रिश्तों की मिठास

किचन के दरवाजे के पास खड़ी सुलोचना देवी की नज़रें बार-बार फ्रिज की तरफ जा रही थीं। उनका गला सूख रहा था, लेकिन मन में एक अजीब सी हिचक और संकोच की दीवार खड़ी थी। पिछले दो दिनों से उनके पति बैकुंठ जी की तबीयत थोड़ी सुस्त थी। उम्र के छिहत्तरवें पड़ाव पर पहुँचते-पहुँचते शरीर की ताक़त भले ही साथ छोड़ गई थी, पर ज़ुबान की पुरानी आदतें और छोटे-छोटे स्वाद अब भी मन के किसी कोने में बच्चों की तरह मचल उठते थे।

सुलोचना देवी ने गहरी साँस ली, अपने सूती आँचल को दोनों हाथों से भींचते हुए अपनी बहू अर्चना के पास पहुँचीं, जो गैस चूल्हे पर चाय की पत्ती खौला रही थी।

“बहू… अगर बुरा न मानो तो एक बात कहूँ? तुम्हारे बाबू जी का आज सुबह से बड़ा जी चाह रहा था… कल शाम को अनुराग जो बादाम का हलवा और पिस्ता बर्फी लाया था, उसमें से बस एक छोटा सा टुकड़ा अगर कटोरी में निकाल देती, तो मैं उन्हें खिला आती।” सुलोचना देवी की आवाज़ में एक माँ या सास का हक़ नहीं, बल्कि एक लाचार याचक जैसी थरथराहट थी।

अर्चना ने चाय छानते हुए छन्नी को ज़ोर से बर्तन के किनारे पटका। उसकी भौंहें तन गईं और चेहरे पर ऐसी चिढ़ तैर गई मानो किसी ने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो।

“माजी! आप भी ना हद करती हैं! ससुर जी को डॉक्टर ने चलने-फिरने से मना किया है, कमर और घुटने जवाब दे चुके हैं, लेकिन ज़बान की यह चटोरेपन वाली बीमारी जाने का नाम ही नहीं लेती। सच ही कहा है किसी ने—उम्र ढलती जाती है, पर तृष्णा और जवान होती जाती है! जहाँ घर में कोई अच्छी चीज़ आई नहीं कि इनकी लार टपकने लगती है। अभी चार दिन पहले ही तो उनका पेट ख़राब हुआ था। क्या सारा दिन मैं यही सब करती रहूँ? कभी हलवा निकालो, कभी बर्फी!”

अर्चना के एक-एक शब्द सुलोचना देवी के सीने में तीर की तरह चुभ रहे थे। उनकी बूढ़ी आँखों में अनायास ही आँसू छलक आए। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस अपना काँपता हुआ सिर झुका लिया।

डाइनिंग टेबल पर बैठा आठ साल का कबीर अपनी ड्रॉइंग बुक में रंग भर रहा था। उसने यह सब देखा और सुना। कबीर अपने दादाजी का सबसे प्यारा साथी था। शाम को जब भी दादाजी की चारपाई के पास बैठता, दादाजी उसे राजा-रानियों और परियों की कहानियाँ सुनाया करते थे।

कबीर ने अपनी मोमबत्ती जैसे रंगों को एक तरफ रखा और धीरे से उठकर अपनी माँ के पास गया। “मम्मी! दादी को डांटो मत ना… दादू को बस एक छोटा सा टुकड़ा दे दो ना! कल शाम को जब पापा वह डब्बा लाए थे, तब दादू ने मुझसे कहा था कि उन्हें पिस्ता बर्फी बहुत अच्छी लगती है। पापा तो पूरा एक किलो का डब्बा लाए थे, उसमें से एक पीस देने में क्या हर्ज है?”

अर्चना का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसने कबीर की बाँह पकड़ी और उसे डांटते हुए कुर्सी की तरफ धकेल दिया, “बड़ा आया अपने दादा-दादी का वकील! दिन-भर पढ़ाई-लिखाई में तो मन लगता नहीं, दुनिया भर की बातों में टाँग अड़ाना सबसे पहले आता है। चुपचाप बैठ कर अपना होमवर्क ख़त्म कर, वरना शाम का पार्क जाना बंद कर दूँगी!”

कबीर सहम गया। उसके नन्हे चेहरे पर उदासी छा गई और वह चुपचाप सिर झुकाकर रंग भरने का नाटक करने लगा, हालाँकि उसकी आँखें अब भी अपनी सिसकती हुई दादी की पीठ को देख रही थीं, जो धीरे-धीरे क़दम बढ़ाती हुई अपने कमरे की तरफ लौट रही थीं।

बैकुंठ जी कभी अपने समय के जाने-माने कपड़ा व्यापारी हुआ करते थे। कानपुर के बड़े बाज़ार में उनकी अपनी साड़ियों की पुश्तैनी दुकान थी। वे दिल के बेहद खुले, मेहमान-नवाज़ और खाने-पीने के ज़बरदस्त शौकीन इंसान थे। शहर की मशहूर दुकानों से रबड़ी, जलेबी और ताज़ा मावे की मिठाइयाँ उनके घर रोज़ किसी न किसी बहाने आती थीं। सुलोचना देवी भी अपने पति के इस शौक को बाख़ूबी जानती थीं। बाहर से मिठाइयाँ आने के बावजूद, वे कभी गाजर का हलवा तो कभी बेसन के लड्डू अपने हाथों से बनाकर काँच के जार में भरकर रख देती थीं ताकि बैकुंठ जी जब चाहें अपनी मनपसंद चीज़ खा सकें।

लेकिन तीन साल पहले, अचानक एक दोपहर बैकुंठ जी की तबीयत बिगड़ी। डॉक्टर ने बताया कि हल्का सा ब्रेन स्ट्रोक और पैरालिसिस का असर हुआ है। दायाँ हिस्सा कमज़ोर पड़ गया और वे चलने-फिरने में लाचार हो गए। उसी समय बैकुंठ जी ने अपनी सारी जमा-पूँजी, दुकान और कारोबार की बागडोर अपने इकलौते बेटे अनुराग के हाथों में सौंप दी। अनुराग मेहनती लड़का था, उसने दुकान को बहुत अच्छे से सँभाला।

लेकिन इसके कुछ ही समय बाद जब अनुराग की शादी अर्चना से हुई, तो घर की हवाएँ बदलने लगीं। शुरू-शुरू में तो सब ठीक रहा, पर धीरे-धीरे अर्चना ने घर के हर कोने पर अपना एकाधिकार जमा लिया। रसोई की चाबी उसके पास चली गई, और इसके साथ ही दोनों बुज़ुर्गों की थाली पर भी पाबंदियाँ लगनी शुरू हो गईं।

अब बैकुंठ जी और सुलोचना देवी के सामने जो थाली आती, उसमें बिना नमक-मिर्च की उबली हुई लौकी, पतली दाल और सूखी रोटियाँ होती थीं। अर्चना कहती कि बुढ़ापे में यही सुपाच्य होता है, लेकिन हक़ीक़त यह थी कि वह उनके लिए कुछ भी अलग या स्वादिष्ट बनाने में अपनी तौहीन और मेहनत की बर्बादी समझती थी। अक्सर वह बेस्वाद खाना दोनों के गले से नीचे नहीं उतरता था। कभी-कभार बैकुंठ जी का मन थोड़ा सा आचार या मीठा खाने को करता, तो अर्चना के तीखे बोल सुनने को मिलते।

अनुराग सुबह नौ बजे दुकान के लिए निकल जाता था और रात को दस-ग्यारह बजे से पहले घर नहीं लौट पाता था। बाज़ार की दौड़धूप और कारोबार का दबाव उसे बुरी तरह थका देता था। जब वह घर लौटता, तब तक माँ-बाबूजी अपने कमरे में खा-पीकर सो चुके होते या आँखें मूँदे करवटें बदल रहे होते। अनुराग कमरे में जाकर सिर्फ़ इतना पूछ पाता, “बाबूजी, तबीयत ठीक है ना?” और वे दोनों अपने बेटे की थकी हुई आँखों को देखकर हमेशा मुस्कुरा कर कह देते, “हाँ बेटा, सब ठीक है।”

अनुराग को अपने पिता की पुरानी आदतों का बख़ूबी इल्म था। वह जानता था कि बाबूजी को मीठा कितना पसंद है। इसलिए वह अक्सर हर तीसरे-चौठे दिन लौटते समय बाज़ार से कोई न कोई बढ़िया मिठाई ज़रूर लाता। कभी काजू कतली, कभी इमरती, तो कभी ताज़ी रसमलाई। वह घर आते ही मिठाई का डिब्बा अर्चना के हाथ में थमा देता और कहता, “अर्चना, बाबूजी को बहुत पसंद है, कल सुबह नाश्ते के बाद उन्हें और माँ को ज़रूर खिला देना।”

अर्चना चेहरे पर मीठी मुस्कान लाकर हाँ कह देती, लेकिन अनुराग की पीठ पीछे वह डिब्बा सीधे फ्रिज के सबसे ऊपरी कोने में या अलमारी के पीछे छुप जाता। उसमें से एकाध टुकड़ा अर्चना खुद खाती या कबीर को देती, और बाक़ी मिठाई या तो मेहमानों के आने पर निकलती या फिर कई दिनों तक रखे-रखे सूख जाती।

सुलोचना देवी सब देखती थीं, पर बेटे के सुखी संसार में कोई कलह न हो, इस डर से वे अपने आँसुओं को कलेजे में ही घोंट लेती थीं। वे जानती थीं कि अगर उन्होंने अनुराग से कुछ कहा, तो घर में महाभारत छिड़ जाएगी और बेटे की शांति छिन जाएगी। लेकिन कभी-कभी जब बैकुंठ जी की आँखें किसी बच्चे की तरह मिठाई के लिए तरस जातीं, तब सुलोचना देवी की ममता और लाचारी बेबस हो उठती। और जब वे हाथ फैलाकर बहू से माँगने जातीं, तो अर्चना का अपमानजनक व्यवहार उन्हें अंदर तक तोड़ देता था।

उस दिन दोपहर में कानपुर के आसमान पर काले घने बादल घिर आए। देखते ही देखते मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। सड़कें पानी से लबालब भर गईं और बाज़ार में बिल्कुल सन्नाटा पसर गया। ग्राहकों के न होने के कारण अनुराग ने सोचा कि रोज़-रोज़ तो समय मिलता नहीं, आज दुकान जल्दी बंद करके घर चला जाए और कुछ वक़्त माँ-बाबूजी के पास बैठकर बातें की जाएँ।

शाम के तक़रीबन पाँच बजे दरवाज़े की घंटी बजी। अर्चना ने दरवाज़ा खोला तो सामने अनुराग को भीगते हुए छाते के साथ खड़ा पाया।

“अरे! आप इतनी जल्दी आ गए? तबीयत तो ठीक है ना आपकी?” अर्चना ने आश्चर्य से पूछा।

“हाँ बाबा, बिल्कुल ठीक हूँ। इतनी तेज़ बारिश में बाज़ार में कोई ग्राहक नहीं था, तो मैंने सोचा कि आज जल्दी घर चलकर माँ-बाबूजी के साथ चाय पी जाए।” अनुराग जूते उतारते हुए मुस्कुराया और सीधे अपने माता-पिता के कमरे की तरफ बढ़ गया।

कमरे में धुंधली सी रोशनी थी। बैकुंठ जी तकिए के सहारे लेटे हुए थे और सुलोचना देवी पास की कुर्सी पर बैठकर चुपचाप माला जप रही थीं।

“प्रणाम बाबूजी! माँ, कैसी हो आप लोग?” अनुराग ने कमरे में क़दम रखते हुए कहा।

सुलोचना देवी ने चौंक कर देखा, उनके चेहरे पर एक असीम ममता भरी चमक आ गई। “अरे अनुराग! आज इतनी जल्दी कैसे आ गया बेटा? सब ख़ैरियत तो है ना?”

“हाँ माँ, सब बढ़िया है। बस बारिश की वजह से दुकान जल्दी बढ़ा दी। सोचा आज आप लोगों के पास बैठूँ, बहुत दिन हो गए सुकून से गपशप किए।” अनुराग बाबूजी के पाँव के पास बिस्तर पर बैठ गया और उनके पैर दबाने लगा।

बैकुंठ जी ने अपने काँपते हाथों से बेटे के सिर पर हाथ फेरा। उनके चेहरे की झुर्रियों में एक संतोष की लकीर खिंच गई। “बड़ा अच्छा किया बेटा। तू दिन-रात इतनी मेहनत करता है, कभी-कभी थोड़ा आराम भी कर लिया कर।”

अनुराग हँस पड़ा। फिर अचानक उसे कुछ याद आया। उसने मुस्कुराते हुए बाबूजी की तरफ देखा, “अरे हाँ बाबूजी! कल रात को लौटते समय मैं वो घंटाघर वाली मशहूर दुकान से आपकी पसंदीदा पिस्ता बर्फी और हलवा लाया था। माँ ने आपको दिया था ना? कैसी लगी मिठाई? उस दुकान का स्वाद तो आज भी वैसा ही है ना जैसा हमारे बचपन में हुआ करता था?”

यह सवाल सुनते ही कमरे में एक अजीब सा, दमघोंटू सन्नाटा छा गया।

सुलोचना देवी के हाथ से माला की डोरी छूटते-छूटते बची। उनके हलक में शब्द अटक गए। उन्होंने घबराकर अपनी नज़रें नीची कर लीं ताकि अनुराग उनकी आँखों में तैरते हुए आँसू न देख ले।

बैकुंठ जी ने एक पल के लिए अपनी पत्नी की तरफ देखा, जिनकी पलकें झुकी हुई थीं और जो अपने काँपते होंठों को दबाए खड़ी थीं। एक लाचार पिता अपने बेटे की आँखों में उम्मीद और प्यार की चमक देख रहा था। वे कैसे कह देते कि उस मिठाई का एक भी दाना उनकी ज़ुबान तक नहीं पहुँचा? वे कैसे कह देते कि उनके बेटे का लाया हुआ प्यार बहू के अहंकार की अलमारी में बंद पड़ा सड़ रहा है?

बैकुंठ जी ने अपने चेहरे पर एक ज़बरदस्ती की, बनावटी मुस्कान बिखेर दी। अपनी लड़खड़ाती आवाज़ को जितना हो सके सहज बनाते हुए बोले, “हाँ… हाँ बेटा! बहुत… बहुत बढ़िया थी। सचमुच, खाकर मन तृप्त हो गया। तू मेरा कितना ख्याल रखता है।”

यह कहते हुए बैकुंठ जी का गला भर आया। उन्होंने अपनी नज़रें खिड़की की तरफ घुमा लीं ताकि बहने को आतुर आँसू छुप सकें। सुलोचना देवी की आँखों से दो बूँद आँसू चुपचाप गिरकर उनकी धोती के पल्लू में जज़्ब हो गए।

अनुराग यह सब देखकर थोड़ा असहज हो गया। उसे कुछ अजीब लगा, लेकिन इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, कमरे के दरवाज़े पर छोटा कबीर आकर खड़ा हो गया।

कबीर के चेहरे पर मासूमियत भरा गुस्सा था। वह कमरे में अंदर आया और अनुराग का हाथ पकड़कर खींचने लगा।

“पापा! दादू बिल्कुल झूठ बोल रहे हैं!” कबीर की मासूम आवाज़ कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई गूँजी।

सुलोचना देवी घबरा गईं, “कबीर बेटा, चुप रहो… अपने कमरे में जाओ!”

“नहीं दादी, मैं चुप नहीं रहूँगा!” कबीर ने ज़िद में पैर पटकते हुए कहा। फिर उसने अपने पिता का चेहरा ऊपर किया, “पापा, दादू ने एक भी बर्फी नहीं खाई। कल रात से दादू को कोई मिठाई नहीं मिली। आज सुबह जब दादी किचन में मम्मी से दादू के लिए एक टुकड़ा बर्फी माँगने गई थीं, तो मम्मी ने दादी को बहुत डांटा। मम्मी ने कहा कि ससुर जी की लार टपकती है और वे चटोरे हैं। मैंने भी माँगा तो मम्मी ने मुझे भी डांट कर भगा दिया। डिब्बा तो अभी भी ऊपर वाली अलमारी में छुपाकर रखा हुआ है!”

कबीर के एक-एक शब्द ने अनुराग के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह असर किया।

अनुराग का शरीर पूरी तरह सुन्न पड़ गया। उसने अपनी माँ की तरफ देखा, जो अपना मुँह पल्लू से ढँककर फफक-फफक कर रो पड़ी थीं। फिर उसने अपने बाबूजी की तरफ देखा, जिनकी बूढ़ी आँखें शर्मिंदगी और लाचारी से गीली थीं—मानो बेटे के सामने अपनी भूख और तृष्णा का ज़िक्र करके उन्होंने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो।

अनुराग के सीने में ऐसा दर्द उठा मानो किसी ने उसका दिल अपनी मुट्ठी में भींच दिया हो। वह जिस पिता के लिए, जिस परिवार के लिए दिन-रात धूप-छाँव सहे बिना बाज़ार में पसीना बहाता था, उसी पिता को एक टुकड़े मिठाई के लिए अपनी ही बहू के सामने हाथ फैलाने पड़ रहे थे और अपमानित होना पड़ रहा था?

अनुराग बिना कुछ बोले धीरे से उठा। उसके चेहरे पर गहरा विषाद और एक अजीब सा सन्नाटा था। वह भारी क़दमों से रसोई की तरफ बढ़ा। दरवाज़े पर अर्चना चाय की ट्रे लिए आ रही थी, उसने कबीर की सारी बातें सुन ली थीं और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ चुका था।

“अनुराग… वो… मेरी बात सुनिए, वो कबीर तो बच्चा है, आप ग़लत समझ रहे हैं…” अर्चना हकलाने लगी।

अनुराग ने न तो चीखा, न चिल्लाया और न ही हाथ उठाया। उसने बेहद शांत, लेकिन बर्फ़ जैसी ठंडी आवाज़ में कहा, “अलमारी खोलो अर्चना।”

अर्चना काँपते हाथों से ऊपर की अलमारी की तरफ बढ़ी और उसने वह मिठाई का डिब्बा निकालकर अनुराग के सामने रख दिया। अनुराग ने डिब्बा खोला। डिब्बे में से एक भी पीस कम नहीं था, वैसी की वैसी पिस्ता बर्फी करीने से सजी हुई थी।

अनुराग ने उस डिब्बे को उठाया। उसकी आँखों से आँसू बहकर उसके गालों पर आ गए। उसने अर्चना की आँखों में सीधे देखते हुए कहा, “अर्चना, मैं रोज़ रात को यह सोचकर घर लौटता था कि मेरा परिवार कितना सुखी है। मैं सोचता था कि मेरी ग़ैर-मौजूदगी में तुम मेरे माँ-बाबूजी का ख्याल अपनी औलाद या अपने माता-पिता की तरह रखती होगी। मुझे नहीं पता था कि जिस बाप ने मुझे उँगली पकड़कर चलना सिखाया, जिसने मुझे इस क़ाबिल बनाया कि आज मैं बाज़ार से हज़ारों की चीज़ें ला सकूँ, उसी बाप को अपनी ही कमाई की छत के नीचे एक टुकड़े मिठाई के लिए तरसना पड़ेगा।”

“अनुराग, मुझे माफ़ कर दीजिए… डॉक्टर ने मीठे के लिए मना किया था, इसलिए मैंने…” अर्चना ने अपनी सफ़ाई देनी चाही।

“बस करो अर्चना! बीमारी और परहेज़ का फ़र्क मुझे मत समझाओ,” अनुराग का गला रुँध गया। “अगर डॉक्टर ने मना किया था, तो क्या उन्हें प्यार से, इज़्ज़त से एक चम्मच खिलाकर नहीं समझाया जा सकता था? यह ताने देकर कि ‘उनकी लार टपकती है’, तुमने सिर्फ़ उनका नहीं, इस घर की हर मर्यादा का अपमान किया है। अगर आज मेरे बाबूजी को मीठा खाने से कुछ हो भी जाता, तो शायद वे खुशी-खुशी जाते, लेकिन तुम्हारे इन कड़वे बोलों ने उन्हें जीते जी मार दिया है। याद रखना अर्चना, वक़्त का पहिया घूमता है। आज जो व्यवहार तुम इनके साथ कर रही हो, कल कबीर वही सब सीखकर तुम्हारे साथ करेगा। तब सोचो, तुम्हारे दिल पर क्या बीतेगी?”

अनुराग की यह बात अर्चना के दिल में किसी गहरे घाव की तरह उतर गई। उसने मुड़कर कबीर को देखा, जो अपनी मासूम आँखों से अपनी माँ को देख रहा था। अर्चना के भीतर का अहंकार जैसे ताश के पत्तों की तरह ढह गया। उसे लगा कि वह अपनी ही नज़र में गिर चुकी है। उसने पहली बार महसूस किया कि उसने सिर्फ़ अपने ससुर का अपमान नहीं किया था, बल्कि अपने बेटे के सामने एक असंवेदनशील और क्रूर माँ की मिसाल पेश की थी।

अनुराग वह डिब्बा लेकर वापस कमरे में आया। वह अपने घुटनों के बल बाबूजी की चारपाई के पास बैठ गया। उसने काँपते हाथों से एक बर्फी उठाई और बाबूजी के मुँह के पास ले गया।

“बाबूजी… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं इतना अंधा हो गया था कि अपने ही घर का सच नहीं देख पाया। खाइए बाबूजी… यह मिठाई आपका बेटा आपके लिए लाया है। खाइए इसे…” अनुराग एक बच्चे की तरह रो पड़ा और अपना सिर बाबूजी की गोद में रख दिया।

बैकुंठ जी के काँपते हाथों ने बेटे की पीठ को सहलाया। “रो मत बेटा… तू क्यों रोता है? तेरी कोई ग़लती नहीं है। तू तो हमारा श्रवण कुमार है।”

तभी अर्चना कमरे में दाखिल हुई। उसका सिर शर्म से झुका हुआ था, आँखों से पश्चाताप के आँसू लगातार बह रहे थे। वह आगे बढ़ी और बिना कुछ सोचे-समझे सीधे बैकुंठ जी और सुलोचना देवी के पैरों में गिर पड़ी।

“बाबूजी… माजी… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैं अंधी हो गई थी। मैंने आप दोनों का दिल दुखाया, आपका अपमान किया। मैं भूल गई थी कि आज जो कुछ भी हमारे पास है, वह आप ही की मेहनत और त्याग का फल है। मुझे सज़ा दीजिए, लेकिन मुझे अपनी नज़रों से मत गिराइए।” अर्चना ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी।

सुलोचना देवी का माँ का दिल पिघल गया। उन्होंने तुरंत आगे बढ़कर अपनी बहू के कंधे थामे और उसे उठाकर गले से लगा लिया। “उठो बहू… जो हुआ सो हुआ। तूने अपनी भूल मान ली, यही हमारे लिए सबसे बड़ा सुकून है। घर में सुख-शांति रहे, हम बुज़ुर्गों को बस यही चाहिए।”

बैकुंठ जी ने भी अपने काँपते हाथ से अर्चना के सिर पर आशीर्वाद का हाथ रख दिया। “बहू, बुढ़ापा एक ऐसा मोड़ है जहाँ इंसान फिर से बच्चा बन जाता है। हमें किसी चीज़ की लालच नहीं होती, बस दो मीठे बोल और थोड़ा सा अपनापन मिल जाए, तो हमारी बची हुई ज़िंदगी संवर जाती है।”

अर्चना ने अपने आँसू पोंछे। उसने अपने हाथों से डिब्बे में से एक छोटा सा टुकड़ा बर्फी का तोड़ा और बहुत ही आदर और स्नेह के साथ अपने ससुर जी के मुँह में रख दिया।

बैकुंठ जी की आँखों में तृप्ति के आँसू थे और चेहरे पर एक सच्ची, निश्चल मुस्कान खिल उठी। बरसों बाद उस कमरे में रिश्तों की असली मिठास घुल रही थी। खिड़की के बाहर बारिश थम चुकी थी और शाम की ढलती धूप ने पूरे आँगन को एक सुनहरी, उम्मीद भरी रोशनी से भर दिया था। उस दिन के बाद से उस घर की रसोई का दरवाज़ा सिर्फ़ खान-पान के लिए नहीं, बल्कि आपसी समझ और सम्मान के लिए भी हमेशा के लिए खुल गया।

बुज़ुर्गों की छोटी-छोटी ख़्वाहिशें कोई हठ या लालच नहीं होतीं, बल्कि वे उनके अकेलेपन और ढलती उम्र में प्यार महसूस करने का एक ज़रिया होती हैं। क्या हमारे समाज में आज भी कई बुज़ुर्ग अपने ही घरों में ऐसी ही ख़ामोश लाचारी सहने को मजबूर हैं? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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 लेखिका : गरिमा चौधरी

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