राह का भटका मुसाफिर

  “तुम कह रहे हो कि तुम्हारे बड़े भैया के सामने किसी ने शर्त नहीं रखी थी? चिराग, जब तुम्हारे भैया की शादी के लिए मेरे पिताजी के पास रिश्ता गया था, तो मेरे पिता ने बिना किसी शर्त के हां इसलिए कह दी थी क्योंकि तुम्हारे भैया ने अपनी मेहनत और संस्कारों से पहले ही खुद को उस काबिल साबित कर दिया था। उनके पास एक स्थिर भविष्य था, एक नेक चरित्र था और परिवार को संभालने का दम था। जो इंसान पहले से ही अपने पैरों पर खड़ा हो, उसके सामने कोई शर्त नहीं रखता। शर्तें उन पर लगाई जाती हैं जो अपनी काबिलियत पर नहीं, बल्कि अपने मां-बाप के टुकड़ों पर पल रहे होते हैं।”

 परिवार बहुत बड़ा नहीं था—सास सावित्री देवी, ससुर ओंकारनाथ जी, पति मयंक और एक छोटा देवर चिराग। पल्लवी जब दुल्हन बनकर दहलीज पर दाखिल हुई थी, तब चिराग की उम्र मुश्किल से बारह-तेरह साल की रही होगी। उम्र में वह मयंक से पूरे बारह साल छोटा था। घर में सबसे छोटा होने और बड़ी मिन्नतों के बाद पैदा होने की वजह से वह सबका लाडला था, पर यह लाड़-प्यार धीरे-धीरे उसके लिए जहर साबित होने लगा था।

चिराग बचपन से ही बेहद चंचल, बात-बात पर मचलने वाला और हठी स्वभाव का लड़का था। कोई चीज अगर उसे पसंद आ जाए, तो जब तक वह उसे मिल न जाती, घर में खाना-पीना तक बंद हो जाता था। सावित्री देवी और ओंकारनाथ जी का मानना था कि उम्र के साथ बच्चा खुद संभल जाएगा। लेकिन उम्र तो बढ़ती गई, चिराग के तेवर और ज्यादा बिगड़ते चले गए। उसे पढ़ाई-लिखाई से सख्त नफरत थी। उसका सारा वक्त टीवी स्क्रीन पर फिल्में देखने, दोस्तों के साथ बाइक पर बेमतलब गलियों में चक्कर काटने और इधर-उधर हुड़दंग मचाने में बीतता। अगर घर का कोई बड़ा उसे टोकने की कोशिश करता, तो वह चिढ़कर सामान पटकने लगता या कई दिनों तक किसी से सीधे मुंह बात नहीं करता।

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। पल्लवी के जीवन में खुशियों ने एक नया रूप लिया जब उसने एक प्यारे से बेटे आरव को जन्म दिया। आरव के आने के बाद सावित्री देवी और ओंकारनाथ जी की पूरी दुनिया जैसे उसी बच्चे के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई। वे सुबह-शाम आरव को पार्क ले जाते, उसके साथ तोतली बोली में बातें करते और पूरा दिन उसी के साथ खेलने में गुजार देते। मयंक अपने दफ्तर की व्यस्तताओं में उलझे रहते। ऐसे में पूरे घर की चौखट, चूल्हा और रसोई का सारा दारोमदार अकेले पल्लवी के नाजुक कंधों पर आ टिका था। पल्लवी सुबह से लेकर रात तक बिना किसी शिकायत के काम में जुटी रहती, लेकिन उसके माथे पर एक स्थायी चिंता की लकीर खिंच चुकी थी—और उस चिंता का नाम था चिराग।

चिराग अब इक्कीस साल का लंबा-चौड़ा नौजवान बन चुका था। चेहरे-मोहरे से वह बेहद आकर्षक और रूपवान था, लेकिन उसकी संगत दिन-प्रतिदिन गर्त में गिरती जा रही थी। कॉलेज में दाखिला तो बड़े रसूख से करवाया गया था, लेकिन वह हफ्ते में दो दिन भी क्लास में नजर नहीं आता था। दिनभर कमरे में पड़े रहना, देर दोपहर को सोकर उठना और फिर शाम ढलते ही अपने आवारा दोस्तों की टोली के साथ गायब हो जाना उसकी रोज की दिनचर्या बन गई थी। मोहल्ले के कुछ भले लोगों ने मयंक को धीरे से आगाह भी किया था कि चिराग शराब और जुए के दलदल में धंसने लगा है, लेकिन जब भी यह बात घर के बड़ों तक पहुंचती, ओंकारनाथ जी बस ठंडी सांस भरकर कहते, “जवानी का जोश है, शादी-ब्याह होगा और जिम्मेदारी सिर पर आएगी तो अपने आप अक्ल ठिकाने आ जाएगी।”

पल्लवी अक्सर हैरान रह जाती कि जो मां-बाप अपने बच्चे को गिरते हुए देख रहे हैं, वे उसे थामने के बजाय वक्त के भरोसे क्यों छोड़ रहे हैं? देर रात कभी दो बजे, कभी ढाई बजे घर की घंटी बजती और पल्लवी को अपनी कच्ची नींद तोड़कर दरवाजा खोलने जाना पड़ता। शराब के नशे में धुत चिराग लड़खड़ाते कदमों से अंदर आता, बिना कुछ बोले कमरे में जाकर गिर जाता। पल्लवी जब भी मयंक से कहती कि चिराग को इस तरह खुला छोड़ना पूरे परिवार के लिए कलंक बन जाएगा, तो मयंक चिढ़कर कहते, “तुम घर का काम देखो पल्लवी, बाबूजी से बात करने की मेरी हिम्मत नहीं होती और मां तो चिराग के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकती।”

एक दिन दोपहर के वक्त जब पल्लवी बालकनी में कपड़े सुखा रही थी, तभी पड़ोस में रहने वाली सरोज चाची तेजी से उनके घर में दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर सख्त नाराजगी और आक्रोश की झलक थी। सावित्री देवी ने जैसे ही पूछा कि क्या बात है, सरोज चाची ने सीधे पल्लवी की तरफ मुखातिब होकर तीखी आवाज में कहना शुरू किया, “पल्लवी बहू, तुम लोग आखिर अपने इस लाडले पर लगाम क्यों नहीं कसते? कल रात के पौने तीन बजे यह लड़का हमारे दरवाजे पर आकर लातें मार रहा था, बेल बजाए जा रहा था। हम सब घबराकर उठ बैठे कि भगवान न करे कोई अनहोनी हो गई। बाहर निकलकर देखा तो यह नशे में धुत गाली-गलौज कर रहा था। मेरे पति ने बड़ी मुश्किल से डांट-डपटकर इसे तुम्हारे गेट की तरफ धकेला। आज तो हमने पड़ोस का लिहाज करके बात दबा दी, लेकिन याद रखो, जिस घर में जवान बेटियां होती हैं, वहां के लोग ऐसी गुंडागर्दी कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे। किसी दिन पुलिस थाने का चक्कर कटेगा तो पूरे खानदान की इज्जत धूल में मिल जाएगी।”

सरोज चाची की बातें सुनकर सावित्री देवी का सिर शर्म से झुक गया। ओंकारनाथ जी अखबार के पीछे अपना चेहरा छुपाए बैठे रहे। उस दिन पल्लवी का सब्र भी जवाब दे गया। उसने अपने ससुर से हाथ जोड़कर कहा, “बाबूजी, अब पानी सिर से ऊपर बह रहा है। आज पड़ोसियों ने दरवाजा खटखटाया है, कल को कोई बड़ा हादसा हो जाएगा। आप लोग कब तक इसकी गलतियों पर पर्दा डालते रहेंगे?” लेकिन हमेशा की तरह ससुर जी ने बस इतना ही कहा, “बहू, समय सबसे बड़ा मरहम है, थोड़ा सब्र रखो।”

लेकिन हालात सुधरने के बजाय बद से बदतर होते चले गए। कुछ ही हफ्तों बाद एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरे मोहल्ले में भूचाल ला दिया। उस रात कॉलोनी में एक शादी समारोह था। चिराग ने जरूरत से ज्यादा शराब पी ली थी। आधी रात को वह अपने घर आने के बजाय दो गली छोड़कर रहने वाले एक प्रतिष्ठित व्यवसायी के बंगले के अहाते में कूद गया और वहां मुख्य दरवाजे को पीट-पीटकर एक लड़की का नाम पुकारते हुए तमाशा करने लगा। वह चीख-चीखकर कह रहा था कि वह इस घर की बेटी मानसी के बिना एक पल भी जिंदा नहीं रह सकता।

यह कोई मामूली बात नहीं थी। मानसी शहर के एक सम्मानित कॉलेज में पढ़ती थी और उसके पिता बद्रीप्रसाद जी शहर के जाने-माने रसूखदार इंसान थे। रात के सन्नाटे में चिराग की उस हरकत ने मानसी के परिवार के मान-सम्मान पर सीधा प्रहार कर दिया था। उस वक्त तो बद्रीप्रसाद जी के बेटों ने किसी तरह चिराग को भगा दिया, लेकिन अगली सुबह होते ही बद्रीप्रसाद जी अपने दोनों बेटों और कुछ बुजुर्गों के साथ सीधे ओंकारनाथ जी के दरवाजे पर आ धमके।

घर में सन्नाटा खिंच गया। बद्रीप्रसाद जी का चेहरा गुस्से से लाल था। उन्होंने ओंकारनाथ जी को सामने बैठाकर दो-टूक शब्दों में कहा, “ओंकारनाथ जी, हमने आपकी शराफत और आपकी उम्र का लिहाज करके रात को पुलिस नहीं बुलाई, वरना आपका यह सपूत हवालात की हवा खा रहा होता। अपनी बेटी की खातिर हम चुप रहे, लेकिन आपके बेटे की यह हिम्मत कि वह रात के अंधेरे में हमारे घर पर आकर हंगामा करे?”

ओंकारनाथ जी कांपते हाथों से अपनी पगड़ी संभाल रहे थे। उन्होंने तुरंत चिराग को बाहर बुलाया। चिराग रात के नशे की खुमारी में लाल आंखें लिए बाहर आया। जैसे ही पिता ने हाथ उठाने की कोशिश की, चिराग ने सीना तानकर बेबाकी से कह दिया, “बाबूजी, मुझे मारना है तो मार लीजिए, लेकिन सच यही है कि मैं मानसी से बेपनाह प्यार करता हूं। वह भी मुझसे प्यार करती है। अगर मेरी शादी होगी तो सिर्फ उसी से होगी, वरना मैं खुद को खत्म कर लूंगा।”

चिराग की इस ढिठाई पर पूरा कमरा स्तब्ध रह गया। बद्रीप्रसाद जी ने एक गहरी सांस ली। वे अपनी बेटी के भविष्य को लेकर चिंतित थे, लेकिन एक पिता होने के नाते वे अपनी बेटी की पसंद और नापसंद से भी वाकिफ थे। उन्होंने माहौल को भांपते हुए कड़े लेकिन नपे-तुले शब्दों में एक बात रखी।

बद्रीप्रसाद जी ने कहा, “ओंकारनाथ जी, मेरी बेटी ने भी मुझसे यह कबूल किया है कि वह आपके इस लड़के को चाहती है। लेकिन मेरी एक ही बेटी है और मैं उसे किसी आवारा, बेरोजगार और शराबी के हाथों में सौंपकर जीते-जी नरक में नहीं धकेल सकता। अगर चिराग मेरी बेटी से ब्याह रचाना चाहता है, तो मेरी केवल एक शर्त है—इसे अपनी ये तमाम बुरी आदतें, ये आवारागर्दी और नशा तुरंत छोड़ना होगा। इसे अपनी पढ़ाई पूरी करके किसी प्रतिष्ठित कंपनी में अपनी मेहनत से नौकरी हासिल करनी होगी और यह साबित करना होगा कि यह अपने पैरों पर खड़ा होकर एक परिवार का पेट पाल सकता है। जिस दिन इसके हाथ में नियुक्ति पत्र होगा, मैं खुद अपनी बेटी का हाथ इसके हाथ में दे दूंगा। और अगर यह ऐसा नहीं कर सकता, तो आज के बाद हमारे घर की तरफ आंख उठाकर भी न देखे।”

यह कहकर बद्रीप्रसाद जी अपने परिवार के साथ वहां से चले गए। उनके जाने के बाद घर में भारी तनाव फैल गया। चिराग गुस्से में पैर पटकता हुआ अपने कमरे में गया और जोर से दरवाजा बंद कर लिया। वह अपने ही कमरे में बड़बड़ा रहा था, “मुझ पर शर्त लगाते हैं! शादी में कोई ऐसी शर्तें रखता है क्या? बड़े भैया की जब शादी हुई थी, तो क्या किसी ने उनके सामने शर्त रखी थी? यह तो सीधा-सीधा मेरा अपमान है। मैं किसी की शर्तों का गुलाम नहीं बनूंगा।”

घर के बड़े-बुजुर्ग असहाय होकर बैठ गए थे। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि उस जलती आग में हाथ डाले। लेकिन पल्लवी जानती थी कि अगर आज इस लड़के को सही आईना नहीं दिखाया गया, तो यह न केवल खुद तबाह होगा बल्कि उस मासूम लड़की की जिंदगी और इस पूरे परिवार के मान-सम्मान को भी जलाकर राख कर देगा।

पल्लवी ने पानी का एक गिलास उठाया और सीधे चिराग के कमरे में चली गई। चिराग खिड़की की तरफ मुंह किए खड़ा था। पल्लवी को देखते ही वह बिफर पड़ा, “भाभी, आप भी मुझे ज्ञान देने आई हैं? मुझे किसी की नसीहत नहीं सुननी। आप जाइए यहां से।”

पल्लवी ने बिना कोई गुस्सा दिखाए, पानी का गिलास मेज पर रखा और एक कुर्सी खींचकर शांत भाव से बैठ गई। उसकी आंखों में न तो ममता का अंधापन था और न ही कोई कड़वाहट, बल्कि एक बड़ी बहन और भाभी का गंभीर दायित्व था।

पल्लवी ने बहुत ही सधे हुए स्वर में कहना शुरू किया, “चिराग, मैं तुम्हारी सगी मां नहीं हूं और न ही मैं कभी तुम्हारी मां बनने का दावा कर सकती हूं। लेकिन इस घर की बड़ी बहू होने के नाते और तुम्हें बचपन से अपनी आंखों के सामने बड़ा होते देखने के नाते, आज मैं तुम्हें वह सच बताऊंगी जो तुम्हारे अपने मां-बाप भी तुम्हें बताने से डरते हैं।”

चिराग ने पलटकर पल्लवी की ओर देखा, उसकी त्योरियां चढ़ी हुई थीं।

पल्लवी ने अपनी बात जारी रखी, “तुम कह रहे हो कि तुम्हारे बड़े भैया के सामने किसी ने शर्त नहीं रखी थी? चिराग, जब तुम्हारे भैया की शादी के लिए मेरे पिताजी के पास रिश्ता गया था, तो मेरे पिता ने बिना किसी शर्त के हां इसलिए कह दी थी क्योंकि तुम्हारे भैया ने अपनी मेहनत और संस्कारों से पहले ही खुद को उस काबिल साबित कर दिया था। उनके पास एक स्थिर भविष्य था, एक नेक चरित्र था और परिवार को संभालने का दम था। जो इंसान पहले से ही अपने पैरों पर खड़ा हो, उसके सामने कोई शर्त नहीं रखता। शर्तें उन पर लगाई जाती हैं जो अपनी काबिलियत पर नहीं, बल्कि अपने मां-बाप के टुकड़ों पर पल रहे होते हैं।”

पल्लवी के ये शब्द चिराग के सीने में तीखे तीर की तरह चुभे। उसने कुछ कहना चाहा, लेकिन पल्लवी ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

“मेरी पूरी बात सुनो चिराग। तुम कहते हो कि तुम मानसी से प्यार करते हो। पर क्या सचमुच प्यार करते हो? प्यार का मतलब केवल अपनी जिद पूरी करना नहीं होता, प्यार का मतलब उस इंसान को सुरक्षा, सम्मान और खुशहाल जीवन देने की जिम्मेदारी उठाना होता है। मानसी भी तुमसे प्यार करती है, इसीलिए उसके पिता ने आज तुम्हारा तमाशा देखने के बाद भी तुम्हें एक मौका दिया है। लेकिन सोचो, अगर तुम अपनी इसी आवारागर्दी, इसी नशे और इस झूठी मर्दानगी में चूर रहे, तो क्या होगा? बद्रीप्रसाद जी अपनी बेटी का ब्याह किसी ऐसे लड़के से कर देंगे जो कमाने वाला और सुलझा हुआ होगा। मानसी रोएगी, तड़पेगी, लेकिन अपने पिता की इज्जत की खातिर किसी और की डोली में बैठ जाएगी। और तुम? तुम जिंदगी भर शराब की बोतलों में डूबकर अपनी बर्बादी का मातम मनाते रहोगे। फिर किसी दिन तुम्हारे मां-बाप किसी और लड़की से तुम्हारा ब्याह करवा देंगे, लेकिन क्या तुम उस बेकसूर को वह प्यार दे पाओगे? क्या वह लड़की तुम्हारे इस आवारापन के साथ जी पाएगी? किसी भी लड़की की जिंदगी नर्क बनाने से पहले, खुद से पूछो कि तुम हो क्या? आज तुम्हारे पास अपने नाम की कौन सी पहचान है?”

पल्लवी की आवाज में एक ऐसी सच्चाई और दर्द था जिसने चिराग के भीतर सोए हुए जमीर को झकझोर कर रख दिया। पल्लवी ने उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा, “फैसला पूरी तरह तुम्हारे हाथ में है चिराग। या तो अपनी इस जिद और अहंकार की आग में जलकर अपनी मोहब्बत और अपने वजूद दोनों को खाक कर लो, या फिर एक मर्द की तरह अपनी गलतियों को स्वीकार करो और उस लड़की के पिता को यह साबित करके दिखाओ कि तुम उनकी बेटी की खुशियों के सबसे बड़े पहरेदार बन सकते हो।”

इतना कहकर पल्लवी कमरे से बाहर निकल आई।

कमरे में पूरी तरह सन्नाटा छा गया था। चिराग वहीं फर्श पर बैठ गया। अगले दस मिनट तक उसके दिमाग में विचारों का भयानक तूफान चलता रहा। भाभी का एक-एक शब्द उसके जेहन में हथौड़े की तरह बज रहा था—’तुम हो क्या? तुम्हारे पास अपने नाम की कौन सी पहचान है?’ उसने अपनी बंद मुट्ठियों को देखा। पहली बार उसे अपनी लाचारी, अपनी कमियों और अपनी खोखली जिंदगी का अहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि प्यार पाने के लिए पहले काबिल बनना पड़ता है, जिद करने से केवल भीख मिलती है, सम्मान नहीं।

दस मिनट बाद चिराग कमरे से बाहर निकला। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह एक असीम पश्चाताप और ठहराव था। वह सीधे रसोई में काम कर रही पल्लवी के पास पहुंचा। उसकी आंखों में आंसू भरे हुए थे। उसने कांपते हाथों से पल्लवी के पैर छुए।

पल्लवी चौंककर पीछे हटी, लेकिन चिराग ने रुंधे गले से कहा, “भाभी… आपने आज मेरी आंखें खोल दीं। अगर आज आपने मुझे ये कड़वी बातें न कही होतीं, तो मैं सचमुच अपनी जिंदगी का तमाशा बना चुका होता। मैं आपसे वादा करता हूं भाभी, आज के बाद मेरी कोई भी हरकत इस परिवार के सिर को झुकने नहीं देगी। मैं मानसी को पाकर रहूंगा, लेकिन अपनी जिद से नहीं, अपनी मेहनत और अपनी काबिलियत के दम पर।”

उस दिन के बाद से चिराग का एक नया जन्म हुआ। उसने अपने तमाम आवारा दोस्तों से किनारा कर लिया। नशे की दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। वह सुबह जल्दी उठता, मंदिर में जाकर हाथ जोड़ता और फिर दिन-रात अपनी बची हुई पढ़ाई को पूरा करने में जुट जाता। उसने अपनी पिछली तमाम असफलताओं को पीछे छोड़ते हुए बेहतरीन अंकों के साथ अपनी डिग्री पूरी की।

डिग्री पूरी करने के बाद उसने कॉर्पोरेट नौकरियों के लिए दिन-रात एक कर दिया। रात के दो-दो बजे तक वह लैपटॉप पर इंटरव्यू की तैयारी करता, अंग्रेजी संवाद सुधारता और प्रतियोगी परीक्षाओं के टेस्ट देता। कई बार वह थककर निराश होने लगता, लेकिन पल्लवी हमेशा एक मजबूत चट्टान की तरह उसके पीछे खड़ी रहती, उसे हौसला देती और उसके लिए गर्म चाय बनाकर लाती।

चिराग की इस अटूट तपस्या का फल आखिरकार मिला। करीब डेढ़ साल की अथक मेहनत के बाद, शहर की एक बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में उसका चयन एक ऊंचे पैकेज वाले पद पर हो गया। जब नियुक्ति पत्र उसके हाथ में आया, तो वह सबसे पहले दौड़कर पल्लवी के पास आया और वह पत्र उसके चरणों में रख दिया। ओंकारनाथ जी और सावित्री देवी की आंखों से खुशी के आंसू बह निकले। पूरे घर में जैसे वर्षों बाद सच्ची दिवाली मनी थी।

अगले ही दिन, ओंकारनाथ जी और मयंक ने बद्रीप्रसाद जी के घर संदेश भिजवाया। इस बार कोई शिकवा-शिकायत नहीं थी। जब चिराग अपनी मेहनत का नियुक्ति पत्र लेकर पूरे सम्मान के साथ बद्रीप्रसाद जी के सामने खड़ा हुआ, तो उस पिता का सीना भी गर्व से चौड़ा हो गया। बद्रीप्रसाद जी ने आगे बढ़कर चिराग को गले से लगा लिया और कहा, “बेटा, तुमने साबित कर दिया कि सच्चा प्यार इंसान को भटकाता नहीं, बल्कि उसे सही रास्ते पर लाकर खड़ा कर देता है।”

कुछ ही महीनों बाद, पूरे शहर की मौजूदगी में चिराग और मानसी का विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ। जब मानसी दुल्हन बनकर उस आंगन में आई, तो उसने सबसे पहले अपनी बड़ी जेठानी पल्लवी के पैर छुए, क्योंकि वह जानती थी कि अगर आज उसका सुहाग एक जिम्मेदार, सम्मानित और सफल इंसान बना था, तो उसके पीछे उस भाभी की सूझबूझ और सच कहने की हिम्मत ही थी।

घर के आंगन में अब किसी डर का साया नहीं था, बल्कि वहां विश्वास, मेहनत और रिश्तों के अटूट सम्मान की नई खुशबू महक रही थी।

दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि बच्चों को केवल अंधा लाड़-प्यार देना ही माता-पिता का कर्तव्य नहीं होता, बल्कि वक्त रहते उन्हें सही और गलत का फर्क समझाना सबसे बड़ी परवरिश है। कई बार जो काम कड़े अनुशासन या लाचारी से नहीं हो पाता, वह काम अपनों की सही समझाइश और कड़वे सच से हो जाता है।

क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में युवाओं को अपनी जिद के आगे परिवार और अपने भविष्य की जिम्मेदारियों को समझना चाहिए? अपनी राय और अनुभव हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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