वंदना जब घर लौटकर हेमंत से यह बात कहती, तो हेमंत आगबबूला हो जाता। वह वंदना को भड़काते हुए कहता, “देखा तुम्हारे भाई का असली चेहरा? वह तुम्हें अपने हिस्से से बेदखल करना चाहता है। वह नहीं चाहता कि तुम अपने हक का इस्तेमाल करो। यदि तुम आज पीछे हट गईं, तो कल वह पूरा मकान हड़प लेगा।” दो पाटों के बीच पिसती वंदना का मन धीरे-धीरे विषैला होने लगा। उसे अपने पति की बातों में सच्चाई और अपने भाई के तर्कों में स्वार्थ नजर आने लगा। अगली बार जब अनुराग ने सामान हटाने का आग्रह किया, तो वंदना की ममता और आत्मीयता पर अहंकार की परत चढ़ चुकी थी। उसने तल्ख लहजे में कहा, “अनुराग, बाबूजी ने आधा मकान मेरे नाम किया है।
ग्वालियर की पुरानी बस्ती के बीचो-बीच स्थित ‘शांति-सदन’ का वह विशाल दालान कभी हँसी के ठहाकों, बच्चों की दौड़ती पदचापों और पारिवारिक आत्मीयता से गूँजा करता था। आज उसी दालान के ठीक बीचो-बीच छह फीट ऊँची लाल ईंटों की एक बदसूरत, रूखी और बेतरतीब दीवार तनी हुई थी। उस दीवार ने न केवल मकान के दो टुकड़े किए थे, बल्कि उसने इस घर में आने वाली सुबह की ताज़ी धूप, हवा और दो सगे भाई-बहनों के बीच के आत्मीय स्नेह को भी लील लिया था। उस मनहूस दीवार के इस पार, अपने पुराने पलंग पर बैठी बहत्तर वर्षीया कल्याणी देवी की नजरें अपने हाथ में थमे मोबाइल की स्क्रीन पर टिकी हुई थीं। उनकी काँपती उँगलियों के नीचे उनकी नातिन पावनी की गोद-भराई और सगाई का डिजिटल निमंत्रण पत्र खुला हुआ था। हल्के सुनहरे अक्षरों में सजा वह कार्ड केवल एक निमंत्रण नहीं था, बल्कि कल्याणी देवी की विवाहिता बेटी वंदना की ओर से बढ़ाया गया एक मौन, संकोची और काँपता हुआ हाथ था। वंदना चाहती थी कि सात साल से खिंची यह नफ़रत की खाई किसी तरह पट जाए और उसका मायका एक बार फिर उसके बच्चों के सिर पर आशीष बनकर खड़ा हो। परंतु कल्याणी देवी का अंतर्मन जानता था कि जिस कड़वाहट और अविश्वास की नींव पर उस घर का बँटवारा हुआ था, उसे लांघना अब किसी के वश में नहीं था। दीवार के इस पार उनका बेटा अनुराग अपनी पत्नी शैलजा और दो मासूम बच्चों के साथ घुटन भरी ज़िंदगी जी रहा था, जबकि दीवार के उस पार कभी एक बाहरी अजनबी का कब्जा हो चुका था। कल्याणी देवी ने अपनी गीली आँखों को पल्लू से ढँक लिया। वे सोचने लगीं कि जिस बाग को उनके स्वर्गीय पति विश्वेश्वर दयाल ने अपनी एक-एक सांस से सींचा था, वह कैसे चंद कागज़ों, व्यापारिक लालच और गलतफहमियों की आंधी में उजड़कर वीरान हो गया। अतीत के झरोखे खुले तो यादों की एक लंबी कतार उनके सामने जीवंत हो उठी।
विश्वेश्वर दयाल शिक्षा विभाग में उप-निदेशक के पद पर कार्यरत थे। पूरे ग्वालियर में उनकी सादगी, ईमानदारी और न्यायप्रियता का सम्मान किया जाता था। उन्होंने अपने दोनों संतानों—पुत्री वंदना और पुत्र अनुराग—को कभी गैर नहीं समझा। वंदना बड़ी थी, स्वभाव से चंचल, स्नेहमयी और सबकी चहेती, जबकि अनुराग छोटा होकर भी शांत, गंभीर और जिम्मेदार था। विश्वेश्वर जी ने अपने जीवन की पाई-पाई जोड़कर दोनों बच्चों की उच्च शिक्षा और वैवाहिक जिम्मेदारियों को निभाया था। वंदना का विवाह शहर के एक जाने-माने थोक प्लास्टिक और हार्डवेयर कारोबारी हेमंत के साथ हुआ था। हेमंत के माता-पिता का देहांत पहले ही हो चुका था और उसकी एक इकलौती विवाहिता बहन थी जो वर्षों से ऑस्ट्रेलिया में बसी हुई थी। विवाह के बाद वंदना उस भरे-पूरे कारोबार और बड़े घर की मालकिन बन गई। उधर अनुराग ने चार्टर्ड अकाउंटेंसी की कठिन परीक्षा पास की और शहर की मुख्य व्यापारिक सड़क पर अपना स्वतंत्र सीए कार्यालय स्थापित किया। अनुराग का विवाह शैलजा से हुआ, जो बेहद सरल, मर्यादित और पारिवारिक मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाली लड़की थी। दोनों परिवारों के बीच ऐसा प्रगाढ़ संबंध था जिसे देखकर पूरा मोहल्ला दाँतों तले उँगली दबा लेता था। जब वंदना के दोनों बच्चों—पावनी और पार्थ—का जन्म हुआ, तब वह पूरे अधिकार से अपने मायके आकर महीनों रही थी। शैलजा ने अपनी ननद की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी; रात-रात भर जागकर नवजात शिशुओं को संभालना और वंदना के लिए पौष्टिक भोजन बनाना शैलजा का रोज़ का नियम था। इसी प्रकार जब शैलजा के बेटे आरव और बेटी पंखुड़ी का जन्म हुआ, तब वंदना ने भी अपनी भाभी के सिरहाने बैठकर वही लाड़-दुलार लौटाया था। दोनों घरों के बच्चे साथ खेलते, साथ खाते और हर त्योहार पर एक ही आँगन में रंगोली बनाते थे। हेमंत अक्सर अपने व्यापार में व्यस्त रहते थे, पर त्योहारों पर जब वे ‘शांति-सदन’ आते, तो घर का कोना-कोना उत्सव बन जाता था।
लेकिन सुख की छाँव सदा एक जैसी नहीं रहती। सात वर्ष पूर्व एक मनहूस दोपहर को नियति ने ऐसा क्रूर प्रहार किया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। विश्वेश्वर दयाल अपने कार्यालय में सामान्य दिनों की तरह फाइलें देख रहे थे कि अचानक उनकी छाती में असहनीय दर्द उठा। अस्पताल पहुँचने से पहले ही उन्होंने अपनी अंतिम सांस ले ली। इस असमय आघात ने कल्याणी देवी के जीवन का आधार ही छीन लिया। पूरा परिवार शोक के गहरे सागर में डूब गया। विश्वेश्वर जी के तेरहवीं के संस्कार बीतने के बाद जब उनकी निजी अलमारी के कागजात देखे गए, तो एक पंजीकृत वसीयत सामने आई। विश्वेश्वर जी ने जीवन भर समानता का जो पाठ पढ़ाया था, उसे अपनी वसीयत में भी अमली जामा पहनाया था। उन्होंने अपनी बैंक बचत, पेंशन का एक हिस्सा और पैतृक जमा-पूँजी का आधा-आधा हिस्सा अनुराग और वंदना के नाम किया था, जबकि कल्याणी देवी के भरण-पोषण के लिए पर्याप्त मासिक आय की व्यवस्था सुनिश्चित की थी। चल संपत्ति के बँटवारे में किसी को रत्ती भर भी संकोच नहीं था, परंतु पेंच फँस गया उस पुश्तैनी ‘शांति-सदन’ के मकान पर। वसीयत के अनुसार, इस दोमंजिला विशाल मकान में भी वंदना और अनुराग का आधा-आधा अधिकार दर्ज था। अनुराग ने बड़े ही स्नेह और आदर के साथ अपनी बहन से कहा, “दीदी, बाबूजी की अंतिम इच्छा हमारे सिर माथे पर है। यह घर जितना मेरा है, उतना ही आपका भी है। आप जब चाहें, अपने परिवार के साथ आकर इस घर के आधे हिस्से में रह सकती हैं, हम सब मिलकर इस आँगन की खुशियाँ साझा करेंगे।” परंतु वंदना अपने पति के भव्य बंगले को छोड़कर यहाँ क्यों आती? उसने उस समय बड़े सहज भाव से कहा कि यह घर भैया और भाभी का ही है, उसे केवल अपने हिस्से के मालिकाना हक का मान चाहिए, रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। बात वहीं दब गई और सब कुछ सामान्य लगने लगा।
दुर्भाग्यवश, यह शांति अधिक दिनों तक नहीं टिक सकी। हेमंत को जब वसीयत के इस हिस्से का पता चला, तो उसके भीतर का चतुर व्यापारी जाग उठा। उस वर्ष हेमंत ने गुजरात से प्लास्टिक के घरेलू सामान और पाइपों की एक बहुत बड़ी खेप भारी मुनाफे के लालच में उधार पर मंगा ली थी। शहर में उसके पास इतना बड़ा गोदाम नहीं था जहाँ वह उस भारी माल को सुरक्षित रख सके। गोदाम किराए पर लेने के लिए भारी खर्च उठाना पड़ता। हेमंत ने वंदना से कहा, “तुम्हारे मायके का मकान शहर के मुख्य मार्ग के करीब है और उसमें तुम्हारा आधा कानूनी हिस्सा खाली पड़ा है। क्यों न हम अपने हिस्से के कमरों को अपने व्यापारिक माल के भंडारण के लिए इस्तेमाल कर लें? इससे हमें नया गोदाम किराए पर नहीं लेना पड़ेगा और लाखों की बचत होगी। आख़िरकार तुम्हारा भी तो उस ज़मीन पर उतना ही हक है।” वंदना ने पहले तो झिझकते हुए मना किया कि मायके का घर रहने के लिए है, व्यापार का गोदाम बनाने के लिए नहीं। परंतु हेमंत ने भावनात्मक दबाव बनाते हुए कहा कि यह सब वे अपने बच्चों के भविष्य और कारोबार को बढ़ाने के लिए ही तो कर रहे हैं। वंदना अपने पति के तर्कों के आगे हार गई। एक दिन बिना किसी पूर्व सूचना के, माल से लदा एक विशाल ट्रक ‘शांति-सदन’ के मुख्य द्वार पर आकर खड़ा हो गया। मजदूरों ने धड़ाधड़ प्लास्टिक के बंडल, पाइप और पेटियाँ उतारकर मकान के आगे के बरामदे और भूतल के तीन बड़े कमरों में भरना शुरू कर दिया। जब अनुराग ने कार्यालय से लौटकर यह नजारा देखा, तो उसके होश उड़ गए। उसने वंदना से विनम्रता से बात की, तो वंदना ने संकोचवश कहा, “भैया, बस कुछ हफ़्तों की बात है, जब तक हेमंत जी का नया गोदाम तैयार नहीं हो जाता, तब तक यह माल यहाँ रखा रहेगा।” अनुराग ने अपनी बहन का मान रखने के लिए भारी मन से सहमति दे दी।
परंतु जो व्यवस्था चंद हफ़्तों के लिए की गई थी, वह धीरे-धीरे स्थायी आदत में तब्दील हो गई। एक ट्रक खाली होता तो दूसरा ट्रक आकर खड़ा हो जाता। दिन भर बाहरी पल्लेदारों, ड्राइवरों और व्यापारियों का उस आवासीय मकान में तांता लगा रहता। शांत रहने वाला वह पारिवारिक घर अब एक शोरगुल वाले, धूल-धूसरित गोदाम का रूप ले चुका था। घर के मुख्य द्वार पर प्लास्टिक के बदबूदार बंडल और पैकिंग के गत्ते इस कदर फैल गए थे कि शैलजा और कल्याणी देवी का अपने ही घर के आँगन में निकलना दूभर हो गया था। बच्चे खेल नहीं सकते थे और सीए के पेशे से जुड़ा अनुराग जब अपने सम्मानित मुवक्किलों को घर के कार्यालय में बुलाता, तो उसे भारी लज्जा का सामना करना पड़ता था। अनुराग ने एक शाम वंदना को बुलाकर अत्यंत संजीदगी से समझाया, “दीदी, यह एक रिहायशी इलाका है। नगर निगम और प्रशासन के कड़े नियम हैं कि आवासीय परिसरों में ज्वलनशील प्लास्टिक का व्यावसायिक भंडारण नहीं किया जा सकता। यदि कभी कोई दुर्घटना घट गई या आग लग गई, तो पूरा मोहल्ला तबाह हो जाएगा। आप हेमंत जी से कहिए कि वे किसी व्यावसायिक क्षेत्र में गोदाम किराए पर ले लें।” कल्याणी देवी ने भी अपनी बेटी को दुलारते हुए कहा, “बेटी, यह तेरा मायका है। तू यहाँ अपने बच्चों के साथ रहने आ, तो मैं अपनी पलकें बिछा दूँगी। पर इस तरह घर को कबाड़खाना मत बना। घर की अपनी एक मर्यादा और शांति होती है।”
वंदना जब घर लौटकर हेमंत से यह बात कहती, तो हेमंत आगबबूला हो जाता। वह वंदना को भड़काते हुए कहता, “देखा तुम्हारे भाई का असली चेहरा? वह तुम्हें अपने हिस्से से बेदखल करना चाहता है। वह नहीं चाहता कि तुम अपने हक का इस्तेमाल करो। यदि तुम आज पीछे हट गईं, तो कल वह पूरा मकान हड़प लेगा।” दो पाटों के बीच पिसती वंदना का मन धीरे-धीरे विषैला होने लगा। उसे अपने पति की बातों में सच्चाई और अपने भाई के तर्कों में स्वार्थ नजर आने लगा। अगली बार जब अनुराग ने सामान हटाने का आग्रह किया, तो वंदना की ममता और आत्मीयता पर अहंकार की परत चढ़ चुकी थी। उसने तल्ख लहजे में कहा, “अनुराग, बाबूजी ने आधा मकान मेरे नाम किया है। मैं अपने हिस्से में चाहे फूल उगाऊँ या प्लास्टिक का सामान रखूँ, यह मेरा व्यक्तिगत फैसला है। अगर तुम्हें और तुम्हारी पत्नी को इतनी ही परेशानी हो रही है, तो बीच में पक्की दीवार खींच दो! हम अपने हिस्से में रहेंगे और तुम अपने हिस्से में।” कल्याणी देवी यह सुनकर स्तब्ध रह गईं। उन्होंने रोते हुए कहा, “अरे वंदना, होश में आ बेटी! सगे भाई के आँगन में दीवार खींचने की बात कहते हुए तेरी जबान नहीं काँपी? यह घर तेरे बाबूजी के खून-पसीने से बना है, यहाँ दीवारें नहीं, दिल जुड़ते हैं।” परंतु वंदना पर पति के सिखाए पाठ का ऐसा नशा चढ़ा था कि उसने अपनी बूढ़ी माँ की रुलाई की भी परवाह नहीं की। कटुता की पहली तीखी ईंट उसी दिन दोनों के बीच रख दी गई थी।
विवाद अभी सुलझा भी नहीं था कि एक दिन वह अनहोनी घट गई जिसका अनुराग को अंदेशा था। मोहल्ले के निवासियों ने तंग गलियों में ट्रकों की आवाजाही और आग के भारी खतरे को देखते हुए नगर निगम और दमकल विभाग में गुप्त शिकायत दर्ज करा दी। एक दोपहर अचानक सायरन बजाती हुई प्रशासनिक गाड़ियाँ ‘शांति-सदन’ के सामने आकर रुकीं। अधिकारियों के दल ने मकान का मुआयना किया और अवैध रूप से किए जा रहे भारी व्यावसायिक भंडारण को तुरंत सील करने का आदेश दे दिया। वंदना के हिस्से के कमरों पर सरकारी ताले लटक गए और भारी जुर्माने का नोटिस चस्पा कर दिया गया। जब हेमंत और वंदना को यह खबर मिली, तो उन्होंने बिना सोचे-समझे यह मान लिया कि यह सब अनुराग का किया-धरा है। हेमंत ने वंदना के कान भरते हुए कहा कि अनुराग ने ही अधिकारियों को रिश्वत देकर यह छापा पड़वाया है ताकि वह उन्हें बेइज्जत करके भगा सके। वंदना अंधी नफ़रत में मायके दौड़ी आई और उसने सबके सामने अपने भाई पर विश्वासघात का घिनौना आरोप लगाया। सच्चाई तो यह थी कि अनुराग ने अपने सीए संपर्कों, कानूनी ज्ञान और भारी व्यक्तिगत धन खर्च करके उस मामले को किसी तरह शांत कराया था ताकि परिवार का नाम अदालत और थानों में न घसीटा जाए। परंतु वंदना सुनने को तैयार नहीं थी। उसने चीखते हुए कहा, “तुमने मेरी पीठ में छुरा घोंपा है अनुराग! अब इस घर में मेरा एक पल भी रहना संभव नहीं।”
अंधे गुस्से और हेमंत के बहकावे में आकर वंदना ने वह आत्मघाती कदम उठा लिया जिसने उस परिवार की बची-खुची मर्यादा को भी धूल में मिला दिया। हेमंत ने एक स्थानीय प्रॉपर्टी डीलर से साँठगाँठ की और वंदना के कानूनी हिस्से को एक अज्ञात, बाहरी कबाड़ी व्यापारी को औने-पौने दाम में बेच दिया। समझौते के अनुसार, रातों-रात उस पुश्तैनी मकान के दालान, आँगन और छत के ठीक बीचो-बीच छह फीट ऊँची ईंटों की दीवार खड़ी कर दी गई। जिस दिन वह दीवार चुनी जा रही थी, कल्याणी देवी अपने मृत पति की तस्वीर से लिपटकर फूट-फूट कर रो रही थीं। ईंट का हर रद्दा उनके कलेजे पर हथौड़े की तरह पड़ रहा था। दीवार बनते ही मकान के उस पार का हिस्सा एक अजनबी को सौंप दिया गया। अब ‘शांति-सदन’ का आधा हिस्सा अंधकारमय और संकरा हो चुका था। हवा का आना बंद हो गया था और जिस आँगन में तुलसी का बिरवा लगा था, वह उस पार चला गया था। अनुराग का स्वाभिमान भीतर तक लहूलुहान हो गया। उसने अपनी बहन से जीवन भर के लिए मुँह मोड़ लिया। दोनों परिवारों के बीच बोलचाल, आना-जाना और बच्चों का मिलना पूरी तरह समाप्त हो गया। भाई-बहन का अटूट रिश्ता अब गहरी शत्रुता और कड़वाहट के मलबे में दब चुका था।
इस दर्दनाक हादसे के बाद के पाँच वर्ष कल्याणी देवी के लिए किसी नर्क से कम नहीं थे। वे दिन भर उस दीवार को देखती रहतीं और घुटती रहतीं। अनुराग ने अपने काम में खुद को झोंक दिया था। घर का संकरापन और सीलन भरे कमरे अब उसके बच्चों की सेहत पर असर डालने लगे थे। अनुराग मन ही मन यह विचार कर रहा था कि इस बँटे हुए और मनहूसियत से भरे पुश्तैनी मकान को किसी तरह बेच दिया जाए और शहर के बाहरी इलाके में किसी आधुनिक बहुमंजिला इमारत में एक फ्लैट खरीद लिया जाए ताकि वे इस रोज-रोज की मानसिक यंत्रणा से मुक्त हो सकें। शैलजा भी पति के तनाव को देखकर उसका समर्थन करती थी। परंतु कल्याणी देवी का मन उस घर को छोड़ने को कतई तैयार नहीं था; उनकी हर सांस अपने स्वर्गीय पति की स्मृतियों से जुड़ी थी। वे अक्सर रात को चुपचाप उठकर उस दीवार को हाथ से छूतीं और सोचतीं कि काश उनके बच्चे उस प्यार को याद कर पाते जिसे उन्होंने अपने खून से सींचा था। वंदना भी अपने ससुराल में पूरी तरह खुश नहीं थी। जिस व्यापार के लिए उसने अपने मायके की बलि चढ़ा दी थी, उसमें हेमंत को बाद के वर्षों में भारी घाटा हुआ था। उस घाटे ने हेमंत के मिजाज को और चिड़चिड़ा बना दिया था। वंदना जब भी अपनी बेटी पावनी के विवाह की बात सोचती, तो उसका कलेजा कांप उठता कि मायके के बिना, मामा के आशीष के बिना वह अपनी बेटी की डोली कैसे उठाएगी? उसने कई बार अपनी माँ को गुप्त रूप से संदेश भेजे, पर अनुराग की नाराजगी के डर से कभी सीधी चौखट लांघने का साहस नहीं जुटा सकी।
और आज, पावनी की सगाई का यह निमंत्रण पत्र उस सन्नाटे को तोड़ने का अंतिम प्रयास बनकर कल्याणी देवी के हाथ में था। कल्याणी देवी ने बहुत हिम्मत करके, काँपते स्वर में अनुराग को अपने कमरे में बुलाया। अनुराग जब अपनी माँ के पास आकर बैठा, तो कल्याणी देवी ने अपना मोबाइल उसकी हथेली पर रख दिया। स्क्रीन पर पावनी की हँसमुख तस्वीर और सगाई का कार्ड चमक रहा था। कार्ड देखते ही अनुराग के चेहरे का रंग बदल गया। उसकी आँखें सख्त हो गईं और जबड़े भिंच गए। उसने मोबाइल वापस बिस्तर पर रखते हुए कठोर स्वर में कहा, “माँ, आप अब भी उससे संपर्क रखती हैं? क्या आप भूल गईं कि उस औरत और उसके पति ने हमारे साथ क्या किया था? हमारे बाबूजी की यादों को बाजार में बेच दिया, हमारे सीने पर यह दीवार खड़ी कर दी और हमें पूरे शहर में तमाशा बना दिया। जिस बहन ने अपने भाई के सम्मान की परवाह नहीं की, उसके घर मेरा या मेरे परिवार का कोई नाता नहीं हो सकता। मेरे लिए वह रिश्ता उसी दिन मर गया था जिस दिन इस आँगन में यह दीवार चुनी गई थी।” अनुराग उठकर जाने लगा, परंतु कल्याणी देवी ने आगे बढ़कर उसका हाथ कसकर पकड़ लिया।
कल्याणी देवी की आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। उन्होंने अत्यंत कातर और टूटे हुए स्वर में कहा, “अनुराग बेटा, मेरी बात सुन ले। तू मेरा बेटा है, पर वह भी तो मेरी ही कोख से जन्मी है। तू सही है, उसके पति ने लालच किया और वंदना ने नादानी में अपने अहंकार को रिश्तों से बड़ा समझ लिया। उसने जो किया, वह अक्षम्य था। पर बेटा, क्या गलतियों की सजा पीढ़ियों तक चलती रहेगी? पावनी तेरी भांजी है। जब वह नन्हीं सी थी, तो तेरी उँगली पकड़कर चलना सीखी थी। वह हर रक्षाबंधन पर तुझे राखी बांधने के लिए तेरे लौटने का इंतज़ार करती थी। कल जब समाज के लोग मंडप में पूछेंगे कि लड़की का सगा मामा कहाँ है, तो उस बच्ची का सिर शर्म से झुक जाएगा। क्या तू अपनी भांजी को उस गलती की सजा देगा जो उसने कभी की ही नहीं?” कल्याणी देवी ने अपने दोनों हाथ अपने बेटे के आगे जोड़ दिए, “बेटा, मैं अब बहुत बूढ़ी हो चुकी हूँ। मेरी आँखें मुंदने से पहले क्या मैं अपने बच्चों को एक बार गले मिलते नहीं देख सकती? क्या तू अपनी मरी हुई माँ की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं करेगा?” माँ के इन शब्दों ने अनुराग के भीतर वर्षों से जमी बर्फ की चट्टान को भीतर तक हिला दिया। वह बिना कुछ कहे भारी कदमों से अपने कमरे में चला गया और रात भर बेचैनी से करवटें बदलता रहा।
अगले दिन सगाई का दिन था। वंदना के ससुराल के भव्य बैंक्वेट हॉल में मेहमानों का जमावड़ा लगा हुआ था। संगीत की मधुर धुनें बज रही थीं, पर वंदना का मन किसी वीराने की तरह खाली था। वह सज-धजकर खड़ी तो थी, पर उसकी नजरें बार-बार मुख्य प्रवेश द्वार पर जाकर टिक जाती थीं। उसने अपनी माँ को कार्ड भेजा था, पर उसे रत्ती भर भी उम्मीद नहीं थी कि अनुराग अपनी नफ़रत को भुलाकर आएगा। हेमंत भी एक कोने में असहज खड़ा था; उसे भी अपने पुराने किए पर शर्मिंदगी महसूस हो रही थी क्योंकि रिश्तेदारों ने आते ही पूछना शुरू कर दिया था कि समधी जी, लड़की के मामा अभी तक दिखाई नहीं दिए? रस्म का समय निकट आ रहा था। पुरोहित जी ने पुकारा, “कन्या के मामा को बुलाइए, गोद-भराई और चुनरी की रस्म मामा के बिना पूर्ण नहीं हो सकती।” वंदना की आँखों से बेबसी के आँसू छलक पड़े। उसने सिर झुका लिया और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करने लगी। तभी मुख्य द्वार पर एक हलचल हुई।
पूरा हॉल अचानक शांत हो गया। दरवाजे पर अनुराग खड़ा था। उसके एक हाथ में सगाई के शगुन का बड़ा थाल था और दूसरे हाथ से उसने अपनी वृद्ध माँ कल्याणी देवी को सहारा दे रखा था। उनके पीछे शैलजा दोनों बच्चों के साथ सजी-धवजी खड़ी थी। अनुराग के चेहरे पर कोई बनावटी मुस्कान नहीं थी, केवल एक गंभीर, आत्मीय गरिमा थी। वंदना ने जब अपने भाई को देखा, तो उसके पैरों से चप्पलें छूट गईं। वह अपनी सुध-बुध खोकर, भरी महफ़िल के बीच दौड़ती हुई आई और अपने भाई के सीने से लगकर फफक-फफक कर रो पड़ी। “भैया! मुझे माफ कर दो भैया! मैंने अपने लालच और नासमझी में सब कुछ बर्बाद कर दिया। मैं आपकी बहन कहलाने के लायक नहीं हूँ भैया!” वंदना के विलाप ने वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति की आँखें नम कर दीं। अनुराग ने पहले तो खुद को कठोर रखने का प्रयास किया, पर जैसे ही उसकी बहन के आँसू उसके कुर्ते पर गिरे, सात साल का सारा गुस्सा, सारा बैर एक पल में बह गया। अनुराग ने अपनी बहन के सिर पर हाथ रखा और रुंधे हुए गले से कहा, “पगली, कोई भाई अपनी बहन से हमेशा के लिए रूठ सकता है क्या? तूने गलती की थी, पर सजा तो हम दोनों भुगत रहे थे। आज अपनी बेटी का शुभ दिन है, रोना बंद कर।”
उसी समय हेमंत भी सिर झुकाए आगे आया। उसके चेहरे पर गहरा पश्चाताप था। उसने अनुराग के सामने दोनों हाथ जोड़ दिए और भर्राई आवाज़ में बोला, “अनुराग, मुझे माफ कर दो। व्यापारिक स्वार्थ और अंधे लालच ने मेरी मति भ्रष्ट कर दी थी। मैंने एक हँसते-खेलते परिवार के आँगन में दीवार खिंचवा दी। मैं समाज में मुँह दिखाने लायक नहीं था, फिर भी तुम यहाँ आकर मेरा मान रख रहे हो। मैं तुम्हारा यह उपकार जीवन भर नहीं भूलूंगा।” अनुराग ने आगे बढ़कर हेमंत के हाथ थाम लिए और कहा, “जीजा जी, जो बीत गया उसे वहीं छोड़ दीजिए। आज हमारी बेटी की ज़िंदगी की नई शुरुआत है, आज सिर्फ खुशियों की बात होगी।” इसके बाद पूरे विधि-विधान से सगाई की रस्म पूरी हुई। अनुराग ने अपनी भांजी पावनी के सिर पर चुनरी ओढ़ाई और उसे सोने का हार भेंट करते हुए ऐसा आशीष दिया कि पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। कल्याणी देवी एक कोने में खड़ी होकर दोनों हाथ जोड़कर ईश्वर का धन्यवाद कर रही थीं; उनके चेहरे पर कई वर्षों बाद वह दिव्य शांति लौटी थी जो केवल एक माँ ही महसूस कर सकती है।
सगाई का समारोह संपन्न होने के तीन दिन बाद, एक चमचमाती सुबह को ‘शांति-सदन’ के सामने दो बड़ी गाड़ियाँ आकर रुकीं। गाड़ी से हेमंत, वंदना और उनके बच्चे उतरे। उनके साथ वही कबाड़ी व्यापारी भी था जिसने सात वर्ष पूर्व मकान का वह आधा हिस्सा खरीदा था। अनुराग हैरान होकर बाहर निकला। हेमंत ने आगे बढ़कर अपनी जेब से रजिस्ट्री के मूल कागजात निकाले और अनुराग के हाथों में रख दिए। हेमंत ने अत्यंत विनम्रता से कहा, “अनुराग, पिछले तीन दिनों में मैंने अपनी सारी जमा-पूँजी लगाकर और थोड़ा कर्ज़ लेकर इस व्यापारी से हमारे पुश्तैनी हिस्से को दोगुने दाम में वापस खरीद लिया है। यह कागजात अब तुम्हारे और वंदना के संयुक्त नाम पर हैं।” इससे पहले कि अनुराग कुछ समझ पाता, हेमंत ने पीछे खड़े मजदूरों को इशारा किया। मजदूरों के हाथों में भारी हथौड़े थे। हेमंत ने पहला हथौड़ा खुद अपने हाथ में लिया और उस मनहूस ईंटों की दीवार पर पूरी ताकत से दे मारा। एक जोरदार आवाज के साथ दीवार की ऊपरी ईंटें भरभराकर गिर पड़ीं।
मजदूरों ने देखते ही देखते उस छह फीट ऊँची दीवार को जड़ से ढहा दिया। वर्षों से बंद पड़ा वह आँगन एक झटके में फिर से विशाल और खुला हो गया। दीवार के गिरते ही सुबह की सुनहरी, ताज़ी धूप पूरे दालान में फैल गई, मानो सूर्यदेव स्वयं इस पुनर्मिलन का स्वागत कर रहे हों। दोनों परिवारों के बच्चे खुशी से चीखते हुए एक-दूसरे से गले मिल गए और पूरे आँगन में दौड़ने लगे। कल्याणी देवी धीरे-धीरे चलकर उस जगह आईं जहाँ अभी-अभी दीवार का मलबा पड़ा था। उन्होंने झुककर उस खुली ज़मीन को छुआ और रोते हुए अपने दोनों बच्चों—अनुराग और वंदना—को अपने आंचल में समेट लिया। विश्वेश्वर दयाल की टंगी हुई तस्वीर पर लगा फूलों का हार मानो हवा के झोंके से धीरे से हिलकर अपनी मूक स्वीकृति दे रहा था। नफ़रत की वह दीवार हमेशा के लिए ढह चुकी थी और प्यार की छाँव में ‘शांति-सदन’ एक बार फिर अपने नाम को सार्थक कर रहा था।
संसार में धन, संपत्ति और ईंट-पत्थरों के मकान तो दोबारा बनाए जा सकते हैं, परंतु सगे रिश्तों की जो पवित्र डोर एक बार टूट जाती है, उसे जोड़ना अत्यंत कठिन होता है। अक्सर ज़रा सा व्यापारिक स्वार्थ, गलतफहमी और झूठा अहंकार हमारे सबसे प्यारे अपनों के बीच नफ़रत की दीवारें खड़ी कर देता है। यदि समय रहते कोई एक पक्ष क्षमा और बड़प्पन का मार्ग चुन ले, तो बिखरते हुए परिवार फिर से स्वर्ग बन सकते हैं। क्या आपके विचार में भी पारिवारिक विवादों में संपत्ति के बँटवारे से ज्यादा रिश्तों के मान-सम्मान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? अपने अमूल्य विचार और अनुभव हमें कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।
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