जो बोया वही पाया – सीमा सिंघी 

चार दिवारी के इस छोटे से कमरे में नंदनी जी का मन नहीं लग रहा था । उनका बहुत मन कर रहा था कि वह भी बेटे बहू और पोते-पोतियो के साथ बाहर घूमने जाएं।

उनके संग होटल में बैठकर सुकून से कुछ पल बिताए, कुछ अच्छा खाएं क्योंकि अब तक की जिंदगी में तो उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से इस घर को बसाया भर ही था। खुद के लिए कभी वक्त निकाला ही नहीं या फिर मिला ही नहीं……

वह बिस्तर पर लेटे-लेटे सोचते रहती। यह समय भी क्या-क्या रंग दिखाता है जबकि मैंने अपने जीवन में कभी किसी का बुरा नहीं किया, बुरा नहीं सोचा। जब से इस घर में ब्याह कर आई थी ।इसी घर की होकर रह गई थी। सास, ससुर, पति, बच्चे, नाते -रिश्तेदार सभी के लिए वह हर पल हाजिर रहती थी।

जब खुद के बच्चे मनीष और विधि बड़े हुए तो विधि का बहुत अच्छा घर देखकर विवाह कर दिया ।

 मनीष के लिए भी कादंबरी को देखा तो एक नजर में ही वह भा गई क्योंकि उसकी बड़ी-बड़ी आंखें और गोरा चांद सा चेहरा बहुत ही भला लगा था । कादंबरी का जितना सुंदर सलोना चेहरा था। उसकी उतनी ही छोटी सोच और नियत की तो वो बिल्कुल भी सही नहीं थी।

विवाह के बाद कुछ दिन तो अच्छी तरह निकले मगर धीरे-धीरे कादंबरी ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। नंदनी जी शुरुआत से ही बहुत भली औरत थी।

सबका भला सोचती थी इसीलिए कुछ दिन तो चुप रही मगर फिर कुछ दिन बाद से उन्होंने प्यार से कादंबरी को समझाना चाहा मगर समझते तो वह लोग हैं। जो समझना चाहते हैं जो समझना ही नहीं चाहते उन्हें समझाना तो समय की बर्बादी ही होती है।

 इसी तरह दिन निकलते गए और अब नंदनी जी बुढ़ापे की ओर अपने कदम बढ़ा चुकी थी । कादंबरी का रवैया दिन प्रतिदिन क्रूर होता गया। वह अपने पति मनीष जी की भी नहीं सुनती थी। जिस दिन नंदनी जी के पति रघुनाथ जी इस दुनिया से चले गए। उसके बाद कादंबरी ने घर के कोने में बने हुए कमरे में अपनी सासू मां नंदिनी जी को छोड़ दिया। अपनी मां के साथ ऐसा बर्ताव देख कर मनीष ने जब भी कहना चाहा । नंदनी जी उन्हें प्यार से समझाते हुए कह देती की बेटा धीरे-धीरे कादंबरी सब समझ जाएगी । नंदिनी जी के मन में यह डर बना रहता की  कहीं कादंबरी के क्रूर स्वभाव की वजह से घर का माहौल और उनके बेटे का जीना मुश्किल ना हो जाए क्योंकि मां तो आखिर मां होती है । ये सब देख मनीष और बच्चों का बहुत मन तरसता था इसीलिए जैसे ही कादंबरी कहीं जाती तो पीछे से मनीष और उसके बच्चे नंदनी जी को बाहर बाजार की बनी हुई मिठाई और नमकीन लाकर खिलाते, उनके साथ पुरानी बातें करते थे मगर जैसे ही कादंबरी आने वाली होती। वह सब अपनी-अपनी जगह वापस चले जाते,जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

समय की नीति देखिए इस तरह अत्याचार भी उस पर ही किया जाता है। जो मन के बड़े सरल होते हैं। दिन गुजरते गए । अब कादंबरी के बच्चे भी बड़े हो गए। घर में पोता मिहिर की बहू रूही भी आ गई।

कादंबरी का तो स्वभाव था आखिर उसने रूही पर भी अपने शासन का हंटर चलाना चाहा। मगर रूही सच का ही साथ देती थी । जो गलत होता वह उसे तुरंत सही तरीके से कह देती थी।

आज दोपहर में अचानक कादंबरी सो कर उठी तो देखा बाजू के कमरे से सबके खिलखिलाने की आवाज आ रही है। वह तुरंत तेज कदमों से बाजू वाले कमरे में चली गई और देखा उनकी सासू मां नंदनी जी और पति मनीष मिहिर और रुही सब खिल खिलाकर हंस रहे हैं और एक दूसरे से बातें कर रहे हैं। कादंबरी  से यह सब देखा नहीं गया। वो तुरंत गुस्से में आकर कहने लगी। यह सब क्या है मां जी को यहां क्यों लेकर आए हो। मां जी अब बूढी हो चली है । अब उन्हें आराम करना चाहिए।

कोई कुछ और कहता उसके पहले ही रूही बड़े सलीके से बोल उठी। मम्मी जी दादी मां उस कोने के कमरे में बिल्कुल अकेले पड़ जाती थी । जहां उन्हें हमारा चेहरा तक नहीं दिखाई देता था इसीलिए घर के बीच वाले कमरे में ले आई । अब उन्हें आते जाते हम सब दिखाई देंगे। सबके चेहरे देखते हुए भी वह आराम तो इस कमरे में भी कर सकती है।

 उन्हें अब घर परिवार की बातों से क्या लेना-देना। मैं तो उनके अच्छे के लिए ही कर रही थी। वैसे भी बाजू में ही रसोई है। उन्हें रसोई में बनी हुई चीजों की खुशबू आएगी । उनका मन करेगा जबकि उनकी पाचन शक्ति अब बिल्कुल कमजोर हो चुकी है तो उन्हें देना सही नहीं होगा। ऐसे में उन्हें तड़पाना सही नहीं है। 

अपनी सासू मां की बात सुनकर रूही फिर बोल उठी। मम्मी जी माना की दादी मां के बदन ने अब बुढ़ापे की चादर ओढ़ ली है मगर मन तो इंसान का कभी बूढ़ा नहीं होता और परिवार की बातों से इनका लेना-देना कैसे नहीं है ।

जबकि इन्होंने ही इस परिवार की जड़ों को अपनी मेहनत और लगन से सींचा है। रही रसोई में पकने वाले पकवान की तो हम उन्हें कम तेल और कम घी का भी बनाकर दे सकते हैं। 

और मम्मी जी याद रखिए। बुढ़ापा एक दिन सबको आने वाला है। आप जो आज दादी मां के साथ कर रही हैं। वही अगर नियति ने कल को आपके साथ कर दिया तो??? फिर तो यह कहावत सच हो जाएगी “जो बोया वही पाया”। 

मैं फिर से कहती हूं मम्मी जी अभी भी वक्त है,बीती बातें भूल जाए और आज से हम सब एक नई जिंदगी शुरू करें  कहते हुए रूही ने उपमा जो बड़े सादे तरीके से बनाए गए थे। अपनी दादी मां को एक चम्मच खिलाया और उसी में से अपनी सासू मां को भी एक चम्मच खिलाते हुए फिर कहने लगी। 

मम्मी जी आप जरा खा कर देखिए क्या इसमें बहुत ज्यादा तेल या मसाले हैं??

कादंबरी से कुछ कहते नहीं बना क्योंकि ज्यादा मिर्च मसाले ना होते हुए भी वाकई में उपमा बहुत स्वादिष्ट बने थे।

उसे मन ही मन अपने सासू मां के प्रति किए गए व्यवहार पर बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई और वह रूही से कहने लगी। तुम बिल्कुल सही कह रही हो रूही। मैंने मां के साथ बहुत बुरा किया मुझे हमेशा यही लगता रहा कि मैं जितना कड़वा बोलूंगी। उतने ही लोग मेरे आगे झुकेंगे।

मैं मां के साथ ऐसा व्यवहार करते वक्त यह भूल ही गई इंसान जैसा बोता है वही तो पाता है । आखिर उसके खुद के किए हुए कर्म ही तो वापस लौट कर आते हैं और फिर नंदनी जी की तरफ देखते हुए कहने लगी । मुझे क्षमा कर दीजिए मां। मैंने सदा आपके साथ इतना गलत व्यवहार किया। आप फिर भी मुझे सदा आशीर्वाद देती रही कहते हुए कादंबरी अपनी सासू मां नंदिनी जी के कदमों में झुक गई। कोई बात नहीं अब रात गई बात गई कहकर मुस्कुराते हुए नंदिनी जी भी आशीर्वाद देते हुए सोचने लगी।

 हे ईश्वर मैं मानती हूं मुझे तकलीफें झेलनी पड़ी मगर कोई मां  अपने सुख के लिए अपने बेटे की गृहस्थी में कैसे तनाव ला सकती है । यह भी सच है मैंने कभी किसी का बुरा नहीं किया, बुरा नहीं सोचा इसीलिए देर से ही सही मगर जो बोया वही तो अब पा रही हूं यही सोचते हुए हुए वो मंद मंद मुस्कुराने लगी।

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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