अनुराग अवाक रह गया। उसकी आंखों से खुशी और कृतज्ञता के आंसू बह निकले। उसने गरिमा के माथे को चूम लिया और बोला, “गरिमा, तुमने आज मुझे दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान बना दिया। हम कल ही गांव चलेंगे। भाभी मां के आशीर्वाद के बिना यह शादी का मंडप अधूरा रहेगा। उनके चरणों की धूल जब हमारे सिर पर पड़ेगी, तभी हमारा नया जीवन सार्थक होगा।”
अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण ने दस्तक दी, तो अनुराग और गरिमा की गाड़ी गांव की पगडंडियों पर दौड़ रही थी। उनके दिलों में किसी पुराने बंटवारे का मलाल नहीं था, बल्कि रिश्तों को फिर से जोड़ने, एक मां को उसका खोया हुआ सम्मान लौटाने और मानवता की एक नई मिसाल कायम करने का अटूट संकल्प था।
कमरे के भीतर रखी शादी के कपड़ों की पेटियां, निमंत्रण पत्रों के बंडल और गहनों के बक्से गवाही दे रहे थे कि बस कुछ ही हफ्तों में इस घर में शहनाइयां गूंजने वाली हैं।
अनुराग कई घंटों से बालकनी की रेलिंग पकड़े शून्य में ताक रहा था। उसके चेहरे पर फैली बेचैनी और माथे की सिलवटें बता रही थीं कि उसके भीतर विचारों का कोई बहुत बड़ा तूफान उठ रहा है।
तभी कमरे से गरिमा हाथ में पानी का गिलास लिए बाहर आई। उसने अनुराग के कंधे पर हल्के से हाथ रखा और बहुत प्यार से पूछा, “अनुराग, पिछले दो दिनों से देख रही हूं, तुम कहीं खोए-खोए से हो। शादी की तारीख पास आ रही है, शॉपिंग बाकी है, कार्ड बांटने हैं और तुम हो कि जब देखो किसी गहरी सोच में डूबे रहते हो। क्या बात है? क्या तुम इस शादी से खुश नहीं हो?”
अनुराग ने चौंककर गरिमा की तरफ देखा। उसकी आंखों में दर्द और कृतज्ञता का मिलाजुला भाव था। उसने गरिमा का हाथ थामकर पास पड़ी कुर्सी पर बैठाया और खुद उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
“गरिमा, आज मुझे तुमसे एक ऐसा सच कहना है जो मैंने आज तक दुनिया की नजरों से छिपाकर रखा… यहां तक कि तुमसे भी। लेकिन सात फेरे लेने से पहले अगर मैंने यह बात तुम्हें नहीं बताई, तो मैं खुद की नजरों में गिर जाऊंगा। हो सकता है यह सुनने के बाद तुम्हारे कदम पीछे हट जाएं, या तुम्हारा परिवार यह रिश्ता तोड़ दे, पर मेरा यह सच जानना तुम्हारा हक है।”
गरिमा का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने घबराते हुए कहा, “अनुराग, तुम मुझे डरा रहे हो। ऐसी कौन सी बात है जो तुमने मुझसे छिपाई? तुमने तो यही बताया था ना कि तुम्हारे माता-पिता बचपन में ही गुजर गए थे, तुम्हारी दो बड़ी बहनें हैं जो अपने-अपने ससुराल में खुश हैं और तुम इस शहर में अपनी मेहनत के दम पर अकेले खड़े हुए हो?”
अनुराग ने भारी मन से सिर हिलाया और बोला, “हां गरिमा, मैंने यही कहा था… पर यह पूरा सच नहीं था। सच यह है कि मैं अपने घर में अकेला भाई नहीं था। मेरे एक बड़े भाई भी थे… सूर्यकांत भैया। आज से करीब आठ साल पहले वो इस दुनिया से चले गए।”
“मगर तुमने कभी उनका जिक्र क्यों नहीं किया?” गरिमा ने हैरान होकर पूछा।
अनुराग ने एक लंबी सांस ली और अपनी जिंदगी के पन्ने पलटने लगा, “सुनो गरिमा… मेरे पिता जी की दो शादियां हुई थीं। पहली शादी बहुत कम उम्र में हुई थी, जिससे सूर्यकांत भैया का जन्म हुआ। भैया जब महज चार साल के थे, तभी उनकी मां की बीमारी से मौत हो गई। पिता जी ने भैया की खातिर पंद्रह साल तक दूसरी शादी नहीं की। उन्होंने अकेले ही भैया को पाला-पोसा। लेकिन जब भैया बड़े हो गए, तो रिश्तेदारों के दबाव में आकर पिता जी ने दूसरा विवाह किया… मेरी मां से। मेरी मां से हम तीन भाई-बहन हुए—मेरी दोनों बड़ी बहनें और मैं।”
अनुराग की आंखें डबडबा आईं। उसने बात जारी रखी, “दीदियों ने तो मां-बाप का प्यार देखा, समझा। मगर जब मैं मुश्किल से ढाई साल का था, तभी पहले पिता जी को दिल का दौरा पड़ा और वो चल बसे। उनके जाने के गम में कुछ ही महीनों बाद मां भी बिस्तर से ऐसी लगीं कि फिर कभी नहीं उठीं। मैं दूध पीता बच्चा अनाथ हो गया था। उस वक्त सूर्यकांत भैया की शादी हो चुकी थी और मेरी भाभी… जानकी भाभी, ब्याह कर उस घर में आ चुकी थीं।”
“उस वक्त भैया और भाभी के अपने दो छोटे बेटे थे—गौरव और मयंक। मैं भी उन्हीं के साथ पलने लगा। जानकी भाभी ने मुझे कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि मैं उनकी सौतेली सास का बेटा हूं। उन्होंने मुझे अपने दोनों बेटों से भी बढ़कर दुलार दिया। जब वो अपने बच्चों को दूध पिलातीं, तो पहले कटोरी मेरे मुंह से लगातीं। जब तीनों बच्चों में लड़ाई होती, तो डांट हमेशा गौरव और मयंक को पड़ती और मुझे अपनी छाती से चिपका लेतीं। बचपन में मुझे पता ही नहीं था कि वो मेरी भाभी हैं… मैं उन्हें ‘मां’ ही कहता था। मेरे लिए वही संसार थीं। पूरे गांव में लोग मिसाल देते थे कि जानकी ने देवर को कलेजे का टुकड़ा बना लिया है।”
गरिमा चुपचाप अनुराग की बात सुन रही थी। उसके भीतर की घबराहट अब एक गहरी जिज्ञासा और भावुकता में बदल रही थी।
अनुराग ने आगे कहा, “समय बीतता गया। दोनों दीदियों की शादी सूर्यकांत भैया और जानकी भाभी ने अपनी हैसियत से बढ़कर धूमधाम से की। फिर हम तीनों भाई बड़े हुए। मैं, गौरव और मयंक। मयंक को हमेशा से विदेश जाकर उच्च शिक्षा लेने का शौक था। उस जमाने में विदेश भेजने के लिए लाखों रुपयों की जरूरत थी। भैया के पास इतनी जमापूंजी नहीं थी। उन्होंने पुरखों की कुछ जमीन बेचने का फैसला किया।”
“फिर क्या हुआ?” गरिमा ने धीरे से पूछा।
अनुराग का गला रुंध गया, “उस दिन मेरी जिंदगी का सबसे काला दिन था गरिमा। गांव के कुछ रिश्तेदारों और पंचायत के बड़े-बूढ़ों ने आकर भैया के कान भरे। उन्होंने कहा कि जमीन बेचने से पहले अनुराग का हिस्सा अलग करो, नहीं तो कल को यह लड़का बड़ा होकर कोर्ट-कचहरी करेगा और तुम्हारे बच्चों का हक छीन लेगा। भैया और भाभी कभी ऐसा नहीं सोचते थे, लेकिन समाज के तानों और कानूनी उलझनों के डर से उन्होंने फैसला किया कि पहले मेरा हिस्सा अलग किया जाए ताकि मुझ पर कोई आंच न आए। एक दिन अचानक मुझे कचहरी ले जाया गया और कागजों पर दस्तखत करवाकर जमीन और पुश्तैनी मकान के दो टुकड़े कर दिए गए।”
अनुराग की आंखों से आंसू छलक पड़े, “गरिमा, जिस दिन वो बंटवारा हुआ, उस दिन मैं अंदर से टूट गया। मुझे लगा कि जिस औरत को मैंने मां माना, जिस भाई को भगवान समझा, उनके सामने मैं बेटा या भाई नहीं… महज एक ‘हिस्सेदार’ बनकर रह गया। मुझे उस जमीन से, उस दौलत से कोई मतलब नहीं था। मुझे बस उनका प्यार चाहिए था। उस बंटवारे ने मेरे सीने में खंजर घोंप दिया। मुझे लगा कि मैं सचमुच अनाथ हूं, मेरा इस दुनिया में कोई अपना नहीं है। भाभी ने रोते हुए मेरे पैर तक पकड़ लिए थे, कहा था—’लल्ला, यह सब तेरी सुरक्षा के लिए किया है, तू तो मेरा सबसे बड़ा बेटा है।’ मगर उस नादान उम्र के अहंकार और चोट खाए दिल ने उनकी एक न सुनी। मैं सब कुछ छोड़कर, बिना बताए शहर भाग आया।”
कमरे में कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। केवल अनुराग की सिसकियों की आवाज गूंज रही थी।
“शहर आकर मैंने दिन-रात मेहनत की, छोटी-मोटी नौकरियां कीं, पढ़ाई पूरी की और खुद को इस मुकाम तक पहुंचाया। इस बीच गांव से खबर आई कि सूर्यकांत भैया मेरे जाने के सदमे और बीमारी के चलते गुजर गए। मैं उनके अंतिम संस्कार में गया जरूर, लेकिन सीने में जमी कड़वाहट की वजह से मुखाग्नि होते ही उसी रात लौट आया। मैंने भाभी से नजरें तक नहीं मिलाईं। मुझे लगा कि उन्होंने मुझे बेगाना किया था।”
“उसके बाद क्या हुआ अनुराग? उनके दोनों बेटों ने क्या किया?” गरिमा ने कांपती आवाज में पूछा।
“वही, जो आज के जमाने की कड़वी सच्चाई है,” अनुराग ने व्यंग्य भरी हंसी हंसते हुए कहा। “मयंक विदेश गया और वहीं की नागरिकता लेकर बस गया। उसने कभी मुड़कर मां का हाल तक नहीं पूछा। दूसरा बेटा गौरव, जिसने शहर में बड़ी नौकरी पकड़ ली, शादी कर ली और अपनी पत्नी के साथ एक आलीशान फ्लैट में रहने लगा। उसने मां को अपने साथ रखने से साफ इनकार कर दिया। वो कहता है कि गांव की गंवार औरत उसके हाई-फाई समाज में फिट नहीं बैठती।”
अनुराग ने गरिमा की आंखों में देखते हुए कहा, “कल रात गांव के एक पुराने पड़ोसी का फोन आया था। जानकी भाभी… मेरी भाभी मां, बहुत बीमार हैं। वो पुराने टूटे हुए मकान के एक कोने में अकेली पड़ी हैं। चलने-फिरने में लाचार हैं। दोनों सगे बेटों ने उन्हें जीते जी मार दिया है। वो आज भी उस चौखट पर मेरी राह देखती हैं और हर आने-जाने वाले से पूछती हैं कि क्या उनका लल्ला आया?”
अनुराग की आवाज में एक गजब का संकल्प और दर्द उतर आया, “गरिमा, जिस औरत ने अपना यौवन, अपने सुख, अपनी ममता मुझ जैसे अनाथ पर न्योछावर कर दिए… जिसने मुझे अपनी कोख से न जनम देकर भी सगे बच्चों से ज्यादा चाहा… आज जब वो जिंदगी और मौत के बीच झूल रही हैं, तो मैं यहां बैठकर अपनी खुशियों की शहनाइयां नहीं सुन सकता। मैं अपनी भाभी मां को इस तरह घुट-घुट कर मरने के लिए अकेला नहीं छोड़ सकता।”
उसने गरिमा के दोनों हाथ थामे और बहुत संजीदगी से कहा, “तुमने एक ऐसे लड़के से प्यार किया था जिसका कोई अतीत नहीं था, जिसके आगे-पीछे कोई जिम्मेदारी नहीं थी। लेकिन आज सच यह है कि मेरी एक मां है। वो मां जो बीमार है, असहाय है और जिसे अब सिर्फ अपने इस बेटे के सहारे की जरूरत है। मैं कल सुबह की पहली गाड़ी से गांव जा रहा हूं और भाभी मां को हमेशा के लिए अपने साथ इस घर में लेकर आऊंगा। मैं उनकी आखिरी सांस तक उनकी सेवा करूंगा।”
अनुराग की पलकों से आंसू बहकर गरिमा की हथेलियों पर गिरे, “अब फैसला पूरी तरह तुम्हारे हाथ में है गरिमा। अगर तुम एक बीमार, बूढ़ी सास की सेवा नहीं करना चाहतीं, या तुम्हें लगता है कि मेरी इस जिम्मेदारी से तुम्हारी आने वाली गृहस्थी में खलल पड़ेगा, तो तुम यह शादी तोड़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हो। मैं तुम्हारे फैसले का सम्मान करूंगा और तुमसे कोई शिकायत नहीं रखूंगा।”
कमरे में पसरा सन्नाटा जैसे सांस रोके खड़ा था। गरिमा चुपचाप अनुराग के चेहरे को देखती रही। उसकी आंखों में आंसुओं का एक समंदर उमड़ आया था।
अगले ही पल, गरिमा ने अपने दोनों हाथों से अनुराग के आंसू पोंछे। उसके चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान खिल उठी। उसने झुककर अनुराग को उठाया और अपने सीने से लगा लिया।
“अनुराग… आज तुमने मेरे दिल में अपने लिए प्यार और सम्मान को हजार गुना बढ़ा दिया है,” गरिमा की आवाज भावुकता से भीगी हुई थी। “मैं तो एक ऐसे अनाथ लड़के से शादी करने जा रही थी जिसकी दुनिया सिर्फ मुझ तक सीमित होती। लेकिन आज मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे इंसान का हाथ थामने जा रही हूं जिसके सीने में पत्थर नहीं, एक संवेदनशील और कृतज्ञ दिल धड़कता है। जो बेटा अपनी उस मां का कर्ज नहीं भूला जिसने उसे पाला था, वो कल को अपनी पत्नी को कभी बेसहारा नहीं छोड़ेगा।”
गरिमा ने पीछे हटकर अनुराग की आंखों में देखते हुए दृढ़ता से कहा, “और तुमने यह कैसे सोच लिया कि वो सिर्फ तुम्हारी जिम्मेदारी हैं? शादी के बाद जो तुम्हारा है, वो मेरा भी तो होगा ना? वो सिर्फ तुम्हारी भाभी मां नहीं, मेरी सास हैं… इस घर की बड़ी हैं। और तुम अकेले गांव नहीं जाओगे। मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी। एक बहू बनकर नहीं, बल्कि उनकी अपनी बेटी बनकर उन्हें इस घर में लेकर आऊंगी। हम दोनों मिलकर उनकी सेवा करेंगे और उन्हें दिखाएंगे कि भले ही कोख के बेटों ने मुंह मोड़ लिया हो, पर कलेजे से लगाया हुआ बेटा आज भी उनका श्रवण कुमार बनकर खड़ा है।”
अनुराग अवाक रह गया। उसकी आंखों से खुशी और कृतज्ञता के आंसू बह निकले। उसने गरिमा के माथे को चूम लिया और बोला, “गरिमा, तुमने आज मुझे दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान बना दिया। हम कल ही गांव चलेंगे। भाभी मां के आशीर्वाद के बिना यह शादी का मंडप अधूरा रहेगा। उनके चरणों की धूल जब हमारे सिर पर पड़ेगी, तभी हमारा नया जीवन सार्थक होगा।”
अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण ने दस्तक दी, तो अनुराग और गरिमा की गाड़ी गांव की पगडंडियों पर दौड़ रही थी। उनके दिलों में किसी पुराने बंटवारे का मलाल नहीं था, बल्कि रिश्तों को फिर से जोड़ने, एक मां को उसका खोया हुआ सम्मान लौटाने और मानवता की एक नई मिसाल कायम करने का अटूट संकल्प था।
आज के इस दौर में जहां सगे बेटे अपने बूढ़े मां-बाप को बेसहारा छोड़ देते हैं, वहीं अनुराग और गरिमा जैसे बच्चों का यह फैसला क्या समाज के लिए एक नई प्रेरणा नहीं है? रिश्तों और परवरिश के इस मोल पर आपकी क्या राय है, हमें अपने विचारों से जरूर अवगत कराएं।
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मूल लेखिका : रश्मि झा मिश्रा