निहारिका अपने मायके में माँ-बाप की लाडली और भाई-बहनों की प्यारी थी। माता-पिता ने उसे फूलों की तरह संभालकर रखा था। उसके जीवन में दुख की छाया तक नहीं पड़ी थी। दादाजी तो उसे अपनी आँखों का तारा मानते थे।
जब उसके विवाह की बात चली तो दादाजी ने रायपुर के एक बड़े और प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार के सबसे बड़े बेटे अंकित से उसका विवाह तय कर दिया। परिवार धन-धान्य से संपन्न था। दादाजी ने घर के द्वार पर रखे चाँदी के दो हाथी देखे तो उनका मन प्रसन्न हो उठा। उन्होंने सोचा, “जिस घर के द्वार पर चाँदी के हाथी हों, वहाँ तो साक्षात लक्ष्मी का वास होगा। मेरी निहारिका हमेशा सुखी रहेगी।”
विवाह के बाद सचमुच निहारिका के दिन चाँदी और रातें सोने जैसी थीं। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। वह जिस चीज की इच्छा करती, सास-ससुर तुरंत पूरी कर देते। उसे लगता, दादाजी का सपना सच हो गया है।
लेकिन कुछ वर्षों बाद उस चमकदार जीवन की सच्चाई धीरे-धीरे सामने आने लगी।
अंकित व्यापार में बिल्कुल रुचि नहीं लेता था। देर तक सोना, ऑफिस न जाना, काम में लापरवाही करना, हिसाब-किताब को नजरअंदाज करना और शाम को दोस्तों के साथ शराब की पार्टियों में जाना उसकी आदत बन चुकी थी।
निहारिका चिंतित रहती। उसने कई बार अंकित को समझाया, “यह व्यवसाय केवल आपका नहीं, पापा की वर्षों की मेहनत है। आपको इसे संभालना चाहिए।”
अंकित हर बार हँसकर बात टाल देता, “तुम बेवजह चिंता करती हो। सब ठीक चल रहा है।”
सबसे अधिक दुख निहारिका को इस बात का था कि उसके सास-ससुर भी अंकित की आदतों को गंभीरता से नहीं लेते थे।
“बिजनेस तो चल ही रहा है,” वे कहते, “बच्चों को भी अपनी जिंदगी जीने दो।”
निहारिका समझ चुकी थी कि बड़े संयुक्त परिवार में विवाह केवल पति से नहीं, पूरे परिवार से होता है। हर निर्णय के पीछे रिश्तों और परंपराओं की एक लंबी परछाई होती है।
एक दिन उसने सोचा, मैं पढ़ी-लिखी हूँ। अगर अंकित व्यापार नहीं संभाल पा रहा, तो क्यों न मैं पापा की मदद करूँ? उसने अपने ससुर से बात की। उन्हें उसका विचार अच्छा लगा।
लेकिन सासू माँ को यह बिल्कुल स्वीकार नहीं था।
“हमारे घर की बहुएँ बाहर जाकर काम नहीं करतीं। मैंने पूरी जिंदगी घर संभाला है, तुम भी वही करो।”
निहारिका ने विनम्रता से कहा, “माँ, मैं नौकरी नहीं करना चाहती। मैं तो अपने ही घर के व्यवसाय को संभालने में पापा की मदद करना चाहती हूँ।”
सास ने दृढ़ स्वर में कहा, “नहीं। बहू का स्थान घर में ही होता है।”
उस रात निहारिका देर तक जागती रही। उसे अपना मायका, दादाजी का विश्वास और दरवाजे पर खड़े वे चाँदी के हाथी याद आ रहे थे। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
तभी उसके ससुर उसके पास आए। उन्होंने कहा, “बेटी, मैंने तुम्हारी सारी बातें सुनी हैं। तुम गलत नहीं हो। यह व्यवसाय केवल हमारा नहीं, तुम्हारे भविष्य का भी हिस्सा है। अगर तुम इसे संभालना चाहती हो, तो मैं तुम्हारे साथ हूँ।”
निहारिका ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा। उसकी आँखों में पहली बार राहत की चमक आई।
ससुर ने कहा, “परिवार की परंपराएँ जरूरी हैं, लेकिन किसी की योग्यता को रोक देना परंपरा नहीं है। तुम घर भी संभालो और अपनी क्षमता का भी सम्मान करो।”
निहारिका की आँखें नम हो गईं। उसे लगा, इस बड़े से घर में पहली बार किसी ने उसके मन की आवाज सुनी है।
अगली सुबह उसने आईने में खुद को देखा और मन ही मन कहा, “मैं समझौता करूँगी, लेकिन अपनी पहचान से नहीं।”
उसने परिवार की भावनाओं और परंपराओं का सम्मान करने का निर्णय लिया, लेकिन अपनी शिक्षा और क्षमता को व्यर्थ न जाने देने का भी संकल्प किया।
उसे समझ आ गया था कि जीवन में हर रिश्ता कुछ न कुछ समझौता माँगता है, पर ऐसा समझौता कभी नहीं करना चाहिए जिसमें इंसान अपना आत्मसम्मान और अस्तित्व ही खो दे।
“सच्चा समझौता वह नहीं, जिसमें इंसान स्वयं को मिटा दे; सच्चा समझौता वह है, जिसमें रिश्ते भी बचें और आत्मसम्मान भी।”
डॉ. हिमानी बंसल
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