“एक मां ने अपनी ही कोख से जन्मी औलाद को बेहतर भविष्य के नाम पर दूसरों की गोद में सौंप दिया, पर जब वही बेटी जिंदगी और मौत की दहलीज पर खड़ी होकर अपनी मां का आंचल तलाशने लगी, तब जो सच सामने आया उसने रूह कंपा दी…”
हॉस्पिटल के आईसीयू वार्ड में मशीनों की धीमी ‘बीप-बीप’ की आवाज़ सन्नाटे को चीर रही थी। आज पूरे पच्चीस दिनों के लंबे और दर्दनाक इलाज के बाद जब कल्याणी ने भारी पलकें उठाईं, तो सामने की दीवार पर लगा घड़ी का कांटा मानों वक्त के ठहर जाने की गवाही दे रहा था। उसके चेहरे, गले और दोनों हाथों पर बंधी सफेद पट्टियां उस भयानक अग्निकांड की दास्तान कह रही थीं, जिसने एक ही झटके में उसके आशियाने को राख कर दिया था। सामने कुर्सी पर सिर झुकाए बैठे पति मिहिर की नजर जैसे ही कल्याणी की खुली आंखों पर पड़ी, वे लड़खड़ाते कदमों से उठकर बेड के करीब आ गए। कल्याणी ने अपने सूखे, फटे होंठों को हिलाकर कुछ कहने की कोशिश की, पर चालीस प्रतिशत झुलस चुके शरीर और गले के सूखेपन ने आवाज़ को हलक में ही घोंट दिया। उसकी आंखें केवल एक चेहरा तलाश रही थीं—उसकी दस साल की नन्ही पीहू।
मिहिर ने कल्याणी के कांपते हाथ को अपनी हथेलियों में समेटा। आंसुओं से धुंधलाई आंखों से वे बस इतना ही कह सके, “कल्याणी… हिम्मत रखो। डॉक्टर कह रहे हैं कि तुम खतरे से बाहर हो, और हमारी पीहू… वह भी बगल के बर्न वार्ड में वेंटिलेटर से बाहर आ चुकी है। वह बच गई कल्याणी, ऊपर वाले ने हमारी बच्ची को हमसे नहीं छीना।” मिहिर की बात सुनते ही कल्याणी की दोनों बंद होती आंखों से गर्म आंसुओं का सैलाब बह निकला। वे आंसू सिर्फ राहत के नहीं थे, बल्कि उस असहनीय पश्चाताप के खारे कतरे थे, जो पिछले तीन हफ्तों से उसके सीने में आग की लपटों से भी ज्यादा दाहक बनकर जल रहे थे। आज जब जिंदगी दोबारा लौट रही थी, तो यादों का एक पूरा बवंडर कल्याणी के मन में घूमने लगा।
कल्याणी और मिहिर दोनों ही बिहार के एक छोटे से कस्बे मधेपुरा के सरकारी इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे। मिहिर गणित के प्राध्यापक थे और कल्याणी जीवविज्ञान पढ़ाती थी। घर में भरा-पूरा परिवार था। उनके तीन बच्चे थे—बड़ी बेटी पीहू, उससे छोटा बेटा आरव और सबसे छोटी बिटिया माही। पीहू जब पैदा हुई थी, तो पूरे मोहल्ले में उसकी खूबसूरती के चर्चे थे। गोल-मटोल चेहरा, कजरारी बड़ी-बड़ी आंखें और घुंघराले बाल; जो भी देखता, बस देखता ही रह जाता। कस्बा छोटा था, इसलिए वहां की मूलभूत सुविधाएं और स्कूल बहुत साधारण थे।
मिहिर की बड़ी बहन मालती अपने परिवार के साथ पटना के एक बेहद पॉश इलाके में रहती थीं। उनके पति एक बड़े सरकारी ठेकेदार थे और घर में पैसों की कोई तंगी नहीं थी। मालती के अपने दो बेटे थे, लेकिन उनकी हमेशा से एक ख्वाहिश थी कि उनकी एक बेटी हो जिसे वे अपनी तरह सजा-संवार सकें, अच्छे कपड़े पहनाएं और बड़े कॉन्वेंट में पढ़ाएं। जब पीहू पांच साल की हुई, तो एक शादी समारोह में मालती ने कल्याणी और मिहिर के सामने यह प्रस्ताव रखा कि वे पीहू को उनके साथ पटना भेज दें। मालती का तर्क था, “तुम दोनों तो दिन भर कॉलेज में रहते हो। इस पिछड़े कस्बे में रहकर इस गुड़िया का भविष्य खराब हो जाएगा। पटना में यह शहर के सबसे बड़े स्कूल में पढ़ेगी, हर तरह की सुख-सुविधाएं पाएगी। जब बड़ी हो जाएगी, तो तुम्हारा ही नाम रोशन करेगी।”
मिहिर पहले तो अपनी नन्ही जान को कलेजे से अलग करने के पक्ष में बिल्कुल नहीं थे, लेकिन कल्याणी के मन में एक अजीब सी महत्त्वाकांक्षा ने जन्म ले लिया था। कल्याणी खुद एक साधारण परिवार से संघर्ष करके शिक्षिका बनी थी, इसलिए वह चाहती थी कि उसकी बेटी वह सब कुछ हासिल करे जो वह खुद नहीं कर पाई थी। कल्याणी ने मिहिर से जिद की, “हम दोनों नौकरीपेशा हैं। तीन बच्चों की संभाल और कॉलेज की भागदौड़ में हम पीहू को वह परिवेश नहीं दे पाएंगे जो दीदी के यहां मिलेगा। बच्ची के अच्छे भविष्य के लिए हमें अपने दिल पर पत्थर रखना ही होगा।”
आखिरकार ममता पर महत्त्वाकांक्षा की जीत हुई और महज पांच साल की पीहू को उसकी बुआ के साथ एक बड़े और अजनबी शहर भेज दिया गया। शुरुआत में पीहू हर हफ्ते फोन पर रोती थी, “मां, मुझे अपने पास बुला लो। मुझे यहां नहीं रहना। मुझे आपकी गोद में सोना है।” लेकिन कल्याणी हर बार अपने आंसू छिपाकर उसे डांट देती, “पीहू, अच्छी बच्चियां ऐसे रोती नहीं हैं। वहां मन लगाकर पढ़ो, तुम्हें बहुत बड़ा अफसर बनना है।”
सालों बीतते गए। पीहू साल में सिर्फ एक बार गर्मियों की छुट्टियों में एक महीने के लिए मधेपुरा आती। जब भी वह घर आती, उसके स्वभाव में एक गहरा खिंचाव और उदासी साफ दिखाई देती। वह अपने छोटे भाई-बहनों आरव और माही को मां के आंचल में छिपकर हंसते-खेलते देखती, तो कोने में बैठकर चुपचाप आंसू बहाती। जब छुट्टियां खत्म होने का वक्त आता, तो पीहू कल्याणी के पैरों से लिपट जाती, “मां, इस बार मुझे मत भेजो। मैं यहां सरकारी स्कूल में ही पढ़ लूंगी। मैं कोई जिद नहीं करूंगी, अपने कपड़े खुद धो लूंगी, आरव और माही का ख्याल भी रखूंगी, बस मुझे अपने साथ रख लो।”
पर कल्याणी हमेशा समाज, स्टेटस और तथाकथित ‘उज्ज्वल भविष्य’ की दुहाई देकर उसके मन की पुकार को अनसुना कर देती। कल्याणी को लगता था कि यह सिर्फ बचपन का भोलापन है, वक्त के साथ वह समझ जाएगी कि उसकी मां ने उसके भले के लिए ही यह सब किया था। लेकिन कल्याणी यह नहीं समझ पाई कि एक बच्चे के लिए मां के स्पर्श, उसके दुलार और घर की छांव से बड़ा कोई भविष्य नहीं होता। बुआ के घर में पीहू के पास हर खिलौना था, महंगे कपड़े थे, बड़ा कमरा था, लेकिन उन बंद कमरों में उस नन्हीं सी आत्मा का दम घुटता था। बुआ का प्यार भी शर्तों पर टिका था—हमेशा अव्वल आना, सलीके से रहना और किसी भी बात पर अपनी मर्जी न चलाना। पीहू धीरे-धीरे अंतर्मुखी होती चली गई। उसका बचपन भारी किताबों और उम्मीदों के बोझ तले दब गया था।
इस बार जब दशहरे की छुट्टियों में पीहू घर आई, तो वह पहले से कहीं ज्यादा शांत थी। उसकी उम्र अब दस साल हो चुकी थी, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सा ठहराव था। छुट्टियों के आखिरी दिन जब पटना लौटने के लिए उसकी पैकिंग हो रही थी, पीहू ने अपनी मां का हाथ पकड़कर कहा था, “मां, क्या मैं आपकी बेटी नहीं हूं? क्या आप सिर्फ आरव और माही से प्यार करती हैं? अगर मैं इतनी ही बुरी हूं, तो मुझे पैदा ही क्यों किया था?” कल्याणी ने उस वक्त उसे एक तमाचा जड़ दिया था और गुस्से में कह दिया था, “तेरी खातिर हम इतना त्याग कर रहे हैं और तू हमें ही ताने मार रही है! चुपचाप गाड़ी में बैठ, कल सुबह दीदी के पास पहुंचना है।”
पीहू उस रात बिना कुछ खाए अपने कमरे में चली गई थी। रात के करीब दो बजे अचानक शॉर्ट सर्किट की वजह से पीहू के कमरे के ठीक बाहर रखे इन्वर्टर की बैटरी में जोरदार धमाका हुआ और देखते ही देखते लकड़ी के दरवाजों और पर्दों ने आग पकड़ ली। घर में धुआं भर गया। आग की लपटों ने विकराल रूप ले लिया। मिहिर ने किसी तरह आरव और माही को खिड़की से बाहर निकाला। कल्याणी जब बदहवास होकर पीहू के कमरे की तरफ भागी, तो पूरा रास्ता आग की दीवार बन चुका था। पीहू अंदर फंसी हुई थी और डर के मारे चीख रही थी, “मां! मुझे बचा लो मां! मैं कहीं नहीं जाऊंगी!”
उस रात कल्याणी को अपनी जान की कोई परवाह नहीं थी। उसने अपनी साड़ी को पानी में भिगोया और आग की लपटों को चीरती हुई कमरे के अंदर कूद गई। पीहू जलते हुए पलंग के कोने में सिमटी हुई थी। कल्याणी ने अपनी नन्ही गुड़िया को अपनी छाती से चिपका लिया और अपनी पीठ पर गिरती जलती लकड़ियों और अंगारों की परवाह किए बिना उसे बाहर की ओर खींच लाई। उस भयानक बचाव में कल्याणी खुद बुरी तरह झुलस गई और पीहू भी धुएं के असर और आग की आंच से गंभीर रूप से घायल हो गई। दोनों को तुरंत शहर के बड़े बर्न केयर अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां जिंदगी और मौत के बीच यह लंबी जंग लड़ी गई।
अस्पताल के उस बिस्तर पर लेटे हुए कल्याणी को समझ आ गया था कि वह अपनी बेटी की कितनी बड़ी गुनहगार थी। उसने अपनी झूठी शान और भविष्य के भ्रम में अपनी ही बच्ची का वर्तमान छीन लिया था। अगर उस रात वह आग में कूदकर अपनी ममता का कर्ज न चुकाती, तो शायद वह जिंदगी भर खुद को कभी माफ नहीं कर पाती। ऊपर वाले ने उसकी झोली खाली होने से बचा ली थी।
दस दिन बाद, जब कल्याणी को व्हीलचेयर पर बैठाकर पीहू के जनरल वार्ड में ले जाया गया, तो मां और बेटी की आंखें मिलीं। पीहू के चेहरे पर भी हल्की पट्टियां बंधी थीं, लेकिन उसकी आंखों में डर की जगह एक उम्मीद की चमक थी। कल्याणी ने व्हीलचेयर से झुककर अपनी कांपती उंगलियों से पीहू के माथे को छुआ। शब्द नहीं थे, सिर्फ दो टूटे हुए दिलों का मौन संवाद था।
“मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची…” कल्याणी की रुंधी हुई आवाज़ कमरे में गूंज उठी, “तेरी मां बहुत अंधी हो गई थी। मुझे लगा था कि तुझे अच्छी अंग्रेजी और बड़े स्कूल देकर मैं दुनिया की सबसे अच्छी मां बन रही हूं। पर मैं यह भूल गई थी कि एक पौधे को सोने के गमले की नहीं, उस मिट्टी की जरूरत होती है जिसमें उसकी जड़ें पनपती हैं। अब तू कहीं नहीं जाएगी। हम रूखी-सूखी खाएंगे, साथ रहेंगे, पर एक-दूसरे से कभी जुदा नहीं होंगे।”
पीहू ने अपने नन्हें, जले हुए हाथों से अपनी मां के आंसुओं को पोंछा और धीरे से मुस्कुरा दी। उस मुस्कान में बरसों का दर्द, उपेक्षा और अकेलापन एक ही पल में बह गया। उसने अपनी मां के गले में बाहें डाल दीं और फुसफुसाई, “मां, मुझे कोई बड़ा अफसर नहीं बनना, मुझे बस आपकी बेटी बनकर रहना है।”
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद कल्याणी और मिहिर ने पटना फोन करके मालती को साफ-साफ कह दिया कि पीहू अब उनके साथ ही रहेगी। उन्होंने पीहू का दाखिला कस्बे के उसी स्कूल में करा दिया जहां वे दोनों पढ़ाते थे। घर की आर्थिक स्थिति पहले जैसी ही साधारण थी, लेकिन अब उस आंगन में एक ऐसी शांति और सुकून था जो किसी भी दौलत से नहीं खरीदा जा सकता था। कल्याणी ने अपने अध्यापन के साथ-साथ तीनों बच्चों को खुद पढ़ाना शुरू किया।
सालों की मेहनत, मां के असीम प्यार और पारिवारिक संबल का असर यह हुआ कि पीहू ने उसी साधारण स्कूल से पढ़ाई करते हुए पूरे जिले में टॉप किया। उसने साबित कर दिया कि बच्चे की तरक्की किसी बड़े शहर की चकाचौंध या महंगे स्कूलों की मोहताज नहीं होती, बल्कि माता-पिता के सानिध्य, विश्वास और भावनात्मक सुरक्षा से बच्चे के भीतर वह आत्मविश्वास पैदा होता है जो उसे दुनिया के किसी भी मुकाम तक पहुंचा सकता है। उस जले हुए घर की राख से एक ऐसा मजबूत परिवार उठ खड़ा हुआ था, जहां प्यार किसी भी महत्त्वाकांक्षा से कहीं ऊपर था।
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क्या आपको भी लगता है कि आज के दौर में माता-पिता बच्चों के ‘उज्ज्वल भविष्य’ की अंधी दौड़ में उनके मासूम वर्तमान और भावनात्मक जरूरतों की अनदेखी कर रहे हैं? क्या किसी बच्चे के लिए मां-बाप के प्यार और साथ से बढ़कर कोई सुख-सुविधा हो सकती है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : मनीषा सिंह