आज फिर रोहन और उसकी पत्नी श्यामा विजय बाबू और उनकी पत्नी संग उलझ गए थे।
पापा पैसे पेड़ पर नहीं उगते?-यह रोहन था।
ऐसा क्या मांग लिया हमने,बस तेरी मां की दवा लाने को कहा था जो खत्म हो गई है।-वे सहज भाव से बोले।
वहीं तो मैं समझा रहा हूं,पैसे पेड़ पर नहीं उगते,जब आएंगे तब ला दूंगा-रोहन गुस्से से चिल्लाते हुए बोला।
अरे बेटा ,उतनी देर में तेरी मां का तो हालत खराब हो जाएगा, डाइबिटीज बड़ी मुश्किल से नियंत्रण में आयी है।-वे समझाते हुए बोले।
फिर पेंशन के पैसे भी तो दिया था -ये आश्चर्य व्यक्त करते बोले।
घर के खर्चों में उठ गये।-बेटे बहू ढिढाई से बोलकर उठ गये और चले गए।
रूको , पर्ची मुझे दो-कहते वे चल दिए और आराम से दवा लाकर दे दिए।
बस इन्हें इतना समझ में आ गया कि पत्नी को यदि बचाना है तो दूसरी पारी खेलनी होगी और वह पैसा अपने हिसाब से खर्च करना होगा।
फिर क्या था,अपने मित्र के फार्म में एकाउंट का काम करना शुरू कर दिया। खूब तेज काम चलने लगा और ये अच्छा कमाने लगे। पत्नी की दवाई और जरूरत की सारी चीजें लाने लगे और पत्नी सही चलने भी लगी।
इधर बेटा इनके दिए मकान में रहता था,इनका ही खाता था।सो वह लापरवाह हो गया था।
बहू भी नकचढ़ी थोड़ी तेज बोलती थी।सो उस दिन जब ये दोनों आराम से अस्पताल गये और पूरी दवाई साथ खाना खाकर आये तो रोहन चौंक गया।
आपने दवा कहां से खरीदी -वह चीखते बोला।
तुमसे मतलब,तुमने पैसे नहीं दिए तो व्यवस्था जमानी पड़ी।अब से दवा और जरूरत का पैसा काटकर पेंशन दूंगा।-ये भी उसी रौ में बोले।
देखिए घर मुझे चलाना पड़ता है सो पूरे पैसे देने होंगे।-वह फिर ढिढाई से बोला।
बस अपना काम कर,इस घर में रहने को दिया है यही बहुत है,कमा और खा-ये स्पष्ट बोलकर पत्नी संग चले गये।
अब तो रोहन और उसकी पत्नी सन्न रह गये।पूरे एशो-आराम पापा के पैसे से करते हैं उनकी दवाई नहीं ला दी तो खुद लाने लगे।दिन भर लैपटाप पर काम करते हैं।
जरूर कुछ है,पत्नी को डांटकर बोला-चुप रहकर काम कर,पापा मम्मी का ध्यान रख वरना पापा पेंशन भी नहीं देंगे और घर से भगा देंगे।हमलोग अपना खर्चा नहीं उठा सकते हैं।सो –।उधर पत्नी भी मामले की नजाकत को समझकर काम करने लगी।
इधर ये दूसरी पारी में काम करके खुश थे।
#जिंदगी की दूसरी पारी
#शब्द संख्या-500लगभग
#रचना मौलिक और अप्रकाशित है इसे मात्र यहीं प्रेषित कर रहा हूं।
#रचनाकार-परमा दत्त झा, भोपाल।