बार-बार कानों में समधन राजेश्वरी जी के वे कड़क और गंभीर शब्द गूंज रहे थे, जो उन्होंने आज सुबह फोन पर कहे थे—”कौशल्या जी, अगर आज आपके पास थोड़ा सा भी वक्त हो तो दोपहर तक हमारे घर आ जाइए। अंकिता को लेकर कुछ बहुत जरूरी बातें करनी हैं। उसकी शिकायतें अब इतनी बढ़ चुकी हैं कि फोन पर समेटना मुमकिन नहीं है। बेहतर होगा कि हम आमने-सामने बैठकर ही इसका कोई हल निकालें।”
इतना कहकर बिना कौशल्या जी की बात सुने राजेश्वरी जी ने फोन काट दिया था। फोन कटते ही कौशल्या जी का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। हे भगवान! यह क्या हो गया? अभी तो अंकिता की शादी को छह महीने भी पूरे नहीं हुए हैं। शहर में ही तो ब्याही थी बेटी, ताकि कभी कोई तकलीफ हो तो पलक झपकते ही मां उसके पास पहुंच सके। लड़का मयंक एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय बैंक में ऊंचे ओहदे पर था, स्वभाव का बेहद शांत और सुलझा हुआ। परिवार भी भरा-पूरा, सभ्य और संभ्रांत था। जब भी अंकिता से फोन पर बात होती, वह तो यही कहती थी कि ‘मम्मी, सब बहुत अच्छा है, आप बिल्कुल चिंता मत किया करो।’
तो फिर अचानक यह वज्रपात कैसे हुआ? क्या अंकिता ने कोई बड़ी भूल कर दी? क्या उसने अपनी सास से बदतमीजी की? या फिर ससुराल के तौर-तरीकों में खुद को ढाल नहीं पाई? कौशल्या जी का मन हजार तरह की आशंकाओं से घिर गया था। उन्हें अपने आप पर भी गुस्सा आ रहा था। बचपन से ही उन्होंने अंकिता को बड़े नाजों से पाला था, पर कभी संस्कारों में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। उसे बड़ों का आदर करना, घर संभालना, सबका मान रखना सब सिखाया था। फिर इस लड़की ने ऐसी कौन सी नादानी कर दी कि उसकी सास को इस तरह कड़े शब्दों में शिकायत दर्ज करानी पड़ी?
ऑटो जब मालवीय नगर के उस सुंदर, हरे-भरे बंगले के सामने रुका, तो कौशल्या जी के कदम भारी हो गए। उन्होंने अपने कांपते हाथों से आंचल ठीक किया, चेहरे पर जबरन एक सामान्य भाव लाने की कोशिश की और गेट खोलकर भीतर दाखिल हुईं। दरवाजे की घंटी बजाते वक्त उनका दिल किसी ढोल की तरह बज रहा था।
दरवाजा खुद अंकिता ने ही खोला। सामने अपनी मां को अचानक खड़ा देखकर उसके चेहरे पर आश्चर्य और खुशी की मिली-जुली चमक तैर गई। “अरे मम्मी! आप? अचानक इस दोपहरी में? आपने बताया भी नहीं कि आप आ रही हैं, मैं मयंक को भेज देती आपको स्टेशन या बस स्टॉप से लेने के लिए!”
अंकिता के चेहरे पर वही पुरानी, चुलबुली और बेफिक्र मुस्कान थी। उसे देखकर कौशल्या जी के भीतर का गुस्सा खौल उठा। ‘देखो तो इस लड़की को! वहां सास ने शिकायतों का पुलिंदा तैयार कर रखा है, घर में कलह की नौबत आ गई है, और यह महारानी ऐसे बत्तीसी दिखा रही है जैसे कुछ हुआ ही न हो! मेरे सारे सिखाए-पढ़ाए पर पानी फेर दिया और ऊपर से इतनी मासूम बन रही है।’ कौशल्या जी ने बेटी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। उन्होंने एक तीखी, घूरती हुई नजर अंकिता पर डाली और बिना एक शब्द बोले सीधे ड्रॉइंग रूम को पार करते हुए अंदर के बड़े दालान की तरफ बढ़ गईं, जहां राजेश्वरी जी अक्सर दोपहर में बैठा करती थीं।
सामने दीवान पर राजेश्वरी जी सूती साड़ी में बैठी थीं। कौशल्या जी को देखते ही उनके चेहरे पर एक असीम अपनत्व उभरा और वे फौरन उठकर आगे बढ़ीं। उन्होंने दोनों हाथ फैलाकर कौशल्या जी को गले से लगा लिया, “अरे समधन जी! आइए, आइए! सच कहूं तो मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप मेरे एक बुलावे पर इतनी जल्दी धूप में चली आएंगी। बैठिए, कितनी गर्मी हो रही है बाहर।” उसी समय सोफे की तरफ से एक और आवाज आई, “प्रणाम मौसी जी!”
कौशल्या जी ने मुड़कर देखा तो राजेश्वरी जी की शादीशुदा बेटी तान्या वहां बैठी थी। तान्या की शादी उदयपुर में हुई थी और वह दो दिन पहले ही मायके आई हुई थी। कौशल्या जी ने बुझे मन से तान्या को आशीर्वाद दिया और औपचारिकता निभाते हुए बैठ गईं। उनका पूरा शरीर तनाव से अकड़ा हुआ था। उन्हें लग रहा था कि अभी कोई बड़ा तूफान आने वाला है।
कुछ ही पलों में अंकिता रसोई से ठंडे गुलाब के शरबत और नमकीन की ट्रे लेकर आ गई। उसने बड़ी आत्मीयता से शरबत का गिलास अपनी मां के हाथ में थमाया, “मम्मी, पहले यह ठंडा पीजिए, चेहरे पर कितनी धूप लग गई है आपके।” लेकिन कौशल्या जी का हलक सूखा जा रहा था। शरबत का एक घूंट भी उनके गले से नीचे उतरना मुश्किल लग रहा था। वे बस सीधे मुद्दे पर आना चाहती थीं ताकि इस असहनीय सस्पेंस का अंत हो।
कौशल्या जी ने गिलास मेज पर रखा और थोड़ा गंभीर, धीमे स्वर में राजेश्वरी जी की ओर देखकर कहा, “बहन जी… आपने फोन पर कहा था कि कुछ बहुत जरूरी बात करनी है। अंकिता के बारे में… कुछ शिकायतें थीं आपकी? आप कृपया मुझे खुलकर बताइए कि इस लड़की ने क्या गलती की है? अगर इसने कोई गुस्ताखी की है, तो मैं अभी इसके कान खींचती हूं।”
राजेश्वरी जी ने कौशल्या जी के चेहरे पर पसरी गहरी चिंता और डर को भांप लिया। उनके होंठों के कोनों पर एक शरारती मुस्कान उभरने को हुई, लेकिन उन्होंने तुरंत अपने चेहरे पर एक सख्त, गंभीर भाव ओढ़ लिया। अपनी साड़ी का पल्लू संभालते हुए वे भारी आवाज में बोलीं, “हां कौशल्या जी, सही समझा आपने। शिकायतें एक-दो नहीं, इतनी हैं कि अगर मैं गिनाने बैठूं तो शाम ढल जाएगी। मुझे तो समझ ही नहीं आ रहा कि मैं अपनी इस बहू का क्या करूं।”
यह सुनते ही कौशल्या जी का कलेजा मुंह को आ गया। उन्होंने पास खड़ी अंकिता की तरफ अपनी आंखें तरेर कर देखा। पर अंकिता वहां सिर झुकाए मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। कौशल्या जी के मन में हुआ कि उठकर इस लड़की को दो थप्पड़ रसीद कर दें। ‘सास इतनी गंभीर बात कर रही है और इसे हंसी सूझ रही है? इतनी निर्लज्ज कब से हो गई यह?’
कौशल्या जी ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “बहन जी, आप बस मुझे बताइए। मैं अपनी बेटी को आज ही सही रास्ते पर लाऊंगी। आखिर क्या बिगाड़ा है इसने?”
राजेश्वरी जी ने एक गहरी सांस ली और बोलना शुरू किया, “तो सुनिए पहली और सबसे गंभीर शिकायत। यह लड़की अपने शरीर के साथ जो खिलवाड़ कर रही है, उसे देखकर मेरा खून खौलता है। आप खुद देखिए इसे, जब विदा होकर आई थी तो चेहरे पर कितना नूर था, गाल कैसे भरे-भरे थे। और आज? छह महीनों में इसने अपना क्या हाल बना लिया है? सूखकर कांटा होती जा रही है! सुबह उठकर पूरे घर के लिए बादाम वाला दूध, मेवे, पराठे सब तैयार होंगे, लेकिन जब खुद के खाने की बारी आएगी, तो आधा सेब या दो बिस्कुट खाकर कह देगी—’मम्मी जी, मुझे बिल्कुल भूख नहीं है।’
कितना भी समझा लो, इसके कान पर जूं तक नहीं रेंगती। ऊपर से आए दिन कोई न कोई कठिन व्रत! कभी सोमवार, कभी गुरुवार, कभी एकादशी। चलो, पूजा-पाठ और व्रत से मुझे कोई ऐतराज नहीं, हम भी करते हैं। लेकिन यह महारानी व्रत के नाम पर पूरा दिन सिर्फ पानी पर काट देती है। मैं लाख चिल्लाती रहूं कि फलाहार कर ले, साबूदाना बना है, फल रखे हैं, पर नहीं! जब घड़ी में दोपहर के तीन बज जाएंगे, तब जाकर कहीं आधा कप चाय और एक केला खाएगी। क्या ऐसे शरीर टिकेगा?
और सिर्फ यही नहीं, सुबह साढ़े पांच बजे उठकर एक घंटे छत पर योग और प्राणायाम करना, फिर दस हजार कदम चलने की सनक! पिछले महीने जब शहर में तीन दिन लगातार मूसलाधार बारिश हुई और बाहर टहलना बंद हो गया, तो इसने घर के बरामदे में ही रस्सियां कूदना शुरू कर दिया। पसीने से लथपथ होकर जब हांफती थी, तो मेरा दिल धक-धक करने लगता था। मयंक ने कई बार डांटा, मैंने हाथ-पैर जोड़े कि बहू थोड़ा रहम कर अपने शरीर पर, पर यह किसी की सुने तब न! पूरा चार किलो वजन घटा लिया इसने। अब आप ही बताइए, अगर यह ऐसे ही भूखी-प्यासी तपस्या करती रही और कल को बीमार पड़ गई, तो क्या मैं अपने बेटे और समाज को मुंह दिखाने लायक रहूंगी?”
कौशल्या जी अवाक रह गईं। उनके दिमाग की नसें जो फटने को थीं, अचानक शिथिल पड़ने लगीं। वे चौंककर राजेश्वरी जी का चेहरा देखने लगीं कि यह शिकायत थी या कुछ और?
राजेश्वरी जी रुकी नहीं, वे आगे बोलीं, “और दूसरी शिकायत! घर के कामकाज को लेकर मुझे इससे सख्त शिकायत है। मेरी उम्र पैंसठ की हो चुकी है, यह सोचकर मैं कभी-कभी रसोई में हाथ बंटाने जाती हूं कि चलो दाल में तड़का मैं लगा दूं या सब्जियां काट दूं। पर यह लड़की मुझे रसोई की दहलीज पार नहीं करने देती! मेरे हाथ से चाकू छीन लेती है, कहती है—’मम्मी जी, आप ड्राइंग रूम में बैठकर टीवी देखिए या भजन सुनिए, जब तक मैं हूं, आप रसोई में खड़ी नहीं होंगी।’ बताइए, मुझे बिल्कुल निकम्मा और बूढ़ा साबित करने पर तुली हुई है यह! जबरदस्ती छीन-झपट कर मुझे कोई काम करना पड़े तो पड़े, वरना यह एक तिनका भी मुझे नहीं हिलाने देती।”
राजेश्वरी जी की आंखों में अब चमक आ गई थी, उन्होंने कौशल्या जी का हाथ अपने हाथों में थामते हुए कहा, “और तीसरी सबसे बड़ी नाइंसाफी! खुद तो चिड़िया जितना खाएगी, पर मुझे खिलाने में इसने कोई कसर नहीं छोड़ी है। सुबह की अदरक वाली चाय के साथ मेरे शुगर-फ्री बिस्कुट, दोपहर के खाने में मेरी पसंद की तोरी या लौकी की सब्जी और पतली फुल्की रोटियां, शाम को सूप या काढ़ा, और रात को सोने से पहले हल्दी वाला दूध। मजाल है कि कभी एक मिनट की भी देर हो जाए! उस दिन पड़ोस की मिसेज शर्मा कह रही थीं कि बहू तो बहू होती है, बेटी का मुकाबला कभी नहीं कर सकती। मैंने सबके सामने डंके की चोट पर कह दिया—’माफ करना बहन जी, मेरी सगी बेटी तान्या ने भी मेरी इतनी सेवा और तीमारदारी कभी नहीं की जितनी यह मेरी बहू करती है। यह बहू नहीं, मेरा साक्षात भाग्य बनकर आई है।'”
कमरे में कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। कौशल्या जी की आंखों से अविश्वास के बादल छंट रहे थे और उनकी जगह आंसुओं की एक पतली धारा बहने लगी थी। यह राहत और खुशी के आंसू थे।
तभी सोफे पर बैठी तान्या जोर से हंस पड़ी और ताली बजाते हुए बोली, “मौसी जी, अब जरा मेरी भी एक शिकायत सुन ही लीजिए! लेकिन मेरी शिकायत भाभी से नहीं, बल्कि अपनी इस स्वार्थी मम्मी से है। मैं साल में सिर्फ दो बार उदयपुर से मायके आती हूं, यह सोचकर कि मम्मी के लाड-प्यार का आनंद लूंगी। पर यहां आकर मुझे लगता है कि मैं कोई दूर की रिश्तेदार हूं और भाभी इनकी अपनी सगी बेटी हैं! दिन भर दोनों सास-बहू फुसफुसाती रहती हैं, एक-दूसरे की पसंद का ख्याल रखती हैं, और मुझे तो कोई पानी के लिए भी नहीं पूछता! सच कहूं मौसी जी, मुझे तो अब भाभी से जलन होने लगी है कि इन्होंने मेरी मां का दिल मुझसे भी ज्यादा चुरा लिया है।”
तान्या की यह बात सुनते ही पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठा। वातावरण में जो हल्का सा भी तनाव बचा था, वह कपूर की तरह उड़ गया। अंकिता ने शरमाते हुए अपना चेहरा दोनों हाथों से छिपा लिया और धीरे से बोली, “मम्मी जी, आप भी न… बेवजह अपनी बेटी को डरा दिया।”
राजेश्वरी जी ने मुस्कुराते हुए कौशल्या जी के आंसू पोंछे और बड़े भावुक स्वर में कहा, “कौशल्या जी, सच तो यह है कि मुझे किसी ज्योतिषी ने एक बार कहा था कि अच्छी चीजों की नजर बहुत जल्दी लग जाती है, इसलिए बहुत ज्यादा तारीफ नहीं करनी चाहिए। आज सुबह जब अंकिता ने फिर नाश्ता छोड़ने की जिद की, तो मुझे लगा कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है। मैंने सोचा कि आज आपको बुलाकर ही इस बात का फैसला करवाया जाए कि यह अपनी सेहत का ध्यान रखेगी या नहीं। और सच कहूं, तो यह शिकायत का बहाना था। असल में तो मुझे आपको अपने घर बुलाकर, आपके चरण छूकर धन्यवाद देना था। आपने अपनी बेटी को जो संस्कार, जो मर्यादा और जो निस्वार्थ प्रेम की सीख दी है, उसने मेरे सूने पड़े घर को स्वर्ग बना दिया है। एक मां ही अपनी बेटी को ऐसा हीरा बना सकती है।”
कौशल्या जी का सीना गर्व और ममता से चौड़ा हो गया। जिस डर और संकोच के साथ वे घर से निकली थीं, वह अब एक असीम संतोष और गौरव में बदल चुका था। उन्होंने आगे बढ़कर अपनी बेटी अंकिता को गले से लगा लिया और उसकी पीठ थपथपाते हुए प्यार भरी डांट लगाई, “सुन लिया महारानी? अब अगर आइंदा तूने समय पर खाना नहीं खाया या अपनी सास को परेशान किया, तो मैं खुद यहां आकर तुझे डंडे से खिलाऊंगी।”
अंकिता ने मां के कंधे पर सिर रख दिया और राजेश्वरी जी ने आगे बढ़कर दोनों को अपनी बांहों में समेट लिया। दो माताओं के बीच बहता यह प्रेम और कृतज्ञता का संगम उस घर के हर कोने को एक पावन मंदिर जैसा बना रहा था। सास-बहू का रिश्ता, जिसे दुनिया अक्सर तानों और तकरार के तराजू में तौलती है, आज इस घर में सम्मान, फिक्र और अगाध अपनत्व की एक अनूठी मिसाल बनकर चमक रहा था।
हर सास अगर मां बन जाए और हर बहू अगर बेटी का समर्पण ले आए, तो कोई भी घर टूटने से बच सकता है। आपको क्या लगता है, क्या आज के दौर में भी सास-बहू का रिश्ता इतना खूबसूरत और आत्मीय हो सकता है? अपने विचार और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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