में बना लाऊँगी।”

सरोजिनी जी ने हल्के से डाँटने के लहजे में उसे वापस सोफे पर बिठाया और कहा, “बहू, जब घर की बड़ी कह रही है तो बात सुन। तेरी कमर का दर्द मुझे दिख रहा है। तू बैठ, मैं अभी आती हूँ।”

इतना कहकर सरोजिनी जी रसोई की तरफ बढ़ गईं। उन्होंने चूल्हा जलाया, चाय की केतली चढ़ाई, उसमें अदरक और इलायची कूटी और साथ ही बेसन के पकोड़े तलने के लिए कड़ाही में तेल गरम करने लगीं।

उसी समय प्रज्ञा अपने कमरे से निकली। जब उसने रसोई से छौंक और खदकती हुई चाय की आवाज़ सुनी, तो वह पानी पीने के बहाने रसोई में आई। वहाँ का नज़ारा देखकर उसके पाँव ठिठक गए। उसने देखा कि उसकी साठ वर्षीय माँ, जो खुद घुटनों के दर्द की पुरानी मरीज थीं, गैस के आगे खड़ी होकर पकोड़े तल रही थीं और चाय उबाल रही थीं, जबकि बैठक से भाभी और उनकी सहेलियों के हँसने की आवाज़ें आ रही थीं।

यह दृश्य देखते ही प्रज्ञा के सीने में जलन और रोष की एक तीखी लहर दौड़ गई। उसका पारा चढ़ गया। वह रसोई के दरवाज़े पर जाकर खड़ी हो गई और तल्ख आवाज़ में बोली, “माँ! यह सब क्या हो रहा है? भाभी की सहेलियाँ आई हैं और उनके लिए आप इस उम्र में चाय और नाश्ता बना रही हैं? क्या भाभी के हाथ-पैर नहीं हैं? वह खुद आकर अपनी सहेलियों की खातिरदारी कर सकती हैं। वे आराम से बैठकर ठहाके लगा रही हैं और मेरी माँ यहाँ नौकरों की तरह चूल्हा फूंक रही है। यह सब देखकर मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा!”

सरोजिनी जी ने कड़छी रोककर गैस धीमी की। उन्होंने बहुत ही शांत और गंभीर दृष्टि से अपनी बेटी के तमतमाए चेहरे को देखा। सरोजिनी जी की आँखों में गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरा ठहराव और एक माँ की चिंता थी जो अपनी बेटी की संकीर्ण सोच को देखकर दुखी थी।

सरोजिनी जी ने धीमी मगर बेहद सधी हुई आवाज़ में पूछा, “प्रज्ञा, एक बात का सच-सच जवाब दे। पिछले महीने जब तेरी यूनिवर्सिटी की चार सहेलियाँ शाम को अचानक हमारे घर प्रोजेक्ट बनाने आई थीं, तब नाश्ता किसने बनाया था? क्या तूने खुद एक भी कप चाय बनाई थी? उस दिन तो तू बैठक में बैठकर पूरे तीन घंटे अपनी सहेलियों के साथ गप्पे मार रही थी, और उस समय इसी रसोई में पसीने से तर-बतर होकर तूलिका ने तुम सबके लिए समोसे और कोल्ड कॉफी तैयार की थी। तब तुझे यह ख्याल क्यों नहीं आया कि भाभी क्यों बनाएगी, मैं खुद बनाऊँगी?”

प्रज्ञा सकपका गई, पर उसने अपने अहंकार को गिरने नहीं दिया। उसने बात घुमाते हुए कहा, “माँ, वह बात अलग थी। मैं इस घर की बेटी हूँ और भाभी इस घर की बहू हैं। बहू का फर्ज होता है घर संभालना और मेहमानों की सेवा करना। और फिर मैं तो आपकी अपनी बेटी हूँ ना! मैं अपनी माँ को चूल्हे के आगे परेशान नहीं देख सकती।”

सरोजिनी जी ने एक गहरी साँस ली और चाय की छलनी उठाते हुए बोलीं, “तो कान खोलकर एक बात अच्छी तरह सुन ले प्रज्ञा… मेरे लिए बेटी और बहू दोनों एक जैसी हैं। ईश्वर ने मुझे दो आँखें दी हैं, और मैं दोनों से बराबर देखती हूँ। जैसे तू अपनी माँ की यह मामूली सी तकलीफ नहीं देख सकती, वैसे ही मैं भी एक माँ होकर अपनी बहू की तकलीफ और उसके दर्द को अनदेखा नहीं कर सकती! तूलिका कल से कमर के दर्द से कराह रही है। उसने सुबह से पूरे घर का काम बिना किसी शिकायत के निपटाया है। अगर आज उसकी सहेलियाँ आई हैं और मैंने अपनी खुशी से उसके लिए चाय की केतली चढ़ा दी, तो इसमें मेरा कौन सा बड़प्पन घट गया या उसकी कौन सी शान बढ़ गई?”

प्रज्ञा खामोश खड़ी फर्श को घूरने लगी, लेकिन उसके चेहरे पर अभी भी असहमति के भाव थे।

सरोजिनी जी ने प्रज्ञा के करीब आकर उसके सिर पर हाथ रखा और बहुत ही मर्मस्पर्शी स्वर में कहा, “बेटा, ज़िंदगी का एक अटल नियम याद रखना—ताली हमेशा दोनों हाथों से बजती है! जैसा दोगे, वैसा ही लौटकर वापस मिलेगा। अगर तुम किसी से केवल लेने की, सेवा करवाने की और हुक्म चलाने की उम्मीद रखोगी, और बदले में उसे ज़रा सा प्यार, सम्मान और राहत नहीं दोगी, तो वह रिश्ता कभी दिल से नहीं जुड़ सकता। कल को तू भी किसी दूसरे घर की बहू बनेगी। सोच, जब तू शादी के बाद ससुराल जाएगी, किसी दिन तू बीमार होगी या थकी होगी और तेरे अपने मायके के लोग या दोस्त तुझसे मिलने आएंगे… तब अगर तेरी सास तुझे चार ताने सुनाकर रसोई में झोंक दे, तो तेरे दिल पर क्या गुज़रेगी? क्या तब तू यह नहीं चाहेगी कि तेरी सास तुझे एक माँ की तरह समझे और कहे कि ‘बेटी तू बैठ, मैं तेरे मेहमानों को चाय पिलाती हूँ’?”

सरोजिनी जी के ये शब्द किसी तीर की तरह प्रज्ञा के अंतर्मन में जाकर लगे। उसके भीतर का सारा झूठा अहंकार और बेटी होने का खोखला अभिमान एक पल में भरभरा कर गिर पड़ा।

सरोजिनी जी ने आगे कहा, “बेटा, बहू भी किसी माँ की कलेजे का टुकड़ा होती है। वह अपने सारे रिश्ते, अपना बचपन का घर, अपनी सहेलियाँ छोड़कर हमारे घर को संवारने आती है। अगर हम उसे सिर्फ एक काम करने वाली मशीन समझेंगे और उसके सुख-दुख में खड़े नहीं होंगे, तो हम किस मुँह से उससे यह उम्मीद करेंगे कि वह बुढ़ापे में हमारी लाठी बने? जैसा बोओगी, वैसा ही काटोगी। ससुराल में सम्मान पाने का सिर्फ एक ही बीज होता है—अपनों को सम्मान देना।”

इतना कहकर सरोजिनी जी ने ट्रे में चाय के कप और पकोड़ों की प्लेट सजाई। वे ट्रे उठाने ही वाली थीं कि प्रज्ञा ने आगे बढ़कर माँ के हाथों से ट्रे ले ली। प्रज्ञा की आँखों में पश्चाताप के आँसू छलक आए थे।

प्रज्ञा ने रुंधे हुए गले से कहा, “माँ, मुझे माफ कर दीजिए। मैं इतनी संकीर्ण सोच में उलझ गई थी कि मुझे अपनी ही भाभी का त्याग और उसकी तकलीफ दिखाई नहीं दी। आपने आज मेरी आँखें खोल दीं। यह ट्रे आप नहीं, मैं लेकर जाऊँगी।”

प्रज्ञा ने आदर से ट्रे उठाई और मुस्कुराते हुए बैठक में दाखिल हुई। उसने बड़े ही स्नेह और आत्मीयता से तूलिका की सहेलियों के आगे नाश्ता परोसा। उसने तूलिका के कंधे को धीमे से दबाते हुए कहा, “भाभी, आप आराम से बैठिए। मैंने माँ को आराम करने के लिए कमरे में भेज दिया है। आप लोगों को जो कुछ भी चाहिए होगा, बस मुझे आवाज़ दे दीजिएगा। मैं यहीं हूँ।”

तूलिका ने जब अपनी ननद के चेहरे पर वह अपनत्व, आदर और आँखों में छलकती आत्मीयता देखी, तो उसका दिल भर आया। उसे लगा जैसे उसकी सारी शारीरिक थकान एक ही पल में काफूर हो गई हो। सहेलियों ने भी प्रज्ञा के संस्कारों और आवभगत की बहुत प्रशंसा की।

शाम को जब सहेलियाँ विदा हो गईं, तो तूलिका रसोई समेटने के लिए अंदर आई। वहाँ प्रज्ञा पहले से ही जूठे बर्तन सिंक में रखकर साफ कर रही थी। तूलिका ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ना चाहा, “अरे प्रज्ञा, तू यह सब क्यों कर रही है? ला, मैं कर देती हूँ।”

प्रज्ञा ने तूलिका का हाथ थाम लिया और उसकी आँखों में देखते हुए भावुक होकर बोली, “भाभी, आज मुझे कुछ मत कहिए। आज माँ ने मुझे सिखाया है कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दर्द को बाँटने से बनते हैं। आप इस घर की बहू बाद में हैं, मेरी बड़ी बहन पहले हैं। आज से इस घर का हर सुख और हर दुख हम दोनों का आधा-आधा होगा।”

दोनों ननद-भाभी ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। दरवाज़े की ओट में खड़े होकर यह सब देख रहीं सरोजिनी जी के चेहरे पर एक असीम संतोष और गर्व की मुस्कान थी। उन्होंने मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया कि ‘सद्भावना निवास’ की नींव आज सचमुच पक्की हो चुकी थी। जहाँ सास माँ बन जाए, ननद बहन बन जाए और बहू बेटी का रूप ले ले, उस घर को कभी किसी की नज़र नहीं लग सकती।

एक संयुक्त परिवार में जब तक सास अपनी बहू में बेटी का अक्स और बेटी अपनी भाभी में बहन का प्यार नहीं देखती, तब तक कोई भी घर स्वर्ग नहीं बन सकता। क्या आपकी राय में भी यह सच है कि ससुराल में जैसा सम्मान और प्यार हम बोते हैं, वही कई गुना होकर हमें वापस मिलता है? इस विषय पर अपनी अनमोल सोच और विचार नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर ज़रूर साझा करें।

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हेमलता गुप्ता

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