शाम के सात बज रहे थे। प्रभा रसोई में रोटियाँ सेंक रही थी और बगल में रखा उसका पुराना फ़ोन बार-बार घनघना रहा था। स्कूल की सहेलियों के व्हाट्सऐप ग्रुप “सखियाँ बैच 1987” में आज सुबह से ही संदेशों की झड़ी लगी थी। मालती ने लिखा था, “इस बार नवंबर में हम सब पुरी चल रहे हैं, पूरे चालीस साल बाद एक साथ। कोई बहाना नहीं चलेगा।” रेखा ने नीचे लिखा था, “प्रभा, तू भी आ रही है ना? याद है, स्कूल में तू कहती थी कि एक दिन समंदर देखूँगी?”
प्रभा के हाथ रुक गए। तवे पर रोटी जल रही थी, पर उसे होश नहीं था। उसे याद आया कि वह सोलह साल की थी जब भूगोल की किताब में समंदर की तस्वीर देखकर उसने अपनी सहेलियों से कहा था, “मैं एक दिन वहाँ जाकर अपने पैर भिगोऊँगी।” उसके बाद ब्याह हुआ, गृहस्थी आई, बच्चे आए, और वह सपना कहीं रसोई के मसालों के डिब्बों के पीछे जाकर खो गया।
रात के खाने पर सब इकट्ठा हुए। उसके पति गिरधारी लाल, जो बैंक से मैनेजर के पद पर रिटायर हुए थे, अख़बार को घड़ी की तरह तह करके एक तरफ़ रखकर बैठे। बेटा अर्णव और बहू इशिता भी अपनी थालियाँ लेकर आ गए। छह साल की पोती चीकू दादी की गोद में चढ़कर बैठ गई।
प्रभा ने हिम्मत जुटाकर कहा, “सुनिए, मेरी स्कूल की सहेलियाँ पुरी जा रही हैं, सब एक साथ। मैंने भी हाँ कह दी है। पाँच दिन का कार्यक्रम है।”
गिरधारी लाल के हाथ का कौर बीच में ही रुक गया। “पुरी? पाँच दिन? और तुमने हाँ भी कह दी? मुझसे पूछना ज़रूरी नहीं समझा?”
“पूछ ही तो रही हूँ।”
“यह पूछना नहीं, बताना है प्रभा। इस उम्र में सहेलियों के साथ घूमने निकलोगी? घुटनों का दर्द भूल गईं? और मेरी शुगर की दवाइयाँ, मेरा खाना, चीकू का स्कूल, घर कौन देखेगा? कभी सोचा है?” उनकी आवाज़ ऊँची होती चली गई। “तीर्थ करना हो तो बता दो, मैं खुद सबको लेकर चल दूँगा। यह सहेलियों के साथ घूमने का क्या शौक चढ़ा है?”
प्रभा की आँखें भर आईं, पर इस बार उसने नज़रें नहीं झुकाईं। “तीर्थ और घूमने में फ़र्क़ होता है जी। आपने तीस साल बैंक की नौकरी की, कभी इस शहर, कभी उस शहर। मैं हर तबादले में सामान बाँधती रही, नया घर सजाती रही, और हर बार सोचती रही कि अगली जगह थोड़ा घूम लूँगी। आपके साथ मैं कितनी जगह गई हूँ? बस वहीं, जहाँ आपके बैंक की कोई शादी या पार्टी होती थी।”
“तो इसमें मेरी क्या ग़लती है? मैं तो घर के लिए कमाता था!”
“ग़लती किसी की नहीं है,” प्रभा ने धीरे से कहा, “बस इतना है कि मेरा एक सपना था, जो मैं कभी किसी से कह नहीं पाई। समंदर देखना। सिर्फ़ एक बार।”
मेज़ पर ख़ामोशी छा गई। गिरधारी लाल ने थाली सरका दी और उठकर अपने कमरे में चले गए। जाते-जाते बस इतना बोले, “मेरी तबीयत ठीक नहीं है, आज खाना नहीं खाऊँगा।”
चीकू ने दादी का पल्लू पकड़कर पूछा, “दादी, समंदर क्या होता है?” प्रभा मुस्कुराई और उसके बालों में हाथ फेरते हुए बोली, “बहुत बड़ा पानी होता है बेटा, इतना बड़ा कि उसका दूसरा किनारा दिखता ही नहीं।”
रात को इशिता ने सारे बर्तन समेटे और चुपचाप सास के पास आकर बैठ गई। “मम्मी जी, आप जाइए। मैं अस्पताल से छुट्टी ले लूँगी। आपने हमारे लिए इतने साल निकाल दिए, अब पाँच दिन हम निकाल लेंगे।”
अर्णव भी आ गया। “माँ, पापा थोड़ा गुस्से में हैं, पर वे मान जाएँगे। आपकी टिकट मैं करवा देता हूँ।”
प्रभा ने दोनों के सिर पर हाथ रखा, पर उसके मन में एक डर बैठ गया था। क्या वह सच में अपने पति को नाराज़ करके जा पाएगी?
अगले तीन दिन घर में अजीब-सी चुप्पी रही। गिरधारी लाल बात तो करते थे, पर सिर्फ़ ज़रूरत भर की। “चाय दे दो”, “चश्मा कहाँ है”। प्रभा हर काम पहले की तरह करती रही, पर उसके भीतर कुछ टूट रहा था। चौथे दिन उसने मालती को फ़ोन करके कहा, “मेरा नाम काट दे, मुझसे नहीं हो पाएगा।”
मालती कुछ देर चुप रही, फिर बोली, “प्रभा, तू पूरी ज़िंदगी सबके लिए जीती रही। आज अगर तूने अपने लिए एक क़दम नहीं उठाया, तो बुढ़ापे में पछताएगी। टिकट मैंने तेरे नाम की भी करा रखी है। बाकी तू देख ले।”
फ़ोन कट गया। प्रभा बहुत देर तक आँगन में बैठी तुलसी के पौधे को देखती रही।
उसी रात गिरधारी लाल को सीने में हल्का दर्द उठा। घबराहट में घर में हड़कंप मच गया। अर्णव उन्हें अस्पताल ले गया। जाँच हुई, सब ठीक निकला। डॉक्टर ने कहा कि यह तनाव और गैस का असर है, घबराने की कोई बात नहीं। पर प्रभा की जान जैसे हलक में अटक गई थी। उसने उस रात पति का हाथ पकड़े रखा और मन ही मन तय कर लिया कि वह कहीं नहीं जाएगी।
सुबह घर लौटकर गिरधारी लाल ने बिस्तर पर लेटे-लेटे पत्नी को देखा। प्रभा की आँखें लाल थीं, चेहरा थका हुआ। वे बहुत देर चुप रहे। फिर बोले, “प्रभा, एक बात पूछूँ? सच-सच बताओगी?”
“पूछिए।”
“तुम्हें याद है, हमारी शादी को कितने साल हुए?”
“पैंतीस साल।”
“और इन पैंतीस सालों में मैंने कभी तुमसे पूछा कि तुम्हें क्या अच्छा लगता है?”
प्रभा चुप रही।
“आज रात अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए मुझे एक बात खटकती रही,” वे धीमी आवाज़ में बोलते गए। “मैं डर गया था कि अगर मुझे कुछ हो गया तो तुम्हारे पास क्या बचेगा? मैंने तुम्हें घर दिया, पैसा दिया, पर तुम्हारी अपनी कोई याद नहीं दी। कोई ऐसी याद नहीं, जिसे तुम अकेले में याद करके मुस्कुरा सको।”
उनकी आवाज़ भर्रा गई। “मुझे गुस्सा इस बात का नहीं था कि तुम जा रही हो। मुझे डर इस बात का था कि तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूँगा। पैंतीस साल से तुमने मुझे इतना सँभाला है कि मैं भूल ही गया था कि तुम भी एक इंसान हो, जिसके अपने सपने हैं। यह मेरा स्वार्थ था प्रभा, और मुझे इसका बहुत अफ़सोस है।”
प्रभा की आँखों से आँसू बह निकले। उसने पति का हाथ थाम लिया। “मैं आपको अकेला छोड़कर कैसे जाऊँ? आपकी तबीयत…”
“तबीयत बिल्कुल ठीक है, डॉक्टर ने कहा है,” गिरधारी लाल ने मुस्कुराकर कहा। “और सुनो, मैंने सोच लिया है। तुम जाओगी। और मैं इन पाँच दिनों में अपनी चाय खुद बनाना सीखूँगा, चीकू को स्कूल के लिए तैयार करना सीखूँगा, और जब तुम लौटोगी तो देखना, यह पुराना बैंक मैनेजर रसोई का भी मैनेजर बन चुका होगा।”
प्रभा हँस पड़ी, और हँसते-हँसते रो भी पड़ी। इतने सालों बाद उसने पति की आँखों में अपने लिए वह चीज़ देखी थी जो वह बरसों से तलाश रही थी, सम्मान और समझ।
अगले कुछ दिन घर में जैसे त्योहार-सा माहौल रहा। चीकू ने दादी के लिए अपनी गुल्लक से निकालकर एक छोटी-सी रंगीन टोपी खरीदी और बोली, “दादी, यह समंदर के लिए है, धूप बहुत होती होगी।” इशिता ने सास की अटैची में सूती साड़ियाँ, दवाइयाँ और एक नया चश्मा रख दिया। अर्णव ने स्टेशन तक छोड़ने की ज़िद की।
स्टेशन पर गिरधारी लाल भी साथ आए। गाड़ी चलने से पहले उन्होंने एक छोटा-सा लिफ़ाफ़ा प्रभा की हथेली पर रख दिया। “इसे गाड़ी में खोलना।”
गाड़ी चली तो प्रभा ने खिड़की से हाथ हिलाया। पति, बेटा, बहू और नन्ही चीकू धीरे-धीरे पीछे छूटते चले गए। जब प्लेटफ़ॉर्म आँखों से ओझल हो गया, तब उसने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक छोटी-सी पर्ची थी, जिस पर काँपते हाथों से लिखा था, “प्रभा, देर से ही सही, पर समंदर से मेरा भी परिचय करा देना। अगली बार हम दोनों साथ चलेंगे। तुम्हारा गिरधारी।”
प्रभा ने पर्ची को सीने से लगा लिया। डिब्बे में बैठी मालती और रेखा ने उसे देखा तो मुस्कुरा दीं। “अरे पगली, रो क्यों रही है? अभी तो सफ़र शुरू हुआ है!”
दो दिन बाद वे पुरी पहुँचीं। होटल में सामान रखकर सारी सखियाँ तुरंत समुद्र-तट की ओर दौड़ पड़ीं। पर प्रभा ने सबसे कहा, “तुम लोग चलो, मैं थोड़ा बाद में आती हूँ।”
वह धीरे-धीरे अकेली चलती रही। रेत पर चलते हुए उसके पैरों के नीचे रेत की ठंडक महसूस हुई, और फिर कानों में एक गहरी, गंभीर आवाज़ पड़ी, जैसे कोई पुराना दोस्त बरसों बाद उसका नाम पुकार रहा हो। उसने नज़र उठाई। सामने अनंत तक फैला हुआ नीला पानी था, लहरें आतीं, उसके पैरों को चूमतीं और लौट जातीं।
प्रभा वहीं रेत पर घुटनों के बल बैठ गई। उसकी आँखों से आँसू बहते रहे और होंठ मुस्कुराते रहे। सोलह साल की वह लड़की, जिसने किताब में समंदर की तस्वीर देखी थी, आज सत्तावन साल की उस औरत के भीतर से मुस्कुरा रही थी।
मालती आकर उसके पास बैठ गई और चुपचाप उसके कंधे पर हाथ रख दिया। कोई कुछ नहीं बोला। कभी-कभी कुछ पल शब्दों से कहीं बड़े होते हैं।
पाँच दिन कैसे बीते, पता ही नहीं चला। उन्होंने सुबह सूरज को समंदर से निकलते देखा, जगन्नाथ जी के दर्शन किए, कोणार्क के सूर्य मंदिर के पत्थरों को छुआ, और रात को रेत पर बैठकर पुरानी बातें दोहराईं। प्रभा ने पूरी उम्र में पहली बार ज़ोर से ठहाके लगाए। उसने अपने हाथों से रेत का घरौंदा बनाया, चीकू के लिए सीपियाँ बटोरीं, और हर शाम फ़ोन पर पति से बात की।
“आज खाने में क्या बनाया?” वह पूछती।
“खिचड़ी,” गिरधारी लाल गर्व से बताते, “पहली बार अकेले बनाई है। थोड़ी जल गई, पर बहू ने कहा कि स्वाद अच्छा है।” फ़ोन के उस पार इशिता की दबी हुई हँसी सुनाई देती और प्रभा का दिल भर आता।
पाँचवें दिन जब वह घर लौटी, तो दरवाज़े पर तोरण सजा था। चीकू दौड़कर दादी से लिपट गई। गिरधारी लाल ने आगे बढ़कर अपने हाथ से बनी चाय का प्याला पत्नी को थमाया। चाय कुछ ज़्यादा ही मीठी थी और दूध थोड़ा कम, पर प्रभा ने उसे अमृत की तरह पिया।
“कैसा लगा समंदर?” गिरधारी लाल ने पूछा।
प्रभा ने पति की आँखों में देखा और मुस्कुराकर बोली, “इतना बड़ा कि उसे देखकर समझ आया, अपने सपनों को इतने साल रोके रखना कितनी छोटी बात थी। अब आप भी चलिएगा।”
“ज़रूर चलूँगा,” गिरधारी लाल हँस पड़े। “इस बार मैं टिकट कटाऊँगा और पूछूँगा भी, कि आपकी अगली जगह कौन-सी है, मैडम?”
सब हँस पड़े। चीकू ने सीपियों को हाथ में लेकर कान से लगाया और बोली, “दादी, इसमें तो समंदर की आवाज़ आ रही है!”
उस दिन के बाद प्रभा के जीवन में बहुत कुछ बदल गया। उसने अपने मोहल्ले की उन औरतों को इकट्ठा किया जो बरसों से अपनी ख़्वाहिशें दिल में दबाए बैठी थीं। हर तीन महीने में वे किसी नई जगह की छोटी-सी यात्रा पर निकलने लगीं। गिरधारी लाल अब खुद चाय बनाते थे, और हर बार पत्नी को विदा करते हुए कहते, “जाओ प्रभा, जी लो अपनी ज़िंदगी। मैं यहाँ हूँ।”
और प्रभा सोचती, कितना अजीब है कि जिस इंसान ने कभी उसके सपनों को रोकने की कोशिश की थी, वही अब उन सपनों को उड़ान दे रहा था। बस एक बार दिल की बात कह देने की ज़रूरत थी, और एक बार सुन लेने की।
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