शक की दीवार

प्रभात जी ने अत्यंत गंभीर और भारी आवाज़ में कहा, “कल्याणी! दाल में कुछ काला नहीं है, बल्कि तुम्हारी सोच का चश्मा ही पूरी तरह काला हो चुका है। बहू में कोई खोट नहीं है, सारा खोट और गड़बड़ तुम्हारे अपने दिमाग में है। जानती हो क्यों? क्योंकि जब तुम इस घर में नई बहू बनकर आई थी, तब तुमने अपनी सास यानी मेरी माँ के साथ यही सब छल-कपट किया था। तुम छिपाकर चीज़ें खाती थीं, तुम हर बात में सास की बुराई अपने मायके में करती थीं। आज जब तुम्हारी बहू तुम्हें अपनी सगी माँ जैसा मानकर, तुम्हारी हर अनुचित शंका का जवाब अपने अनूठे प्रेम और त्याग से दे रही है, तब भी तुम उसे अपनी ही पुरानी परछाईं समझ रही हो! जो इंसान जैसा खुद होता है, वह पूरी दुनिया को उसी नजरिए से देखता है।”

  शिखा अपनी सधी हुई चाल और चेहरे पर सौम्य मुस्कान लिए नाश्ते की तैयारी में जुटी थी। शिखा का विवाह दो वर्ष पूर्व एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत अमित के साथ हुआ था। विवाह के तुरंत बाद दोनों को कंपनी के प्रोजेक्ट के सिलसिले में शहर से दूर जाना पड़ा था, इसलिए परिवार के साथ ज़्यादा समय बिताने का अवसर नहीं मिल सका। अब जब ससुर प्रभात जी सरकारी बैंक के वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए, तो अमित और शिखा ने उन्हें अपने पास ही इंदौर बुला लिया। शिखा के मन में अपने सास-ससुर के प्रति असीम आदर था। उसने अपने मायके में हमेशा अपनी माँ को दादी की सेवा निस्वार्थ भाव से करते देखा था, वही संस्कार उसके अंतर्मन में रचे-बसे थे।

ससुर प्रभात जी शांत, विवेकशील और सुलझे हुए व्यक्तित्व के धनी थे, किंतु सास कल्याणी देवी का स्वभाव इसके विपरीत था। उनके भीतर पुरानी रूढ़ियों, असुरक्षा और बहू के प्रति एक अनकहा अविश्वास हमेशा घर किए रहता था। वे हर बात में कोई न कोई खोट ढूँढने की आदी थीं। शिखा सुबह पाँच बजे उठकर कल्याणी देवी की पूजा की थाली सजाती, उनके घुटनों के दर्द के लिए गरम तेल तैयार रखती और नाश्ते में उनकी पसंद का दलिया बनाती। फिर भी कल्याणी देवी की आँखों में संतोष का भाव कभी दिखाई नहीं देता था।

एक दिन दोपहर के समय शिखा बैठक की मेज पर रखे फूलदान को ठीक कर रही थी। तभी सास-ससुर के कमरे से कल्याणी देवी की दबी हुई किंतु तीखी आवाज़ सुनाई दी। वे प्रभात जी से कह रही थीं, “सुनिए जी, आपने गौर किया? यह शिखा हमारे लिए जो बादाम और काजू का डिब्बा रसोई में रखती है, उसमें से आधा तो खुद ही चट कर जाती होगी। हमें कटोरी में बस चार-चार दाने गिनकर देती है। बाहर से इतना महंगा मेवा आता है और हमारे हिस्से बस दिखावा आता है।”

प्रभात जी ने चश्मा उतारते हुए धीमे स्वर में कहा, “कल्याणी, बहू डॉक्टर के कहे अनुसार ही हमें नपा-तुला देती है। बुढ़ापे में ज़्यादा मेवा पचता नहीं है। तुम बेवजह हर बात में खोट क्यों निकालती हो?” पर कल्याणी देवी कहाँ मानने वाली थीं, वे बड़बड़ाती रहीं।

दरवाजे के बाहर खड़ी शिखा ने जब यह सुना, तो उसके सीने में एक टीस उठी। उसने सोचा कि अगर वह सफाई देने जाएगी, तो बात बहस में बदल जाएगी और घर की शांति भंग होगी। उसने इस समस्या को अपने ढंग से सुलझाने का निश्चय किया।

शाम को बाज़ार से लौटते समय शिखा किराने की दुकान से काजू, बादाम, अखरोट और पिस्ते के बड़े-बड़े सीलबंद जार खरीद लाई। रात के भोजन के बाद वह वे सारे जार एक सुंदर ट्रे में सजाकर सीधे कल्याणी देवी के कमरे में ले गई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “माँ जी, पिताजी को और आपको रोज़ सुबह मेवे लेने रसोई तक आना पड़ता है। कई बार मैं काम में व्यस्त होती हूँ तो देने में देर हो जाती है। इसलिए मैंने ये सारे जार आपकी अलमारी की सबसे सामने वाली रैक पर रख दिए हैं। आप दोनों अपनी पसंद और इच्छा के अनुसार जब चाहें, जितना चाहें खाएं। जब खत्म होने वाला हो, बस एक बार बता दीजिएगा, अमित नया मँगवा देंगे।”

कल्याणी देवी ने अवाक होकर जार देखे और फिर शिखा का चेहरा। उनके पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं बचा था। प्रभात जी ने मन ही मन बहू की सूझबूझ की सराहना की।

कुछ हफ्ते बीते। घर की व्यवस्था सामान्य लग रही थी, लेकिन कल्याणी देवी का संशय शांत नहीं हुआ था। एक दिन दोपहर में कल्याणी देवी बालकनी में बैठकर अपनी बेटी वंदना से मोबाइल पर बात कर रही थीं। शिखा पौधों को पानी दे रही थी, तभी सास की आवाज़ उसके कानों में पड़ी, “अरे वंदना, क्या बताऊँ! ऊपर से तो बड़ी संस्कारी बनती है, पर दाल में घी का छौंक ऐसे लगाती है जैसे कोई उपकार कर रही हो। कल ही मैंने देखा, जब अपने लिए कटोरी में दाल निकाली तो चम्मच भरकर शुद्ध घी डाला और हमारे लिए बस नाममात्र की एक बूँद! घी का असली पीपा तो अंदर छुपाकर रखती है।”

शिखा ने एक गहरी सांस ली। उसने मन ही मन सोचा कि शिकायत का जवाब शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार से देना ही सबसे बेहतर उपाय है। अगले ही दिन शिखा ने गाँव से मंगवाया हुआ शुद्ध गाय के देसी घी का पाँच किलो का नया पीपा और एक सुंदर चीनी मिट्टी की बरनी उठाई और सास के कमरे में रख दी।

दोपहर में जब कल्याणी देवी आराम कर रही थीं, शिखा ने विनीत स्वर में कहा, “माँ जी, आपको तो पता ही है कि मुझे अक्सर काम के सिलसिले में या खरीदारी के लिए बाहर जाना पड़ता है। रसोई में काम करने वाली बाई भी कई बार कम घी डाल देती है। मुझे हमेशा चिंता रहती है कि आप दोनों को खाने में स्वाद आ रहा है या नहीं। इसलिए यह पूरा पीपा और बरनी मैंने आपके पलंग के पास वाली तिपाई पर रख दी है। आप जब भी भोजन करने बैठें, अपनी इच्छानुसार जितना मन करे उतना घी अपनी और पिताजी की थाली में डाल लिया करें। मुझे इससे बहुत तसल्ली रहेगी।”

कल्याणी देवी का चेहरा एक पल के लिए फक पड़ गया। वे केवल सिर हिलाकर रह गईं। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि बहू पर अब किस बात का दोषारोपण करें।

परंतु मानव स्वभाव का वहम बड़ी गहरी जड़ें जमाए बैठा होता है। कुछ ही दिनों बाद गर्मियों के मौसम में अमित बाज़ार से कई टोकरी ताजे फल लेकर आया—आम, सेब, अनार और अंगूर। शिखा ने फल धोकर फ्रिज में रख दिए और रोज़ की तरह दोपहर में एक बड़ी प्लेट काटकर सास-ससुर को दी।

उस रात कल्याणी देवी फिर अपने पति के कान भरने लगीं, “देखा आपने? अमित इतनी पेटियाँ भरकर फल लाया था। हमारे आगे बस दो फांक सेब और चार दाने अंगूर रख दिए। बाकी सब फल कहाँ गए? ज़रूर पीछे से खुद खा जाती है या अपनी सहेलियों को बुलाकर खिला देती होगी। हमें तो बस बीमारों की तरह थोड़ा-सा पकड़ा दिया जाता है।”

प्रभात जी झुँझला उठे, “कल्याणी, तुम्हें मधुमेह है! डॉक्टर ने मीठे फल सीमित मात्रा में खाने को कहा है। वह तुम्हारी सेहत का ख्याल रख रही है, पर तुम्हें हर बात में षड्यंत्र ही नज़र आता है।”

शिखा उस समय दालान से गुजर रही थी और यह संवाद उसके कानों में पड़ गया। इस बार शिखा को थोड़ी निराशा हुई, लेकिन उसने अपना धैर्य नहीं खोया। उसने अगले दिन एक बड़ा कदम उठाने की ठानी।

अगली सुबह जब प्रभात जी और कल्याणी देवी टहलकर लौटे, तो उन्होंने देखा कि दो मजदूर रसोई से बड़ा वाला डबल-डोर फ्रिज उठाकर सीधे उनके बेडरूम के कोने में रख रहे थे। बिजली का प्लग लगाकर फ्रिज चालू कर दिया गया था।

कल्याणी देवी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने घबराकर पूछा, “अरे शिखा! यह क्या हो रहा है? रसोई का फ्रिज हमारे कमरे में क्यों रखवा दिया?”

शिखा ने अपने चेहरे पर वही शांत, सहज और आत्मीय मुस्कान लाते हुए कहा, “माँ जी, इस उम्र में ठंडे पानी, दूध या फलों के लिए आपको बार-बार रसोई के चक्कर लगाने पड़ते हैं। आपके घुटनों में पहले से ही दर्द रहता है। अब फल, मेवे, दूध और सब कुछ इसी फ्रिज में रहेगा। आप अपनी मर्जी से जब चाहें जो फल खाना चाहें, निकाल सकती हैं। मुझे जब खाना बनाने के लिए सब्ज़ियाँ या दूध चाहिए होगा, मैं यहीं आकर ले जाया करूँगी। इससे आपकी सेहत भी ठीक रहेगी और आपको किसी चीज़ की कमी भी नहीं खलेगी।”

इतना कहकर शिखा आदरपूर्वक सिर झुकाकर कमरे से बाहर चली गई। कमरे में एक सन्नाटा पसर गया।

प्रभात जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए और उन्होंने एक तीखी, व्यंग्यात्मक दृष्टि कल्याणी देवी पर डाली। वे शांत स्वर में बोले, “लो कल्याणी, अब तो तुम्हारी सारी शिकायतें दूर हो गईं। मेवे तुम्हारे कमरे में हैं, शुद्ध घी का पीपा तुम्हारे सिरहाने रखा है, और अब पूरा का पूरा फ्रिज भी तुम्हारे कमरे में आ गया। अब तो तुम्हें बहू पर कोई शक नहीं होगा ना?”

कल्याणी देवी ने अपनी साड़ी का पल्लू उँगलियों में लपेटते हुए झेंप मिटाने की कोशिश की और बोलीं, “हाँ… वो तो ठीक है जी। पर… पर मेरा मन फिर भी नहीं मानता। मुझे पक्का यकीन है कि वह कोई न कोई चाल तो चल ही रही होगी। आखिर बहू है, अपने हाथ की बागडोर इतनी आसानी से सास को कैसे सौंप सकती है? ज़रूर दाल में कुछ काला है।”

यह सुनते ही प्रभात जी के चेहरे पर एक गहरा दुख और आक्रोश उभर आया। वे अपनी जगह से उठे और कल्याणी देवी के बिल्कुल सामने आकर खड़े हो गए।

प्रभात जी ने अत्यंत गंभीर और भारी आवाज़ में कहा, “कल्याणी! दाल में कुछ काला नहीं है, बल्कि तुम्हारी सोच का चश्मा ही पूरी तरह काला हो चुका है। बहू में कोई खोट नहीं है, सारा खोट और गड़बड़ तुम्हारे अपने दिमाग में है। जानती हो क्यों? क्योंकि जब तुम इस घर में नई बहू बनकर आई थी, तब तुमने अपनी सास यानी मेरी माँ के साथ यही सब छल-कपट किया था। तुम छिपाकर चीज़ें खाती थीं, तुम हर बात में सास की बुराई अपने मायके में करती थीं। आज जब तुम्हारी बहू तुम्हें अपनी सगी माँ जैसा मानकर, तुम्हारी हर अनुचित शंका का जवाब अपने अनूठे प्रेम और त्याग से दे रही है, तब भी तुम उसे अपनी ही पुरानी परछाईं समझ रही हो! जो इंसान जैसा खुद होता है, वह पूरी दुनिया को उसी नजरिए से देखता है।”

प्रभात जी की आवाज़ थोड़ी और गंभीर हो गई, “शिखा चाहती तो तुम्हारे तानों का जवाब तीखी आवाज़ में दे सकती थी। वह अमित से शिकायत करके इस घर में महाभारत खड़ी कर सकती थी। पर उस बच्ची ने तुम्हारा मान रखने के लिए अपने आत्मसम्मान को भी किनारे रख दिया और घर की सारी चाबियाँ, सारी व्यवस्था तुम्हारे चरणों में लाकर डाल दी। पर अफ़सोस, वहम का इलाज तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं था, तो बेचारी शिखा के पास कहाँ से होगा!”

प्रभात जी इतना कहकर कमरे से बाहर चले गए।

कमरे में कल्याणी देवी बिल्कुल अकेली रह गईं। कमरे का शांत वातावरण और सामने रखा फ्रिज, मेवों के जार और घी का पीपा मानो उन पर हँस रहे थे। प्रभात जी का एक-एक शब्द कल्याणी देवी के कानों में हथौड़े की तरह बज रहा था।

वे बिस्तर पर बैठ गईं। उनकी आँखों के सामने बीते तीस साल का चलचित्र घूमने लगा। उन्हें याद आया कि कैसे जवानी के दिनों में वे अपनी सास की हर बात पर तिलमिला जाती थीं, कैसे अपनी सास से छिपाकर अलमारी में मिठाइयाँ रखती थीं। आज जब शिखा ने उनके शक के बदले अपने पूरे दिल और रसोई के सारे दरवाजे खोल दिए थे, तब कल्याणी देवी को अपनी ही संकीर्णता का अहसास हुआ। उनकी अंतरात्मा ने उन्हें झकझोर कर रख दिया। वे भीतर तक काँप उठीं। उन्हें समझ आ गया कि बहू कोई पराई नहीं, बल्कि उनके ही घर की लक्ष्मी थी, जिसे वे अपनी ही पुरानी दुर्भावनाओं की कसौटी पर कस रही थीं। पश्चाताप के आंसुओं ने कल्याणी देवी के गालों को भिगो दिया।

कल्याणी देवी धीरे-धीरे उठीं और भारी कदमों से रसोई की ओर बढ़ीं। रसोई में शिखा शाम के भोजन के लिए रोटियाँ बेल रही थी। उसके चेहरे पर वही पुरानी शांति और सेवा भाव था, किसी प्रकार का कोई क्रोध या शिकवा नहीं।

कल्याणी देवी ने पीछे से जाकर धीरे से शिखा के कंधे पर हाथ रखा। शिखा पलटी और उसने देखा कि सास की आँखों से लगातार आँसू बह रहे हैं।

“माँ जी! क्या हुआ? आपकी तबीयत तो ठीक है ना?” शिखा ने घबराते हुए पूछा और अपने हाथों का आटा पोंछकर उन्हें सहारा देने लगी।

कल्याणी देवी ने बिना कुछ कहे शिखा को अपने सीने से लगा लिया। एक सास के सीने से लगकर बहू का सारा संयम भी पल भर के लिए पिघल गया।

कल्याणी देवी ने रोते हुए कहा, “मुझे माफ कर दे, बेटी! मैं अपनी ही पुरानी गलतियों और शक के अंधेरे में इतनी अंधी हो गई थी कि तेरी निस्वार्थ सेवा और पवित्र मन को देख ही नहीं पाई। तूने अपने त्याग से आज मेरी आँखें खोल दी हैं। एक माँ अपनी बेटी पर कभी शक नहीं करती, और तूने साबित कर दिया कि तू बहू नहीं, मेरी सबसे प्यारी बेटी है।”

शिखा की आँखों से भी आँसू छलक पड़े। उसने सास के हाथ थामे और कहा, “माँ जी, आप घर की सबसे बड़ी हैं। आपका हक है हम पर। अगर मुझसे कोई गलती हुई हो तो मुझे माफ कर दीजिए।”

उसी समय प्रभात जी और अमित भी वहाँ आ पहुँचे। दोनों ने दरवाजे पर खड़े होकर यह दृश्य देखा। कल्याणी देवी ने अमित की ओर देखकर कहा, “अमित बेटा, उन मजदूरों को बुलाओ और वह फ्रिज वापस रसोई में रखवाओ। यह रसोई, यह घर और हम सब इस शिखा के भरोसे ही सुरक्षित और खुश हैं। आज से इस घर की मालकिन मैं नहीं, मेरी बेटी शिखा है।”

प्रभात जी के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। घर का माहौल जो अब तक एक अनकहे तनाव से भरा हुआ था, वह एकाएक प्रेम, सम्मान और विश्वास की मधुर सुगंध से महक उठा। शिखा की समझदारी, मौन साधना और सकारात्मक दृष्टिकोण ने एक बिखरते हुए रिश्ते को हमेशा के लिए अटूट बना दिया था।

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 डॉ अंजना गर्ग

                      म द वि रोहतक

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